अली रज़ा असीर
ग़ज़ल 17
नज़्म 1
अशआर 6
मुतमइन मुझ को न कर झूटी तसल्ली दे कर
गर सुराही में तिरी मय नहीं बाक़ी साक़ी
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere