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Irshad Khan Sikandar's Photo'

इरशाद ख़ान सिकंदर

1983 - 2025 | दिल्ली, भारत

नुमायाँ शाइर, नाटककार और कई किताबों के लेखक

नुमायाँ शाइर, नाटककार और कई किताबों के लेखक

इरशाद ख़ान सिकंदर के शेर

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खींच लाई है मोहब्बत तिरे दर पर मुझ को

इतनी आसानी से वर्ना किसे हासिल हुआ मैं

बूढ़ी माँ का शायद लौट आया बचपन

गुड़ियों का अम्बार लगा कर बैठ गई

मिरे ख़िलाफ़ सभी साज़िशें रचीं जिस ने

वो रो रहा है मिरी दास्ताँ सुनाता हुआ

कल तेरी तस्वीर मुकम्मल की मैं ने

फ़ौरन उस पर तितली कर बैठ गई

मुद्दतों आँखें वज़ू करती रहीं अश्कों से

तब कहीं जा के तिरी दीद के क़ाबिल हुआ मैं

रिश्ता बहाल काश फिर उस की गली से हो

जी चाहता है इश्क़ दोबारा उसी से हो

हमीं तुम से हमेशा मिलने आएँ क्यूँ

तुम्हारे पाँव में मेहंदी लगी है क्या

अब अपने-आप को ख़ुद ढूँढता हूँ

तुम्हारी खोज में निकला हुआ मैं

मैं चराग़ से जला चराग़ हूँ

रौशनी है पेशा ख़ानदान का

कर गया ख़मोश मुझ को देर तक

चीख़ना वो एक बे-ज़बान का

काम सब हो गए मिरे आसाँ

कौन समझेगा मेरी मुश्किल को

ज़माने पर तो खुल कर हँस रहा था

तिरे छूते ही रो बैठा है पागल

बह गए आँसुओं के दरिया में

आप की बात याद ही रही

ख़्वाब क्या उस का बुना मैं रूह तक तर हो गया

एक क़तरा इस क़दर फैला समुंदर हो गया

क्या किसी का लम्स फिर इंसाँ बनाएगा मुझे

उस के जाते ही समूचा जिस्म पत्थर हो गया

सारे ख़्वाबों के इंतिक़ाल के बा'द

आप और वो भी इतने साल के बा'द

वहाँ पर ज़िंदगी ही ज़िंदगी थी

उसी कूचे में मरना चाहिए था

रात गुज़रे तो सफ़र पर निकलें

मुझ में सोए हैं मुसाफ़िर मेरे

तुम ने देखा नहीं अदाकारों

उन का चेहरा मिरे सवाल के बा'द

ग़म को हैरत-ज़दा किया हम ने

शाम के वक़्त मुस्कुराए हम

इक उदासी थी रात थी हम थे

और फिर हाजत-ए-ख़ुशी रही

चमक आँखों में क्यूँकर बढ़ गई है

अधूरा ख़्वाब पूरा हो गया क्या

यूँ हुआ फिर करिश्मा हुआ

मिट्टी ख़ुद कूज़ा-गर हो गई

मुझ को मिट्टी में बोया गया

मेरी मिट्टी शजर हो गई

मैं उस के साथ हूँ जब से सुकून तारी है

मैं अपने साथ था जब तक सज़ा बनी हुई थी

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