कलीम अहमदाबादी
ग़ज़ल 8
अशआर 18
अपना जीना एक धोका अपना मरना इक फ़रेब
ज़िंदगी से ज़िंदगी की तर्जुमानी हो तो क्या
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कुछ नहीं है तिरे हाथों में लकीरों के सिवा
बात नासेह की है लेकिन ख़त-ए-तक़्दीर भी है
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सर्द हो सकता नहीं सरगर्म इंसाँ का लहू
हादिसात-ए-नौ-ब-नौ में ज़िंदगानी हो तो क्या
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किस तरह इश्क़-ए-मजाज़ी को हक़ीक़ी कर लूँ
सामने तू है बग़ल में तिरी तस्वीर भी है
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छेड़ती है मुझे आ आ के मिरी आज़ादी
गो मैं क़ैदी हूँ मिरे पाँव में ज़ंजीर भी है
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