उर्दू के अफ़सानवी अदब की समाजियात
गुज़रे हुए कल के इस आईने में हमारी क्या शक्ल उभरती है, इसे पहचानने के लिए इतिहास के पास बड़ा ज़खीरा है, तख़्त-ओ-ताज का ब्यौरा है। जीती और हारी जाने वाली जंगों की दास्तानें हैं, हुकूमतों के फ़रमान और फ़ौजों की आवाजाही के सभी पते, निशान मौजूद हैं, लेकिन बदक़िस्मती से इंसान के भीतर का हाल जानने के साधन इतिहास के पास नहीं हैं। और इतिहास हो या सभ्यता, दरअसल इनका निर्माण और गठन तो इंसान के भीतर से उठने वाले रहस्यमयी और पेचीदा जज़्बातों और विचारों से ही होता है, जिनकी हल्की सी गूंज साहित्य (अदब) में सुनाई देती है। लिहाज़ा साहित्य इतिहास का माध्यम भी हो सकता है और उसका अग्रदूत भी।
साहित्य की अपनी पूरी दुनिया है। अव्वल तो साहित्य की विधाएं (अस्नाफ़) अलग-अलग हैं और हर विधा के बयान का अंदाज़ जुदा-जुदा है। दूसरे, साहित्य में हक़ीक़त का बयान इतिहास और साइंस की तरह सीधे तौर पर नहीं होता, बल्कि साहित्यिक अंदाज़ में होता है। इसीलिए इस बात की संभावना रहती है कि साहित्य के बयानों की गहराई में उतरे बिना, उनके शाब्दिक और ऊपरी अर्थ पर भरोसा करके कोई साहित्य से अनजान व्यक्ति ग़लत नतीजे निकाल ले और हक़ीक़त बिगड़ कर रह जाए। साहित्य का लहज़ा सिर्फ़ उसके अपने दौर ही से नहीं, बल्कि साहित्यिक परंपरा और शैली (उस्लूब) से भी बनता है। इसकी उपमाएं और रूपक (तश्बीहें और इस्तिआरे), इसके प्रतीक और चिह्न, इसके किरदार और घटनाएं, इसके काल्पनिक रंग-रूप की धूप-छांव—यह सब कुछ विचार और हक़ीक़त पर रंग-बिरंगे नक़ाब डाल देते हैं।
फिर साहित्य महज़ विचार और जज़्बा है भी नहीं। विचार होता तो दर्शन बन जाता, महज़ जज़्बा होता तो इश्क़, जुनून या पैग़म्बरी कहलाता। इसका मक़सद महज़ जानकारी देना या विचार और जज़्बे की बहुतायत नहीं, बल्कि इनकी मदद से नई सौंदर्यपरक दृष्टि (जमालियाती बसीरत) तक पहुंच हासिल करना है। और इस कोशिश में वह विचार और ख़्याल, एहसास और एकाग्रता के न जाने कितने सांचे बनाता-बिगाड़ता है और इसी कोशिश के ज़रिए अपने आप को पहचानता है, अपने और प्रकृति के रिश्ते खोजता है, अपने और अपने चारों तरफ़ बिखरी हुई ज़िंदगी से मुक़ाबले और तालमेल के रिश्ते तय करता है, अपने और दूसरे इंसानों के बीच संतुलन क़ायम करता है। इस लिहाज़ से साहित्य से किसी क़िस्म के नतीजे निकालने से पहले इसके बयान के अंदाज़ के अनोखेपन पर नज़र रखनी होगी और इसी के साथ-साथ इसके सौंदर्यपरक मिशन और इसकी सार्थकता को ध्यान में रखना होगा।
शاعری में सोचने के अंदाज़ और महसूस करने के अंदाज़ की पेचीदगियां ज़्यादा हैं। और कविता की जो विधा (सिन्फ़) अभिव्यक्ति का जितना ज़्यादा ख़ास अंदाज़ अपनाएगी और प्रतीकों और चिह्नों से ज़्यादा काम लेगी, उसी क़दर ये पेचीदगियां बढ़ती जाएंगी। इसलिए ग़ज़ल के शेर से ऐतिहासिक सच्चाइयों के बारे में नतीजे निकालना बेहद मुश्किल और ख़तरनाक है। मुमकिन है जिसे हम शायर की हक़ीक़ी अभिव्यक्ति समझ रहे हों, वह महज़ पारंपरिक बयान का अंदाज़ हो या महज़ बोलते हुए क़ाफ़िए की आवाज़। इसलिए उन्नीसवीं सदी के मिज़ाज को समझने के लिए ख़ास तौर पर ग़ज़ल का इस्तेमाल और आम तौर पर शायरी का इस्तेमाल जोखिम का काम है। सबसे ज़्यादा आसान माध्यम शायद कथा-साहित्य (अफ़सानवी अदब) है, जिसके ज़रिए युग की आत्मा (रूह-ए-असर) नए रंग-रूप के साथ अपना जलवा दिखाती है।
ड्रामे को छोड़ दें तो उन्नीसवीं सदी में कथा-साहित्य ने तीन स्पष्ट मोड़ लिए और ये तीनों मोड़ पूरी उन्नीसवीं सदी के मिज़ाज और चरित्र को स्पष्ट करने के लिए काफ़ी हैं। पहले दौर में क़िस्सों का, दूसरे दौर में दास्तानों का और तीसरे दौर में नॉवेलों का उदय हुआ। क़िस्से का संबंध समूह (समाज) से है, दास्तान का कल्पना से और नॉवेल का व्यक्ति से। और फिर समूह, कल्पना और व्यक्ति का संबंध ख़ास क़िस्म के समाजों, सभ्यताओं और आर्थिक व्यवस्थाओं से है। उन्नीसवीं सदी के सामाजिक और आर्थिक सफ़र की पूरी दास्तान इन्हीं तीन शब्दों में छिपी है।
क़िस्सा क्या है? गुमनाम चित्रकारों की बनाई हुई चित्रशाला, ऐसी कहानियों का ज़खीरा जो हमें हवा में घूमती हुई मिलती हैं। नानी-दादी अपने नवासे-नवासियों और पोते-पोतियों को सुनाती हैं, दोस्त अपने दोस्तों से सुनते हैं। यह कोई नहीं जानता कि इन कहानियों का लेखक कौन था, फिर कोई लिखने वाला इन्हें अपने लफ़्ज़ों में लिख डालता है और ये इसी किताबी शक्ल में घूमने लगती हैं। ये क़िस्से-कहानियां एक देश से दूसरे देश तक पहुंचती हैं, एक सभ्यता को दूसरी सभ्यता से मिलाती हैं और पूरब-पश्चिम के तंबू तानती हुई समय और स्थान (ज़मान-ओ-मकान) की सरहदों से ऊपर उठ जाती हैं।
(एक मिसाल उस मशहूर कहानी की है जिसमें एक बच्चे की दो माताएं दावेदार होती हैं। मामला अदालत तक पहुंचता है और जज फ़ैसला करता है कि दोनों औरतें एक बच्चे को विपरीत दिशा में खींचें और आधा-आधा बांट लें। असली मां बच्चे की यह तकलीफ़ बर्दाश्त नहीं कर पाती और दावे से पीछे हट जाती है और उसे बच्चा दे दिया जाता है। यह कहानी जो बौद्ध धर्म की कहानियों में शामिल थी, ब्रेख़्त के ड्रामे कॉकेशियन चॉक सर्कल की शक्ल में बीसवीं सदी तक पहुंचती है।)
