महाराजा सर किशन परसाद शाद
ग़ज़ल 27
अशआर 3
दिल में जब से देखता है वो तिरी तस्वीर को
नूर बरसाता है अपनी चश्म-ए-तर से आफ़्ताब
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बादा-ए-ख़ुम-ए-ख़ाना-ए-तौहीद का मय-नोश हूँ
चूर हूँ मस्ती में ऐसा बे-ख़ुद-ओ-मदहोश हूँ
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ज़िक्र से रिंदों के वाइज़ तू अभी वाक़िफ़ नहीं
ये तो हू-हक़ की सदा है शोर-ए-रिंदाना नहीं
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