डॉ भावना श्रीवास्तव
ग़ज़ल 28
नज़्म 5
अशआर 8
इस क़दर आँखों पे क़ाबिज़ है वो जाना उस का
इस तरफ़ आता दिखाई नहीं देता कुछ भी
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
ख़ामोशी जब भी ज़ाए' हो जाती थी
सहरा में जा कर चिल्लाया करते थे
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
फ़र्क़ कोई नहीं ख़ल्वत में कि महफ़िल में रहूँ
दर्द से मुझ को जुदाई नहीं देता कुछ भी
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
ये बाद-ए-सबा ख़ुशबू परिंदों की सदाएँ
हर शय उसे खिड़की पे बुलाने के लिए है
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
काश हम महसूस करते दुख उन आँखों का कभी
देखती रहती हैं जो हर पल किसी का रास्ता
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
वीडियो 9
This video is playing from YouTube