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तंज़-ओ-मज़ाह1
शेर20
ग़ज़ल31
नज़्म6
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चित्र शायरी 6
आल-ए-अहमद सुरूर
लेख 40
उद्धरण 30
तंज़-ओ-मज़ाह 1
अशआर 20
हम जिस के हो गए वो हमारा न हो सका
यूँ भी हुआ हिसाब बराबर कभी कभी
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- ग़ज़ल देखिए
आती है धार उन के करम से शुऊर में
दुश्मन मिले हैं दोस्त से बेहतर कभी कभी
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- ग़ज़ल देखिए
हुस्न काफ़िर था अदा क़ातिल थी बातें सेहर थीं
और तो सब कुछ था लेकिन रस्म-ए-दिलदारी न थी
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ग़ज़ल 31
नज़्म 6
पुस्तकें 1448
चित्र शायरी 6
ऑडियो 11
आज से पहले तिरे मस्तों की ये ख़्वारी न थी
कुछ लोग तग़य्युर से अभी काँप रहे हैं
ख़ुदा-परस्त मिले और न बुत-परस्त मिले
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