प्रियंवदा इल्हान
ग़ज़ल 30
अशआर 17
कीजे इज़हार-ए-मोहब्बत चाहे जो अंजाम हो
ज़िंदगी में ज़िंदगी जैसा कोई तो काम हो
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जो कहकशाँ सी नज़र आती हैं मिरी आँखें
गुज़िश्ता शब के ये आँसू हैं जो सितारे हुए
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ज़रा सी बात नहीं है किसी का हो जाना
कि उम्र लगती है बुत को ख़ुदा बनाने में
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फ़िक्र तेरी ठीक पर मेरी अना का भी तो सोच
दूर से बस देख ले ज़ख़्मों को मेरे छू नहीं
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अलग बात है ये कि तुम सुन न पाए
मगर हम ने तुम को पुकारा बहुत है
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