हमारी सम्त ज़रा अब वो देखता कम है
हमारी सम्त ज़रा अब वो देखता कम है
त'अल्लुक़ात तो बेहतर हैं वास्ता कम है
मिला तो करता है सब से वो मुस्कुराते हुए
मगर ख़ुलूस जिसे कहिए वो ज़रा कम है
ख़ुलूस-ओ-प्यार के चर्चे हैं हर तरफ़ लेकिन
इस 'अहद-ए-नौ में मगर दोस्तो वफ़ा कम है
हर एक शख़्स समझता है रहनुमा ख़ुद को
यही सबब है यहाँ पर जो क़ाफ़िला कम है
हमेशा हिचकियाँ आती हैं उन की यादों की
ये किस ने कह दिया यादों का सिलसिला कम है
मैं मस्लहत से त'अल्लुक़ ज़रा नहीं रखता
यही सबब है कि लोगों से राब्ता कम है
हसीन इस लिए ख़ुद को सभी समझते हैं
कि अपने शहर में ऐ 'नूर' आइना कम है
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