जानी लखनवी
ग़ज़ल 17
अशआर 5
अंधे भी बना लेते हैं तस्वीर सनम की
बीनाई पे मौक़ूफ़ नज़ारे नहीं होते
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सहरा में हर किसी से नहीं होते मो'जिज़े
वो एड़ियाँ भी हैं जिन्हें ज़मज़म नहीं मिला
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आसमानों में उड़ा करते थे इतराते थे
एक इक करके ज़मीनों के निवाले हुए लोग
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इसी दरिया पे उदासी का बदन चूमते हैं
आख़िर-ए-शब तिरे दरवाज़े से टाले हुए लोग
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मेरे लहजे से परेशानी है तुझ को सुन ले
मैं जो ख़ामोश रहूँगा तो ग़ज़ल बोलेगी
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