मुर्ली धर शाद
ग़ज़ल 16
अशआर 1
कभी थी वो ग़ुस्से की चितवन क़यामत
कभी आजिज़ी से मनाना किसी का
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere