अक्स-ए-रुख़-ए-गुलगूँ से तमाशा नज़र आया
अक्स-ए-रुख़-ए-गुलगूँ से तमाशा नज़र आया
आईना उन्हीं फूलों का दूना नज़र आया
ख़ूबी में दो-बाला वह सरापा नज़र आया
पुर-नूर बदन पैकर-ए-जाैज़ा नज़र आया
दिल ख़ुश गुहरों का हमें सहरा नज़र आया
क्या गर्द-ए-यतीमी का बगूला नज़र आया
नैरंगी-ए-हैरत से रवाँ रहते हैं आँसू
तस्वीर का दरिया हमें बहता नज़र आया
निकला जो हवा-वार में वह रश्क-ए-सुलैमाँ
उड़ता सू-ए-अफ़्लाक फ़रिश्ता नज़र आया
बालीदा है हर शीशा-ए-मय अब की यहाँ तक
एक एक फ़लक पम्बा-ए-मीना नज़र आया
ख़िल'अत मुझे वहशत ने दिया वुस'अत-ए-दिल का
जामे में मिरे दामन-ए-सहरा नज़र आया
नज़रों में ये छाया है ग़ुबार-ए-दिल-ए-वहशी
हर आँख में आँसू मुझे ढेला नज़र आया
वह आइना-सीमा है दिल-ए-सख़्त-अदू में
बोतल में उतरते हुए शीशा नज़र आया
'आशिक़ तिरे पलकों का हुआ ज़िंदा-ए-जावेद
सूली का ख़रीदार मसीहा नज़र आया
ज़ाहिद ने भी अक़्द आज किया बिन्त-ए-'इनब से
जुफ़्त-ए-बत-ए-मय मुर्ग़-ए-मुसल्ला नज़र आया
बरगश्ता-नसीबी-ए-सदफ़-ए-दिल की कहूँ क्या
मोती के 'एवज़ इस में फफोला नज़र आया
आईना-ए-गेती में वही 'अक्स है हर सू
हम ने जिधर उस शोख़ को देखा नज़र आया
करते हो मिरे पैकर-ए-वहमी को निशाना
नावक में तुम्हारे पर-ए-अन्क़ा नज़र आया
उस बुत के नहाने से हुआ साफ़ ये पानी
मोती भी सदफ़ में तह-ए-दरिया नज़र आया
उस हूर की रंगत उड़ी रोने से हमारे
रंग-ए-गुल-ए-फ़िरदौस भी कच्चा नज़र आया
शीशा मय-ए-गुलगूँ का उन्हें मद्द-ए-नज़र है
तेग़-ए-निगह-ए-मस्त में छाला नज़र आया
हो जाएँगे सब कोह-ए-जहाँ संग-ए-फ़लाख़न
वहशत में जो 'आलम तह-ओ-बाला नज़र आया
शम'एँ जो बुझीं बज़्म-ए-तिलिस्मात को देखा
आँखें जो हुईं बंद तो क्या क्या नज़र आया
क्यूँ ख़ुश न हो तिल बैठ के मीज़ान-ए-फ़लक में
मौज़ून-ए-क़द-ए-यार का पल्ला नज़र आया
मिल मिल गए हैं ख़ाक में लाखों दिल-ए-रौशन
हर ज़र्रा मुझे 'अर्श का तारा नज़र आया
आँखों में खटकती है यही दौलत-ए-दुनिया
हर सिक्के की मछली में भी काँटा नज़र आया
है बूद-ए-जहाँ नक़्श सर-ए-आब नज़र में
ये खेल हमें बन के बिगड़ता नज़र आया
हैरत-कदा-ए-दहर हुआ मुझ से मुकद्दर
आईना-ए-ईजाद में धब्बा नज़र आया
ख़ुश आते नहीं दाँत किसी हूर के मुझ को
चाक-ए-गुल-ए-फ़िरदौस में बख़िया नज़र आया
मुद्दत से नज़र-दोख़्ता रहते हैं गिरफ़्तार
गेसू की भी ज़ंजीर में टाँका नज़र आया
चम्पा-कली उस मस्त-ए-मय-ए-हुस्न की देखी
गर्दन की सुराही का ये मीना नज़र आया
मदफ़ून हुआ ज़ेर-ए-ज़मीं आप का लाग़र
चश्म-ए-लहद-ए-तंग में जाला नज़र आया
कलकत्ता में हर दम है 'मुनीर' आप को वहशत
हर कोठी में हर बंगले में जंगला नज़र आया
- रचनाकार : मुनीर शिकोहाबादी
- प्रकाशन : मतबा सईदी
- संस्करण : 1831
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