जमीला ख़ुदा बख़्श
ग़ज़ल 58
अशआर 1
जो क़ैदी-ए-मेहन थे 'जमीला' वो चल बसे
ज़िंदाँ में कोई साहब-ए-ज़िंदाँ नहीं रहा
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आज क़ाबू में ये मिज़ाज नहीं
काटूँगा शब तड़प कर रो कर सहर करूँगा
लिया है इश्क़ ने क्या इंतिख़ाब कर के मुझे
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