ख़लील मामून
ग़ज़ल 24
नज़्म 7
अशआर 27
लफ़्ज़ों का ख़ज़ाना भी कभी काम न आए
बैठे रहें लिखने को तिरा नाम न आए
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लफ़्ज़ों का ख़ज़ाना भी कभी काम न आए
बैठे रहें लिखने को तिरा नाम न आए
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वो बुराई सब से मेरी कर रहे हैं
क्यूँ नहीं करते बयाँ अच्छाइयों को
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वो बुराई सब से मेरी कर रहे हैं
क्यूँ नहीं करते बयाँ अच्छाइयों को
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ऐसा हो ज़िंदगी में कोई ख़्वाब ही न हो
अँधियारी रात में कोई महताब ही न हो
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