करामत बुख़ारी
ग़ज़ल 10
नज़्म 3
अशआर 10
हर सोच में संगीन फ़ज़ाओं का फ़साना
हर फ़िक्र में शामिल हुआ तहरीर का मातम
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पर्वाज़ में था अम्न का मासूम परिंदा
सुनते हैं कि बे-चारा शजर तक नहीं पहुँचा
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आह तो अब भी दिल से उठती है
लेकिन उस में असर नहीं होता
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एक नज़र में उस ने हर इक दिल को जीत लिया
एक नज़र में उस के हो गए जाने कितने लोग
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मैं कि तेरे ध्यान में गुम था
दुनिया मुझ को ढूँढ रही थी
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