ज़ेब-उन-निसा
बंबई के सफ़र में एक अज़ीज़ दोस्त ने, जो अंग्रेज़ी किताबों पर ज़्यादा भरोसा रखते हैं, 'इंडियन मैगज़ीन एंड रिव्यू' का एक आर्टिकल दिखलाया जो ज़ेब-उन-निसा की जीवनी के बारे में था। मुझे अफ़सोस हुआ कि एक ऐसी सम्मानित पत्रिका की जानकारी का स्रोत पूरी तरह बाज़ारी क़िस्से थे, जिनमें से एक शर्मनाक क़िस्सा आक़िल ख़ान राज़ी का भी है। इससे ज़्यादा अफ़सोस की बात यह है कि ख़ुद मुसलमानों में बाज़ारी लेखकों ने ज़ेब-उन-निसा के जो हालात व्यापारिक उद्देश्य से लिखे, वे बिल्कुल निराधार हैं। इसलिए ख़याल आया कि ज़ेब-उन-निसा के बारे में सही जानकारी इकट्ठा कर दी जाए, जिससे यह फ़ायदा होगा कि ग़लत जानकारी में सुधार हो जाएगा।
ज़ेब-उन-निसा का जन्म
ज़ेब-उन-निसा औरंगज़ेब की सबसे पहली औलाद थी। उसकी मां, जिसका नाम दिलरसन बानो बेगम था, शाह नवाज़ ख़ां सफ़वी की बेटी थी। शाह नवाज़ ख़ां का असली नाम बदी-उज़-ज़मां है। जहांगीर के ज़माने में सम्मानित पदों पर प्रतिष्ठित होकर उसे शाह नवाज़ ख़ां के ख़िताब (उपाधि) से नवाज़ा गया। शाहजहां के ज़माने में भी उसने उल्लेखनीय काम किए। चूंकि निजी योग्यता के साथ-साथ वह ऊंचे ख़ानदान का भी था, इसलिए शाहजहां ने 1047 हिजरी में, जो उसकी सल्तनत का दसवां साल था, औरंगज़ेब की शादी उसकी बेटी से कर दी। चार लाख महर तय किया गया। तालिब कलीम ने तारीख़ी शेर कहा, दो गौहर ब यक अक़्द दौरां कशीद।
ज़ेब-उन-निसा शादी के दूसरे साल शव्वाल 1048 हिजरी में पैदा हुई। आलमगीर के दरबारियों में इनायत उल्लाह ख़ां बहुत सम्मानित अधिकारी था। उसकी मां हाफ़िज़ा मरियम क़ाबिल और पढ़ी-लिखी थी। ज़ेब-उन-निसा जब पढ़ने के क़ाबिल हुई तो औरंगज़ेब ने उसकी तालीम के लिए हाफ़िज़ा मरियम को नियुक्त किया, जिसने रिवाज़ के मुताबिक़ सबसे पहले क़ुरआन मजीद की तालीम दी। ज़ेब-उन-निसा ने क़ुरआन मजीद ज़बानी याद (हिफ़्ज़) किया। जिसके इनाम के तौर पर औरंगज़ेब ने तीस हज़ार अशरफ़ियां दीं। तमाम इतिहास और जीवनियां इस बात पर एकमत हैं कि ज़ेब-उन-निसा ने अरबी और फ़ारसी की बहुत आला दर्जे की तालीम हासिल की थी। और बड़े-बड़े विद्वान उसकी ख़िदमत में रहते थे, लेकिन उसके उस्तादों में सबसे ज़्यादा क़रीबी और ख़ास मुल्ला सईद अशरफ़ माज़ंदरानी थे, जो मुल्ला सईद तक़ी मजलसी के नवासे थे। वे आलमगीर के शासन की शुरुआत में ईरान से आए थे और आलमगीर ने उन्हें ज़ेब-उन-निसा की तालीम के लिए नियुक्त किया था। उस वक़्त ज़ेब-उन-निसा की उम्र तक़रीबन इक्कीस बरस थी। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि तैमूरी ख़ानदान में औरतों की तालीम का सिलसिला कितना लंबा चलता था। ज़ेब-उन-निसा गद्य और पद्य (नज़्म और नस्र) में मुल्ला सईद से ही इस्लाह (मार्गदर्शन) लेती थी।
मुल्ला अशरफ़ शायर भी थे और अपनी शायरी की ख़ूबी के लिए ही मशहूर हैं। तक़रीबन 13-14 बरस वे तालीम के सिलसिले में ज़ेब-उन-निसा की ख़िदमत में रहे। 1083 हिजरी में उन्होंने वतन जाना चाहा। ज़ेब-उन-निसा की ख़िदमत में एक क़सीदा लिखकर पेश किया, जिसमें छुट्टी की दरख़्वास्त इस तरह की थी:
यक बार अज़ वतन नतवां बर-गिफ़्त दिल
दर ग़ुर्बतम अगरचे फ़ुज़ूं अस्त एतबार
ईं पेश ओ क़ुर्ब ओ बोअद तफ़ावुत नमी कुनद
गो ख़िदमत-ए-हुज़ूर बिना शुद मर अशआर
निस्बत चो बातिनी अस्त चे देहली चे इस्फहान
दिल पेश-ए-तुस्त मन चे ब-काबुल चे क़ंधार
ज़ेब-उन-निसा ने जिस तरह की तालीम पाई थी और ख़ुद उसकी अपनी रुचि जैसी थी, उसके लिहाज़ से वह राजनीति से बिल्कुल अनजान थी। फिर भी आलमगीर के जटिल शासनकाल में वह भी इस बदनामी से न बच सकी। 1091 हिजरी में जब राजपूतों ने आम बग़ावत की और आलमगीर ने उन्हें दबाने के लिए शहज़ादा अकबर को एक बड़ी फ़ौज देकर जोधपुर की तरफ़ रवाना किया, तो राजपूतों के बहकावे में आकर शहज़ादा ख़ुद बाग़ी हो गया और आलमगीर के मुक़ाबले के लिए आगे बढ़ा। ज़ेब-उन-निसा और शहज़ादा अकबर सगे भाई-बहन थे। दोनों के बीच ख़त-ओ-किताबत (पत्र-व्यवहार) भी होती थी। ये ख़त पकड़े गए और आलमगीर ने इसके बदले में ज़ेब-उन-निसा की तनख़्वाह, जो चार लाख सालाना थी, बंद कर दी। इसके साथ ही उसकी सारी धन-संपत्ति ज़ब्त कर ली गई और उसे सलीमगढ़ क़िले में रहने का हुक्म हुआ। लेकिन मालूम होता है कि बहुत जल्द उसकी बेगुनाही साबित हो गई और उसे माफ़ कर दिया गया, क्योंकि 1094 हिजरी में जब हमीदा बानो बेगम (रूह उल्लाह ख़ां की मां) का इंतिक़ाल हुआ, तो शोक प्रकट करने के लिए आलमगीर ने ज़ेब-उन-निसा को रूह उल्लाह के घर भेजा। उसी साल जब शहज़ादा काम बख़्श (आलमगीर का सबसे छोटा बेटा) की शादी हुई, तो समारोह की रस्में ज़ेब-उन-निसा के ही महल में हुईं और आलमगीर के हुक्म से दरबार के सभी सदस्य ज़ेब-उन-निसा की ड्योढ़ी तक पैदल गए।
ज़ेब-उन-निसा ने शादी नहीं की। आम तौर पर यह मशहूर है कि तैमूरी सुल्तान अपनी लड़कियों की शादियां नहीं करते थे। इस ग़लत बात को यूरोपीय लेखकों ने बहुत उछाला है और इससे उन्हें शाही बेगमों की बदनामी फैलाने में बहुत मदद मिली है, लेकिन यह क़िस्सा ही सिरे से बेबुनियाद है। ख़ुद आलमगीर की दो बेटियां, ज़ुब्दत-उन-निसा बेगम और मेहर-उन-निसा बेगम, सिपह्र शिकोह और ईज़द बख़्श (शहज़ादा मुराद के बेटे) से ब्याही गई थीं। चुनांचे 'मआसिर-ए-आलमगीरी' में दोनों शादियों की तारीख़ें और संक्षिप्त हालात लिखे हैं और किताब के अंत में भी इसका ज़िक्र किया गया है। आलमगीर ज़ेब-उन-निसा की बहुत इज़्ज़त करता था। जब वह कहीं बाहर से आती थी, तो उसके स्वागत के लिए शहज़ादों को भेजता था। सफ़र हो या क़याम, वह उसे अपने साथ रखता था। कश्मीर के कठिन सफ़र में भी वह उसके साथ थी। लेकिन जब आलमगीर दकन गया, तो उसने शायद अपनी इल्मी (शैक्षणिक) ज़िंदगी की वजह से राजधानी को छोड़ना मुनासिब नहीं समझा। उसकी छोटी बहन ज़ीनत-उन-निसा आलमगीर के साथ चली गई, इसलिए उसका नाम बार-बार घटनाओं में आता है। ज़ेब-उन-निसा ने दिल्ली में ही क़याम किया और वहीं सुपुर्द-ए-ख़ाक हुई। ज़ेब-उन-निसा का 1110 हिजरी में, जो आलमगीर की हुकूमत का अड़तालीसवां साल था, दिल्ली में इंतिक़ाल हुआ। 'उदख़ुली जन्नती' इसका तारीख़ी शेर है।
आलमगीर उस ज़माने में दकन की जीतों में व्यस्त था। यह ख़बर सुनकर वह बहुत ग़मज़दा हुआ। बेसाख़्ता उसकी आंखों से आंसू निकल पड़े और अपने बेहद मज़बूत स्वभाव के बावजूद वह सब्र न कर सका। सैयद अमजद ख़ां, शेख़ अता उल्लाह और हाफ़िज़ ख़ान के नाम हुक्म जारी हुआ कि उसके ईसाल-ए-सवाब (पुण्य) के लिए ज़कात और ख़ैरात बांटें, और मरहूमा का मक़बरा तैयार कराएं। 'ख़ानी ख़ान' के कलकत्ता से छपे संस्करण में ज़ेब-उन-निसा का नाम और उसके वाक़िआत 1122 हिजरी तक आते हैं। लेकिन यह साफ़ ग़लती है। कातिबों (लिखने वालों) ने ग़लती से ज़ीनत-उन-निसा को ज़ेब-उन-निसा से बदल दिया है।
इल्मी कमाल और आम अख़लाक़ व आदतें
तमाम इतिहासकारों ने साफ़ तौर पर लिखा है कि ज़ेब-उन-निसा अरबी इल्म और फ़ारसी ज़बान जानने में कमाल रखती थीं। नस्तलीक़, नस्ख़ और शिकस्ता लिपियाँ बहुत उम्दा लिखती थीं। लेकिन उनकी रचनाओं में से आज कोई चीज़ मौजूद नहीं है। आम तौर पर मशहूर है कि वह 'मख़फ़ी' तख़ल्लुस (उपनाम) रखती थीं और 'दीवान-ए-मख़फ़ी' जो छप कर प्रकाशित हो चुका है, उन्हीं का है। लेकिन यह सही नहीं है। किसी इतिहास या तज़्किरे (जीवनी-संग्रह) में उनके तख़ल्लुस या दीवान का ज़िक्र नहीं है। मौलवी ग़ुलाम अली आज़ाद 'यद-ए-बैज़ा' में लिखते हैं: ये दो शेर उनके नाम से सुने गए हैं। फिर दो शेर नक़्ल किए हैं। उनका दीवान होता तो सिर्फ़ दो शेरों का ज़िक्र क्यों करते। 'मख़्ज़न-उल-ग़राइब' एक तज़्किरा है जो अहमद अली सन्दिलवी की रचना है। लेखक ने बहुत बड़ी तादाद में फ़ारसी तज़्किरे जमा किए हैं और उनसे हालात और शेर चुने हैं। ज़ेब-उन-निसा के हाल में लिखते हैं, लेकिन उनके शेरों का दीवान कहीं नज़र नहीं आया। अलबत्ता एक तज़्किरे में उनका चुनाव नज़र आया, लेकिन वह भरोसे के लायक़ नहीं है। वजह यह है कि उस तज़्किरे के लेखक ने उस्तादों के शेर बेगम के नाम से लिख दिए थे।
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि वह शायरा थीं, लेकिन मालूम होता है कि उनका कलाम (शायरी) ज़ाया (नष्ट) हो गया। इसी तज़्किरे में मुल्ला सईद अशरफ़ के हाल में लिखा है कि ज़ेब-उन-निसा की ख़ास बयाज़ (डायरी) एक ख़वास (सेविका) के हाथ से, जिसका नाम इरादत फ़हम था, हौज़ में गिर पड़ी। चुनांचे सईद अशरफ़ ने इस पर एक क़िस्सा लिखा जो आगे आएगा। शायद यह शेरों की ही बयाज़ रही होगी। तज़्किरों में ये दो शेर ज़ेब-उन-निसा के नाम से नक़्ल किए गए हैं:
बिश्कनद दस्ते कि ख़म दर गर्दन-ए-यारे नशुद
कोर बह चश्मे कि लज़्ज़त-गीर-ए-दीदारे नशुद
सद बहार आख़िर शुद ओ हर गुल ब-फ़र्क़े जा गिरिफ़्त
ग़ुंचा-ए-बाग़-ए-दिल-ए-मा ज़ेब-ए-दस्तारे नशुद
ज़ेब-उन-निसा की रचनाओं और संकलनों में से 'ज़ेब-उल-मुन्शात' का ज़िक्र अलबत्ता तज़्किरों में आया है। 'तज़्किरत-उल-ग़राइब' के लेखक ने लिखा है कि मैंने उसे देखा है, वह ज़ेब-उन-निसा के ख़तों और रुक़्क़ों (चिट्ठियों) का संग्रह है।
इल्म-परवरी
ज़ेब-उन-निसा ने ख़ुद कोई किताब लिखी हो या न लिखी हो, लेकिन उन्होंने अपनी निगरानी में माहिरों से बहुत सी उम्दा किताबें लिखवाईं। मौलवी ग़ुलाम अली आज़ाद 'यद-ए-बैज़ा' में लिखते हैं, उनकी हिम्मत गुणी और ज्ञानी लोगों की तरक़्क़ी में लगी रहती थी। आलिमों, शायरों, मुंशियों और ख़ुशनवीसों की एक बड़ी जमात उनकी क़द्रदानी के साये में ख़ुशहाल थी और उनके नाम से कई किताबें और रिसाले लिखे गए। ज़ेब-उन-निसा का दरबार हक़ीक़त में एक अकैडमी (बैत-उल-उलूम) था। हर फ़न के आलिम और फ़ाज़िल (विद्वान) मुलाज़िम थे जो हमेशा किताबें लिखने और संकलित करने में लगे रहते थे। ये किताबें आम तौर पर उन्हीं के नाम से मंसूब होती थीं, यानी इन किताबों के नाम का पहला हिस्सा 'ज़ेब' शब्द होता था। इससे अक्सर तज़्किरा लिखने वालों को धोखा हुआ है और उन्होंने वे किताबें ज़ेब-उन-निसा की रचनाओं में गिन लीं।
ज़ेब-उन-निसा ने जो किताबें लिखवाईं, उनमें ज़्यादा क़ाबिल-ए-ज़िक्र 'तफ़्सीर-ए-कबीर' का तर्जुमा है। यह मानी हुई बात है कि तफ़्सीरों (क़ुरआन की व्याख्याओं) में इमाम राज़ी की तफ़्सीर से ज़्यादा मुकम्मल कोई तफ़्सीर नहीं है। इसलिए ज़ेब-उन-निसा ने मुल्ला सफ़ीउद्दीन अर्दबेली को, जो कश्मीर में रह रहे थे, हुक्म दिया कि इसका फ़ारसी में तर्जुमा करें। चुनांचे इसका नाम 'ज़ेब-उत-तफ़ासीर' रखा गया। कुछ तज़्किरा लिखने वालों ने ग़लत लिख दिया है कि वह ज़ेब-उन-निसा की अपनी रचना है।
ज़ेब-उन-निसा ने किताबें लिखने और संकलित करने का जो विभाग क़ायम किया था, उसके साथ एक शानदार कुतुबख़ाने (पुस्तकालय) का होना भी ज़रूरी था, जिससे लेखक फ़ायदा उठा सकें। चुनांचे बेगम साहिबा ने एक बहुत ही शानदार कुतुबख़ाना क़ायम किया। 'मआसिर-ए-आलमगीरी' के लेखक का बयान है कि इस कुतुबख़ाने की मिसाल किसी की नज़र से न गुज़री होगी। उक्त लेखक के असली अल्फ़ाज़ ये हैं: सरकार-ए-आलिया में ऐसा कुतुबख़ाना इकट्ठा हो गया था जो किसी की नज़र में न आया होगा। ज़ेब-उन-निसा के हुस्न-ए-मज़ाक़ (अच्छी पसंद) से बड़ा फ़ायदा यह हुआ कि आलमगीर की ख़ुश्क मिज़ाजी ने जो नुक़सान पहुँचाया था, उसकी भरपाई हो गई। याद होगा कि दरबार में 'मलिक-उश-शोअरा' (राजकवि) का पद सल्तनत की शुरुआत से चला आ रहा था, जिस पर फ़ैज़ी, तालिब आमली, क़ुदसी, कलीम तैनात रह चुके थे। आलमगीर ने इस पद को ख़त्म कर दिया और अचानक शायर मानो बेघर हो गए। लेकिन ज़ेब-उन-निसा की क़द्रदानी ने फिर वह दरबार क़ायम कर दिया। अलग-अलग मौक़ों पर शायर क़सीदे और नज़्में लिखकर पेश करते थे और क़ीमती इनाम पाते थे। ज़ेब-उन-निसा की शेर-दोस्ती का यह असर हुआ कि शायर लोग मामूली अर्ज़-गुज़ारिश भी शेर ही में करते थे। इस तरह की कुछ घटनाओं का ज़िक्र दिलचस्पी से ख़ाली न होगा। ऊपर हम लिख आए हैं कि इरादत फ़हम नाम की एक ख़वास के हाथ से ज़ेब-उन-निसा की ख़ास बयाज़ हौज़ में गिर पड़ी थी। इस जुर्म की माफ़ी के लिए मुल्ला सईद अशरफ़ माज़ंदरानी ने यह क़ितआ (काव्य-खंड) लिखकर पेश किया:
ऐ अदा-फ़हमे कि पेशत फ़ाज़िलान-ए-अस्र रा
शुस्तन-ए-मजमूआ-ए-अंदेशा बाब उफ़्तादा अस्त
दर ख़ुम-ए-अफ़लातून ज़ियाद-ए-दानिशत सरख़ोश बूद
हमचु मख़मूरे कि दर फ़िक्र-ए-शराब उफ़्तादा अस्त
गाह-गाहे गर ज़े बे-आदाबी-ए-बाद-ए-सबा
अज़ गुल-ए-रू-ए-अरक़-नाकत नक़ाब उफ़्तादा अस्त
आब-ए-हसरत दर दहान-ए-अख़तरान गरवीदा अस्त
आतिश-ए-ग़ैरत ब-जान-ए-आफ़ताब उफ़्तादा अस्त
ज़ेहन-ए-साफ़त ता अलम गरदीद दर दानिश्वरी
तब्अ-ए-अफ़लातून ज़े-बस दर इज़्तिराब उफ़्तादा अस्त
दफ़्तर-ए-फ़रहंग दर चंगश मुजज़्ज़ा गश्ता अस्त
अज़ कफ़श मजमूआ-ए-दानिश दर आब उफ़्तादा अस्त
अर्ज़-ए-हाले हस्त दर ख़ातिर कि दर इज़हार-ए-आँ
बंद-बंदम मौज-साँ दर इज़्तिराब उफ़्तादा अस्त
आँ बयाज़-ए-ख़ासा-ए-शाही कि दर अतराफ़-ए-आँ
जा-ए-अफ़शाँ नुक़्तहा-ए-इंतिख़ाब उफ़्तादा अस्त
आँ मुरस्सा ख़्वान-ए-गौहर-रेज़ी कि बाशद जल्वा-गर
दुर्र-ए-अल्फ़ाज़श बसे बा आब-ओ-ताब उफ़्तादा अस्त
दोश अज़ दस्त-ए-इरादत-फ़हम ख़ाकम दर दहन
चूँ बयाज़-ए-सीना-ए-माही दर आब उफ़्तादा अस्त
न हमीं अज़ याद-ए-मादन रफ़्त लाल-ए-आबदार
गौहर-ए-ग़लताँ हम अज़ चश्म-ए-सहाब उफ़्तादा अस्त
बहर-ए-शेर-ए-आबदारश ताज़ा तूफ़ाँ करदा अस्त
कश्ती-अश दर चार मौज-ए-इज़्तिराब उफ़्तादा अस्त
गोइया अज़ सर बदर रफ़्तस्त आब-ए-जदवलश
कीं चुनीं गुलज़ार-ए-अशआरश ख़राब उफ़्तादा अस्त
आह अज़ीं ग़म दर दिल-ए-पीर-ओ-जवाँ पेचीदा अस्त
लर्ज़ा ज़ीं हैबत ब-जान-ए-शैख़-ओ-शाब उफ़्तादा अस्त
बसकि मी-बंदन्द हर यक बर गुलू-ए-दीगरे
गर बयाज़-ए-गर्दनाश ख़्वानन्द ताब उफ़्तादा अस्त
