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उर्दू शायरी की अदबी समाजियात

मोहम्मद हसन


अनुवाद : Rekhta Editor

मोहम्मद हसन

उर्दू शायरी की अदबी समाजियात

मोहम्मद हसन

MORE BYमोहम्मद हसन

    निज़ामी बीदरी ने जब उर्दू की पहली मसनवी 'कदम राव पदम राव' लिखी होगी तो उसे अंदाज़ा भी होगा कि उर्दू शायरी के लिए नई रिवायत (परंपरा) कायम हो रही है। इस रिवायत का रूप-रंग फ़ारसी शायरी के ढांचे से मिला था। बहरें (छंद) वहीं की थीं, मसनवी के मिसरों की तराश, काफ़िए की खनक और हर मिसरे का दूसरे मिसरे से संबंध और लय सब कुछ फ़ारसी रिवायत का हिस्सा था, लेकिन इस ढांचे में जो रूह मौजूद थी वह देशी रिवायतों की थी और उनमें जो कहानी बयान हुई थी वह दो हिंदुस्तानी दिलों की कहानी थी। निज़ामी बीदरी की मसनवी की तर्ज़ पर कई मसनवियों की रचना की गई और यह कम से कम दकनी दौर की मसनवियों की एक मानी हुई रिवायत बन गई। यहाँ तक कि डॉक्टर सैयद अब्दुल्लाह ने उर्दू मसनवियों का विश्लेषण करते वक़्त इस शुद्ध शैली को एक अलग रंग माना।

    इस क़िस्म की सभी मसनवियों में कई विशेषताएं समान हैं, इनमें इश्क़िया क़िस्से नज़्म किए गए हैं और ये इश्क़िया क़िस्से आम तौर पर पहले से मशहूर रिवायतों का हिस्सा थे। इन्हें काव्य रूप देने से शायर का मक़सद महज़ वर्णन करना नहीं बल्कि अपने दौर को सामाजिक अभिव्यक्ति का माध्यम देना है। (२) आम तौर पर इस क़िस्म के क़िस्से के ज़रिए वह इंसानी फ़ितरत या नैतिकता के किसी एक पहलू पर ज़ोर देना चाहता है और इसी के मुताबिक़ वह इन क़िस्सों में कहीं-कहीं मुनासिब फेरबदल कर लेता है और अपनी ज़रूरत के मुताबिक़ उन्हें ढाल लेता है ताकि उन्हें स्पष्ट दिशा दे सके।

    इन क़िस्सों में जिस क़िस्म के किरदार पेश किए गए हैं वे सब के सब बड़े आदर्श किरदार हैं और उनके जज़्बात और एहसासात में बड़ी ताक़त और शिद्दत है। नज़र आने वाले किरदार, नज़र आने वाले मक़सदों के लिए, नज़र आने वाले साधनों से संघर्ष करते नज़र आते हैं।

    इश्क़ का जो तसव्वुर (विचार) यहाँ पेश किया गया, वह महज़ दुनियावी आनंद का तसव्वुर नहीं है बल्कि इसमें दृढ़ता के साथ वफ़ादारी ही असल ईमान है और इसके लिए जान कुर्बान करना बहुत छोटा कमाल माना जाता है। इन कहानियों के साथ-साथ वे मसनवियाँ हैं जिनमें मज़हबी चमत्कार या तिलिस्माती (जादुई) क़िस्से बयान हुए हैं। मज़हबी चमत्कार हालाँकि हैरत में डालने वाले हैं और इनमें अलौकिक तत्वों से ख़ूब काम लिया गया है, मगर इनमें एक ऐसा आला तसव्वुर पेश किया गया है जिसमें ईमान की ताक़त सभी दुश्वारियों पर क़ाबू पा लेती है। मसनवियों की तीसरी क़िस्म रज़्मिया (युद्ध-काव्य) थी जिसमें जंगों का बयान मौजूद था। ये जंगें ख़याली और फ़र्ज़ी थीं बल्कि वाक़ई दकन की धरती के विभिन्न इलाक़ों में लड़ी गईं और विभिन्न सियासी गुटों के बीच लड़ी गईं। यह सच है कि इनमें शायरों ने फ़र्ज़ी क़िस्सों के अफ़साने भी गढ़े और स्थानीय तौर पर मशहूर और मक़बूल रिवायतों को भी इन घटनाओं में जगह दी, जिनसे ये घटनाएँ महज़ ऐतिहासिक सच्चाई को दर्शाने वाली नहीं रहीं, बल्कि हक़ीक़त की ऐसी तस्वीर बन गईं जिनमें कल्पना ने रंग भरा है और जगह-जगह रचनात्मक शक्ति ने बदलाव और इज़ाफ़े कर दिए हैं, लेकिन इन सब मसनवियों के किरदार भी एकांगी (एकतरफ़ा) हैं। उनके पास महज़ अमल (कर्म) है, फ़िक्र (विचार) नहीं है, उनके पास ज़ाहिर (बाहरी रूप) है बातिन (आंतरिक रूप) नहीं है, वे सिर से पैर तक अमल की मूरत हैं और उनका मन अंदरूनी कशमकश से ख़ाली है। वे हुस्न, बहादुरी और इंसाफ़ के पुतले हैं, नैतिकता की सभी ख़ूबियाँ उनमें मौजूद हैं।

    जो लड़ाइयाँ उन्होंने लड़ी हैं वे असली हैं और उनके मैदान-ए-जंग महज़ फ़र्ज़ी नहीं हैं। यक़ीन आए तो नुसरती की मसनवी 'अली नामा' का वह मंज़र पढ़ लीजिए, जिसमें अपने नायक की फ़तह के बाद मैदान-ए-जंग का नक़्शा खींचा गया है। यहाँ सैकड़ों लाशें बिना क़ब्र और कफ़न के पड़ी हैं, किसी का सिर ग़ायब है किसी का धड़, किसी के ख़ून से ज़मीन लाल हो रही है तो किसी का गोश्त गिद्ध खा रहे हैं और शायर इस मंज़र को ख़ुशी और उल्लास के मंज़र के तौर पर बयान कर रहा है, जहाँ गीदड़ और आदमख़ोर जानवर बराती हैं और मौत गीत गा रही है। हर दर्दनाक मंज़र एक आनंददायक नज़ारे में बदल जाता है और शायर जंग में फ़तह हासिल करने के नशे में चूर होकर शायराना तश्बीहों (उपमाओं) और इस्तआरों (रूपकों) के ज़रिए सब कुछ बयान करता चला जाता है। इन्हीं के साथ-साथ इन मसनवियों की एक और क़िस्म भी है जिनमें दास्तानी रंग हावी है। क़िस्सा अबू तमीम अंसारी हो या तूती नामा, दोनों में यही रंग हावी है।

    क़िस्सा अबू तमीम में किस तरह क़िस्से के अंदर क़िस्से आगे बढ़ते हैं और हज़रत अबू तमीम की लड़ाइयाँ और अभियान मसनवी का गौण क़िस्सा बन कर रह जाते हैं। तूती नामा में किस तरह सौदागर की बीवी को तूती हर रात नए-नए क़िस्से सुनाकर अपने शौहर से दग़ाबाज़ी करने से रोकती है, हर रात उसके नए क़िस्से पूरी मसनवी का ताना-बाना बुन कर रख देते हैं। ग़रज़ दकनी मसनवियों का पूरा भंडार ऐतिहासिक और अर्ध-ऐतिहासिक, अफ़सानवी और दास्तानी, रज़्मिया (युद्ध-काव्य) और बज़्मिया (शृंगार-काव्य) तत्वों की एक ऐसी चित्रशाला है, जिसमें सामाजिक रिश्तों की नज़दीकी और घटनाओं के पारंपरिक भंडार की दिलकशी साफ़ झलकती है।

    मसनवी निगार मानो यहाँ भी अपने दौर का गायक और चित्रण करने वाला है। मौलिक क़िस्से उसका मैदान नहीं, वह या तो रिवायतों के भंडार से क़िस्से और किरदार लेता है और उन्हें अपनी कल्पना और शैली से ज़िंदा और चमकदार बना देता है या फिर इतिहास से सामग्री जुटाता है। इनका समापन सिराज औरंगाबादी की मसनवी 'सिराज-ए-सुख़न' पर होता है जिसमें अपने ज़माने का मशहूर क़िस्सा बयान कर दिया गया है और इसका सारा हुस्न बयान की सरलता के अलावा हुस्न की अदा और इश्क़ की बेबसी में छिपा है। यहाँ इश्क़ आनंद से शुरू ज़रूर होता है मगर महज़ आनंद पर ख़त्म नहीं होता और एक ऐसी अजब सरमस्ती, बेचैनी और बेक़रारी छोड़ जाता है जिसके ज़रिए आत्मज्ञान हासिल हो सकता है, जिसे सूफ़ियों की शब्दावली में 'क़ंतरत-उल-हक़ीक़त' (सच्चाई का पुल) का मर्तबा हासिल होता है। इश्क़ का यही शोला भड़क कर दुनियावी कूड़े-करकट को जलाकर ख़ाक कर सकता है और इंसान का व्यक्तित्व सांसारिक बंधनों की गंदगी से आज़ाद होकर कुंदन बन सकता है। मसनवी की इस पूंजी में वास्तविक इज़ाफ़ा दिल्ली और लखनऊ में हुआ जहाँ मीर असर और मीर की मसनवियाँ और बाद में मीर हसन की मसनवी 'सहर-उल-बयान', मुसहफ़ी की मसनवी 'बहर-उल-मोहब्बत', तक़ी ख़ाँ हवस की मसनवी 'लैला मजनूँ', नसीम की 'गुलज़ार-ए-नसीम' और शौक़ की मसनवियाँ लिखी गईं।

    हालाँकि इनसे पहले उत्तर भारत का सिर्फ़ एक महत्वपूर्ण कारनामा अफ़ज़ल की रचना 'बकट कहानी' है जिसकी सामूहिक लय और लोक रंग ज़ाहिर है। अफ़ज़ल हैरतअंगेज़ हद तक अवामी माहौल के क़रीब हैं और मौसमों का ज़िक्र और ज़मीन की सुगंध मन मोह लेती है। क़ुली क़ुतुब शाह, हातिम, नज़ीर और दूसरे शायरों की छोटी-छोटी मसनवियों का ज़िक्र यहाँ करना अनावश्यक है। मानो ये भी एक ख़ास क़िस्म की काव्य अभिव्यक्ति का प्रतीक हैं। ख़ास तौर पर क़ुली क़ुतुब शाह और नज़ीर की निरंतर उत्कृष्ट काव्य रचनाओं ने नज़्म की शुरुआत की जिसने बाद में एक अलग विधा के रूप में विकास किया।

    दिल्ली और लखनऊ की मसनवियों में भी सामूहिक स्वर प्रमुख है। हालाँकि मीर की मसनवियों को छोड़कर उनमें जज़्बातों की वह शिद्दत, इश्क़ की वह आदर्श कल्पना, और वह कल्पनाशील रंग-ढंग नहीं मिलता। ये सभी मसनवियाँ या तो अपने ज़माने के मशहूर क़िस्सों पर आधारित हैं या पारंपरिक क़िस्सों को नज़्म करती हैं, किरदार या तो शाही ख़ानदान से ताल्लुक़ रखते हैं या व्यापारी वर्ग के हैं और इन सभी मसनवियों में एक दीवानगी की कैफ़ियत और समर्पण पाया जाता है। दिल्ली की मसनवियों में ज़्यादा और लखनऊ की मसनवियों में कम। मिसाल के तौर पर मीर की मसनवियों में भी हालाँकि क़िस्से या तो पारंपरिक हैं या उनके दौर के सुने-सुनाए हैं या कम से कम एक मसनवी आपबीती है, मगर उनमें कोई मौलिक रचनात्मक तत्व कम से कम क़िस्से और किरदारों को गढ़ने के सिलसिले में मौजूद नहीं है। अलबत्ता एक नया तत्व उनमें ज़रूर शामिल हो गया है, वह है निजी और व्यक्तिगत लहज़ा, जो इससे पहले नायाब था और इसी व्यक्तिगत लहज़े ने सिर्फ़ मीर को ग़ज़ल की नई सिन्फ़ (विधा) का सबसे बड़ा शायर बना दिया बल्कि उस दौर के काव्यात्मक इज़हार में एक नए स्वर का इज़ाफ़ा कर दिया। मीर से हटकर उस दौर के अन्य शायरों में यह व्यक्तिगत स्वर नुमायाँ नहीं हुआ और उनकी मसनवियाँ पुराने क़िस्सों को नए नैतिक और सूफ़ियाना मायने देने में लगी रहीं। इसकी सबसे स्पष्ट मिसाल मीर असर की मसनवी 'ख़्वाब-ओ-ख़याल' है जो हालाँकि हाली के नज़दीक निहायत निचले और घटिया स्तर पर पहुँच कर हुस्न और इश्क़ के मामलों का शारीरिक रूप पेश करती है, मगर मीर असर ने इसे इश्क़-ए-मजाज़ी (सांसारिक प्रेम) की सख़्त आलोचना और इश्क़-ए-हक़ीक़ी (ईश्वरीय प्रेम) की महानता बयान करने के लिए लिखा था, वह ख़ुद लिखते हैं:

    बात है बे-सरिश्ता बे-अस्ल

    हिज्र किधर का और कहाँ का वस्ल

    जल्वा-पर्दाज़ी-ए-जहान-ए-मिसाल

    नाम इसका यही है ख़्वाब-ओ-ख़याल

    हैंगे सौदाइयों के हालातें

    शोरिश-ए-इश्क़ की ख़ुराफ़ातें

    आगे चलकर लिखते हैं:

    इश्क़-ए-सूरी बड़ी मलामत है

    हासिल इससे यही नदामत है

    कहते हैं इसको ही ज़लाल-ए-मुबीन

    नफ़ा दुनिया है कुछ हासिल दीन

    सिर्फ़ ख़ुसरान-ए-दीन-ओ-दुनिया है

    मनफ़अत इसमें और तो क्या है

    गर मुलाक़ात हो तो क्या हासिल

    हिज्र और वस्ल दोनों ला-हासिल

    और आगे चलकर लिखते हैं:

    बुलहवस हैं हवा-परस्त नफ़्स

    इश्क़ वह है जो हो शिकस्त-ए-नफ़्स

    नफ़्स-ए-काफ़िर को कोई मार सके

    यह तो मारे मरे काटे कटे

    आपी अपना हरीफ़ है नहीं ग़ैर

    है ख़ुदी से यहाँ ख़ुदाई से बैर

    अपने हाथों यह कौन मरता है

    काम फ़ज़्ल-ए-ख़ुदा ही करता है

    मदद-ए-पीर से हलाक करे

    मिस्ल-ए-इक्सीर मार ख़ाक करे

    जिस क़दर पीर पर हो अपने फ़िदा

    उस क़दर हुए है फ़ना-ओ-बक़ा

    और इसके सिवा है सब उल्फ़त

    है सरासर कुदूरत-ओ-कुल्फ़त

    लेकिन इस कुदूरत और कुल्फ़त (रंजिश और तकलीफ़) की दास्तान को मीर असर ने बड़े मज़े ले कर बयान किया है। कोई ऐसा पहलू नहीं जो छूट गया हो, लेकिन मीर असर की मसनवी इश्क़ की मालूमात के इस बेबाक बयान के अलावा, अव्वल तो घटनाओं के लिहाज़ से हल्की है, दूसरे किरदार-निगारी (चरित्र-चित्रण) में भी इसका स्तर ऊँचा नहीं है। ऐसा लगता है जैसे दिल्ली के हालात मसनवी-निगारी के लिए अनुकूल रहे हों।

    आख़िर ऐसा क्यों हुआ कि मसनवी का विकास साथ-साथ नहीं हुआ, बल्कि जहाँ कहीं मसनवी का विकास हुआ वहाँ अच्छी और स्तरीय ग़ज़लों का चलन नहीं रहा। दिल्ली में मीर की ग़ज़लों ने तरक़्क़ी पाई मगर मसनवी बेजान हो गई, ख़ुद मीर की मसनवी में जो रंग और स्वर आया है वह मसनवियों के आम चलन से अलग है। उधर लखनऊ में मसनवी का विकास हुआ तो ग़ज़लें बेनूर हो गईं। ग़ज़लें कही बहुत सी गईं, मगर उनमें वह कैफ़ियत नहीं रही। ज़ाहिर तौर पर इसकी एक वजह यह भी नज़र आती है कि मसनवी सिमटे हुए समाज की अभिव्यक्ति का माध्यम है जहाँ कहानियाँ चलन में हों और परंपरा से क़िस्से और अफ़साने मिल सकते हों। समाज से शायर का रिश्ता गहरा हो और उसे इस गहरे रिश्ते को नए काव्यात्मक रूप में ढालने की सहूलियत हासिल हो। ग़ज़ल बिखरते हुए समाज की अभिव्यक्ति का माध्यम है जहाँ धीरे-धीरे समाज दूर होता जाता हो और सामाजिक रिश्ते आहिस्ता-आहिस्ता धुँधलाते जा रहे हों। ग़ज़ल व्यक्ति की आपबीती ज़रूर है मगर इसकी अपनी व्यापकता इसे दूसरों का अफ़साना भी बना देती है। ग़ज़ल के लिए आंतरिक कैफ़ियत, दाख़िलियत (आंतरिकता) और निजी लहज़ा ज़रूरी है, यह नहीं तो सामूहिक परंपराओं के इज़हार से ग़ज़ल ज़्यादा विकास नहीं पा सकती।

    ग़ज़ल का विकास एक तरफ़ और मसनवी का विकास दूसरी तरफ़। लखनऊ सिर्फ़ मसनवी का ही केंद्र नहीं ठहरा बल्कि मर्सिये का भी यहीं उत्कर्ष हुआ। लखनऊ सुरक्षा के एक बनावटी एहसास में मुब्तिला था, बक्सर की लड़ाई के बाद से अवध की नवाबी रस्मी तौर पर दिल्ली के अधीन रही लेकिन असल में ईस्ट इंडिया कंपनी की फ़ौजों ने वहाँ का प्रशासन सँभाल लिया था। अवध लगातार एक मीठे ख़्वाब में मुब्तिला था, हालाँकि राजनीतिक और आर्थिक तौर पर हुकूमत की जड़ें खोखली हो चुकी थीं, लेकिन आम बाशिंदों ही को नहीं, शायरों और अदीबों तक को इस ज़बरदस्त ख़तरे का एहसास था जो उनके सिरों पर मँडरा रहा था। अवध के भावनात्मक और वैचारिक मिज़ाज की झलक मीर हसन की 'सहर-उल-बयान', नसीम की 'गुलज़ार-ए-नसीम' और बाद में शौक़ की मसनवी 'ज़हर-ए-इश्क़' से मिलती है।

    'सहर-उल-बयान' और 'गुलज़ार-ए-नसीम' इसी शाइस्तगी (शालीनता) और बनावटी ठहराव का प्रतीक हैं। ये मसनवियाँ यूँ तो अलौकिक तत्वों की दास्तानें हैं लेकिन इन पर एक तरफ़ तो सामूहिक स्वर की छाप साफ़ नज़र आती है। दूसरे जिस तहज़ीब का अक्स इनमें झलकता है वह हिन्द-ईरानी तहज़ीब है जिसमें शहज़ादी-शहज़ादों से लेकर जिन्न और परी तक रंगे हुए हैं, उनके लिबास, हुलिए, चेहरे-मोहरे साफ़ बताते हैं कि इनमें हिंदुस्तान और ईरान की तहज़ीबें मिल-जुल गई हैं। यहाँ नज्म-उन-निसा जोगन बनती है और गुल बकावली अवध की शहज़ादियों की तरह गुफ़्तगू करती है। ग़ैर-मज़हबी लहज़ा और एक सेक्युलर माहौल मसनवियों पर छाया हुआ है। अलबत्ता यहाँ कमी है तो इश्क़ में गहराई और संजीदगी की। इश्क़ का सारा कारोबार जीवन के सतही धरातल पर है, हालाँकि ज़बान से आशिक़ और माशूक़ दोनों एक-दूसरे पर जान छिड़कते हैं लेकिन यहाँ जज़्बे की शिद्दत है ख़ुलूस, अलबत्ता लज़्ज़त ही जीवन का मूल बन चुकी है।

    ऐसा लगता है कि जिस समाज के लिए ये मसनवियाँ लिखी जा रही हैं उसने ख़ुद को सतही संवेदना पर राज़ी कर लिया है। फिर इन मसनवियों में तख़य्युल (कल्पना) की उड़ान बहुत स्पष्ट है। साफ़ ज़ाहिर है कि शायर तख़य्युल के पर्दे पर हक़ीक़त से गुरेज़ (पलायन) का सामान पैदा कर रहा है और जो असल ज़िंदगी में पा सका उसे तख़य्युल की मदद से पाकर भावनात्मक संतुष्टि हासिल करना चाहता है, इस एहसास से ख़ुद अवध के नवाब और बादशाह भी ख़ाली थे। इसके सुबूत हैं कि ख़ुद आख़िरी बादशाह वाजिद अली शाह ने जब ख़ुद को राजकाज के मामलों में मसरूफ़ करना चाहा और अंग्रेज़ रेज़िडेंट ने विरोध किया तो उन्होंने अपनी मज़बूरी के एहसास को ऐश-ओ-इशरत और नाच-गाने के पर्दे में छिपा लिया। यही सूरत उनसे पहले आसफ़-उद-दौला और सआदत अली ख़ाँ के साथ पेश चुकी थी। मसनवियों ने लखनऊ के हार के एहसास को एक भावनात्मक संतुष्टि बख़्श दी और आख़िरकार 'ज़हर-ए-इश्क़' की मज़बूर नाज़नीन की तरह इस लतीफ़, नाज़ुक, और शाइस्ता तहज़ीब को भी अपना भरम रखने के लिए ख़ुदकुशी करनी पड़ी।

    मर्सिया भी कल्पना के इसी पलायन का नतीजा था। मर्सिया में घटनाओं और किरदारों को हिंदुस्तानी रूप-रंग मिला, किस्सा आधा धार्मिक, आधा ऐतिहासिक और आधा पारंपरिक था। शायर के ज़ेहन ने इसमें अपनी मर्जी के मुताबिक रंग भी भरे, लेकिन मर्सिये के बुनियादी टकराव की प्रकृति अजीबोगरीब थी। इसके नेक किरदार पैगंबर जैसे थे, उनकी रूहानी ताकत बेमिसाल, नैतिक खूबियों में बेजोड़, बहादुरी में अद्वितीय, हुस्न-ओ-जमाल में यकता (अकेले), इंसानियत के सर्वोच्च मूल्यों से युक्त, अल्लाह के ऐसे नेक बंदे कि दुआ के लिए हाथ उठाते ही जो चाहें पा लें, मगर इसके बावजूद ये नेक और बेहतरीन खूबियों वाले बंदे बेगुनाह शहीद होते हैं और हार का सामना करते हैं। उनकी हार दरअसल खुदा की मर्जी है और वे इसे अपनी व्यक्तिगत बहादुरी और बेमिसाल समझदारी के बावजूद बिना चूँ-चरा किए स्वीकार कर लेते हैं। इसी तरह की स्थिति उस वक्त की व्यवस्था के सामने भी थी। लखनऊ बेहतरीन नफ़ासत, शाइस्तगी और लताफ़त (कोमलता) का केंद्र था, लेकिन इसके बावजूद राजनीतिक हार उसका मुकद्दर बन चुकी थी। मर्सिया निगार उस तहज़ीब का मातम तो मना रहे थे जो उनकी आँखों के सामने दम तोड़ रही थी, मगर वे ईश्वर पर भरोसे और संतोष के साथ नेक इंसानों के त्याग और बलिदान का औचित्य भी पेश कर रहे थे। इस लिहाज़ से मर्सिया अपने दौर की अहम ज़रूरत को पूरा कर रहा था।

    (२)

    दिल्ली में यह तहज़ीबी बिसात और ज़्यादा तेज़ी से पलट रही थी और इसी के साथ मसनवी की सल्तनत ग़ज़ल के हाथ गई। ग़ज़ल भी कैसी सोज़-ओ-गुदाज़ (दर्द और करुणा) से लबरेज़, तजुर्बे से भरपूर, और कैफ़ियत (भाव) में डूबी हुई; इस ग़ज़ल के पीछे दाख़िलियत (आंतरिक भावनाओं) की खनक थी। इसका लहज़ा निजी और व्यक्तिगत था, इसके विषयों में जहाँ एक परत परंपरा की थी, वहीं दूसरी परत ज़िंदगी के उन तजुर्बों की थी जो व्यक्ति और समाज की ज़िंदगी में हलचल मचाए हुए थे। ग़ज़ल की यह आवाज़ एक ऐसे समाज से उभर रही थी जो सामाजिक और आर्थिक तौर पर इससे पहले मसनवी को लोकप्रिय बनाने वाले रंग-ढंग से अलग था। उसे सुकून मयस्सर था और ही स्थिरता। यह और बात है कि सौदा और मीर ने भी मसनवियाँ और मर्सिये लिखे हैं। ग़ज़ल की यह कैफ़ियत मीर के दौर से ग़ालिब के दौर तक दिल्ली में छाई रही और ऐसी छाई कि ग़ज़ल के आगे किसी दूसरी विधा का चिराग़ जल सका।

    ग़ज़ल क्या थी? ग़ज़ल दो मिसरों (पंक्तियों) में बात मुकम्मल करने वाले उस शायरी के सिलसिले का नाम है जो एक ही बहर और काफ़िया इस्तेमाल करे, खास प्रतीकों (अलामतों) को काम में लाए, जिसकी प्रकृति आंतरिक और गीतात्मक हो। यह विधा अचानक हिंदुस्तान में नहीं उभरी, इसके पीछे ईरान की तहज़ीबी पृष्ठभूमि थी और इसके प्रतीकों की व्यवस्था सदियों के इतिहास से जुड़ी हुई थी। ग़ज़ल को समझने के लिए एक नज़र इसकी प्रतीकात्मक व्यवस्था पर डालना ज़रूरी है और मुमकिन है कि इस प्रतीकात्मक व्यवस्था के ज़रिए हम ग़ज़ल के तहज़ीबी मिज़ाज और इसके वर्गीय चरित्र को भी समझने में कामयाब हो जाएँ। साथ ही यह देख सकें कि ग़ज़ल की प्रतीकात्मक व्यवस्था में भी समय-समय पर हालात के मुताबिक तब्दीलियाँ क्यों होती रही हैं और इन तब्दीलियों के पीछे कौन से सामाजिक कारण और वर्गीय टकराव काम करते रहे हैं।

    ग़ज़ल की दास्तान अभी तक अधूरी है। यह सही है कि आज की ग़ज़ल लोकप्रिय है, लेकिन इसकी निरंतरता और प्रवाह ने नया रंग-ढंग अपना लिया है और पुरानी ग़ज़ल का पारंपरिक स्वर काफी हद तक टूट चुका है। ग़ज़ल में व्यक्ति की आवाज़ तो उभरी, मगर वह ऐसे समाज की पृष्ठभूमि में उभरी जो साझा प्रतीकों के पालने में पला था और जो एक तहज़ीबी मुकद्दर रखता था। इसके इश्क़-ओ-आशिक़ी के पैमाने, हुस्न और महबूब के तसव्वुर (अवधारणाएँ) काफी हद तक साझा थे। इसके पीछे एक नई तहज़ीब का सतरंगी जलवा छिपा हुआ था और तसव्वुफ़ (सूफ़ीवाद) और इश्क़, कलंदरी (फ़कीरी) और दर्दमंदी में हर शख्स को अपनी दास्तान के टुकड़े मिल जाते थे। यहाँ मसनवी और मर्सिये की तरह पारंपरिक किस्सों की साझा विरासत नहीं थी, बल्कि साझा प्रतीकों की विरासत थी, जिसकी मदद से ग़ज़ल गो (ग़ज़ल कहने वाला) चंद इशारों और गिनी-चुनी अलामतों से मायनों का एक पूरा जहान सजा सकता था।

    इस विरासत का सारा दारोमदार शहरी तहज़ीब से जुड़ा था और इस तहज़ीब पर कारीगर और दस्तकार वर्ग की ज़िंदगी छाई हुई थी। हालाँकि हमारे दौर तक आते-आते ग़ज़ल के पीछे अलग-अलग वर्गों की आवाज़ें सुनाई देने लगीं, लेकिन ग़ज़ल का शहरीपन आज भी उसी तरह कायम है और इसके प्रतीकों के पीछे बनते-बिगड़ते सायों ने आज भी इस रिश्ते को खत्म नहीं किया है। जिस तरह दास्तान ने मौलिक रचनात्मक तत्वों के लिए गुंजाइश निकाली थी, मगर समाज के सामूहिक स्वर और पारंपरिक तत्वों से अपना रिश्ता जोड़े रखा था और कल्पना के लिए नए रास्ते निकाल लिए थे, उसी तरह ग़ज़ल ने सामूहिक स्वर और पारंपरिक तत्वों से अपना रिश्ता जोड़ने के साथ-साथ कल्पना और रचनात्मक तत्वों के लिए अपने दामन में विस्तार पैदा कर लिया।

