मीरज़ा अबुल मुज़फ़्फर ज़फ़र
ग़ज़ल 1
अशआर 1
बे-ख़ुदी में ले लिया बोसा ख़ता कीजे मुआफ़
ये दिल-ए-बेताब की सारी ख़ता थी मैं न था
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere