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जब ये आलम हो तो लिखिए लब-ओ-रुख़्सार पे ख़ाक

इरफ़ान सिद्दीक़ी

जब ये आलम हो तो लिखिए लब-ओ-रुख़्सार पे ख़ाक

इरफ़ान सिद्दीक़ी

MORE BYइरफ़ान सिद्दीक़ी

    जब ये आलम हो तो लिखिए लब-ओ-रुख़्सार पे ख़ाक

    उड़ती है ख़ाना-ए-दिल के दर-ओ-दीवार पे ख़ाक

    तू ने मिट्टी से उलझने का नतीजा देखा

    डाल दी मेरे बदन ने तिरी तलवार पे ख़ाक

    हम ने मुद्दत से उलट रक्खा है कासा अपना

    दस्त-ए-दादार तिरे दिरहम-ओ-दीनार पे ख़ाक

    पुतलियाँ गर्मी-ए-नज़्ज़ारा से जल जाती हैं

    आँख की ख़ैर मियाँ रौनक़-ए-बाज़ार पे ख़ाक

    जो किसी और ने लिक्खा है उसे क्या मालूम

    लौह-ए-तक़दीर बजा चेहरा-ए-अख़बार पे ख़ाक

    चार दीवार-ए-अनासिर की हक़ीक़त कितनी

    ये भी घर डूब गया दीदा-ए-ख़ूँ-बार पे ख़ाक

    पा-ए-वहशत ने अजब नक़्श बनाए थे यहाँ

    हवा-ए-सर-ए-सहरा तिरी रफ़्तार पे ख़ाक

    ये ग़ज़ल लिख के हरीफ़ों पे उड़ा दी मैं ने

    जम रही थी मिरे आईना-ए-अशआर पे ख़ाक

    ये भी देखो कि कहाँ कौन बुलाता है तुम्हें

    महज़र-ए-शौक़ पढ़ो महज़र-ए-सरकार पे ख़ाक

    आप क्या नक़द-ए-दो-आलम से ख़रीदेंगे इसे

    ये तो दीवाने का सर है सर-ए-पिंदार पे ख़ाक

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    इरफ़ान सिद्दीक़ी

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    नोमान शौक़

    नोमान शौक़,

    नोमान शौक़

    जब ये आलम हो तो लिखिए लब-ओ-रुख़्सार पे ख़ाक नोमान शौक़

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    Author: Irfan Siddiqi
    Publication: Rekhta Publications (2023)
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