इन क़िस्सों के बीच कई ख़ास विशेषताएं समान होती हैं। पहली यह कि इनकी घटनाएं और कभी-कभी किरदार तक जाने-माने और मशहूर होते हैं। इनका संबंध या तो किसी पुरानी परंपरा और दृष्टांत (तल्मीह) से होता है या किसी ऐसी घटना से जो अभी हाल में पेश आई हो और जिसकी जानकारी सुनने वाले समाज को बख़ूबी हो। मानो क़िस्सागो (क़िस्सा सुनाने वाले) का काम सिर्फ़ दी गई घटनाओं और परिचित किरदारों को क़िस्सागोई की रंगीनी और बयान की ताक़त के साथ पेश करना है। इन क़िस्सों के वैचारिक ताने-बाने से उस दौर की छिपी हुई बातों (निहितार्थ) का अंदाज़ा लगाना ग़लत न होगा। किस क़िस्म की घटनाओं को किस ख़ास रुख़ से अहमियत हासिल हुई, किस क़िस्म के किरदारों ने भरोसा पाया और किस क़िस्म का सांस्कृतिक माहौल उस दौर को रास आया... ये तमाम सुबूत साहित्यिक ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक सार्थकता भी रखते हैं।
लिहाज़ा इन सभी क़िस्सों की पहली विशेषता इनकी सामाजिक और सामूहिक स्वीकृति है। इस दौर तक समूह से व्यक्ति का रिश्ता कटा नहीं है, बल्कि यह कहना ज़्यादा उचित होगा कि व्यक्ति अभी सामूहिक ढांचे से अलग इकाई की हैसियत से उभरा ही नहीं है। वह मानो सामूहिक आत्मा की अभिव्यक्ति का महज़ एक माध्यम है, उसकी ज़बान से उसका दौर और उसके लोग बोलते हैं और उसकी अपनी पहचान (इन्फ़रादियत) इन्हीं लोगों के सोचने और महसूस करने के अंदाज़ को आवाज़ देने की आभारी है।
दूसरी अहम विशेषता इन सभी क़िस्सों के पीछे सक्रिय एक नैतिक स्वर (अख़लाक़ी आहंग) है जो इन क़िस्सों को सार्थकता बख़्शता है। यह नैतिकता दार्शनिक नहीं बल्कि व्यावहारिक है, जो अलग-अलग तरह के विचारों के बीच उन्हें जोड़ने का काम अंजाम देती है। नैतिकता के इस विचार के पीछे प्रेरणा या सुधार का जज़्बा नहीं, अलबत्ता अपने दौर की व्यावहारिक सच्चाइयों को आम और मनपसंद अंदाज़ में सुरक्षित कर लेने का ख़्याल ज़रूर मौजूद है। ये मानो युग के ज्ञान (दानिश-ए-असर) के कथा-रूप हैं।
तीसरे, इन सभी क़िस्सों में इंसान और अति-प्राकृतिक तत्वों के बीच की रेखाएं धुंधली और अस्पष्ट हैं। घटनाओं के बीच संबंध तर्क (मंतिक़) से तय नहीं होता, हर कार्य का कारण होना ज़रूरी नहीं और कारणों और प्रेरकों का सिलसिला संयोगों से जा मिलता है। इंसान के पास जीत का सबसे अचूक साधन अगर कुछ है तो वह ईश्वरीय सहायता है, या किसी पहुंचे हुए गुरु (मुर्शिद) की सिफ़ारिश, या फिर किसी तावीज़ या मंतर का सहारा, जो नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाता है और अटल त्रासदी (अलमिए) को सुखद अंजाम तक पहुंचाता है।
शुरुआती दौर के नस्री (गद्य) किस्सों को ध्यान में रखा जाए तो निम्नलिखित रचनाओं पर गौर करना होगा। फ़ज़ली की 'करबल कथा', ईसवीं खां की 'दास्तान मेहर अफ़रोज़ ओ दिलबर', शाह आलम से मंसूब 'अजायब-उल-क़सस', तहसीन की 'नौतर्ज़-ए-मुरस्सा', इंशा की 'रानी केतकी की कहानी' और फिर फोर्ट विलियम के असर में लिखे गए किस्से जिनमें मीर अम्मन की 'बाग़-ओ-बहार' को सबसे अहम हैसियत हासिल है। इन सब किस्सों में यह बात समान है कि,
(1) करबल कथा के अलावा किसी का इज़हार का ज़रिया मज़हबी नहीं है और इन सब में एक गैर-मज़हबी और रवादाराना (सहिष्णु) माहौल भी पाया जाता है।
(2) इन मशहूर और आम तौर पर मक़बूल किस्सों का तर्ज़ (शैली) कायम रखा गया है जिनकी रिवायत हमारे अवामी अदब (लोक साहित्य) में चली आती है।
(3) इन सभी किस्सों में शहरी समाज की झलकियां नुमायां (प्रमुख) हैं, देहाती ज़िंदगी की तस्वीरें या तो सिरे से गायब हैं या हैं तो मामूली और दूसरे दर्जे की।
(4) यह सभी किस्से किसी न किसी शक्ल में हमारी अवामी रिवायत का हिस्सा बने रहे हैं और इस तयशुदा और मुक़र्रर वाक़ियाती ढांचे को तर्ज़-ए-बयान और तख़य्युल (कल्पना) की रंगारंगी ने तरह-तरह के निराले रूप दे दिए हैं। इनमें वह किस्से भी हैं जो हमारे गांव-देहातों में मक़बूल रहे हैं। वह किस्से भी जो हमारी नानी-दादियां सुनाती आई हैं और वह भी जिनका सिलसिला पंचतंत्र, हितोपदेश या अलिफ़ लैला से मिलता है। इस किस्म की कहानियों का अपना एक अलग शजरा (वंशावली) है और इनकी आवाजाही मुल्कों और तहज़ीबों के बीच तिजारती (व्यापारिक) और दूसरे ताल्लुक़ात से मुतास्सिर (प्रभावित) होती आई है।
चुनांचे हिंदुस्तान, मिस्र, बाबुल, शाम, ईरान और मध्य एशिया के ज़रिए ऐसी अनगिनत कहानियों का लेन-देन हुआ है। इस खयाल का बार-बार इज़हार किया गया है कि बिल्कुल मुमकिन है कि हिंदुस्तान की कहानियों ने तिजारती सामान के साथ अलिफ़ लैला की सरज़मीन तक सफ़र किया हो और वहां से अरब ताज़िरों (व्यापारियों) के ज़रिए इटली की बंदरगाहों तक पहुंच हासिल की हो और शेक्सपियर को अपने ड्रामों के लिए कई कहानियां यहीं से हाथ आई हों। (इस किस्म के अवामी किस्सों का शजरा-ए-नसब (वंशावली) प्रोफ़ेसर मोल्टन ने अपनी किताब 'वर्ल्ड लिटरेचर' में तीन आलमी तहज़ीबों से मिला दिया है। यूनानी, सामी और दक्षिणी एशियाई)।
करबल कथा से पहले की रिवायत में कम से कम दो किस्से ज़िक्र के क़ाबिल हैसियत रखते हैं। एक मुल्ला वज़ही की 'सब रस' जिसका तमसीली तर्ज़ (प्रतीकात्मक शैली) अपनी मिसाल आप है और जो तमसीली पर्दे में एक मुरव्वजा (प्रचलित) किस्से को नए अंदाज़ के साथ पेश करता है। यहां भी मामला हुस्न-ओ-दिल का है जिसे कुछ मुहक़्क़िक़ीन (शोधकर्ता) कृष्ण मिश्र की 'प्रबोध चंद्रोदय' का किस्सा क़रार देते हैं और कुछ फ़त्ताही की फ़ारसी तसनीफ़ 'दस्तूर-उल-उश्शाक़' का। दोनों सूरतों में मुल्ला वज़ही के किस्से के एक प्रचलित अवामी किस्सा होने में कोई शक है, न इसकी अख़लाक़ी (नैतिक) अहमियत में, न इसके फ़ौक़-उल-फ़ितरत (अलौकिक) हिस्सों से काम लेने के अंदाज़ में। मुल्ला वज़ही के नज़दीक किस्से की वाक़ियत (यथार्थ) अहम नहीं, इसकी अख़लाक़ी तमसील (नैतिक प्रतीक) अहम है जिसकी नौइयत (प्रकृति) मज़हबी और सूफ़ियाना नहीं बल्कि गैर-मज़हबी, आज़ाद खयाली और इश्क़ की अव्वलियत (प्राथमिकता) पर मबनी (आधारित) है।
दूसरे वह तमसीली किस्से या मुअम्मे (पहेलियां) हैं जो शिकारनामे के नाम से दकन में आम थे और जिन्हें आम तौर पर ख्वाजा गेसू दराज़ बंदा नवाज़ से मंसूब किया जाता रहा है, इसका एक नमूना यह है:
हम चार भाई थे देहात से, उनमें से तीन का लिबास नहीं था और चौथा बरहना (नंगा) था। जो भाई बरहना था उसकी आस्तीन में नक़द (पैसे) था। हम चारों तीर-कमान ख़रीदने बाज़ार गए, क़ज़ा (मौत) आई और चारों मारे गए और चोबें (लकड़ियां) ज़िंदा उठ खड़े हुए। उस वक़्त चार कमानें नज़र आईं, तीन टूटी हुई थीं और नाक़िस (ख़राब) थीं और एक बे-ख़ाना और बे-गोशा (बिना कोने की)। उस बरहना भाई ने जिसके पास पैसे थे, उस बे-ख़ाना और बे-गोशा कमान को ख़रीदा। तीर की फ़िक्र हुई, चार तीर नज़र आए। तीन टूटे हुए थे और चौथे में पर (पंख) और पैकान (नोक) नहीं थे। हमने बे-पर-ओ-पैकान तीर को ख़रीदा और शिकार की तलाश में सहरा (जंगल) को रवाना हुए। चार हिरन नज़र आए। तीन मुर्दा थे और चौथा बेजान था। बेजान हिरन पर बे-पर-ओ-पैकान तीर छोड़ा गया। अब शिकार बांधने के लिए फ़ितराक (शिकार बांधने की डोरी) चाहिए। चार कमंदें (रस्सियां) नज़र आईं, तीन पारा-पारा (टुकड़े-टुकड़े) थीं और एक के किनारे और वस्त (बीच का हिस्सा) नहीं थे। शिकार उस बे-किनारा और बे-मियाना कमंद में बांधा गया। अब ठहरने के लिए और शिकार को लटकाने के लिए घर चाहिए। चार घर नज़र आए, तीन टूटे हुए थे और एक की छत और दीवारें ग़ायब थीं, हम उस बे-सक़्फ़ (बिना छत) और बे-दीवार घर में दाख़िल हुए।
आख़िर में शिकारनामे के मुसन्निफ़ (लेखक) अरबाब-ए-नज़र (समझदार लोगों) को इस मुअम्मे (पहेली) के हल करने की दावत देते हैं। ज़ाहिर है कि यह मुअम्मा तमसीली (प्रतीकात्मक) है और यह किस्सा जो आम तौर पर मशहूर होगा, तसव्वुफ़ (सूफ़ीवाद) की इस्तलाहों (शब्दावली) में ढाल लिया गया है।
करबल कथा नीम-मज़हबी (अर्ध-धार्मिक), नीम-तारीख़ी (अर्ध-ऐतिहासिक) किस्से को बयान करती है ताकि वह औरतें जो फ़ारसी नहीं समझतीं, अपनी ज़बान में इमाम हुसैन और उनके रुफ़क़ा (साथियों) की शहादत का हाल पढ़ और सुन सकें। करबल कथा अनीस के मरासी (मर्सियों) से तक़रीबन सौ साल पहले लिखी गई, लेकिन यहां भी इमाम हुसैन और उनके साथियों के हुलिए, लिबास और तर्ज़-ए-अमल (व्यवहार) पर हिंदुस्तानी मुआशरत (समाज) की परछाइयां नज़र आती हैं। किस्सा ज़ाहिर है कि हिंदुस्तानियों के लिए लिखा गया है, इसलिए इस किस्से में भी ऐसी कई हिंदुस्तानी तफ़्सीलात (विवरण) और जुज़ियात (बारीकियां) शामिल हो गई हैं जिन्होंने इसे हिंदुस्तानी रूप दे दिया है। किस्सा यहां भी तबाज़ाद (मौलिक) नहीं है, रिवायती है और वह भी ऐसा जो हमारे अवामी अदब का जुज़्व (हिस्सा) बन चुका था, जिस पर शुमाली हिंद (उत्तर भारत) और दकन में नौहे, सलाम, मर्सिए, ज़ारियां (विलाप) तसनीफ़ हो चुकी थीं (लिखी जा चुकी थीं)।
फ़ज़ली ने अलबत्ता इसको एक अख़लाक़ी महवर (नैतिक धुरी) देकर हिंदुस्तानी रंग-रूप बख़्श दिया है, कशमकश की नौइयत मरई (प्रत्यक्ष) है। किरदार वाज़ेह तौर पर स्याह-सफ़ेद (काले-सफ़ेद) रंगों में पेश किए गए हैं, नेक हर तरह नेक और बद हर तरह से बद। यह और बात है कि मस्लहत-ए-ख़ुदावंदी (ईश्वरीय इच्छा) से यहां हार बरगुज़ीदा (चुने हुए) और नेक बंदों के मुक़द्दर में आती है। यही वह आवाज़ है जो इस दौर के शेरी सरमाये (काव्य संपत्ति) में दूर तक गूंजती सुनाई देती है। मीर का क़नूती (निराशावादी) लहज़ा हो या हातिम, क़ायम और नज़ीर का शहर-ए-आशोब, सौदा का शहर-ए-आशोब, सब में नेकों और बाकमाल लोगों की ख़्वारी (अपमान) और ज़बूं-हाली (बुरी हालत) का मातम जगह-जगह मिलता है।
शाह आलम की तसनीफ़ 'अजायब-उल-क़सस' को लीजिए जो हाल ही में दरयाफ़्त (खोज) हुई है, यहां भी किस्से का नहज (ढंग) वही अलिफ़ लैलावी या दास्तानी है, मुरव्वजा (प्रचलित) किस्सा है जिसमें सात सवालों का जवाब लाने पर महबूब को पाने का मदार (दारोमदार) है और इन सात सवालों के जवाबात महज़ मालूमात से हासिल नहीं हो सकते बल्कि मुर्शिद-ए-कामिल (सच्चे गुरु) की हिदायत, तौफ़ीक़-ए-इलाही (ईश्वरीय कृपा) और रियाज़त (तपस्या) से मिलते हैं। दायरे के एतबार से 'सब रस' के बाद 'अजायब-उल-क़सस' सब किस्सों में ज़्यादा वसीअ (व्यापक) है लेकिन यहां भी किस्से के बाज़ (कुछ) हिस्सों को छोड़कर मुरव्वजा रंग ग़ालिब (हावी) है। यहां भी अख़लाक़ी मरकज़ियत (नैतिक केंद्रियता) ने कहानी के दूसरे पहलुओं पर ग़लबा (दबदबा) क़ायम कर रखा है और इसकी कोशिश अवामी किस्सों को जोड़कर एक दास्तानी शक्ल देने की है। किरदार सपाट और एक-रुख़े हैं और कहानी-दर-कहानी की अलिफ़ लैलावी तकनीक के अलावा इसमें कोई दूसरी नुदरत (अनोखापन) नहीं है।
इसी सिलसिले में सआदत यार ख़ां 'रंगीन' की रचना 'अख़बार-ए-रंगीं' का ज़िक्र भी ज़रूरी है, जिसमें अपने दौर की अलग-अलग घटनाओं और लतीफ़ों को रंगीन ने इस ख़ास नियम के साथ जमा किया है कि दिल को बादशाह मान लिया है और ख़ुद को बादशाह की ख़िदमत में पर्चा-नवीस (ख़बर देने वाले) की हैसियत से शहर या दुनिया के अलग-अलग हालात की ख़बर पहुँचाने वाले का रूप दिया है। हर वाक़ये पर दिल टिप्पणी करता है और हर टिप्पणी के बाद एक उर्दू कहावत, एक उर्दू और एक फ़ारसी का शेर दिया गया है। इनमें वह मशहूर शेर भी है जो मानो इस पूरे दौर के माहौल की झलक पेश करता है:
ये जो कुछ है जहाँ में इसके बेश-ओ-कम को देखा है
हमें क्या देखते हो हमने इक आलम को देखा है
यहाँ भी अलग-अलग क़िस्सों के ज़रिए रिवायतों और रोज़ाना की घटनाओं को इकट्ठा करने की कोशिश मौजूद है और उनसे किसी न किसी तरह का अख़लाक़ी (नैतिक) सबक़ हासिल करने का ख़याल भी है, जिससे लेखक का अवामी रिवायतों और उसकी हिफ़ाज़त करने वाले समाज से गहरे ताल्लुक़ का पता चलता है। यहाँ यह ज़िक्र करना बे-मौक़ा न होगा कि इसी तरह के रोज़मर्रा के वाक़यात या मशहूर इश्क़िया क़िस्सों को मीर, सौदा और क़ायम ने अपनी मसनवियों का मौज़ू (विषय) बनाया है।
