जमील मज़हरी
ग़ज़ल 39
नज़्म 7
अशआर 11
जलाने वाले जलाते ही हैं चराग़ आख़िर
ये क्या कहा कि हवा तेज़ है ज़माने की
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हम मोहब्बत का सबक़ भूल गए
तेरी आँखों ने पढ़ाया क्या है
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होने दो चराग़ाँ महलों में क्या हम को अगर दीवाली है
मज़दूर हैं हम मज़दूर हैं हम मज़दूर की दुनिया काली है
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किसे ख़बर थी कि ले कर चिराग़-मुस्तफ़वी
जहाँ में आग लगाती फिरेगी बू-लहबी
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ब-क़द्र-ए-पैमाना-ए-तख़य्युल सुरूर हर दिल में है ख़ुदी का
अगर न हो ये फ़रेब-ए-पैहम तो दम निकल जाए आदमी का
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