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तालिब देहलवी
अशआर 5
शैख़-ए-हरम का ज़िक्र नहीं है मिरे नदीम
पीर-ए-मुग़ाँ के कश्फ़-ओ-करामत की बात है
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बशर मिट्टी का पुतला ही सही ज़ेर-ए-फ़लक 'तालिब'
मोहब्बत से मगर ये ख़ाक भी इक्सीर बनती है
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बुत-ख़ाने में भी नूर-ए-ख़ुदा देखता हूँ मैं
जी हाँ ये मेरे हुस्न-ए-अक़ीदत की बात है
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कुछ उस का फ़ितरत-ए-आज़ाद पर क़ाबू नहीं चलता
ये दुनिया तो हर इक के पाँव की ज़ंजीर बनती है
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वो मुश्त-ए-ख़ाक जो परवाना-ए-दिल-गीर बनती है
जिगर की आग बुझ जाती है जब इक्सीर बनती है
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