अब्दुल अज़ीज़ फ़ितरत
ग़ज़ल 31
नज़्म 1
अशआर 5
और भी कितने तरीक़े हैं बयान-ए-ग़म के
मुस्कुराती हुई आँखों को तो पुर-नम न करो
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हम तो तिरे ज़िक्र का हुए जुज़्व
तू ने हमें किस तरह भुलाया
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मरना भी नहीं है अपने बस में
जीना भी अज़ाब हो गया है
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'फ़ितरत' दिल-ए-कौनैन की धड़कन तो ज़रा सुन
ये हज़रत-ए-इंसाँ ही की अज़्मत का बयाँ है
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हुस्न-ए-क़िस्मत से हमेशा 'फ़ितरत'
बख़्त बेदार रहा ख़्वाबों में
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