फिर 'क़िस्सा मेहर अफ़रोज़-ओ-दिलबर' है, जिसके लिखे जाने का समय 1732 ई. के लगभग बताया जाता है। बादशाह ताज-ओ-तख़्त से उकता कर वारिस की आरज़ू में जंगल में डेरा जमा लेता है, वहाँ एक फ़क़ीर मिलता है जिसकी दुआ से मेहर अफ़रोज़ की पैदाइश होती है। 14 साल की उम्र में मेहर अफ़रोज़ शिकार का पीछा करते-करते एक अजीब दिलकश बाग़ में जा पहुँचता है जहाँ मुग़लिया अंदाज़ के बाग़ों की तरह फ़व्वारे हैं। यहीं उसकी मुलाक़ात दिलबर से होती है।
शहज़ादा उसका पीछा करता है मगर जंगल में रास्ता भूल जाता है। वज़ीर-ज़ादे के कहने पर शहज़ादे के गाने से जंगल के सब जानवर उसके वश में हो जाते हैं और बंदरों का राजा उसे एक दरवेश आरज़ू बख़्श के पास ले जाता है जो उसे शहज़ादे मुनव्वर का क़िस्सा सुनाता है, जो ख़्वाब में ख़ता (चीन का एक इलाक़ा) की शहज़ादी दिलरुबा पर आशिक़ होकर जादू में फँस गया था। जिससे रिहाई उसी वक़्त मुमकिन थी जब वह पन्ना के बने हुए तोते की चोंच पर ताक कर तीर मारे। मगर निशाना चूक गया और उसका सिर कट कर अलग जा गिरा, लेकिन शहज़ादे के वफ़ादार ताजर-ज़ादे (व्यापारी के बेटे) ने ताक कर निशाना मारा और शहज़ादे को रिहा करा लिया। फिर जब दिलरुबा अपने आशिक़ मुनव्वर शाह के साथ जा रही थी तो एक चोर उसे अग़वा करके ले जाता है, तब भी क़ंबर-आबाद का बादशाह सीदी जवाहर और एक साहूकार का बच्चा ही उसे वापस दिलाते हैं।
इन दोनों वाक़यात से ताजरों (व्यापारियों) और साहूकारों की बढ़ती हुई अहमियत का अंदाज़ा लगाया जा सकता है, जो आगे चलकर इतनी बढ़ी कि ख़ुद मुग़ल शहंशाह शाह आलम से लेकर बहादुर शाह तक दिल्ली के ताजरों और साहूकारों के क़र्ज़दार थे और ईस्ट इंडिया कंपनी भी अमी चंद और जगत सेठ जैसे साहूकारों से माली मदद हासिल करती थी। इसके अलावा 'मेहर अफ़रोज़-ओ-दिलबर' के पूरे माहौल पर यही ग़ैर-मज़हबी (सेक्युलर) और मिली-जुली हिंदुस्तानी तहज़ीब के असर साफ़ नज़र आते हैं। मेहर अफ़रोज़ और दिलबर शादी के बाद पूरनमासी को चाँदनी की सैर को निकलते हैं, ठीक उसी वक़्त राजा इंदर अपनी अप्सराओं के साथ आसमानों में उड़ रहा होता है:
इत्तिफ़ाक़ ऐसा होता है इंदर वास्ते सैर के मय अपछराओं निकला है सो देख इस चाँदनी का ठाठ और हुस्न के तिलिस्मात और राग-ओ-नाच का बनाव बे-इख़्तियार खड़ा हो रहता है तो उस वक़्त के बीच में चतर रूप पातरा तो नाचती है और गुन तरंग पखावजन पखावज बजावती... इंदर जो छुपा खड़ा था तिस के मुँह से बे-इख़्तियार वाह-वाह निकल आती... फूलों का मेंह बरसावता है।
इस सैर-ओ-तफ़रीह के फ़ौरन बाद मेहर अफ़रोज़ मर जाता है, मगर 'शुक सप्तति' की कहानियों की तर्ज़ पर तोता दिलबर को ख़ुदकुशी करने से रोके रखता है और अलग-अलग क़िस्से सुनाकर उसका दिल बहलाता है। उसे जंगल की तरफ़ ले आता है, जहाँ दरवेश मुराद बख़्श रहता है। उसे तोते के कहने से दिलबर बीन बजाकर मस्त कर देती है और वह ख़ुश होकर दिलबर की मुराद पूरी करने का वादा कर लेता है। मेहर अफ़रोज़ को दरवेश ज़िंदा कर देता है और तोता भी इंसानी रूप में आ जाता है।
इस क़िस्से को कुछ तफ़सील (विस्तार) से बयान करने का मक़सद यह था कि इस क़िस्से के ताने-बाने में कई संस्कृत क़िस्सों और पुरानी रिवायतों के हिस्से मिलते हैं। दूसरे, मसनवी 'सहर-उल-बयान', 'गुलज़ार-ए-नसीम' और अमानत व मदारी लाल की 'इंदर सभाओं' की कहानियों का ढाँचा भी यहीं से मिलता है। ये क़िस्से मानो शहर और देहाती समाज की सरहद को ज़ाहिर करते हैं, जहाँ लोक कहानियों और रिवायती अफ़सानों से फ़नकार का रिश्ता अभी तक गहरा था और वह माहौल में बिखरे हुए सभी ख़ज़ानों को तरह-तरह से महफ़ूज़ कर लेना चाहता था। इसीलिए बयान के अंदाज़ में भी कहीं नख-शिख का अंदाज़ है, कहीं संकलनकर्ता के अनुसार, कृष्ण भक्ति शाखा के कवियों के अक्सर अशआर जो दिल्ली और आगरा के आस-पास कहावतों के तौर पर मशहूर थे, उन्हें नस्र (गद्य) की शक्ल में नक़ल करता है। शहर की यह तस्वीर देखिए जिसमें देहात की सरहद साफ़ झलकती है:
ज्यों-ज्यों बादशाहज़ादा नज़दीक शहर के पहुँचता है त्यों-त्यों उसे ऐसी ख़ुश-वक़्ती होती है गोया बादशाहज़ादे का दिल तो है किसान और तन उसका हुआ खेत, तिस कूँ हुस्नाबाद के जो सघन-सघन दरख़्त हैं सोई हुए श्याम घटा और फूल जो झड़ें हैं दरख़्तों के सोई हुए बूँद मेंह, सो मानो उसका तन रूपी जो है खेत तिस पे बरसे है और नहरें जो शहर के हर चहार तरफ़ जारी हैं व तालाब भरे हैं और पानी में जो तरंगें चलती हैं सो ये तरंगें नहीं चलतीं, दिलबर के बिरह से जो आशिक़ जलता है तिस के बुझावने के वास्ते तरंगें उठती हैं।
'नौ तर्ज़-ए-मुरस्सा' की रचना 1768 ई. से 1775 ई. के दौरान मुकम्मल हुई, इसका क़िस्सा मशहूर है। लेकिन यह बात अलबत्ता ग़ौर करने लायक़ है कि यहाँ भी चारों दरवेश ताजर (व्यापारी) हैं और ख़ुद बादशाह इन ताजर दरवेशों का हम-नशीं (साथी) है। ख़ुद 'मेहर अफ़रोज़-ओ-दिलबर' में बादशाही के चार सुतून (खंभे) गिनवाए गए हैं:
अमीर-ओ-सिपाह के लिए मानिंद आग के हैं, दूसरे वज़ीर और पढ़े और दाना (समझदार) लोग कि ये मानिंद बाओ (हवा) के हैं। तीसरे सौदागर और साहूकार वे मानिंद पानी के हैं। चौथे रइयत और जाता (जनता) वे मानिंद ख़ाक के हैं।
फिर यहाँ मादर-ए-बरहमनां के अलावा फ़िरंगियों (अंग्रेज़ों) का ज़िक्र भी जिस अंदाज़ से हुआ है, वह ग़ौरतलब है। वज़ीर एक ताजर ख़्वाजा सग-परस्त का हाल बयान करता है, जिसके कुत्ते की गर्दन में जवाहरात का पट्टा पड़ा रहता है। बादशाह इसे ग़लत बयानी (झूठ) जानकर वज़ीर की गर्दन काटने का हुक्म देता है:
