फ़िदा कड़वी
अशआर 1
रंज-ओ-ग़म दर्द-ओ-अलम ज़िल्लत-ओ-रुसवाई है
हम ने ये दिल के लगाने की सज़ा पाई है
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere