अपनी मस्ती कि तिरे क़ुर्ब की सरशारी में
अपनी मस्ती कि तिरे क़ुर्ब की सरशारी में
अब मैं कुछ और भी आसान हूँ दुश्वारी में
कितनी ज़रख़ेज़ है नफ़रत के लिए दिल की ज़मीं
वक़्त लगता ही नहीं फ़स्ल की तय्यारी में
इक त'अल्लुक़ को बिखरने से बचाने के लिए
मेरे दिन रात गुज़रते हैं अदाकारी में
वो किसी और दवा से मिरा करता है 'इलाज
मुब्तला हूँ मैं किसी और ही बीमारी में
ऐ ज़माने मैं तिरे अश्क भी रो लूँगा मगर
अभी मसरूफ़ हूँ ख़ुद अपनी 'अज़ा-दारी में
उस के कमरे से उठा लाया हूँ यादें अपनी
ख़ुद पड़ा रह गया लेकिन किसी अलमारी में
अपनी ता'मीर उठाते तो कोई बात भी थी
तुम ने इक 'उम्र गँवा दी मिरी मिस्मारी में
हम अगर और न कुछ देर हवा दें तो ये आग
साँस घुटने से ही मर जाएगी चिंगारी में
तुम भी दुनिया के निकाले हुए लगते हो 'ज़हीर'
मैं भी रहता हूँ यहीं दिल की 'अमल-दारी में
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