चश्मक-ज़नी में करती नहीं यार का लिहाज़
चश्मक-ज़नी में करती नहीं यार का लिहाज़
नर्गिस की आँख में भी नहीं है ज़रा लिहाज़
बे-गाली अब तो बात भी करते नहीं कभी
वो इब्तिदा में करते थे बे-इंतिहा लिहाज़
तन्हा मैं और इतने वहाँ हैं मिरे रक़ीब
नाज़-ओ-अदा-ओ-ग़मज़ा-ओ-शर्म-ओ-हया लिहाज़
साक़ी की बे-रुख़ी की कहाँ ताब थी मगर
पीर-ए-मुग़ाँ की रूह का करना पड़ा लिहाज़
क्या वस्फ़-ए-चश्म-ए-यार करूँ इस के सामने
नर्गिस से है फ़क़त मुझे इक आँख का लिहाज़
हुर्मत बड़ी है उस की न कर हज्व इस क़दर
लाज़िम है दुख़्त-ए-रज़ का तुझे वा'इज़ा लिहाज़
निकली न ख़ुम से बज़्म-ए-जवानान-ए-मस्त में
पीर-ए-मुग़ाँ का बिन्त-ए-'इनब ने किया लिहाज़
फिर मुझ से इस तरह की न कीजेगा दिल-लगी
ख़ैर उस घड़ी तो आप का मैं कर गया लिहाज़
बे-ख़ुद शराब-ए-शौक़ ने शब को ये कर दिया
उन को रहा हिजाब न मुझ को रहा लिहाज़
क़ुर्बान इस हिजाब के इस शर्म के निसार
इतना न आशिक़ों से कर ऐ मह-लक़ा लिहाज़
महजूब है मिज़ाज 'क़लक़' अपना इस क़दर
करते हैं अपने ख़ुर्द का भी हम बुरा लिहाज़
- रचनाकार : असद अली ख़ान क़लक़
- प्रकाशन : मुंशी नवल किशोर, कानपुर
- संस्करण : 1911
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