मुनीर सैफ़ी
ग़ज़ल 22
अशआर 1
क़त्ल के कब थे ये सारे सामाँ
एक तीर एक कमाँ थी पहले
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere