उमराव जान अदा
पच्चीस साल पहले की बात है कि मैंने एक साहित्यिक पत्रिका में मिर्ज़ा रुस्वा के नॉवेल उमराव जान अदा पर एक समीक्षा पढ़ी। उसे पढ़कर मुझे हैरानी हुई। यह नॉवेल एक तवायफ़ की जीवन कथा है। मुझे जिस बात पर हैरानी हुई, वह थी समीक्षक की बेपनाह तारीफ़। (और समीक्षक भी) एक ऐसा लेखक जो अपने कट्टरपन की वजह से बदनाम था। मैंने फ़ौरन यह किताब ख़रीद कर पढ़ी। तब मैं समझा कि इस लेखक का कट्टरपन क्यों दूर हो गया और सावधानी का दामन उसके हाथ से क्यों छूट गया। उमराव जान अदा का व्यक्तित्व ही ऐसा है जिसकी संगति और जिससे विचार-विमर्श करने से नज़रिया बिल्कुल बदल जाता है।
उसकी ज़िंदगी किसी भी लिहाज़ से उल्लेखनीय नहीं थी। उन्नीसवीं सदी के मध्य में हिंदुस्तानी रियासतों में हंगामों और पतन के ख़ास माहौल में किसी लड़की का अग़वा हो जाना और सूरत-शक्ल के हिसाब से बाज़ार में जो कुछ भी क़ीमत लगे, उस पर बेच दिया जाना कोई अनोखी बात नहीं थी। ऐसी लड़कियों को वे लोग ख़रीद लेते थे जिन्हें घरेलू नौकरानियों की ज़रूरत होती थी, या वे डेरेदार तवायफ़ें ख़रीदती थीं जो कोठे चलाती थीं या जिनके साथ नाचने-गाने वालियां रहती थीं।
उमराव जान अदा को ऐसी ही एक डेरेदार तवायफ़ ने ख़रीदा जो अपना कारोबार चलाना ख़ूब जानती थी। उसने उमराव जान को लिखना-पढ़ना सिखाया और गाने-बजाने की तालीम दिलाई। उमराव जान ने दूसरी लड़कियों के मुक़ाबले अपने मौक़ों का ज़्यादा फ़ायदा उठाया। उसने उर्दू, फ़ारसी और अरबी सीख ली। (उस ज़माने में) शायरी करना पढ़े-लिखे आदमी का ज़रूरी गुण समझा जाता था। उमराव जान अदा ने अपनी जन्मजात प्रतिभाओं का काफ़ी कामयाबी से विकास किया और जब वह अपने माहौल की वजह से अपनी नायिका (मालकिन) का पेशा अपनाने पर मजबूर हुई, तो उसने एक गाने वाली की हैसियत से अपनी ख़ूबियों और उससे भी ज़्यादा अपनी हाज़िरजवाबी और बातचीत के अंदाज़ की वजह से एक विशिष्ट स्थान हासिल कर लिया।
उसकी ज़िंदगी में शायद इतने हादसे नहीं हुए थे जितने उन अन्य लड़कियों की ज़िंदगी में, जिनकी परवरिश उसके साथ हुई थी। वह अपनी पसंद के लोगों से मिलती थी और उनसे भी जो उसे पसंद करते थे। उनमें से कुछ उसके ख़्वाब जगा देते थे। लेकिन उसकी ज़िंदगी का यह दर्द देखते ही देखते गुज़र गया। वह एक ऐसे व्यक्ति के साथ भाग निकली जो असल में डाकू था। एक ऐसे व्यक्ति ने उसको धोखा दिया जिसे वफ़ादार रहना चाहिए था, और एक ऐसे व्यक्ति ने उसको बचा लिया और सहारा दिया जो ख़ुद एक बदमाश था। कहीं-कहीं ऐसा मालूम होता है कि कहानी में जान डालने के लिए कोई सुखद घटना एकदम गढ़ ली गई है। लेकिन (सच्चाई यह है कि) उमराव जान एक ऐसी दुनिया में रहती थी जो सामाजिक और भौगोलिक लिहाज़ से वाक़ई बहुत सीमित थी। यह दुनिया थी तवायफ़ों और उनसे मिलने-जुलने वालों और उनके चाहने वालों की, अमीरों और उनके आश्रितों की, जांबाज़ों, चोरों और डाकुओं की, और शायरी और संगीत के दीवानों की।
ये सब के सब उस छोटी सी रियासत अवध में रहते थे जिसके बारे में यह मालूम था कि 1856 ई. में उसकी स्वाधीनता ख़त्म हो चुकी है। कहानी में कोई भी बात अस्वाभाविक या दूर की कौड़ी नहीं है। न उमराव जान की वह दूरदर्शिता जिससे काम लेकर उसने कुछ बचत की या ख़र्च किया, और न ही उसकी वह होशियारी जिसकी वजह से उसने उस वक़्त से पहले ही एकांतवास अपना लिया, जब लोगों की बेरुख़ी से यह ज़ाहिर होने लगे कि अब एकांतवास का वक़्त आ गया है।
नॉवेल में वह हमारे सामने उस वक़्त आती है जब वह एकांतवास में जा चुकी है। वह अपनी मर्ज़ी से उन नए शायरों की महफ़िल में शामिल होती है जो कभी-कभी उसके पास वाले मकान में जमा होते हैं। पहले उसकी शायरी और उसके बाद उसकी कहानी उसी की ज़बानी, दिलकश मगर बनावट से मुक्त, और बेलाग अंदाज़ में हमारे सामने पेश की जाती है। अपनी कहानी बयान करते वक़्त उमराव जान अलग-अलग बातों पर अपने विचार प्रकट करती है और अपने आप पर तथा दूसरों पर आलोचना भी करती जाती है।
उसकी आलोचनाएं हमेशा उचित और नपी-तुली होती हैं। लेकिन ज़िंदगी के बारे में उसके विचार बहुत आधुनिक या गहरे नहीं होते। हर जीवन-व्यवस्था धीरे-धीरे अपने आप एक ख़ास दर्शन को जन्म देती है, और बुद्धि व ज्ञान का पहला फल उनको मिलता है जो सबसे पक्के तौर पर सच्चाई का समर्थन करते हैं और इस दर्शन के पीछे जो सिद्धांत काम कर रहे होते हैं, उनके सत्य होने को स्पष्टता से बयान करने की योग्यता रखते हैं। इसी (ज्ञान और) अक़्लमंदी के अलावा उमराव जान को और कोई आरज़ू नहीं है। वह अपने ग़म को बढ़ा-चढ़ाकर बयान नहीं करती और न ही वह ज्ञान और चेतना, नैतिकता और शिष्टाचार, या पवित्रता का दावा करती है। वह तो हर वक़्त बिल्कुल वैसी ही रहती है जैसी कि वह असल में है। (वह अपने व्यक्तित्व पर पर्दे नहीं डालती) और हम उसके इस तरह बेनक़ाब रहने से ऐसे मंत्रमुग्ध रहते हैं कि हमारे दिल में किसी क़िस्म के संदेह या मतभेद पैदा नहीं होते।
हम तो उस वक़्त चौंकते हैं जब आख़िरी घटनाएं और आख़िरी शेर सही मौक़े पर पेश कर दिए जाते हैं, जब हमारे सामने एक ढलती उम्र की औरत रह जाती है, जिसने अपने बारे में सब कुछ बता दिया है और अब हमको एक चुनौती भरी मुस्कान के साथ देख रही है। क्या हम उसकी बात समझते हैं? क्या उसने यह ख़्वाहिश की है कि उसे समझा जाए? वह हमदर्दी की हक़दार है या माफ़ी की? या वह सिर्फ़ यह चाहती है कि उसके बहुत से जन्मजात गुणों और हर तरह की परिस्थिति से निपटने, तथा बिना किसी पछतावे और रंज-ओ-मलाल के ज़िंदगी गुज़ारने की क्षमता को स्वीकार किया जाए और उसकी क़द्र की जाए? उसने कितनी सच्चाई और साफ़गोई से काम लिया है। कितनी ही बार उसने हमें मौक़ा दिया है कि हम उसे बुरा-भला कहें, क्योंकि वह है ही ऐसी। उसकी तीव्र इच्छा है कि हम उस पर्दे को न उठाएं जो उसने स्पष्ट रूप से अपनी ज़िंदगी की सारी गंदगी पर डाल रखा है। उसकी यह ख़्वाहिश दिखावे और बनावट से इस क़दर मुक्त है कि यह ज़्यादती बल्कि बदतमीज़ी (और ओछापन) होगा अगर हम उस पर किसी क़िस्म का नैतिक फ़ैसला सुनाने की कोशिश करें। लेकिन ऐसी स्थिति में हमें महानता और गरिमा, स्वाभाविक पवित्रता और माहौल से उसकी तटस्थता के उस गहरे प्रभाव को समझना होगा जो वह हमारे दिल पर क़ायम करती है; एक ऐसी तटस्थता जिसने न सिर्फ़ ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव से निकलने में उसकी मदद की है, बल्कि जिसमें भरपूर आध्यात्मिक ख़ूबी भी शामिल है।
यह बिल्कुल स्पष्ट है कि उमराव जान कोई एंग्लो-सैक्सन हीरोइन नहीं है जिसे किसी जांबाज़ बांके सूरमा का इंतज़ार हो, और जो अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए इश्क़ और आशिक़ के सहारे की मोहताज हो। वह इस मंज़िल से कहीं आगे है। किसी भी क़िस्म की अधीनता स्वीकार कर लेना अब उसके लिए मुमकिन नहीं है। वह अच्छी तरह जानती है कि दो इंसान आध्यात्मिक कायापलट या आत्म-शुद्धि के किसी तरीक़े से एक नहीं बन सकते, और अगर ऐसा मुमकिन भी होता, तो भी वह इसे क़बूल न करती। वह तो सिर्फ़ एक आज़ाद और ख़ुदमुख़्तार हस्ती की हैसियत से ही ज़िंदा रह सकती है, लेकिन इसमें बहुत से ख़तरे होते हैं — निजी सुरक्षा, अपनी सामाजिक हैसियत बरक़रार रखना, बढ़ती हुई उम्र का परेशान करने वाला ख़याल, और अतृप्त इच्छाओं की चुभन की वजह से धिक्कार-धिक्कार कर कर्म के लिए उकसाने वाली अंतरात्मा। इन सबका मुक़ाबला कैसे होगा? क्या होगा उस ज़िंदगी के खालीपन का जो बिल्कुल तनहा और महज़ अपने लिए ही बसर की जाए?
ये आम अंदेशे हैं। अपने आप में शायद इनमें असलियत न हो, लेकिन ये लगातार एक से दूसरे तक पहुँचते रहते हैं और ऐसी बीमारी की शक्ल ले लेते हैं जिससे कोई नहीं बच सकता? सिर्फ़ बहुत सी बेहतरीन इंसानी ख़ूबियों की क़ुर्बानी देकर ही इनसे बचा जा सकता है। उमराव जान इसके लिए अच्छी तरह तैयार मालूम होती है। वह ऐसा कर सकती है क्योंकि वह ख़ासी महफ़ूज़ (सुरक्षित) है, एक तो अपनी ताक़त की वजह से और दूसरे अपने कल्चर (या तहज़ीब) की वजह से।
उसकी ताक़त का राज़ क्या है? मेरे ख़याल में इसकी वजह यह है कि जो कुछ यक़ीनी तौर पर होने वाला हो, उसे अक़्ल का तक़ाज़ा समझकर मान लिया जाए। यह वही बात नहीं है जिसे (भाग्य का लिखा या) तक़दीर-परस्ती (भाग्यवादिता) कहते हैं और जिसका पूरब के लोगों और ख़ासकर मुसलमानों पर अक्सर और बिना सोचे-समझे इल्ज़ाम लगा दिया जाता है। इसमें शक नहीं कि हममें बहुत से ऐसे लोग हैं जो तक़दीर का ज़िक्र करते रहते हैं, लेकिन एक सरसरी नज़र डालने से ही यह ज़ाहिर हो जाता है कि यह ज़िक्र और फ़िक्र महज़ एक आड़ है जहालत (अज्ञानता), काहिली (सुस्ती) या सही काम न करने से साफ़ इनकार की। जो यक़ीनी तौर पर होने वाला है, उसे उमराव जान ज़िंदगी के अपने सीमित अध्ययन की बुनियाद पर हँसी-ख़ुशी और ख़ूब सोच-समझकर मान लेती है और इन जानलेवा दलदलों में, जिनमें वह फँसी हुई है, लोग उसका बड़ा सहारा बन जाते हैं।
