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कलीम अहमदाबादी

- 1966

कलीम अहमदाबादी

ग़ज़ल 8

अशआर 11

अपना जीना एक धोका अपना मरना इक फ़रेब

ज़िंदगी से ज़िंदगी की तर्जुमानी हो तो क्या

कुछ नहीं है तिरे हाथों में लकीरों के सिवा

बात नासेह की है लेकिन ख़त-ए-तक़्दीर भी है

सर्द हो सकता नहीं सरगर्म इंसाँ का लहू

हादिसात-ए-नौ-ब-नौ में ज़िंदगानी हो तो क्या

छेड़ती है मुझे के मिरी आज़ादी

गो मैं क़ैदी हूँ मिरे पाँव में ज़ंजीर भी है

दहर की फ़ज़ाओं में कौन रक़्स करता है

कौन कर रहा है यूँ आप अपनी रुस्वाई

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