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महशर आफ़रीदी

1966 | मुंबई, भारत

महशर आफ़रीदी

ग़ज़ल 38

अशआर 12

ज़मीं पर घर बनाया है मगर जन्नत में रहते हैं

हमारी ख़ुश-नसीबी है कि हम भारत में रहते हैं

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मुझे जिस हाल में छोड़ा उसी हालत में पाओगी

बड़ी ईमान-दारी से तुम्हारा हिज्र काटा है

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मैं इस लिए भी हमेशा ख़मोश रहता हूँ

मिरे दिमाग़ में इक शोर मचता रहता है

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'अक़्ल और 'इश्क़ लड़ते रहे देर तक

'अक़्ल मारी गई 'इश्क़ ज़िंदा रहा

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तुम मुझे अपनी क़सम दे कर कहो

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शायर अपना कलाम पढ़ते हुए

महशर आफ़रीदी

महशर आफ़रीदी

महशर आफ़रीदी

महशर आफ़रीदी

महशर आफ़रीदी

महशर आफ़रीदी

महशर आफ़रीदी

महशर आफ़रीदी

महशर आफ़रीदी

महशर आफ़रीदी

महशर आफ़रीदी

महशर आफ़रीदी

महशर आफ़रीदी

महशर आफ़रीदी

महशर आफ़रीदी

महशर आफ़रीदी

महशर आफ़रीदी

महशर आफ़रीदी

दबी कुचली हुई सब ख़्वाहिशों के सर निकल आए

महशर आफ़रीदी

दबी कुचली हुई सब ख़्वाहिशों के सर निकल आए

महशर आफ़रीदी

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