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मीर कल्लू अर्श

1783 - 1867 | लखनऊ, भारत

महान उर्दू शायर मीर तक़ी मीर के बेटे

महान उर्दू शायर मीर तक़ी मीर के बेटे

मीर कल्लू अर्श

ग़ज़ल 32

अशआर 10

क्या ग़ैर क्या अज़ीज़ कोई नौहागर हो

जान यूँ निकल कि बदन तक ख़बर हो

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सेह्हत है मरज़ क़ज़ा शिफ़ा है

अल्लाह हकीम है हमारा

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चश्म-ए-बातिन में से जब ज़ाहिर का पर्दा उठ गया

जो मुसलमाँ था वही हिन्दू नज़र आया मुझे

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नज़र किसी को वो मू-ए-कमर नहीं आता

ब-रंग-ए-तार-ए-नज़र है नज़र नहीं आता

क्या दिया बोसा लब-ए-शीरीं का हो कर तुर्श-रू

मुँह हुआ मीठा तो क्या दिल अपना खट्टा हो गया

पुस्तकें 3

 

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