इसहाक़ नाशाद
अशआर 3
बहुत मासूम हैं 'नाशाद' कर के हम को दीवाना
हमीं से पूछते हैं चाक-दामानों पे क्या गुज़री
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मिरा ख़ून-ए-जिगर तो गुल्सिताँ के काम आया है
बताऊँ किस तरह आख़िर बयाबानों पे क्या गुज़री
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उजालों के बिना जो एक लम्हा जी न पाते थे
शब-ए-ज़ुल्मात में ऐसे सनम-ख़ानों पे क्या गुज़री
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