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मुग़ीसुद्दीन फ़रीदी

1926 | दिल्ली, भारत

मुग़ीसुद्दीन फ़रीदी

ग़ज़ल 16

अशआर 6

इस दौर में इंसान का चेहरा नहीं मिलता

कब से मैं नक़ाबों की तहें खोल रहा हूँ

तिरी अदाओं की सादगी में किसी को महसूस भी न होगा

अभी क़यामत का इक करिश्मा हया के दामन में पल रहा है

सिर्फ़ अल्फ़ाज़ पे मौक़ूफ़ नहीं लुत्फ़-ए-सुख़न

आँख ख़ामोश अगर है तो ज़बाँ कुछ भी नहीं

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अब किसी दर्द का शिकवा न किसी ग़म का गिला

मेरी हस्ती ने बड़ी देर में पाया है मुझे

है 'फ़रीदी' अजब रंग-ए-बज़्म-ए-जहाँ मिट रहा है यहाँ फ़र्क़-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ

नूर की भीक तारों से लेने लगा आफ़्ताब अपनी इक इक किरन बेच कर

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