उसे (मोहब्बत और) रोमांस से कोई ताल्लुक़ नहीं। उसे इंसानी जज़्बात की उस ज़्यादती से भी कोई ताल्लुक़ नहीं जिस पर भरोसा न किया जा सके, और न उन गुमनाम वजहों से जो इंसानी तौर-तरीक़े तय करते हैं। मोहब्बत और शादी की वेदी पर अपने आप को क़ुर्बान कर देने के बजाय, वह बिना किसी क़ुसूर के ही हालात का शिकार होने को तरजीह (प्राथमिकता) देती है। वह ख़ुशी से जुर्म क़बूल कर लेना और सम्मोहित अदालत से अपनी मासूमियत (और बेगुनाही) का फ़ैसला सुन लेना बेहतर समझती है, बजाय इसके कि जोश में आकर अपने आप को कोसने लगे और ऐसी नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़, जो बहुत हद तक अपनी ही पैदा की हुई है, उन लोगों के संघर्ष की रहनुमाई (नेतृत्व) करने लगे जिनके बारे में वह जानती है कि वे ख़ुद अन्यायी हैं।
हक़ीक़त यह है कि वह इतनी मुहज़्ज़ब (सभ्य) है कि नैतिकता के बारे में जो कुछ आम तौर पर कहा जाता है, वह उसे ध्यान देने लायक़ नहीं समझती। जिन चीज़ों की उसकी नज़र में अहमियत है, वे हैं संगत और विचार-विमर्श। कई-कई दिन और रात वह बड़े शौक़ से ऐसी बौद्धिक बहस के लिए ख़यालात पकाती रहेगी जो बहुत मुमकिन है कि पाँच मिनट या उससे भी कम वक़्त में ख़त्म हो जाए। जिस चीज़ की उसको लोगों से तलब है, वह क़द्रदानी या मोहब्बत नहीं है। वह इन दोनों को शक की नज़र से देखती है और उन्हें इतना क़ीमती नहीं समझती जितना कि आम तौर पर उन्हें समझा जाता है। वह उन्हें प्रचलित सिक्के की तरह तब तक नहीं मान लेती जब तक कि उस पर यह साबित न हो जाए कि उनके पीछे वाक़ई ज़हानत (बुद्धिमानी), बारीक-बीनी और उसकी अपनी जैसी सभ्य अभिव्यक्ति की ताक़त भी मौजूद है।
वह किसी को अपने बराबर का नहीं पाती। न उसे इसकी तलाश है, लेकिन वह उन लोगों की आज़माइश के लिए तैयार रहती है जिन्हें आज़माइश की ख़्वाहिश होती है। आख़िरकार वह हमको यक़ीन दिला देती है कि वह जीत गई और कल्चर की बहुत सी परिभाषाओं में से कम से कम एक परिभाषा ज़रूर सही है, और वह है ख़ुद उसकी अपनी की हुई परिभाषा, यानी कल्चर का ताल्लुक़ दिमाग़ से है जो आज़ादाना (बिना किसी पूर्वाग्रह के) सारी दुनिया का जायज़ा लेता है। ऐसी दुनिया जिसमें पाक-दामनी (पवित्रता) गुनाह के प्रलोभन की क़ैद में है और प्रायश्चित, गुनाह के आँख और भौंह के इशारे का इंतज़ार कर रहा है!
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