मन चि गोयम काँ चु मिज़्गान-ए-ख़ुदश बरगश्त-बख़्त
दर तप-ए-ईं ग़म चुनाँ अज़ ख़्वुर्द-ओ-ख़्वाब उफ़्तादा अस्त
ज़ाँ ज़माँ बाज़ार-ए-परेशाँ-हाली-ओ-आशुफ़्तगी
हमचु ज़ुल्फ़-ए-ख़्वेशतन दर पेच-ओ-ताब उफ़्तादा अस्त
रफ़्त रंग-ए-आतिशीं चूँ शम्अ-ए-सुब्ह अज़ आरिज़श
हमचु नब्ज़-ए-मौज अंदर इज़्तिराब उफ़्तादा अस्त
फ़ैज़-बख़्शा ज़ूद-तर परवाना-ए-बख़्शाइशे
कातिशे दर वे चु शम्अ अज़ इल्तिहाब उफ़्तादा अस्त
वर न ख़्वाही दीद, यक दम दफ़्तर-ए-अफ़लाक रा
अज़ हुजूम-ए-गिर्या-अश यक-सर ख़राब उफ़्तादा अस्त
नेमत ख़ाँ आली उस ज़माने के मशहूर शायर थे। एक बार उन्होंने एक मुरस्सा (जड़ाऊ) कलग़ी, जो पगड़ी पर लगाते थे, ज़ेब-उन-निसा की ख़िदमत में बेचने के लिए पेश की। ज़ेब-उन-निसा ने रख ली। लेकिन जैसा कि दरबारों का दस्तूर है, क़ीमत मिलने में देर हुई। नेमत ख़ाँ ने यह रुबाई लिखकर भेजी:
ऐ बंदगी-अत सआदत-ए-अख़तर-ए-मन
दर ख़िदमत-ए-तो अयाँ शुदा जौहर-ए-मन
गर जीग़ा ख़रीदनी-स्त पस कू ज़र-ए-मन
वर नेस्त ख़रीदनी बिज़न बर सर-ए-मन
(अगर ख़रीदना है तो दाम दिलवाइए और न ख़रीदना हो तो मेरे सिर मारिए) बेगम ने पाँच हज़ार रुपये दिलवाए और कलग़ी वापस कर दी।
मुल्ला सईद अशरफ़ जो ज़ेब-उन-निसा का उस्ताद था, और ज़ेब-उन-निसा उसी से नज़्म और नस्र (कविता और गद्य) में इस्लाह (मार्गदर्शन) लेती थी, बड़े दर्जे का शायर था। तमाम तज़किरों (जीवनी-ग्रंथों) में उसके हालात तफ़्सील से लिखे हैं। बेगम उसे बहुत अज़ीज़ रखती थी। एक बार उसने एक लौंडी मुल्ला साहब के पास भेजी कि इसे ख़िदमत में रखिए। वह कनीज़ (दासी) मुल्ला साहब की पसंद के मुताबिक़ नहीं थी। एक लंबा-चौड़ा क़ितआ (काव्य-खंड) उसकी हिज्व (निंदा) में लिखकर बेगम को भेजा। शुरुआत का शेर यह था:
क़द्र दानिश्वर शनासा नूर-ए-चश्म-ए-आलिमा
ऐ कि हरगिज़ क़ुदरत-ए-हम-चश्मियत हूर अंदाश्त
मौलवी ग़ुलाम अली आज़ाद ने सिर्फ़ यही एक शेर नक़्ल किया है और लिखा है कि इसमें 'क़ाब क़ौसैन औ अदना' का क़ाफ़िया अश्लील मौक़े पर इस्तेमाल किया था। लेकिन यह बहुत ताज्जुब की बात है। ज़ेब-उन-निसा तो ज़ाहिदाना (धार्मिक) मिज़ाज रखती थी। शाही बेगमों के दरबार में आमतौर पर किसी को इस क़िस्म की गुस्ताख़ी की जुर्रत नहीं हो सकती थी। जहाँ आरा बेगम (ज़ेब-उन-निसा की फूफी) एक बार बाग़ की सैर को निकली। हर तरफ़ पर्दा करा दिया गया। मीर सैदी तेहरानी एक मशहूर शायर था। वह किसी हुजरे (कमरे) में छुपकर सवारी का तमाशा देख रहा था। बेगम का हाथी पास से गुज़रा तो बे-साख़्ता (अनायास) सैदी ने यह मतला पढ़ा:
बुरक़ा ब-रुख़ अफ़गंदा बुरद नाज़ ब-बाग़श
ता निगहत-ए-गुल बेख़्ता आयद ब-दिमाग़श