यकायक एलची फ़िरंग का दस्त-बस्ता (हाथ बाँधे) खड़ा हुआ और ज़बान बीच शफ़ाअत (सिफ़ारिश) वज़ीर के खोली और अर्ज़ किया।
कीजे जान-बख़्शी और तक़्सीर मुआफ़
बात इसकी कि न बूझो तुम ज़लाफ़
तुझ बादशाह आदिल रइयत-परवर जो ख़ून नाहक़ करे और वबाल जान वज़ीर का अपने ऊपर लेवे फ़रावाँ (बहुत ज़्यादा) तास्सुफ़ और तहलुफ़ का है। अव्वल लाज़िम यह है कि तहक़ीक़ फ़रमाए। (पृष्ठ 244)
यह सूरत ख़्वाजा सग-परस्त के बयान किए गए क़िस्से में बादशाह-ए-फ़िरंग और अख़्तर बादशाह-ए-फ़िरंग की है, जो समझदारी में बेमिसाल और हमदर्दी व ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ (जनसेवा) में यकता (बेजोड़) नज़र आते हैं।
'नौ तर्ज़-ए-मुरस्सा', जो 'बाग़-ओ-बहार' का पहला रूप है, ख़ुद इसी क़िस्म के कई क़िस्सों के ढांचों की देन है और यहाँ भी वो तमाम तत्व साफ़ तौर पर मिलते हैं जिनका ज़िक्र क़िस्सों के सिलसिले में किया जा चुका है। 'बाग़-ओ-बहार' फोर्ट विलियम कॉलेज की रचना है और फोर्ट विलियम अंग्रेज़ अफ़सरों के प्रशिक्षण के लिए क़ायम किया गया था। मक़सद सिर्फ़ उर्दू सिखाना नहीं था बल्कि हिंदुस्तान की संस्कृति और माहौल से परिचित कराना भी था जो क़िस्सों के ज़रिए आसानी से मुमकिन था। जॉन गिलक्रिस्ट ने जो ख़्वाब देखा था वो पूरा न हो सका और ब्रिटिश शासकों को हिंदुस्तान के लोक कल्चर से परिचित कराने का काम बीच में ही रुक गया, उसने लिखा था:
ए प्रोफेट इज़ नॉट रिक्वायर्ड टू प्रेडिक्ट दैट इन ए फ्यू इयर्स मोर, द ग्लीम ऑफ़ लर्निंग इन द डे ऑफ़ हेस्टिंग्स एंड जोंस विल बी टोटली एक्लिप्स्ड बाय दैट प्रेशियस डॉन इन द ईस्टर्न लव अपेरेंट नाउ एंड व्हिच विल देन ब्रेक फोर्थ विद द मेरिडियन स्प्लेंडर टू प्रमोट एंड कन्फर्म द हैप्पीनेस एंड प्रोस्पेरिटी ऑफ़ द ब्रिटिश इंडिया।
गिलक्रिस्ट, ब्रिटिश ओरिएंटलिस्ट्स। पृ. 84
फोर्ट विलियम की कहानियाँ सिर्फ़ बयान के अंदाज़ और आसान ज़बान के कारनामे नहीं हैं। इनके ज़रिए हिंदुस्तान के कहानियों वाले अतीत को फिर से व्यवस्थित करने की कोशिश की गई है ताकि नए सीखने वाले सिर्फ़ ज़बान ही न सीखें बल्कि 'पूरब' की आत्मा से वाक़िफ़ हो जाएँ और यहाँ के क़िस्सों में झलकती हुई सांस्कृतिक क़द्रों और माहौल से परिचित हो सकें। गुलिस्ताँ, बोस्ताँ, अनवार-ए-सुहेली, पंद नामों के अनुवाद, आराइश-ए-महफ़िल, तोता की कहानी, सिंघासन बत्तीसी, मुख़्तसर कहानियाँ और हितोपदेश और पंचतंत्र की कहानियों का परिचय, यह सब कुछ इस मुहिम का हिस्सा था। यहाँ नैतिक शिक्षा केंद्रीय स्थान नहीं रखती थी बल्कि हिंदुस्तान को समझना पहली प्राथमिकता थी, लेकिन इन कहानियों के पीछे वही क़िस्सों का ढांचा था जिससे सामाजिक रिश्तों का तालमेल छलक रहा था।
इस सिलसिले में दो और अहम गद्य क़िस्सों का ज़िक्र बाक़ी रह जाता है जो फोर्ट विलियम के बाहर लिखे गए, इनमें एक इंशा की 'रानी केतकी की कहानी' है और दूसरा रजब अली बेग सुरूर का 'फ़साना-ए-अजायब'। इंशा की 'रानी केतकी' भी अपने माहौल के हिसाब से लोक कथाओं ही का रूप है और इसका माहौल, घटनाएँ, किरदार और बयान का अंदाज़ मौलिक तत्व रखते हुए भी उस ख़ास समाज की आवाज़ बनते हैं जिसकी ख़ुशहाली के साधन जुटाए गए हैं। वही साधु और दरवेश जिनके मंतर चूकते नहीं, वही अलौकिक तत्वों पर भरोसा, वही सेक्युलर अजमी किरदार जिनके रिश्ते कारीगरों के हाथों फलने-फूलने वाली इस शहरी संस्कृति से मिलते हैं, वही नैतिकता का विचार जिसमें रंगीन मिज़ाजी जुर्म नहीं बल्कि जीवन के आनंद का हिस्सा है। कुल मिलाकर सामाजिक संरचना के ताने-बाने की हैसियत से इंशा की 'रानी केतकी' उभरती है।
'फ़साना-ए-अजायब' के क़िस्से का भी यही हाल है। यहाँ भी मौलिक तत्व मौजूद हैं लेकिन क़िस्से का ढांचा पारंपरिक है, शहर से लगाव ज़्यादा है बल्कि हर लफ़्ज़ उसी शहर की मोहब्बत में डूबा हुआ है। अलौकिक तत्वों से यहाँ भी काम लिया गया है, बंदर की तक़दीर ने फ़साने के नैतिक पहलू को उजागर कर दिखाया है।
पिसर-ए-मजिस्तान के किरदार ने उस नए सांस्कृतिक तत्व का भी परिचय करा दिया है जो हिंदुस्तान के समाज में शामिल होने लगा था और सेक्युलर लब-ओ-लहजा उस जोगी के किरदार में साफ़ झलकता है जो उस साँझी संस्कृति को मानने वाला है जो कबीर, नामदेव, नानक और नज़ीर से होती हुई उर्दू साहित्य की वैचारिक नींव बन चुकी थी।
हर गुरु का नाम लिया फिर कलमा जो पढ़ा दुनिया से चल बसा। दम निकल गया। जोगी मुसाफ़िर-ए-अदम बैकुंठ बासी रम गया, जान-ए-आलम का रोते-रोते दम गया... शहज़ादे ने बमूजिब-ए-वसीयत ग़ुस्ल कराया, कफ़नाया, क़ब्र तक उतारते-उतारते कुछ न पाया। आख़िरकार बराबर कफ़न फाड़ दिया, आधा चेलों ने जलाया, निस्फ़ मुरीदों ने मढ़ी में गाड़ दिया। हिंदुओं ने राख पर छतरी बनाई, मुसलमानों ने क़ब्र बनाकर सब्ज़ चादर ओढ़ाई।
'फ़साना-ए-अजायब' में तोते का काम आना और मुल्कों-मुल्कों का सफ़र, दरवेशों और बुज़ुर्गों का मदद करना, यह सब कुछ पुराने क़िस्सों के दरमियान साँझा है और सामाजिक संरचना का हिस्सा नज़र आता है। इसी सिलसिले की एक कड़ी महज़ूर की 'नवरतन' है जो लोक कथाओं को क़िस्से-कहानी के रूप में पेश करती है।
इन क़िस्सों के बुनियादी ढांचे में समानता मौजूद है लेकिन बुनियादी ढांचा एक नहीं है, दूसरे इन तमाम क़िस्सों में घटनाएँ लगभग पहले से मशहूर क़िस्सों पर आधारित हैं और सामाजिक संरचना का हिस्सा हैं, तीसरे इनमें एक नैतिक पहलू एकता पैदा करता रहता है। आम तौर पर लड़ाई-झगड़ा इन क़िस्सों का बुनियादी हिस्सा नहीं है। हालाँकि जगह-जगह इससे काम लिया गया है लेकिन यह सभी विशेषताएँ आगे चलकर हमारे दास्तानी साहित्य में कुछ की कुछ हो जाती हैं।
दास्तान का चलन हालाँकि पुराना है लेकिन लखनऊ में इसे जो विकास मिला उसकी मिसाल दूसरी जगह नहीं मिल सकती। बेशक दास्तान में मशहूर क़िस्सों से भी काम लिया गया। अलौकिक तत्व भी काम में लाए गए लेकिन कल्पना की जो विशाल दुनिया यहाँ सजाई गई वो क़िस्सों में इस ढांचे के साथ ग़ायब है। इसके अलावा यहाँ मौलिक घटनाओं और किरदारों की गुंजाइश कहीं ज़्यादा और कहीं बेहतर तौर पर निकल आती है।
दास्तान ने आम तौर पर अपने आपको प्रतिनिधि किरदारों में ढाल लिया। अमीर हमज़ा और उनके अय्यारों में उमरो अय्यार सबके प्रमुख ठहरे, ख़ुदावंद-ए-बक़ा से मुक़ाबला कर रहे हैं। यहाँ विवाद का मुद्दा सिर्फ़ देशों की जीत या तिलिस्म की जीत नहीं है बल्कि क़िस्सों के नैतिक मक़सदों ने ज़रा आगे बढ़कर मज़हबी मक़सद भी अपना लिए हैं। साँझी संस्कृति यहाँ भी जगह-जगह नज़र आती है लेकिन माहौल कहीं ज़्यादा इस्लामी है और सारा संघर्ष नेकी और बदी के बजाय इस्लाम और कुफ्र के दरमियान लड़ाई का रूप ले लेता है, जिसकी मुख्य अहमियत यह है कि सिर्फ़ ख़ुदा की मदद और दुनियावी समझ की मदद से अमीर और उनके अय्यार जादूगरों की जादूगरी पर विजयी होते हैं और अलौकिक कारनामे पूरे करते हैं। इन कहानियों में शुरुआती कहानियों की तरह कमज़ोर के ताक़तवर पर विजयी होने की हैरतअंगेज़ दास्तानें बयान हुई हैं, यह एक ऐसे दौर में भरोसा और हौसला बनाए रखने के लिए ज़रूरी थीं जो हार का सामना कर रहा था। गोडार्ड ने लिखा है:
द अर्लियर स्टोरीज़ आर इनवेरिएबली द टेल्स ऑफ़ द फिजिकली स्ट्रॉन्गेस्ट एंड मोस्ट परफेक्ट ओवर-थ्रोन एंड डिफीटेड बाय द वीकर बाय द लेस फिजिकली स्ट्रॉन्ग, बाय द मोर इंटेलेक्चुअली पोटेंट, इट इज़ ऑलवेज़ ए जायंट किल्ड बाय द इनसिग्निफिकेंट जैक, ऑफ़ द फायर-रेटिंग ड्रैगन किल्ड बाय रेनफ्लाई नाइट, ग्रेंडेल किल्ड बाय बेओवुल्फ, ऑफ़ बेयरर फॉर आउटविटेड बाय बेयरर रैबिट।
किस्सों और दास्तानों में बुनियादी फ़र्क़ सिर्फ़ शिल्प (रूप) और शैली का ही नहीं था, बल्कि व्यक्ति और सामूहिक स्वर का भी था। किस्सों में आदर्श किरदार एक व्यक्ति का था जिसके सामने अलग-अलग तरह की मुहीमें थीं, जो जान-ए-आलम बनकर तोते की रहनुमाई में हसीनाओं की तलाश में भटकता था, कभी कुंवर उदय भान बनकर बन-बन घूमता था और दरवेशों और साधुओं की दुआओं से अपनी मंज़िल तक पहुँचता था। दास्तानों में अमीर हमज़ा और उनके अय्यारों का पूरा गिरोह खुदावंद-ए-बक़ा के पूरे गिरोह के ख़िलाफ़ मोर्चा सँभाले हुए था। उनके मक़सद भी आम तौर पर सामूहिक हैं, हालाँकि बीच-बीच में व्यक्तिगत इश्क़-मुहब्बत और निजी जीत भी सामने आती रहती हैं और उमरो अय्यार ख़ास तौर पर अपनी मज़ाक़िया हरकतों से बहुत कुछ अपनी ज़ंबील (झोले) में डालते रहते हैं, फिर किस्सों के उलट यहाँ सारा ज़ोर जंग और लड़ाई-झगड़े पर है।
हालाँकि यहाँ की रंगीन महफ़िलों का भी जवाब नहीं, मगर असल मुहीमें जंगी ही हैं। इस लिहाज़ से देखा जाए तो वह घमासान की जंग जो उस वक़्त का हिंदुस्तानी समाज ब्रितानी साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ लड़ रहा था, उसका विकल्प ख़याली दुनिया में दास्तानें मुहैया कर रही थीं। असली दुनिया में हारी हुई तहज़ीब (संस्कृति) ख़यालों के पर्दे में नए मोर्चे जमा रही थी और जीत के शादियाने बजा रही थी। वहाँ भी उसे दुश्मन के कहीं ज़्यादा ताक़तवर और साधन-संपन्न होने का एहसास था, लेकिन ईश्वर पर भरोसा और संतोष, ईमान की ताक़त और ख़ुदा की मदद जो असली दुनिया में ज़्यादा काम नहीं आ पाती थी, दास्तान की ख़याली दुनिया में नए जौहर दिखा रही थी और अब्दुल हलीम शरर के नॉवेलों की तरह हार के लम्हों में जज़्बाती सुकून का सामान मुहैया कर रही थी।
अब यह उस तबक़े की आवाज़ नहीं थी जो क़स्बों और देहातों की सरहदों पर था और महज़ सामूहिक रूप में बिखरे हुए उन किस्सों को इकट्ठा कर रहा था जो उसके समाज में आम चलन का दर्जा हासिल कर चुके थे। अब दास्तानों के पीछे वह तबक़ा उभर रहा था, जिसका रिश्ता देहाती समाज से टूट चुका था। देहात का चित्रण, देहात के रहने वालों की गँवारू तहज़ीब का मज़ाक़ सब इसकी गवाही देता है। अब इस तबक़े को जज़्बाती और ख़याली सतह पर सुकून हासिल करने के लिए मौलिक (ओरिजिनल) कहानी की ज़रूरत थी, जिसमें रंगीनी, चटपटापन और जंग व लड़ाई की सनसनी मौजूद हो। अब यह तबक़ा शहरी अर्थव्यवस्था में एक तहज़ीब की टूट-फूट से दो-चार था और उससे ख़याली सतह पर दास्तान के ज़रिए मुक़ाबला कर रहा था।
शिल्प और शैली के एतबार से भी यह फ़र्क़ साफ़ है। शिल्प के एतबार से दास्तान 'कहानी के अंदर कहानी' की तकनीक को अपनाती है और चूँकि सामूहिक मुहीमों का सिलसिला जारी रहता है, इसलिए एक के बजाय अलग-अलग हीरो तरह-तरह से अपनी ज़हानत, समझदारी और बहादुरी का प्रदर्शन करते नज़र आते हैं। यहाँ भी किरदार बँधे-टक़े हैं और अच्छे बहुत अच्छे, बहादुर, हसीन और नेक हैं, बुरे सभी ख़राबियों के पुतले हैं और उनकी बुनियादी शख़्सियत में विकास नहीं होता। वक़्त उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता, वे कभी पत्थर के हो जाते हैं, कभी फिर इंसानी रूप में वापस आ जाते हैं। शक्लें ही नहीं, जिस्म बदलने में भी उन्हें महारत है। हालाँकि वे इंसान हैं लेकिन उनमें अलौकिक (सुपरनैचुरल) ताक़तें भी मौजूद हैं। एक दास्तान के अंदर से दूसरी दास्तान निकालने की 'टेलीस्कोपिक' (telescopic) तकनीक उनके लिए ख़ास है। यह मानो 'ख़बर' की अमरता का वीर-गीत (रज़ज़) है, जिन्हें कुछ हद तक मज़हबी रंग में पेश किया गया है।
शैली के एतबार से भी दास्तानों ने अपना ख़याली रंग बरक़रार रखा। एक ऐसी ख़्वाबों जैसी शैली उभरी जिसमें कल्पना का पूरा माहौल क़ायम रह सके और जिसके ज़रिए बयान करने के अंदाज़ को ज़्यादा से ज़्यादा दिलचस्प और कुछ हद तक वर्णनात्मक (नैरेटिव) बनाया जा सके। दास्तानें आम तौर पर मजमों (भीड़) में बयान की जाती थीं, छपकर पढ़े जाने का सिलसिला बाद का है। इसलिए मजमों के सामने बयान करने के लिए जिन पैंतरों की ज़रूरत होती थी, उनसे बराबर काम लिया जाता रहा। अलग-अलग तबक़ों की तहज़ीब, उनके मर्द और औरतों की ख़ास बातचीत, उनका रहन-सहन, उठना-बैठना, तफ़रीह और सामाजिक मेल-जोल के तौर-तरीक़े उन्हीं के लहज़े में बयान हुए और दास्तान-गो (दास्तान सुनाने वाले) ने सजावटी अंदाज़-ए-बयान को अपनाया। इसके अलावा यह बात भी ध्यान में रखने की है कि दास्तानों में बुनियादी कशमकश (संघर्ष) भी प्रत्यक्ष (दिखाई देने वाली) है, प्रत्यक्ष मक़सदों के लिए है और प्रत्यक्ष गुमराहियों के बीच है।
इस मंज़िल तक पहुँचते-पहुँचते हिंदुस्तान की तहज़ीबी बिसात उलट चुकी थी। सियासी तौर पर हिंदुस्तान अंग्रेज़ों का ग़ुलाम हो चुका था। अर्थव्यवस्था और समाज का रुख़ बदल चुका था। आर्थिक लूट का माल अब इंग्लैंड जा रहा था। नतीजे के तौर पर कारीगर तबाह हो चुके थे और उस साझे कल्चर (संस्कृति) की बुनियाद टूटने लगी थी जो अकबर के दौर से अलग-अलग शहरों, कारोबारी केंद्रों और क़स्बों के इर्द-गिर्द बनने लगा था। 1857 ई. की आख़िरी जंग के बाद मुक़ाबला करने की ताक़त ख़त्म हो गई और तहज़ीबी, आर्थिक, सियासी और वैचारिक सतह पर पश्चिम से समझौते की कोशिशें होने लगीं। इन्हीं कोशिशों से नॉवेल वजूद में आया जिसने समाज सुधार को मक़सद क़रार दिया और ऐसे नए तरीक़े की कहानियाँ बयान करना शुरू कर दीं, जिनमें न तो अलौकिक तत्त्व थे, न मीर अम्मन, न तोते, न जान-ए-आलम। नॉवेल का विषय व्यक्ति और नई आर्थिक स्थिति से पैदा होने वाले समाज के आपसी रिश्तों को तय करना ठहरा, और इसके लिए जिस बहुत बड़ी ज़हनी तब्दीली और समझौते की ज़रूरत थी, उसने नए नॉवेल को जन्म दिया। इसीलिए नज़ीर अहमद अपने नॉवेलों को किस्से कहते हैं क्योंकि उनके नज़दीक उनका सुधारवादी और नैतिक पहलू, घटनाओं की तरतीब और किरदारों की बुनावट के मुक़ाबले में कहीं ज़्यादा अहम था।
नॉवेलों ने सबसे पहले तो घटनाओं के ढाँचे को बदल दिया। न दास्तान जैसी 'कहानी के अंदर कहानी' की तकनीक क़ायम रही, न किस्सों की अलौकिकता और ख़याली माहौल। अलौकिक तत्त्व भी ख़ारिज कर दिए गए क्योंकि ज़िंदगी का वह नज़रिया बदल गया जो अलौकिक तत्त्वों से बेझिझक काम लेने का क़ायल था और उन्हें इंसानी ज़िंदगी का एक हिस्सा मानता था। जो अचानक होने वाली घटनाओं की उम्मीद रखता था। इत्तेफ़ाक़ (संयोग) का क़ायल था और कारणों व मक़सदों, तथा कार्य-कारण के रिश्तों को लाज़िमी (ज़रूरी) मानता था। नॉवेल का किस्सा मौलिक था। दूसरे साहित्यिक स्रोतों की मदद से रचा गया था, जिसकी रचना में फ़नकार की व्यक्तिगत शख़्सियत, अपने इर्द-गिर्द के समाज में बिखरे हुए किस्सों को महज़ इकट्ठा कर लेने पर ही बस करने को तैयार नहीं थी। वह इन घटनाओं को अपनी ज़ात का व्यक्तिगत रंग बख़्शना चाहता था और इन मौलिक किस्सों के ज़रिए पुराने किस्सों को नहीं, बल्कि अपने दौर की ज़िंदगी की समकालीन हक़ीक़तों को नए रुख़ से पेश करना चाहता था। यहाँ कहानी और उसकी तरतीब पर उसकी शख़्सियत की छाप थी।
लेकिन यह अकेली शख्सियत, यह नई वैयक्तिकता आख़िर क्या थी? इसकी पहचान, किरदारों और समस्याओं से आसानी से हो सकती है। अब दास्तानों के शहज़ादे और क़िस्सों के अमीरज़ादों की जगह एक मध्यम वर्ग के आम नौजवानों ने ले ली और उनकी ज़िंदगी की समस्याएँ नॉवेल का विषय बनने लगीं। इन विषयों में सिर्फ़ दृश्य संघर्ष और दिखाई देने वाली चीज़ों या मक़ासदों (उद्देश्यों) के लिए संघर्ष ही शामिल नहीं था, बल्कि पहली बार मूल्यों के टकराव की गूँज सुनाई देती थी। 'तौबत-उन-नसूह' में नसूह और कलीम किसी महबूबा को पाने के लिए नहीं टकराते। सरशार के 'फ़साना-ए-आज़ाद' में हालाँकि आज़ाद हुस्न आरा को ही पाने के लिए निकले थे, मगर पूरा नॉवेल खंड चार के जिस भाषण पर ख़त्म होता है, उसका विषय मूल्यों का बदलाव है। हुस्न आरा नहीं, जिसकी पृष्ठभूमि में लखनवी तहज़ीब एक ट्रेजेडी के हीरो की तरह उभरती है।
'उमराव जान अदा' में उमराव जान का सारा संकट (Crisis) मूल्यों का है। दोबारा सामाजिक स्वीकृति और सम्मान पाने का है और इस सूरत में हीरो सभी नेक, बहादुर हैं और ख़ूबियों का समूह तो हैं, लेकिन न तो ख़ूबसूरती में अद्वितीय हैं और न बेमिसाल हैं। (नसूह का हुलिया और उमराव जान की शक्ल-सूरत आम लोगों जैसी बयान की गई है और उनमें कोई ग़ैर-मामूली कशिश नहीं दिखाई गई है)। फिर विलेन की शख्सियत में कुछ ऐसे आकर्षक तत्व भी हैं जो उसे कभी-कभी हीरो से भी ज़्यादा आकर्षक बना देते हैं। नसूह जैसे नीरस, परहेज़गार और ग़ैर-दिलचस्प किरदार को, जो न शक्ल-सूरत के लिहाज़ से आकर्षक है और न बहादुरी में अद्वितीय है, हीरो बनाने की हिम्मत कोई क़िस्सागो या दास्तानगो नहीं कर सकता था।
उमराव जान अदा जैसी औरत को, जो बाज़ारी औरत है और जिसको समाज क़बूल करने से इनकार करता है, क़िस्से या दास्तान का मुख्य किरदार नहीं बनाया जा सकता था। इसी तरह कलीम जैसी कशिश रखने वाला, शेरो-शायरी में माहिर, दोस्ती में खुला-डुला और दिलचस्प किरदार क़िस्से और दास्तान में विलेन नहीं हो सकता था। यह बात भी ग़ौर करने लायक़ है कि इन नॉवेलों में अक्सर नॉवेल निगार (उपन्यासकार) की ख़्वाहिश के ख़िलाफ़ हीरो से ज़्यादा अहमियत या तो विलेन को या किसी सहायक किरदार को हासिल हो जाती है। नज़ीर अहमद को नसूह अज़ीज़ हैं, लेकिन नॉवेल पढ़ने वाले को कलीम का बाँकपन नसूह से ज़्यादा भाता है और ज़ाहिरदार बेग के सहायक किरदार की छाप उसके दिल पर दूसरों से कहीं गहरी होती है। इसी तरह सरशार का नॉवेल आज़ाद का फ़साना है, मगर ख़ोजी का किरदार केंद्रीय स्थान हासिल कर लेता है और आज़ाद के किरदार को कहीं पीछे छोड़ देता है। यही हाल शरर के शेख़ वजूदी का है, जो 'फ़िरदौस-ए-बरीं' के हीरो से कहीं ज़्यादा आकर्षक हो जाता है।
पहली बार नॉवेल के किरदारों में वैयक्तिकता और परतदारी उभरती नज़र आती है। ये किरदार न सिर्फ़ 'टाइप' हैं न सिर्फ़ 'अमल' (कर्म), इनके पीछे मूल्यों की एक व्यवस्था है और इनका आंतरिक जीवन संघर्ष से पूरी तरह ख़ाली नहीं है। ये सोचते हैं और बेक़रार होते हैं, तड़पते हैं और तड़पाते हैं और इनकी चिंता और बेचैनी का कारण सिर्फ़ इश्क़ या ईमान नहीं, बल्कि उन मूल्यों की खोज और तलाश है जो बदलते हुए हालात में काम आ सकें। यहाँ न तो संघर्ष की प्रकृति दृश्य और दिखाई देने वाली है, न विलेन और हीरो साफ़-साफ़, अलग-अलग और काले-सफ़ेद रंगों में पेश किए गए हैं। इनके अंदर न सिर्फ़ इंसानी किरदार की ऊँच-नीच, अच्छाई और बुराई के बहुत से पहलू एक साथ नज़र आते हैं, बल्कि इनकी शख्सियतों में नई परतदारी और पेचीदगी का भी पता चलता है। न संघर्ष का मक़सद दिखाई देने वाला है, यहाँ न महबूबा को पाना सामने है, न बिना दरवाज़े के क़िलों की फ़तह (जीत) लक्ष्य है। ग़रज़ कि बुनियादी टकराव का केंद्र बाहरी के बजाय आंतरिक होता जाता है और टकराने वाले तत्व दृश्य के बजाय अदृश्य और अमूर्त, या भौतिक के बजाय वैचारिक होते जाते हैं।
नॉवेल को औद्योगिक युग का महाकाव्य (रज़्मिया) कहा गया है। हिंदुस्तान में औद्योगिक युग के आने से पहले ही पश्चिम के प्रभाव से नॉवेल का विकास होने लगा था और मध्यम वर्ग के उभार के साथ-साथ मूल्यों के बदलाव और नए सामाजिक हालात से तालमेल और सामंजस्य की ख़्वाहिश ने नॉवेल की अवधारणा को जन्म दिया। यह मानो इस बात का ऐलान था कि ग्रामीण और शहरी जीवन की सरहदों पर बसने वाले कारीगर वर्ग के हाथ से सत्ता की बागडोर छिन चुकी है और सामूहिक ढाँचे से व्यक्ति के रिश्ते आहिस्ता-आहिस्ता ढीले पड़ने लगे हैं। वह भी इस वजह से कि सामूहिक जीवन के दर-ओ-बाम (घर-आँगन) में गूँजने वाले अफ़साने और प्रचलित क़िस्से अब उसे संतुष्टि नहीं देते, वह सिर्फ़ समाज का हिस्सा नहीं बल्कि उससे कटता जा रहा है और उसे अपने नए मिथक और नए तिलिस्म बनाने की ज़रूरत है जिनसे नए अफ़साने बुने जा सकें।
इस रास्ते से उर्दू अदब में नॉवेल के विभिन्न रूप दाख़िल हुए। इनमें ऐतिहासिक नॉवेल थे जो ऐतिहासिक घटनाओं और किरदारों से कच्चे माल का काम लेकर उन्हें नया रंग-रूप देते थे और उनमें अपनी शख्सियत ही का नहीं, अपने दौर की महरूमियों (वंचनाओं) और अधूरी ख़्वाहिशों, हार और आरज़ूओं के इज़हार का ज़रिया ढूँढते थे। अब्दुल हलीम शरर के कई नॉवेल, जो अपने दौर में लोकप्रियता की बुलंदी हासिल कर चुके हैं, इसी क़िस्म की काल्पनिक संतुष्टि और 'इमोशनल कंपनसेशन' (Emotional Compensation) का नतीजा हैं। फिर वे नॉवेल हैं जिन्हें तहज़ीबी 'पिकारेस्क' (Picaresque) क़रार दिया जा सकता है, जिनमें व्यक्ति किसी सभ्यता का सूचक बनकर सामने आता है और उसकी कहानी मानो तहज़ीब और तमद्दुन (सभ्यता) के व्यापक चित्रण का बहाना होती है। इसकी सबसे नुमाइंदा मिसाल 'फ़साना-ए-आज़ाद' है, जिसमें एक अज़ीम-ओ-शान (महान) तहज़ीब का अज़ीम-ओ-शान समापन लिखा गया है। फिर व्यक्ति और समाज के बीच तालमेल का वह टकराव और संतुलन की तलाश है जो नज़ीर अहमद के नॉवेलों का विषय बना। फिर 'उमराव जान अदा' है, जिसने व्यक्ति के अंतर्मन को ज़्यादा परतदारी और हमदर्दी से पेश करने की कोशिश की और उसकी ज़ात में बनती-बिगड़ती क़दरों (मूल्यों) की धूप-छाँव का अध्ययन किया।
इसके आगे बीसवीं सदी की सरहद है जिसने प्रेमचंद को जन्म दिया। जिनके नॉवेलों ने किसानों और मज़दूरों को अपने दामन में समेट लिया और नए हिंदुस्तान के नए वैचारिक और वर्गीय आयामों का चित्रण किया, व्यक्ति की एक नई अवधारणा बख़्शी जो सूरदास, होरी, धनिया से होता हुआ उनके अफ़सानों (कहानियों) के घीसू और माधव तक पहुँचता है। यहाँ व्यक्ति का आंतरिक संघर्ष भी ज़्यादा गहरा, पेचीदा और अर्थपूर्ण हो जाता है और समाज कई वर्गों में बँटकर ज़्यादा स्पष्ट सामाजिक और वर्गीय चेतना की अभिव्यक्ति का साधन बनने लगता है। अफ़साने (कहानी) में यथार्थवाद की यह परंपरा नॉवेल के ज़रिए ही पहुँची और प्रेमचंद का अफ़साना 'कफ़न' इसका बड़ा ही स्पष्ट और क्रांतिकारी निशान बन गया।
फिर बीसवीं सदी के उर्दू नॉवेल की पूरी परंपरा है, जिसका एक रिश्ता नियाज़ की 'शहाब की सरगुज़श्त' और क़ाज़ी अब्दुल ग़फ़्फ़ार के 'लैला के ख़ुतूत' की रूमानियत से जुड़ा हुआ है और दूसरा प्रगतिशील आंदोलन के उन नॉवेल निगारों से, जिनमें कृश्न चंदर, इस्मत चुग़ताई, राजिंदर सिंह बेदी और हमारे अपने दौर में क़ुर्रतुलऐन हैदर, अब्दुल्लाह हुसैन, ख़दीजा मस्तूर, मुमताज़ मुफ़्ती, शौकत सिद्दीक़ी से लेकर प्रगतिशील दायरे से बाहर के नॉवेल निगार हयातुल्लाह अंसारी तक शामिल हैं। इन्हीं के साथ-साथ अफ़साने का कारवाँ है जो विचार और कला की राहों पर अग्रसर हुआ और नॉवेलों के टकराव को छोटे कैनवस पर ज़्यादा प्रभावशीलता के साथ पेश करने में कामयाब हुआ।
इस दास्तान का दूसरा सिरा उस प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति से जा मिलता है जिसने टकराव की प्रकृति को ही बदल दिया है और उसे बाहरी के बजाय प्रतीकात्मक शक्ल में ढाल दिया, जिसे आधुनिक युग में विशेष लोकप्रियता हासिल हुई।
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