    (३)

    ग़ज़ल को सबसे बड़ा सदमा १८७४ ई. के करीब पहुँचा जब मौलाना मुहम्मद हुसैन आज़ाद की 'अंजुमन पंजाब' ने एक ऐसे मुशायरे का इंतज़ाम किया जिसमें किसी खास विषय पर निरंतरता और जुड़ाव रखने वाले शेर 'नज़्म' के शीर्षक से पढ़े गए। फिर यह नई विधा साहित्यिक महफ़िलों में लोकप्रिय हुई, पत्र-पत्रिकाओं और अख़बारों पर छा गई और इसे हाली और शिबली जैसे आलोचक मिले। यहाँ व्यक्ति तो उतना ज़्यादा नहीं उभरा जितना समाज। सामाजिक सुधार की जिस आवाज़ ने उर्दू नॉवेल को जन्म दिया था, वही आवाज़ नज़्म का केंद्र बिंदु बनी। हाली और आज़ाद की नज़्मों के पीछे 'नेचुरल शायरी' का जो रंग-ढंग मौजूद है, वह बार-बार उस नई ज़िंदगी की बशारत (शुभ संकेत) देता है जो सर सैयद अहमद खाँ और उनके साथियों के प्रभाव में उभर रही थी। यह महज़ पश्चिम की नक़ल नहीं थी, बल्कि उस आर्थिक और तहज़ीबी चुनौती का नतीजा थी जो ब्रितानी कब्ज़े के बाद हिंदुस्तानी समाज के सामने थी।

    अब एक ऐसा वर्ग उभर रहा था जो शहरी कारीगरों के वर्ग से अलग था। इसे अभिव्यक्ति के ऐसे साधन चाहिए थे जो समाज से दूर होने वाले व्यक्ति को संतुष्ट कर सकें, जिसमें वह महज़ अपनी ही नहीं, बल्कि अपने उस समाज की तस्वीर देख सके जिसमें व्यक्ति आहिस्ता-आहिस्ता केंद्रीय हैसियत पाने लगा था। ग़ज़ल से जो तसव्वुफ़ उभरा था, उसकी लय मद्धम होने लगी, ग़ज़ल के प्रतीकों की गूँज खामोश होने लगी और आहिस्ता-आहिस्ता नज़्म में नई शैलियाँ उभरने लगीं। शुरू-शुरू में बयानिया (वर्णनात्मक) शायरी का चर्चा हुआ, जिसमें कुदरत के नज़ारों का चित्रण, वतन की महानता, आज़ादी की बरकत और इल्म (ज्ञान) की श्रेष्ठता का ज़िक्र था। मक़सद सिर्फ यह था कि व्यक्ति अब अपनी आँखों से देखना चाहता था। समाज और उसकी परंपराओं से बँधा रहने के बजाय, अब वह इसे अपनी ज़रूरतों के मुताबिक तब्दील करना चाहता था। फिर जब सियासत का शोर उठा तो उसके प्रभाव भी पड़ने लगे और नज़्म हाली की 'मुसद्दस' से सफ़र करती हुई रफ़्ता-रफ़्ता चकबस्त और इक़बाल तक पहुँची, जिसके बाद जोश और अख़्तर शीरानी की रूमानियत और तरक़्क़ीपसंद शायरों की सामाजिक सार्थकता ने इसे एक नया रुख दे दिया। शैली और शिल्प (उसलूब) के लिहाज़ से कल्पना, जज़्बे और फ़िक्र ने इस नई विधा के ज़मीन-आसमान बदल डाले और अख़्तर-उल-ईमान तक पहुँचते-पहुँचते इसमें एक नया मेयार (स्तर) झलकने लगा।

    इस नए पैमाने की तरफ संक्षेप में इशारा किया जा सकता है। हाली और आज़ाद के दौर में नज़्म की महज़ निरंतरता (तसलसुल) पर ज़ोर था। आम तौर पर किसी एक विषय को अलग-अलग संदर्भों में पेश करना ही काफ़ी समझा जाता था। उदाहरण के लिए देश-प्रेम, पक्षियों में किस तरह पाया जाता है। इंसानों में इसका क्या रूप है और फिर इंसानों के अलग-अलग वर्गों में इसकी क्या स्थिति है, मानो एक केंद्रीय विचार की अलग-अलग पहलुओं से ली गई तस्वीरों से मिलकर बनी हो और नज़्म मानो एक तरह का मंज़ूम इंशाइया (काव्य-निबंध) या Essay बनकर रह जाती है। चूँकि ज़ोर वर्णन पर ज़्यादा है और वर्णन में भी अवलोकन (मुशाहिदा) अहम है और कल्पना की मदद से अलग-अलग अवलोकनों को इकट्ठा करने पर ध्यान ज़्यादा है। इसलिए नज़्म में भाव और निर्माण का एहसास बुनियादी जगह हासिल नहीं करते, बल्कि उनके बजाय नज़्म चारों तरफ़ बिखरी हुई ज़िंदगी का एक हिस्सा बनकर उभरती है।

    शायर फ़ोटोग्राफ़र के दर्जे पर संतुष्ट होने को राज़ी है। शिबली की सियासी शायरी का भी यही हाल है। चकबस्त की वर्णनात्मक नज़्में और इक़बाल की प्राकृतिक दृश्यों से जुड़ी नज़्में भी इसी श्रेणी की हैं। धीरे-धीरे दृश्यों के वर्णन की मदद से केंद्रीयता पैदा करने के बजाय, इन नज़्मों में विचार या ख़याल की मदद से निरंतरता और केंद्रीयता पैदा की जाने लगी, जिसकी सबसे अच्छी मिसालें इक़बाल की मस्जिद-ए-क़ुर्तबा और साक़ी नामा में मिलती हैं। 'मस्जिद-ए-क़ुर्तबा' दार्शनिक विचारों से शुरू होती है। वर्णनात्मक हिस्से पर आकर ज़रा सी देर के लिए ठहर जाती है और फिर इसी वर्णनात्मक हिस्से को नई दार्शनिक, बल्कि अर्ध-सियासी, अर्ध-सांस्कृतिक दृष्टि का शुरुआती बिंदु बना लेती है और इंसानी ज़िंदगी के बारे में एक सामान्य दृष्टि पर ख़त्म होती है।

