सख़ी लख़नवी
ग़ज़ल 34
अशआर 53
जाएगी गुलशन तलक उस गुल की आमद की ख़बर
आएगी बुलबुल मिरे घर में मुबारकबाद को
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बहुत ख़्वाब-ए-ग़फ़लत में दिन चढ़ गया
उठो सोने वालो फिर आएगी रात
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एक दो तीन चार पाँच छे सात
यूँही गिन लेंगे कम के क्या मअनी
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हिचकियाँ आती हैं पर लेते नहीं वो मेरा नाम
देखना उन की फ़रामोशी को मेरी याद को
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बात करने में होंट लड़ते हैं
ऐसे तकरार का ख़ुदा-हाफ़िज़
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