(बाग़ में बुरक़ा पहन कर इसलिए जाती हैं कि फूल की ख़ुशबू छन कर दिमाग़ में आए।) बेगम ने हुक्म दिया कि शायर को खींचते हुए सामने लाएँ। बेगम ने बार-बार मतला पढ़वा कर सुना और पाँच हज़ार रुपये दिलवा दिए। लेकिन साथ ही हुक्म दिया कि शहर से निकाल दिया जाए। (यानी यह गुस्ताख़ी क्यों की) इस वाक़िए से अंदाज़ा हो सकता है कि बेगमों के लिए किस क़िस्म के आदाब (नियम) मुक़र्रर थे।
अख़लाक़ और आदात
ज़ेब-उन-निसा हालाँकि दरवेशाना (फ़क़ीराना) और मुंसिफ़ाना (न्यायपूर्ण) मिज़ाज रखती थी, फिर भी शाहजहाँ की पोती थी। इसलिए नफ़ासत-पसंदी (सुरुचि) और अमीरी के सामान भी लाज़िमी थे। इनायत उल्लाह ख़ाँ जो आलमगीर के अमीरों में ख़ास क़रीबी था, ज़ेब-उन-निसा का मीर-ख़ानसामाँ (प्रबंधक) था। कश्मीर में जगह-जगह ख़ुशगवार और ख़ूबसूरत चश्मे (झरने) हैं। इनमें से एक चश्मा जिसका नाम अहवल था, ज़ेब-उन-निसा की जागीर में था। ज़ेब-उन-निसा ने इसके पास एक निहायत शानदार बाग़ और शाही इमारतें तैयार कराई थीं। चुनाँचे आलमगीर जब 1073 हिजरी में कश्मीर के सफ़र पर गया तो इस मुक़ाम पर एक दिन क़याम (ठहराव) किया और ज़ेब-उन-निसा ने क़ायदे के मुताबिक़ नज़्र पेश की और रुपये न्योछावर किए। 1090 हिजरी में अबरक़ (माइका) का एक बड़ा ख़ेमा तैयार कराया था, जो पूरी तरह शीशा मालूम होता था। नेमत ख़ाँ आली ने इसकी तारीफ़ में एक छोटी सी मसनवी लिखी, जिसके कुछ अशआर (शेर) नीचे दिए गए हैं:
अज़ाँ ख़रगाह-ए-तल्क़श चश्म-ए-बद दूर
कि शुद अज़ जल्वा-अश नूर-अलुन-नूर
तआला अल्लाह चि रौशन बारगाहे
कुदूरत रा दर ईं जा नेस्त राहे
ज़ि-नूरश गश्ता ख़ीरा चश्म-ए-कौकब
कमीना ख़ाना-ज़ादश माह-ए-नख़्शब
फ़रोग़श गर चुनीं दारद जहाँ-ताब
कसे शब रा न-ख़्वाहद दीद दर ख़्वाब
चु आजिज़ गश्त नुत्क़म अज़ सनायश
शुदम जोया-ए-तारीख़-ए-बनायश
पय-ए-तारीख़-ए-आँ गुफ़्तार-ए-ज़माना
बुरद ज़ंग-ए-दिलम आईना-ख़ाना
भाइयों से बहुत मुहब्बत रखती थी। 1105 हिजरी में जब आज़म शाह इस्तिसक़ा (जलोदर) की बीमारी में सख़्त बीमार हुआ तो ज़ेब-उन-निसा ने उसकी तीमारदारी (देखभाल) इस मुहब्बत से की कि बीमारी के तमाम दिनों तक उस परहेज़ी खाने के सिवा जो ख़ुद शहज़ादा खाता था, कोई और खाना नहीं खाया। मुहम्मद अकबर जिस ज़माने में आलमगीर से बाग़ी होकर राजपूतों से मिल गया था, उस ज़माने में भी ज़ेब-उन-निसा ने उससे भाईचारे के ताल्लुक़ात और ख़त-ओ-किताबत (पत्र-व्यवहार) ख़त्म नहीं की। जिसके नतीजे में उसकी तनख़्वाह और जागीर ज़ब्त हो गई।
ज़ेब-उन-निसा के मुताल्लिक़ झूठे क़िस्से
ज़ेब-उन-निसा के बारे में कई झूठे क़िस्से मशहूर हो गए हैं जिनको यूरोपियन लेखकों ने और ज़्यादा बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया है। इनमें से एक यह है कि ज़ेब-उन-निसा और आक़िल ख़ाँ के बीच आशिक़ी और माशूक़ी का ताल्लुक़ था और ज़ेब-उन-निसा उसे चोरी-छुपे महल में बुलाया करती थी। एक दिन आलमगीर महल में मौजूद था कि उसे पता लगा कि आक़िल ख़ाँ महल में है और हम्माम (गुसलख़ाने) की देग में छुपा दिया गया है। आलमगीर ने अनजान बनकर उसी देग में पानी गर्म करने का हुक्म दिया। आक़िल ख़ाँ ने राज़ छुपाए रखने की ख़ातिर उफ़ तक न की और जल कर मर गया। मरने के वक़्त यह मतला कहा था:
बाद-ए-मुर्दन ज़ि-जफ़ा-ए-तो अगर याद कुनम
अज़ कफ़न दस्त बुरूँ आरम ओ फ़रियाद कुनम
आक़िल ख़ाँ का तफ़्सीली ज़िक्र 'मआसिर-उल-उमरा' में मौजूद है और चूँकि वह शायर था, इसलिए तमाम तज़किरों में भी उसके हालात दर्ज हैं। लेकिन इस वाक़िए का कहीं नाम-ओ-निशान नहीं है। जिन किताबों में इसका हाल मिल सकता था और जो प्रामाणिक और भरोसेमंद मानी जाती हैं, वे नीचे दी गई हैं: आलमगीरनामा, मआसिर-ए-आलमगीरी, मआसिर-उल-उमरा, तज़किरा सरख़ोश, ख़ज़ाना-ए-आमरा, सर्व-ए-आज़ाद, यद-ए-बैज़ा। इन किताबों में एक हर्फ़ भी इस वाक़िए के बारे में मौजूद नहीं है, हालाँकि उसकी वफ़ात (मृत्यु) का ज़िक्र सबने लिखा है जो 1107 हिजरी में हुई। दूसरा वाक़िया यह मशहूर है कि एक बार ज़ेब-उन-निसा ने यह मिसरा कहा: अज़ हम नमी शवद ज़ि हलावत जुदा लबम। वह चाहती थी कि यह मतला बन जाए, लेकिन दूसरा मिसरा इसके जोड़ का मौज़ूँ (सटीक) नहीं बैठ रहा था। उसने नासिर अली के पास मिसरा लिखकर भेजा। उसने बरजस्ता (तुरंत) कहा:
अज़ हम नमी शवद ज़ि-हलावत जुदा लबम
शायद रसीद बर लब-ए-ज़ेब-उन-निसा लबम
लेकिन जो शख़्स तैमूरियों के जाह-ओ-जलाल (शानो-शौकत) और आदाब-ओ-आईन (नियम-क़ानून) से वाक़िफ़ है, वह समझ सकता है कि बेचारे नासिर अली को ख़्वाब में भी इस गुस्ताख़ी की जुर्रत नहीं हो सकती थी।
हाशिए
(1) मआसिर-उल-उमरा, जिल्द 2, सफ़्हा 670, 671
(2) मआसिर-उल-उमरा, जिल्द 2, सफ़्हा 828
(3) मआसिर-ए-आलमगीरी, सफ़्हा 538
(4) सर्व-ए-आज़ाद, तज़किरा मुल्ला अशरफ़
(5) सर्व-ए-आज़ाद, तज़किरा मुल्ला अशरफ़ माज़ंदरानी
(6) मआसिर-ए-आलमगीरी, सफ़्हा 304
(7) मआसिर-ए-आलमगीरी, सफ़्हा 225
(8) सफ़्हा आलमगीरी, सफ़्हा 262
(9) मआसिर-ए-आलमगीरी, सफ़्हा 539
(10) ये तमाम अशआर तज़किरा 'मजमा-उल-ग़राइब' में अशरफ़ सईद के हालात में नक़्ल किए गए हैं।
(11) ख़ज़ाना-ए-आमरा, तज़किरा नेमत ख़ाँ आली।
(12) ख़ज़ाना-ए-आमरा, ज़िक्र सैदी तेहरानी
(13) मआसिर-उल-उमरा, जिल्द 2, तज़किरा इनायत उल्लाह ख़ाँ, सफ़्हा 828
(14) आलमगीरनामा, मतबूआ (प्रकाशित) कलकत्ता। सफ़्हा 836
(15) मआसिर-उल-उमरा, जिल्द 1, सफ़्हा 599, मआसिर-ए-आलमगीरी में ज़ेब-उन-निसा की बजाय ज़ीनत-उन-निसा का नाम लिखा है, लेकिन यह वही लफ़्ज़ी इश्तबाह (शाब्दिक भ्रम) है।
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