    जोश ने एक विचार से जुड़ी उपमाओं और रूपकों की मदद से दोहराव को नज़्म की तकनीक में ढाला, मानो नज़्म में निरंतरता और ख़याल की एकता ही अहम हो और ख़याल का विकास अहम हो। जिसे बाद में अख़्तर-उल-ईमान की नज़्मों ने प्रदान किया। इस सफ़र के दौरान फ़ैज़ की ख़ूबसूरत और युग-प्रवर्तक नज़्में भी हैं और मजाज़, सरदार, जाँ निसार और मख़दूम की नज़्में भी, जिन्होंने नज़्म को नई ऊर्जा और नई संरचना से परिचित कर दिया।

    अब नज़्म महज़ एक शैली पर क़ायम नहीं रही, इसके कई रंग उभरे। हालाँकि बदक़िस्मती से अब भी इंशाइया और Essay का सीधा अंदाज़ नज़्म पर हावी है। हमारे दौर में नज़्म कई दिशाओं में फैली है और अब वह मंज़ूम क़िस्से को भी अपने दामन में समेटती नज़र आती है। अब फ़ैज़ की नज़्म 'मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब माँग' अलग-अलग टुकड़ों में बाँट कर लिखी जा सकती थी। साहिर की 'परछाइयाँ' या अख़्तर-उल-ईमान की नज़्म 'बाज़दीद' फ़िल्मी मोंटाज के अलग-अलग प्रभाव-खंडों में ढाली जा सकती थी। अख़्तर-उल-ईमान की नज़्म 'मीर नासिर हुसैन' एक-पात्रीय व्यंग्यात्मक नज़्म की शक्ल में लिखी जा सकती थी, या अख़्तर-उल-ईमान की ही नज़्म 'एक लड़का' प्रतीकात्मक शैली में एक सूक्ष्म इशारे की तरह लिखी जा सकती थी, या सिर्फ़ संवादों में एक नज़्म, या किसी कहानी को बीच से लेकर उसकी बाक़ी कड़ियों को किसी एक पात्र की ज़बानी बयान किया जा सकता था। ग़रज़ (कहने का तात्पर्य यह है कि) नज़्म ने तकनीकी और शैली के लिहाज़ से विस्तार और विविधता ही नहीं, बल्कि परिपक्वता भी हासिल की, क्योंकि जो वर्ग इस नई विधा के विकास के ज़िम्मेदार थे, वे ख़ुद परिपक्वता की मंज़िल तक पहुँचने लगे थे।

    इसी दौरान आज़ाद नज़्म (मुक्त छंद) का चलन हुआ। आज़ाद नज़्म के पीछे उस नए वर्ग की आवाज़ थी जो अभिव्यक्ति के नए साधनों के बीच पला-बढ़ा था। मैकलुहान ने अपनी किताब “Understanding Media” में अभिव्यक्ति के साधनों, उदाहरण के लिए फ़िल्म, रेडियो, प्रेस, पत्रिकाओं आदि के प्रभाव रचनात्मक प्रक्रिया पर तलाश किए हैं। आज़ाद नज़्म का ताल्लुक़ मुशायरे वाली नज़्मों से नहीं था, बल्कि छपने वाली नज़्मों से था। कोशिश यह थी कि नज़्म में प्रचलित बहर (छंद) और क़ाफ़िए की लय से हटकर कोई नई लय तलाश की जाए, ताकि आम ज़िंदगी से इसका अजनबीपन कम हो जाए और शायरी में आधुनिक दौर की ज़िंदगी जैसी विविधता और विस्तार सके। आज़ाद नज़्म और इसके बाद की मुअर्रा (blank verse) और हाल की नस्री (गद्य) नज़्मों में वह शायर झलकता है, जो औद्योगिक ज़िंदगी में इस तरह रच-बस गया है कि समाज की परंपराओं और समाज की इकाई का एक हिस्सा बने रहने के बजाय, इन सबसे आहिस्ता-आहिस्ता दूर होता जा रहा है और उसकी वैयक्तिकता और उसका बेचैन अंतर्मन, उसके अंदर की सारी हलचल, सारी बेचैनी इन नज़्मों में ऐसी तस्वीरों की शक्ल ले रही है, जिस पर उसकी अपनी वैयक्तिकता की गहरी छाप है। मानो हम मसनवी के दौर के बिल्कुल दूसरे सिरे पर पहुँच गए हैं, जहाँ व्यक्ति समाज से कटकर अपनी वैयक्तिकता में क़ैद है।

    कभी-कभी यह दूरी इतनी बढ़ जाती है कि उसकी शायरी के प्रतीक बिल्कुल निजी बनकर रह जाते हैं और उसकी बातें अस्पष्ट, उलझी हुई और समझ से बाहर हो जाती हैं। जैसे-जैसे हिंदुस्तान में औद्योगिक विकास की रफ़्तार तेज़ होती जाती है, पुराना समाज टूटता-बिखरता जाता है। ग्रामीण और क़स्बाती ज़िंदगी का ताना-बाना बिखरने लगता है। इसी रफ़्तार से शहरों की भीड़-भाड़ में फँसा हुआ व्यक्ति ख़ुद को ज़्यादा अकेला और समाज से कटा हुआ महसूस करता जाता है और उसकी शायरी में व्यक्तित्व की अंदरूनी परतें ज़्यादा स्पष्ट होती जाती हैं। सामूहिक क़िस्सों की जगह व्यक्तिगत दुख-दर्द लेने लगा है और तरन्नुम, संगीतात्मकता और तग़ज़्ज़ुल के बजाय ज़्यादा गंभीर और ज़्यादा बेबाक हक़ीक़तें नए काव्य-रूप में ढलती जाती हैं।

