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सलीम अहमद

1927 - 1983 | कराची, पाकिस्तान

पाकिस्तान के प्रमुखतम आलोचकों में विख्यात/ऐंटी-गज़ल रूझान और आधुनिकता-विरोधी विचारों के लिए प्रसिद्ध

पाकिस्तान के प्रमुखतम आलोचकों में विख्यात/ऐंटी-गज़ल रूझान और आधुनिकता-विरोधी विचारों के लिए प्रसिद्ध

सलीम अहमद

ग़ज़ल 64

नज़्म 22

अशआर 70

दर-ब-दर ठोकरें खाईं तो ये मालूम हुआ

घर किसे कहते हैं क्या चीज़ है बे-घर होना

घास में जज़्ब हुए होंगे ज़मीं के आँसू

पाँव रखता हूँ तो हल्की सी नमी लगती है

जाने शेर में किस दर्द का हवाला था

कि जो भी लफ़्ज़ था वो दिल दुखाने वाला था

सच तो कह दूँ मगर इस दौर के इंसानों को

बात जो दिल से निकलती है बुरी लगती है

इतनी काविश भी कर मेरी असीरी के लिए

तू कहीं मेरा गिरफ़्तार समझा जाए

क़ितआ 2

 

लेख 47

मसनवी 1

 

पुस्तकें 16

वीडियो 31

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ऑडियो 18

कोई सितारा-ए-गिर्दाब आश्ना था मैं

जाने किसी ने क्या कहा तेज़ हवा के शोर में

ज़िंदगी मौत के पहलू में भली लगती है

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