मातम फ़ज़ल मोहम्मद
ग़ज़ल 9
अशआर 24
पूजता हूँ कभी बुत को कभी पढ़ता हूँ नमाज़
मेरा मज़हब कोई हिन्दू न मुसलमाँ समझा
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जहाँ से हूँ यहाँ आया वहाँ जाऊँगा आख़िर को
मिरा ये हाल है यारो न मुस्तक़बिल न माज़ी हूँ
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ख़त देख कर मिरा मिरे क़ासिद से यूँ कहा
क्या गुल नहीं हुआ वो चराग़-ए-सहर हनूज़
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देख कर हाथ में तस्बीह गले में ज़ुन्नार
मुझ से बेज़ार हुए काफ़िर ओ दीं-दार जुदा
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रुख़्सार का दे शर्त नहीं बोसा-ए-लब से
जो जी में तिरे आए सो दे यार मगर दे
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