    काव्य-रूपों में यह तब्दीली, वर्णन की शैली और अंदाज़ में यह बदलाव सिर्फ़ साहित्यिक ज़रूरतों या सांस्कृतिक प्रभावों का ही नतीजा नहीं है, बल्कि इसके पीछे बदलते हुए आर्थिक और सांस्कृतिक तत्त्व सक्रिय हैं। वह नई आर्थिक हक़ीक़तें निहित हैं जो नए वर्गों और नए वर्गीय रिश्तों को पैदा करती हैं और इन बदलते हुए वर्गीय रिश्तों से कला और साहित्य का सारा ताना-बाना प्रभावित होता है। यह नतीजा निकालना शायद अनुचित होगा कि दरअसल नई विधाओं का विकास नए वर्गों के विकास से जुड़ा है, हालाँकि इस जुड़ाव का पता लगाने के लिए विधाओं की प्रकृति को समझना और उनमें तब्दीलियों की प्रक्रिया का ज़रा ज़्यादा ग़ौर और ध्यान से विश्लेषण करना होगा।

    इस बहस से यह ज़ाहिर होता है कि उर्दू शायरी में मसनवी का विकास सिर्फ़ इत्तेफ़ाक़ नहीं था। यह दरअसल उस गहरे सांस्कृतिक समन्वय का नतीजा था जो तुर्क-ईरानी सभ्यता और हिंदुस्तानी सभ्यता के अलग-अलग तत्त्वों के बीच इस वजह से अमल में रहा था कि हिंदुस्तान का प्रशासनिक ढाँचा अपनी व्यापारिक ज़रूरतों के आधार पर केंद्रीयता और अंतर्राष्ट्रीयता (यानी हिंदुस्तान, ईरान, पश्चिमी और मध्य एशिया से गहरे व्यापारिक संबंधों) की तरफ़ झुका हुआ था। उस ज़माने की आर्थिक ज़रूरतों ने शहरों और क़स्बों को जन्म दिया और इन शहरों और क़स्बों में आस-पास के गाँवों से, साथ ही हिंदुस्तान के आस-पास के देशों से कारीगर, पेशेवर और हुनरमंद आकर जमा होने लगे और इस समागम के आधार पर एक नई सभ्यता और शिष्टता का विकास हुआ, जिसकी सामूहिक लय ने मसनवी और मर्सियों की परंपराओं और कहानियों से अपना रिश्ता जोड़ा और एक ऐसी विधा वजूद में गई जो उस दौर की सांस्कृतिक ज़रूरतों को पूरा कर सकती थी।

    धीरे-धीरे यह तहज़ीब बिखरने लगी। सबसे पहले और सबसे ज़्यादा तेज़ी के साथ इसका बिखराव दिल्ली में हुआ। कारीगरों और दस्तकारों के जमावड़े बिखरने लगे और ईस्ट इंडिया कंपनी के दखल के साथ-साथ कारीगरी और दस्तकारी का मैदान सीमित होता गया, मंडियां वीरान होने लगीं और व्यापार और कारीगरी से हासिल की गई धन-दौलत देश से बाहर जाने लगी। अलबत्ता एक झूठी खुशहाली और बनावटी इत्मीनान लखनऊ जैसे चंद केंद्रों में बाकी रह गया, जहाँ मसनवी की परंपरा ज़िंदा रही, लेकिन दिल्ली में बिखरते हुए समाज ने मसनवी को अलविदा कह दिया और ग़ज़ल को शायरी की विधाओं में पहला दर्जा हासिल हो गया। ग़ज़ल ने ज़िंदगी को समाज की नहीं, बल्कि व्यक्ति की नज़र से देखा। लेकिन यहाँ भी व्यक्ति किसी किसी हद तक समाज से जुड़ा रहा और उसके प्रतीक (अलामतें) उसके अपने वर्ग के लिए स्वीकार्य और समझने लायक बने रहे। उसकी बुनियादी दिलचस्पी इंसान के आपसी रिश्तों में बनी रही और इन रिश्तों की बदलती हुई हालतों पर ग़ौर किया जाता रहा जिसे 'मामलात' का नाम दिया गया। इश्क़ भी इन्हीं रिश्तों का एक रूप था और शायर अपने ख़ास प्रतीकों और विषयों की हदों में रहकर इंसानी रिश्तों की इस धूप-छाँव का तमाशाई (दर्शक) बना रहा।

    फिर जब ईस्ट इंडिया कंपनी की हुकूमत ने यह तहज़ीबी बिसात ही उलट दी और समाज से व्यक्ति का रिश्ता और ज़्यादा कट गया, तो नज़्म की नई विधा उभरी जिसने शुरू-शुरू में समाज सुधार के ज़रिए ख़ुद को तलाशने की कोशिश की और फिर नज़्म की वो नई शैलियाँ खोजीं जिनमें से एक देश-प्रेम की शायरी की तरफ़ ले गई, तो दूसरी 'नेचुरल शायरी' की तरफ़, तीसरी रोमानियत की तरफ़ गई तो चौथी इस क़िस्म की वैचारिक शायरी की तरफ़ रहनुमाई करने लगी जिसे इक़बाल के नाम से पहचाना जाता है। जैसे-जैसे आर्थिक बदलावों की यह प्रक्रिया तेज़ से तेज़ होती गई और देश में औद्योगिक विकास के हाथों व्यक्ति का रिश्ता समाज से कटता गया, वैसे-वैसे नज़्म शैली और तकनीक की नई मंज़िलें तय करके आज़ाद नज़्म और आज की प्रतीकात्मक और नस्री नज़्म (गद्य कविता) की तरफ़ सफ़र करती गई। आज भी यह सफ़र जारी है और इसी तरह आर्थिक बदलावों के साथ-साथ चल रहा है।

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