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कहूँ किस से रात का माजरा नए मंज़रों पे निगाह थी

अहमद मुश्ताक़

कहूँ किस से रात का माजरा नए मंज़रों पे निगाह थी

अहमद मुश्ताक़

रोचक तथ्य

Shamsur Rahman Faruqi's historic novel "Kai Chaand the Sar-e-Aasmaan", the title has been picked from second sher of this ghazal.

कहूँ किस से रात का माजरा नए मंज़रों पे निगाह थी

किसी का दामन-ए-चाक था किसी की तर्फ़-ए-कुलाह थी

कई चाँद थे सर-ए-आसमाँ कि चमक चमक के पलट गए

लहू मिरे ही जिगर में था तुम्हारी ज़ुल्फ़ सियाह थी

दिल-ए-कम-अलम पे वो कैफ़ियत कि ठहर सके गुज़र सके

हज़र ही राहत-ए-रूह था सफ़र में रामिश राह थी

मिरे चार-दांग थी जल्वागर वही लज़्ज़त-ए-तलब-ए-सहर

मगर इक उम्मीद-ए-शिकस्ता-पर कि मिसाल-ए-दर्द सियाह थी

वो जो रात मुझ को बड़े अदब से सलाम कर के चला गया

उसे क्या ख़बर मिरे दिल में भी कभी आरज़ू-ए-गुनाह थी

RECITATIONS

नोमान शौक़

नोमान शौक़,

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नोमान शौक़

कहूँ किस से रात का माजरा नए मंज़रों पे निगाह थी नोमान शौक़

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