बहराम जी
ग़ज़ल 11
अशआर 12
है मुसलमाँ को हमेशा आब-ए-ज़मज़म की तलाश
और हर इक बरहमन गंग-ओ-जमन में मस्त है
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नहीं दुनिया में आज़ादी किसी को
है दिन में शम्स और शब को क़मर बंद
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ज़ाहिदा काबे को जाता है तो कर याद-ए-ख़ुदा
फिर जहाज़ों में ख़याल-ए-ना-ख़ुदा करता है क्यूँ
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पता मिलता नहीं उस बे-निशाँ का
लिए फिरता है क़ासिद जा-ब-जा ख़त
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ज़ाहिरी वाज़ से है क्या हासिल
अपने बातिन को साफ़ कर वाइज़
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