आसी करनाली
ग़ज़ल 2
अशआर 1
मैं आख़िर आदमी हूँ कोई लग़्ज़िश हो ही जाती है
मगर इक वस्फ़ है मुझ में दिल-आज़ारी नहीं करता
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere