ज़बान और रस्म-ए-ख़त
ज़बान की राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय और सांस्कृतिक अहमियत इल्मी नज़रिए से मानी हुई बात है। देखा जाता है कि दुनिया की छोटी से छोटी और असभ्य क़ौम के पास भी ज़बान मौजूद है। ज़्यादातर लोग ऐसे हैं जिन्हें यह मसला परेशान नहीं करता कि इंसान बोलने की ताक़त से किस तरह काम लेता है। सामाजिक ज़िंदगी की किस मंज़िल पर ज़बान वजूद में आई, इसका विकास किस तरह हुआ, इंसान और ज़बान का क्या ताल्लुक़ है, ज़बान और क़ौम में क्या रिश्ता है। ज़बान के बदलाव में कौन से तत्व काम करते हैं, मातृभाषा से क्या मुराद है और ज़बान किस तरह ज़िंदा रहती है?
ये सवाल पेचीदा हैं और आम ज़ेहन तो क्या, विद्वानों के लिए भी मुश्किलें पैदा करते हैं, फिर भी अलग-अलग विज्ञानों की मदद से इंसानों ने इन सवालों पर बराबर ग़ौर किया है और आजकल जब इंसानी अधिकारों पर इल्मी नज़रिए से निगाह डाली जा रही है, तो क़ौम और ज़बान के ताल्लुक़ का मसला भी सामने आ गया है। हिंदुस्तान में ज़बान का मसला इल्मी और बौद्धिक नज़रिए से तय नहीं किया जा रहा है। इसलिए बहुत से लोगों के जज़्बात भड़के हुए हैं और गुत्थियां बढ़ती जा रही हैं। ज़बान से जुड़ा कोई मसला छेड़ते हुए फ़ौरन यह ख़याल पैदा होता है कि कुछ लोग इससे अपनी भावनाएं और नीयतें जोड़कर इस बहस को इल्मी रास्ते से ज़रूर भटका देंगे, लेकिन मैं ये चंद पंक्तियां इस उम्मीद में लिख रहा हूं कि इन पर वैज्ञानिक ज्ञान की रोशनी में बहस की जाएगी।
ज़बान ही की तरह लिपि का मसला भी इल्मी और ग़ैर-जज़्बाती ग़ौर-ओ-फ़िक्र का हक़दार है। क्या किसी ज़बान और उसकी लिपि में कोई अंदरूनी ताल्लुक़ है? क्या जिस ज़बान के लिए जो लिपि इस्तेमाल की जा रही है, वही उसके लिए सबसे मुनासिब है और क्या एक ज़बान को दूसरी लिपि में नहीं लिखा जा सकता? और अगर लिखा जाए तो क्या यह कोई अस्वाभाविक कोशिश होगी? क्या इससे ज़बान की असलियत और हक़ीक़त बदल जाएगी। इस वक़्त इस मसले को किसी ख़ास ज़बान या लिपि की रोशनी में देखना मक़सद नहीं है बल्कि किसी ज़बान और उसकी लिपि के ताल्लुक़ को देखना है।
इस हक़ीक़त से कोई इनकार नहीं कर सकता कि ज़बान पहले वजूद में आई, शुरुआत में इसकी जो भी शक्ल रही हो, वह विचारों और भावनाओं को ज़ाहिर करने का एक ज़रिया थी, इसका मक़सद अभिव्यक्ति और संचार था, इससे वह सामाजिक ज़रूरत पूरी होती थी जिससे सबके ज़ेहन में किसी हद तक समानता और एकता पैदा होती है। इसी सिलसिले में यह बहस भी उठती है कि सबसे पहली ज़बान कहां और किन लोगों में पैदा हुई थी, क्या एक ही ज़बान पैदा हुई या कई ज़बानें? लेकिन यहां इस बहस में उलझने की ज़रूरत नहीं है। हमें मान लेना चाहिए कि इंसानी ज़िंदगी की शुरुआत में ज़बान वजूद में आई और अगर ये इंसान कई इलाक़ों में रहते थे तो उनकी सामाजिक ज़रूरतों के तहत अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग ज़बानें वजूद में आईं, इससे मूल विचार पर कोई असर नहीं पड़ता, यानी ज़बान इंसानों के बीच पैदा हुई और एक ज़बरदस्त सामूहिक आधार के रूप में शुरुआती सभ्यता को व्यवस्थित करने में मददगार साबित हुई।
यह बात इनकार करने लायक़ नहीं है कि ज़बान सामूहिक ज़िंदगी के निर्माण और विकास में इतनी अहम साबित हुई, जब इसने विकास में मदद दी तो इसकी ख़ुद भी तरक़्क़ी हुई और इंसानी ज़ेहन ने इस अनोखे आविष्कार को हमेशा ज़िंदा रखने के लिए लिपि ईजाद करने की कोशिश की। बहरहाल यह बात तय है कि ज़बान पहले पैदा हुई और लिपि बाद में। मैं इससे यह नतीजा निकालता हूं कि ज़बान और लिपि में कोई अंदरूनी ताल्लुक़ नहीं है बल्कि यह महज़ रस्मी (औपचारिक) है, और अगर यह बात मान ली जाए तो ज़बान और लिपि से जुड़ी जो बहस जारी है, वह सीमित हो सकती है।
यहां ज़रा देर के लिए ठहर कर अगर लिपि की शुरुआत पर ग़ौर कर लिया जाए तो ज़बान और लिपि के ताल्लुक़ को समझने में आसानी होगी। ज़बान ही की तरह लिपि की शुरुआत भी धुंधलके में है, लेकिन जहां तक इस सिलसिले में खोज हुई है, उससे पता चलता है कि शुरुआत चित्रात्मक अक्षरों की अलग-अलग शक्लों से हुई। मिस्री, बेबीलोनियन, चीनी और हिंदुस्तानी लोग लेखन कला को देवताओं से जोड़ते थे और यहूदी हज़रत मूसा से। इसमें शक नहीं कि लिखाई का आविष्कार भी प्रकृति पर क़ाबू पाने का एक ज़रिया था और अपनी याददाश्त को और मज़बूत बनाने के लिए इंसान ने अपने ख़यालों को जानी-पहचानी तस्वीरों में ढाल लिया, ताकि मानसिक जुड़ाव की मदद से वह अपने ख़यालों और तजुर्बों को दोबारा ताज़ा करने में सक्षम हो सके। यह अहम सामाजिक कारनामा जादू और टोटके के विचार पर भी आधारित कहा जा सकता है।
अब इस पर ग़ौर किया जाएगा तो मालूम होगा कि जादू की मदद से भी प्रकृति को हराने या उस पर क़ाबू पाने की ही कोशिश की जाती थी, क्योंकि इंसान अपनी शुरुआती ज़िंदगी से ही प्रकृति के ख़िलाफ़ जद्दोजहद करने लगा था और अपने सीमित भौतिक साधनों से काम लेकर आगे बढ़ रहा था। लिखाई आगे बढ़ने का एक ज़रिया थी। यह ज़ाहिर है कि याददाश्त में सबसे ज़्यादा मदद सबसे क़रीबी समानता से मिलती है, इसलिए चीज़ों की तस्वीरों को सबसे ज़्यादा स्वाभाविक लिखाई कहा जा सकता है। पेड़ की तस्वीर देखकर पेड़ की याद ज़रूर आएगी, और ज़िंदगी के शुरुआती तजुर्बों का जो ताल्लुक़ पेड़ से होगा, ख़यालों का सिलसिला उन्हें भी सामने ला खड़ा करेगा, लेकिन ज़बान सिर्फ़ चीज़ों के नामों का समूह तो नहीं है।
गतिशील ज़िंदगी में बनी-बनाई चीज़ें कम हैं। ख़यालों की रफ़्तार, कर्म की अलग-अलग सूरतों और हालतों में संबंध पैदा कर लेती है, इसलिए चित्रात्मक लिखाई के अलावा वैचारिक लिखाई भी पैदा हुई जिसमें ख़यालों और विचारों के प्रतीक बनाए जाते थे, यानी अल्फ़ाज़ ख़यालों के उच्चारित या ध्वन्यात्मक प्रतीक कहे जा सकते हैं, और उनकी तस्वीरें लिखित प्रतीक। इस लिखित प्रतीक का मक़सद किसी आवाज़ या आवाज़ों के समूह या ख़याल की तरफ़ ज़ेहन को ले जाने के सिवा और कुछ नहीं है।
चित्रात्मक लिखाई ख़यालों का प्रतीक तय करने की शुरुआती और भद्दी कोशिश थी, लेकिन जब इंसानी ज़ेहन और मज़बूत हुआ और उसकी लिखने की ताक़त बढ़ी तो आवाज़ों के प्रतीक तय करने की कोशिश की गई, क्योंकि चित्रात्मक लिपि में जितने अल्फ़ाज़ होते थे, उतने ही प्रतीकों की ज़रूरत पड़ती थी। फिर चित्रकारी पर महारत न होने की वजह से कुछ तस्वीरें एक-दूसरे से मिल जाती थीं और भ्रम पैदा करती थीं। इसलिए ज़्यादा वैज्ञानिक तरीक़े की तलाश ज़रूरी थी। जल्दी लिखने की कोशिश में तस्वीरें महज़ प्रतीक बनकर रह जाती थीं और माना जाता है कि वर्णमाला उन्हीं चित्रात्मक या वैचारिक लिखाइयों का विकसित रूप है। शुरुआती इब्रानी (हिब्रू) या यूनानी वर्णमाला के इतिहास का अध्ययन करने से मालूम होता है कि हर अक्षर का कोई अर्थ होता है और उनकी शुरुआती शक्ल उस अर्थ या मायने से रूपगत समानता रखती है।
इस वक़्त इल्मी हल्क़ों (विद्वानों के बीच) में यह बात मानी जाती है कि सबसे पुरानी लिपी के नमूने (जो तस्वीरी या हीरोग्लिफ़िक नहीं हैं) उत्तरी सामी क़ौमों में मिलते हैं, उन्हीं की अलग-अलग शाखाएँ और शक्लें कनानी (यानी शुरुआती इब्रानी और फ़ीनीक़ी), अरामी, दक्षिणी सामी और यूनानी के रूप में बढ़ीं और फैलीं। यह अरामी लिपी थी जिससे कई लिपियाँ निकलीं या कम से कम इससे ख़याल और असर लेकर दूसरी लिपियाँ बनाई गईं, चुनांचे पुरानी पहलवी तो अरामी लिपी से निकली ही है, ब्राह्मी लिपी भी इसी का नतीजा कही जा सकती है, लेकिन यह बात बहुत बहस का विषय है क्योंकि शुरू में कभी यह दाईं तरफ़ से लिखी गई और कभी बाईं तरफ़ से। यहाँ मूल बहस से इसका गहरा ताल्लुक़ भी नहीं है, सिर्फ़ यह ज़ाहिर करना मक़सद है कि हर ज़बान अपने साथ लिपी लेकर पैदा नहीं हुई बल्कि सांस्कृतिक विकास और व्यापारिक संबंधों और सामाजिक असर के तहत एक ही लिपी और अक्षर कई ज़बानों के लिए इस्तेमाल होने लगे और आहिस्ता-आहिस्ता वक़्त गुज़रने के साथ उनमें तब्दीलियाँ हुईं।
ज़बानों में भी मेल-जोल होते रहे लेकिन फिर भी ज़्यादा इस्तेमाल और क़ौमी ख़ूबियों वग़ैरह की वजह से ज़बानों ने अपनी आज़ाद हैसियत कुछ न कुछ बरक़रार रखी, लेकिन लिखने का फ़न जो एक जगह से दूसरी जगह सफ़र करके पहुँचा, तो एक ज़रूरी सामाजिक ईजाद (आविष्कार) होने की वजह से लोगों ने इसे अपना लिया और अपने अल्फ़ाज़ को भी आवाज़ पर आधारित लिखित रूप दे दिया। लंबा अरसा गुज़र जाने के बाद मामूली तब्दीलियाँ करके हर मुल्क में इसे क़ौमी लिपी या ख़ास ज़बानों से जुड़ी लिपी समझ लिया गया। यह भी याद रखना चाहिए कि जिस तरह ज़बानों में तब्दीली होती रही है, उस तरह लिपी में नहीं होती है। मामूली आवाज़ों के बदलाव के लिए मामूली तब्दीलियाँ कर ली गईं।
डेविड डिरिंगर, जिसने वर्णमाला (alphabet) पर बड़ी इल्मी किताब लिखी है, लिखने के क्रांतिकारी फ़न को उत्तरी-पश्चिमी सामी लोगों से जोड़ता है। उसका ख़याल है कि वहीं से ये अक्षर यूनानियों में पहुँचे और यूनानियों ने इनमें इज़ाफ़ा किया। इन्हीं जड़ों से बराबर शाखाएँ निकलती रहीं और मुल्कों-मुल्कों में फैलती रहीं। किसी लिपी को मुकम्मल तौर पर तमाम व्यंजनों (consonants) और तमाम स्वरों (vowels) के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। अभी चंद साल पहले तक रूस की कुछ ज़बानों के पास लिपी नहीं थी, भाषा विज्ञानियों ने इन ज़बानों को तरक़्क़ी देने के लिए इनकी लिपियाँ ईजाद कीं।
सारी दुनिया के इंसानों को एक करने की कोशिशें हमेशा से होती रही हैं। कभी मज़हब ने यह फ़र्ज़ निभाने की कोशिश की है, कभी सियासी फ़लसफ़े ने, कभी सब के लिए एक ज़बान ईजाद करने की कोशिश की गई है और कभी एक लिपी। इनके पीछे हुकूमत और सत्ता के जो जज़्बात काम कर रहे हैं वो इतने ज़ाहिर हैं कि उन पर बहस करने की ज़रूरत नहीं। आज भी एक क़ौम या इलाक़े की ज़बान दूसरे इलाक़ों पर लादने में यही जज़्बा काम करता है। हालाँकि इसे अलग-अलग दलीलों से दार्शनिक और इल्मी बनाने की कोशिश की जाती है लेकिन चूँकि इसमें ज़ोर-ज़बरदस्ती के पहलू शामिल होते हैं, इसलिए कभी कामयाबी नहीं होती। फिर भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अगर किसी तरीक़े से ज़बान और लिपी में एकरूपता पैदा हो जाए तो कुछ सदियाँ गुज़र जाने के बाद इससे फ़ायदे ज़रूर हासिल होंगे, लेकिन असल सवाल यह है कि जिस तरह ज़बान क़ौम के निर्माण और विकास में मददगार साबित होती है, क्या उसी तरह लिपी भी किसी ज़बान से जुड़ी होती है?
तक़रीबन तमाम भाषा विज्ञानी इस ख़याल से सहमत हैं कि ज़बान और लिपी में कोई ख़ास ताल्लुक़ नहीं। आवाज़ और उसकी बाहरी लिखित अलामत (चिह्न) में कोई ज़रूरी रिश्ता नहीं है। फिर जो यह ख़याल बार-बार दोहराया जाता है कि अगर किसी ज़बान की लिपी बदली गई तो वो ज़बान भी ख़त्म हो जाएगी, इसका क्या मतलब है?
जब तक लिखने का फ़न ईजाद नहीं हुआ था, ज़बान का इस्तेमाल सिर्फ़ आवाज़ की हैसियत रखता था, उस वक़्त ज़बान किसी लिपी से जुड़ी न थी, लफ़्ज़ों की आवाज़ को सिर्फ़ कान पकड़ते थे और बोलने वाले की आवाज़ जो असर या प्रतिक्रिया सुनने वाले में पैदा करती थी, वो कुछ दिनों में इसे पहचानने का आदी बन जाता था, यहाँ तक कि ख़ास अल्फ़ाज़ ख़ास असर पैदा करने लगते थे और अल्फ़ाज़ के मायने तय हो जाते थे। अल्फ़ाज़ की सामाजिक हैसियत मायने को भी सामाजिक अहमियत बख़्शती थी। ज़बान का जो मक़सद था वो इस तरह पूरा हो रहा था। जब लिखने का फ़न ईजाद हुआ तो असर और प्रतिक्रिया को स्थायी बनाने के लिए आवाज़ की तस्वीरों को जो सुनने की मदद से ज़ेहन में बनती थीं, लिखित अलामतो (चिह्नों) में बदल दिया गया और वो असर देखने की मदद से ज़ेहन पर उभरने लगा।
सीखने और देखने के बाद अलग-अलग अलामतो की आवाज़ें उसी तरह ज़ेहन में बनने और असर पैदा करने लगती हैं जिस तरह सुनने और सीखने के बाद। अगर किसी शख़्स को कोई ज़बान न मालूम हो तो उसके अल्फ़ाज़ (यानी आवाज़ों के समूह) सुनने के बाद भी वो उन्हें समझ न सकेगा। उसी तरह उन्हें किसी मालूम या नामعلوم लिपी में लिखा हुआ देखने के बाद भी कुछ न समझा जा सकेगा। असर या प्रतिक्रिया की वो मंज़िल जो मतलब तक ज़ेहन को पहुँचा दे, हमारे इल्म (ज्ञान) पर निर्भर है और इसका ताल्लुक़ आदत से है। जिस-जिस लिपी को हम जानते हैं उसी हद तक हम उसे देखकर जल्दी या देर से असर हासिल करेंगे।
दूसरे लफ़्ज़ों में इसका मतलब यह है कि ख़ास लिखित अलामतो को देखकर ख़ास आवाज़ों की तरफ़ ज़ेहन का जाना सिर्फ़ हमारी आदत पर निर्भर है और यह आदत सीखी हुई होती है। एक ख़ास अलामत का ताल्लुक़ एक ख़ास आवाज़ के साथ हमारा तय किया हुआ है। मिसाल के तौर पर किसी आवाज़ को लीजिए। 'ज', यह आवाज़ तक़रीबन दुनिया की हर ज़बान में मौजूद है। कुछ लोग इसे या किसी शक्ल में पहचानते हैं, कुछ की शक्ल में, कुछ लोग 'ज' की शक्ल में। सैकड़ों लिपियाँ हैं जिनमें यही आवाज़ किसी न किसी शक्ल में मिलती है। अगर कोई शख़्स तमाम लिपियों को जानता होगा तो वो हर जगह इस आवाज़ की लिखित सूरत या अलामत को पहचान लेगा और चंद को जानता होगा तो सिर्फ़ उन्हीं में पहचानेगा और अगर सिर्फ़ एक को जानता होगा तो सिर्फ़ उसी एक में पहचानेगा। अगर किसी क़िस्म की लिपी से वाक़िफ़ न होगा तो वो यह आवाज़ जानने के बाद भी इसकी शक्ल या लिखित रूप से बिल्कुल अनजान होगा।
जो शख़्स कोई लिपी नहीं जानता, उसे आवाज़ों के पहचानने के लिए कोई लिपी सिखाई जा सकती है और थोड़े ही दिनों की प्रैक्टिस (अभ्यास) के बाद उन आवाज़ों को जिन्हें वो बोलने में इस्तेमाल करता है, उस लिपी में पहचानने का आदी हो जाएगा, चाहे वो लिपी कोई हो और ज़बान कोई। जैसा कि बताया जा चुका है, दुनिया की कोई लिपी मुकम्मल नहीं है लेकिन जो लिपी जितनी अच्छी होगी उसी क़दर वो आवाज़ों की अच्छी अलामते यानी आवाज़ों से ज़्यादा से ज़्यादा मेल रखने वाली अलामते पेश कर सकेगी और उसी क़दर साइंटिफ़िक (वैज्ञानिक) कही जाएगी, लेकिन जो निगाहें जिस लिपी की आदी हो जाती हैं वही उनके लिए आसान मालूम होती है।
चीनी और जापानी लिपि बहुत मुश्किल हैं। लोग सिर्फ़ उन्हीं चिह्नों में आवाज़ों को पहचानने के आदी हो चुके हैं। वे आसान से आसान लिपि को भी शुरुआत में उनके मुक़ाबले में मुश्किल समझेंगे। एक इंसान कई लिपियाँ और कई ज़बानें जानता हो तो उसकी आदत हर ज़बान को उसकी प्रचलित लिपि में पढ़ने की हो जाती है, लेकिन अगर एक ज़बान दूसरी लिपि में लिख दी जाए तो ज़बान जानने की वजह से वह लिपि की मुश्किलों को पार कर सकेगा और जितना अभ्यास बढ़ाता जाएगा, उसी क़दर यह मुश्किल ख़त्म होती जाएगी। यहाँ तक कि वह किसी ज़बान को किसी भी लिपि में पढ़ने लगेगा।
इसे एक तरह से और देखना चाहिए। अगर ज़बान और लिपि में कोई ऐसा ताल्लुक़ होता कि ज़बान के अल्फ़ाज़ उसी की प्रचलित लिपि में कोई प्रतिक्रिया या असर पैदा कर सकते तो यक़ीनन यह मुश्किल पैदा करता, लेकिन ऐसा नहीं है। असल प्रतिक्रिया मतलब की जानकारी से पैदा होती है, चिह्न से नहीं। मिसाल के तौर पर हम बहुत से अंग्रेज़ी अल्फ़ाज़ उर्दू में इस्तेमाल करते हैं और ज़रूरत पड़ने पर उन्हें उर्दू लिपि में लिख भी देते हैं जैसे पब्लिक, पोएट्री, पॉलिटिकल, जज वग़ैरह। और हर वह इंसान जो इन अल्फ़ाज़ और इनके मायनी से वाक़िफ़ है, बिना किसी दिक़्क़त के इन्हें पढ़ लेता है। अगर ये अल्फ़ाज़ अंग्रेज़ी लिपि में लिखे जाते तो इस लिपि से अनजान लोग इन अल्फ़ाज़ के मायनी जानने के बाद भी इन्हें पढ़ न सकते।
इन तमाम बातों से यह साफ़ नतीजा निकलता है कि ज़बान और लिपि में कोई ताल्लुक़ नहीं है, यह हमारी परंपरा और आदत है जो ताल्लुक़ पैदा करती है, जिस तरह की आदत डाली जाए, पड़ जाएगी। यानी अगर अंग्रेज़ी ज़बान को फ़ारसी लिपि में, उर्दू ज़बान को लातीनी या अंग्रेज़ी लिपि में लिखने लगें तो यह कोई अस्वाभाविक, नामुमकिन या अकादमिक नज़रिए से ग़लत काम न होगा। दोनों लिपियाँ ऐसी हैं जिनमें कभी-कभी बोलने और लिखने में फ़र्क़ होता है। उर्दू का बिल्कुल अंग्रेज़ी या लातीनी लिपि में अपना अलिफ़ खो देगा और अंग्रेज़ी का HIGH उर्दू में लिखा जाएगा तो दो हर्फ़ G और H ग़ायब हो जाएँगे और उर्दू में यह लफ़्ज़ तलफ़्फ़ुज़ (उच्चारण) के मुताबिक़ 'हाई' रहेगा।
हर ज़बान में लिपि का मक़सद एक ही है। आवाज़ों के चिह्न तय करके उन्हें स्थायित्व बख़्शना, कहीं भी ये चिह्न मायनी तय करने में मदद नहीं देते क्योंकि अगर ऐसा होता तो फिर बिना लिखे हुए लफ़्ज़ के मायनी तय ही न हो सकते, लेकिन हम जानते हैं कि बातचीत करते वक़्त हम लफ़्ज़ के मायनी महज़ उसकी आवाज़ की हैसियत को सामने रखकर समझ लेते हैं। अब अगर यह बात तय हो जाए कि ज़बान और लिपि दो अलग-अलग चीज़ें हैं और कोई ज़बान किसी भी लिपि में लिखी जा सकती है तो फिर उर्दू के लिए देवनागरी, लातीनी और फ़ारसी लिपि में से किसी एक को चुनने में सवाल दूसरा रूप ले लेगा। फ़ितरत, मिज़ाज और मनोविज्ञान के नाम पर बहुत सी अकादमिक ग़लतफ़हमियाँ तैयार की गई हैं। उन्हीं में से एक यह भी है कि अगर लिपि बदल दी जाए तो ज़बान बदल जाएगी या ख़राब हो जाएगी। अगर इस बहस से सही नतीजे निकले तो फिर यह बहस शुरू की जा सकती है कि किसी लिपि को अपनाने में किन बातों का ध्यान रखना है और आज इस मसले की स्थिति क्या है।
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