नज़ीर फ़तेहपूरी
अशआर 1
कौन अब उस को उजड़ने से बचा सकता है
हाए वो घर कि जो अपने ही मकीं का न रहा
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere