तन्क़ीद क्या है?
पश्चिम के असर से उर्दू में कई सुखद इज़ाफ़े हुए, इनमें सबसे अहम तनक़ीद (आलोचना) की कला है। इसका यह मतलब नहीं कि पश्चिम के असर से पहले उर्दू साहित्य में कोई तनक़ीदी चेतना नहीं रखता था, या शेरो-अदब के बारे में बातचीत, शायरों पर टिप्पणी और भाषा व शैली की खूबियों पर चर्चा नहीं होती थी। महान रचनात्मक कारनामे बिना एक अच्छी तनक़ीदी चेतना के वजूद में नहीं आ सकते। रचनात्मक प्रतिभा बिना तनक़ीदी चेतना के गुमराह हो जाती है और तनक़ीदी चेतना बिना रचनात्मक क्षमता के बेजान रहती है।
उर्दू में वजही से लेकर हसरत मोहानी तक हर अच्छे शायर की एक स्पष्ट और परखी हुई तनक़ीदी चेतना भी है, फिर बयाज़ों (काव्य-संग्रहों), तज़्किरों (जीवनियों), तक़रीज़ों (समीक्षाओं), दीबाचों (प्रस्तावनाओं) और पत्रों का खज़ाना शुरू से मौजूद है। मुशायरों और साहित्यिक महफ़िलों में शायरों और शेरो-अदब पर टिप्पणियां बराबर होती रहती थीं। मीर, जुर्रत की 'चुमा-चाटी' (छिछोरेपन) से बेज़ार थे। ख़ान आरज़ू, सौदा के शेर को हदीस-ए-क़ुदसी कहते थे। आतिश, दबीर के मर्सियों को लंधूर बिन साद की दास्तान बताते थे, शेफ़्ता, नज़ीर के कलाम को बाज़ारी बताते थे और शैली में गंभीरता के इस क़दर क़ायल थे कि कैसे ही अर्थ हों, गंभीरता के बिना उसे बेकार समझते थे। ग़ालिब के नज़दीक शायरी अर्थ-सृजन (मानी-आफ़रीनी) थी, तुकबंदी (क़ाफ़िया-पैमाई) नहीं। वह शेर में चीज़े दिगर (एक अलग ही बात) के भी क़ायल थे और आतिश के यहां नासिख़ से तेज़ नश्तर पाते थे।
यह तनक़ीदी चेतना भी अच्छी परंपराओं की वाहक थी, इसमें कला की बारीकियों का एहसास था और इसके लिए रियाज़ (अभ्यास) करने का सम्मान। यह कुछ हद तक सीमित और पारंपरिक थी और अनुशासन की ज़रूरत से ज़्यादा क़ायल थी। यह हर उतार-चढ़ाव को बराबर करना चाहती थी और हर ज़ेहन को एक ही सांचे में ढालना चाहती थी। यह बात इशारों में करती थी, स्पष्टीकरण और विस्तार की क़ायल न थी। इसमें या तो तारीफ़ (मदह) होती थी या बुराई (क़दह), इसका पैमाना साहित्यिक कम था, कलात्मक ज़्यादा। इसमें कोई शक नहीं कि तनक़ीद सही मायनों में हाली से शुरू हुई। हाली से पहले शायर उस्तादों को मानते थे, आलोचकों (नक़्क़ादों) को नहीं। उनसे पहले किसी में उच्च स्तर की तनक़ीदी क्षमता अगर मिलती है तो वह शेफ़्ता हैं, जिनकी पसंद के बिना ग़ालिब भी ग़ज़ल को ग़ज़ल नहीं समझते थे, मगर वह भी परिचित और प्रमाणित सौंदर्य के क़ायल हैं, सौंदर्य की खोज नहीं कर सकते।
हाली ने शायरी, साहित्य, जीवन, नैतिकता, समाज, ग़ज़ल और नज़्म के बारे में सैद्धांतिक सवाल किए। उन्होंने शायरी का एक मानदंड तय करना चाहा और इस मानदंड से हमारे साहित्यिक खज़ाने का जायज़ा लेने की कोशिश की। इस मानदंड में वह पश्चिम से भी प्रभावित हुए। हालांकि उनका मानदंड पूरी तरह पश्चिमी न था। इसमें उन्होंने कला का भी लिहाज़ रखा मगर प्रकृति (फ़ितरत) को हाथ से जाने नहीं दिया। उन्होंने कुछ परंपराओं की नुक्ताचीनी की मगर साहित्य की परंपराओं को नज़रअंदाज़ नहीं किया। हाली का यह तरीक़ा उपयोगी साबित हुआ और तनक़ीद और उसके सिद्धांतों पर बातचीत शुरू हो गई। नतीजतन, उर्दू में इस तरह के लेख, पत्रिकाएं और किताबें बड़ी संख्या में हैं जिनमें तनक़ीद के सिद्धांतों पर बहस की गई है। या कुछ साहित्यकारों या साहित्यिक आंदोलनों पर तनक़ीद है या किसी साहित्यिक सिद्धांत की व्याख्या और विश्लेषण है।
पश्चिम में तनक़ीद ने कई करवटें बदली हैं और उनका असर भी हमारे यहां महसूस हो रहा है, फिर भी यह एक हक़ीक़त है कि तनक़ीद के अर्थ, उसकी भूमिका, उसकी ज़रूरत, उसकी बुनियादी शर्तों, उसके मैदान और विशेषताओं के बारे में आज भी बहुत सी ग़लतफ़हमियां आम हैं। इसलिए यह स्पष्ट करने की भी बड़ी ज़रूरत है कि तनक़ीद क्या है और साहित्य और जीवन में इसकी क्या अहमियत है?
कोलरिज ने एक जगह एक मर्द और एक औरत का ज़िक्र किया है जो किसी झरने (आबशार) का नज़ारा कर रहे थे। मर्द ने कहा, इसमें कैसा जलाल (भव्यता) है! औरत ने जवाब दिया, हां, बहुत ख़ूबसूरत है। यह न था कि बेचारी औरत सौंदर्य का एहसास न रखती हो, एहसास था पर परख (ज़ौक़) न थी, चेतना थी मगर प्रशिक्षित और परिष्कृत न थी, इसलिए वह सौंदर्य और सौंदर्य में फ़र्क़ न कर सकती थी और बहादुरी और प्रचंडता (क़ाहिरी) के फ़र्क़ को नहीं जानती थी या जानती थी तो बयान न कर सकती थी। यह बीमारी आम लोगों में ही नहीं, ख़ास लोगों में भी है, कितने ही बुज़ुर्ग, नज़ारे से नहीं, देखने की परख (ज़ौक़-ए-नज़र) से वास्ता रखते हैं। वे चीज़ों का सौंदर्य नहीं देखते, उन चीज़ों में एक ख़ास ख़याल का सौंदर्य देखते हैं।
अब भी कितने ही लोग प्रगतिशील साहित्य और नए साहित्य को एक ही समझते हैं। कितने ही सौंदर्य को एक ख़ास लिबास में देखते हैं और लिबास को सौंदर्य समझते हैं, कितने ही परंपरा के पुजारी हैं, कितने सिर्फ़ बग़ावत के अलंबरदार हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो फ़ानी और जिगर की तरह ग़ज़ल को असली शायरी समझते हैं और नज़्म को सिर्फ़ तुकबंदी, कुछ कलीमुद्दीन की तरह ग़ज़ल को अर्ध-बर्बर (नीम-वहशियाना) काव्य-विधा कहते हैं। कुछ कृश्न चंदर की तरह हैं जो राशिद की शायरी में पलायन और यौन उलझनें देखते हुए भी उसकी प्रगतिशीलता पर ज़ोर देते हैं, कुछ इंक़लाबी शायरी के मायने बग़ावत और ख़ून की होली के लेते हैं। कुछ अख़्तर रायपुरी की तरह अपने जोश में अकबर के कलाम को व्यंग्यात्मक तुकबंदी कह जाते हैं, कुछ साहित्य को प्रोपेगैंडा बनाना चाहते हैं, कुछ सिद्धांत बनाते हैं मगर उन पर अमल नहीं कर सकते और कुछ अलग-अलग तस्वीरें अच्छी बना लेते हैं मगर अनेकता में एकता (कसरत से वहदत) नहीं देख सकते।
इस अतिवाद (इफ़रात-ओ-तफ़रीत) की वजह यह है कि हमारे साहित्य को दरअसल साहित्य कम रहने दिया गया है, या इसे सूफ़ीवाद और दर्शन बनाया गया है या प्रोपेगैंडा। ज़ाहिर-परस्तों (बाहरी रूप देखने वालों) ने इक़बाल की ज़बान में इसके अंदरून (भीतर) को नहीं देखा, इसे महज़ कला समझा। इसके ख़ून-ए-जिगर की रंगीनी को नज़रअंदाज़ किया, दूसरों ने प्रतिक्रिया के तौर पर कला की बारीकियों को नज़रअंदाज़ करना चाहा और इस तरह अपनी बात का वज़न खो बैठे। उर्दू में तनक़ीदें अच्छी-अच्छी लिखी गईं मगर सही तनक़ीद, जिसका रास्ता बाल से ज़्यादा बारीक है, इसी वजह से ज़्यादा तरक़्क़ी न कर सकी। अलग-अलग टोलियों ने इसे अपने मक़सदों के लिए इस्तेमाल किया, इसके लिए रियाज़ कम किया।
हाली के बाद उर्दू में कोई ऐसा आलोचक नहीं है जो टी. एस. इलियट के शब्दों में आफ़ाक़ी ज़ेहन (Universal Intelligence) रखता हो, आफ़ाक़ी ज़ेहन से मुराद अंतरराष्ट्रीय नहीं है। कितने ही आलोचक अपनी असली भूमिका को भुलाकर दंगल में बहादुरी की दाद देने लगे, कितने ही दर्शन बघारने के शौक़ में रुसवा हुए, कितने ही तानाशाही पर उतर आए, कितने ही एक स्कूल, एक दौर, एक परंपरा के प्रवक्ता होकर रह गए। नज़रिए अच्छे-अच्छे पेश किए गए मगर ऐसे कम जो तीन सौ साल पहले की शायरी, आज की और तीन सौ साल बाद की शायरी, तीनों के अध्ययन में मदद दे सकें, चाहे वे अंतिम सत्य (हर्फ़-ए-आख़िर) न साबित हों।
अफ़सोस है कि उर्दू में कोई अरस्तू पैदा न हुआ। हाली की प्राच्यता (मशरिक़ियत) और उनकी शराफ़त कभी-कभी समकालीनों पर राय ज़ाहिर करने में उन्हें ज़रूरत से ज़्यादा नरम बना देती है। बक़ौल बर्नार्ड शॉ, साहित्यकार को पहले साहित्य का ख़याल करना चाहिए, बाद में शराफ़त और मुरव्वत का। 'मुक़द्दमा' और 'मक़ालात' के हाली में यही फ़र्क़ है।
उर्दू में तनक़ीद (आलोचना) की कमी की सबसे बड़ी वजह यह है कि तनक़ीद को आम तौर पर दूसरे दर्जे की चीज़ समझा गया है। अलीगढ़ में मेरे एक मेहरबान हैं जो कोई तनक़ीद पढ़ते हैं तो कहते हैं, यह बात क्या हुई? कुछ ऐसे अशआर लिखे, कुछ उनका ख़ुलासा बयान किया, कुछ शुरुआती शब्द या हाशियों (टिप्पणियों) को बढ़ाया और तनक़ीद तैयार हो गई। इसमें कोई शक नहीं कि अदबी पत्रिकाओं में ऐसी तनक़ीदें बहुत मिलती हैं मगर तनक़ीद महज़ इसका नाम नहीं। शिबली ने 'मुवाज़ना अनीस-ओ-दबीर' में लंबे-लंबे इक़्तेबासात (उद्धरण) इसलिए दिए थे कि मर्सियों की ख़ूबी का अंदाज़ा दो-एक बंदों से नहीं हो सकता। इक़बाल के बहुत से नक़्क़ादों (आलोचकों) ने इक़बाल के अशआर ज़्यादा लिखे, अपने ख़यालात कम बयान किए।
इंतख़ाब (चयन) तनक़ीद तो नहीं है मगर इंतख़ाब से तनक़ीदी शऊर (चेतना) ज़्यादा होता है। इंतख़ाब में अपनी पसंद से ज़्यादा शायर की नुमाइंदगी ज़रूरी है। शायरी की नुमाइंदगी आसान काम भी नहीं है मगर जो लोग इक़्तेबासात की अधिकता से बदगुमान (शंकित) हो जाते हैं उन्हें यह सोचना चाहिए कि तनक़ीद हवाई नहीं हो सकती। इक़्तेबासात तनक़ीद को सच्चाई के क़रीब रखते हैं। जो लोग इक़्तेबासात को देखते हैं, उस तलाश और जुस्तजू को नज़रअंदाज़ कर देते हैं जो इक़्तेबासात में लगती है और लगनी चाहिए, वे अदब का कोई अच्छा तसव्वुर (संकल्पना) नहीं रखते और उनकी ज़ेहनी सलाहियत (मानसिक क्षमता) के मुताल्लिक़ कोई अच्छी राय क़ायम नहीं की जा सकती।
अब भी कुछ लोग यह मानते हैं कि तख़्लीक़ी अदब (रचनात्मक साहित्य) सीधे तौर पर ज़िंदगी के शऊर को ज़ाहिर करता है और तनक़ीदी अदब चूंकि उस तख़्लीक़ की तर्जुमानी (व्याख्या), तहलील या तज्ज़िए (विश्लेषण) का फ़र्ज़ अंजाम देता है, इसलिए उसकी बराबरी नहीं कर सकता। कुछ लोगों का ख़याल यह है कि चूंकि नक़्क़ाद ख़ुद शायर कम होते हैं और अगर होते हैं तो अच्छे शायर नहीं होते इसलिए उनकी राय पर ज़्यादा भरोसा नहीं किया जा सकता। आख़िर ये 'कबूतरान-ए-बाम-ए-हरम' (आज़ाद परिंदे) 'मुर्ग़ान-ए-रिश्ता-बर-पा' (क़ैदी परिंदों) के मुताल्लिक़ क्या जान सकते हैं, और क्या बता सकते हैं, इन दोनों तसव्वुरात पर ग़ौर करना हमारा फ़र्ज़ है।
इक़बाल की शायरी पर यूसुफ़ हुसैन ने 'रूह-ए-इक़बाल' लिखी, जिसमें उनके कलाम की तर्जुमानी की कोशिश की, किसी ने 'रूह-ए-इक़बाल' पर तनक़ीद लिखी, जिसमें यूसुफ़ साहब के नज़रिए से इख़्तेलाफ़ (विरोध) किया, किसी ने इख़्तेलाफ़ से इख़्तेलाफ़ किया। नतीजा यह होता है कि ताबीरों (व्याख्याओं) की अधिकता से कभी-कभी ख़्वाब-ए-परेशां (बिखरा हुआ सपना) हो जाता है। टैगोर पर भी एक दफ़ा यही वाक़्या गुज़रा था, उन्होंने अपने हल्क़े में एक नई नज़्म सुनाई, एक साहब ने कहा इसका यह मतलब है, दूसरे ने कहा, यह नहीं है यह है। इस पर दोनों में बहस होने लगी और टैगोर बीच से ग़ायब हो गए। हमारी पुरानी शिक्षा प्रणाली में शरहों (व्याख्याओं), हाशियों और तफ़्सीरों को समझने का जो दस्तूर था उसकी वजह से मामूली चीज़ें असल से ज़्यादा अहमियत इख़्तियार कर लेती थीं और नज़र महदूद हो जाती थी। ज़ाती, शख़्सी और दाख़िली (आंतरिक) तनक़ीदों से इस क़िस्म की संभावना ज़रूर है।
कभी-कभार यह भी होता ہے कि नक़्क़ाद की ग़ैर-मामूली शख़्सियत, उसके शानदार उसूल और दिलचस्प फ़िक़रे पढ़ने वाले को मरऊब (प्रभावित) कर लेते हैं। वह नक़्क़ाद की ऐनक से हर चीज़ को देखने का आदी हो जाता है (हालांकि आम पढ़ने वालों के लिए ऐसे ज़ेहनी साथी बेहतर हैं बजाय इसके कि वे अदबी मिज़ाज का शिकार हों) मगर अच्छी तनक़ीद तख़्लीक़ी अदब की तरफ़ माइल (आकर्षित) करती है, वह ख़ुद तख़्लीक़ी होती है, वह पढ़ने वाले के ज़ेहन पर मोहर नहीं लगाती, उसके ज़ेहन की तर्बियत (प्रशिक्षण) करती है। तख़्लीक़ी अदब पर कोई तनक़ीद तख़्लीक़ी अदब से बेनियाज़ (मुक्त) नहीं कर सकती, दोनों के दरमियान कोई ख़लीज (खाई) नहीं है। तख़्लीक़ी अदब में तनक़ीदी शऊर की कारफ़रमाई (दख़ल) होती है, तनक़ीद उसको वाज़ेह (स्पष्ट) कर देती है। तनक़ीद ख़ुलासा या तनक़ीज़ (खंडन) नहीं मगर उसका तख़्लीक़ के बुनियादी ख़याल तक पहुंचना ज़रूरी है, यह तख़्लीक़ पर आम ज़बान में अमल-ए-जर्राही (चीर-फाड़) भी करती है मगर यह अमल शायराना तौर पर होता है और उसी फ़िज़ा के अंदर रूनुमा (प्रकट) होता है।
तनक़ीद की तरफ़ से बदगुमानी आम तौर पर उन लोगों को होती है जो अदब को बहुत गहरी नज़र से देखने के आदी नहीं हैं, जो उसमें तफ़रीह (मनोरंजन) या इक़बाल के अल्फ़ाज़ में कोकनार की लज़्ज़त (अफ़ीम का मज़ा) ढूंढते हैं। अगर वे सतही फ़र्क़ को नज़रअंदाज़ कर दें और ग़ौर करें तो उन्हें मालूम हो जाए कि तख़्लीक़ी अदब की ज़िंदगी के लिए कितना ज़रूरी है कि वह तनक़ीद से मदद ले। कभी-कभी बदगुमानी इस वजह से भी होती है कि तब्सिरों (समीक्षाओं), दीबाचों (प्रस्तावनाओं), मुक़द्दमों (भूमिकाओं) और तआरुफ़ों (परिचयों) में आम तौर पर जो तनक़ीद मिलती है उसमें तनक़ीद के अलग-अलग रंग हैं। दरअसल इनमें से हर एक का मैदान अलग है।
दीबाचा या तआरुफ़, किताब या लेखक का तआरुफ़ कराता है, उसकी अहमियत को वाज़ेह करता है, उसकी क़द्र-ओ-क़ीमत (मूल्य) तय भी करता है और क़ौल-ए-फ़ैसल (अंतिम फ़ैसला) भी पेश कर देता है। तब्सिरा या रिव्यू कुछ अहम ख़ुसूसियात (विशेषताओं) की तरफ़ इशारा करता है। मगर आम तौर पर मुक़द्दमों में बालिग़-नज़री (परिपक्व दृष्टि) से ज़्यादा शराफ़त का सुबूत दिया जाता है। इनमें से यक़ीनन कुछ गुमराहकुन (भ्रामक) होते हैं, महदूद तनक़ीद तो ख़ैर महदूद क़िस्म की होती है ज़्यादा नुक़सानदेह नहीं होती। लेकिन वह तनक़ीद जिसमें दावा जामियत (व्यापकता) का किया जाए मगर हो महदूद और मख़्सूस, वह गुमराहकुन और फ़रेब है। मुझे इस बात का एतेराफ़ (स्वीकार) है कि दाख़िली तनक़ीद में इस क़िस्म का फ़ैसला नागज़ीर (ज़रूरी) है और यह फ़रेब पूरब और पश्चिम में बहुत आम है, इसलिए मैं दाख़िली तनक़ीद को नाक़िस (दोषपूर्ण) तनक़ीद कहता हूं, वह तहसीन (Appreciation) के दर्जे में आती है उसकी अलग क़द्र-ओ-क़ीमत है मगर उसे बड़ी तनक़ीद का दर्जा नहीं मिल सकता। बड़ी तनक़ीद तख़्लीक़ी अदब से किसी तरह कमतर नहीं होती बल्कि वह तख़्लीक़ हो जाती है।
रहा यह सवाल कि जो नक़्क़ाद शायर नहीं होते वे शायरी के मुताल्लिक़ क्या बता सकते हैं या ख़ुद नॉवेलिस्ट नहीं वे नॉवेल के मुताल्लिक़ क्या राय क़ायम कर सकते हैं। तो यह सवाल एक ग़लतफ़हमी पर आधारित है। मौलवी अब्दुल हक़ के मुताल्लिक़ दुनिया जानती है कि वे शायर नहीं लेकिन यह बात उनके एक अच्छे नक़्क़ाद होने में ख़लल-अंदाज़ (बाधक) नहीं है। जिगर एक अच्छे शायर हैं मगर वे एक अच्छे नक़्क़ाद नहीं कहे जा सकते, शायरी के लिए एक शीरीं दीवानगी (मीठी दीवानगी) और तनक़ीद के लिए एक मुक़द्दस संजीदगी (पवित्र गंभीरता) की ज़रूरत होती है। आर्नल्ड ने इसको (High Seriousness) कहा है। कभी-कभी ये दोनों चीज़ें एक ही शख़्स के यहां मिल जाती हैं। हर अच्छा शायर एक फ़न्नी शऊर (कलात्मक चेतना) भी रखता है मगर यह फ़न्नी शऊर उसे अदब की दूसरी अस्नाफ़ (विधाओं) की क़द्र तय करने में चंदां (ख़ास) मदद नहीं देता बल्कि एक रुकावट ही साबित होता है। एक शोबे (क्षेत्र) की ताक़त दूसरे की कमज़ोरी हो ही जाया करती है। ग़ज़ल के शायर अक्सर नज़्म की तामीरी सलाहियतों (रचनात्मक क्षमताओं) का अंदाज़ा नहीं कर पाते, इशारों के दिलदादा तफ़्सील और सराहत और वज़ाहत (स्पष्टता और व्याख्या) के हुस्न को नहीं देख पाते, जिस गहराई और सुपुर्दगी (समर्पण) की तख़्लीक़ में ज़रूरत होती है, तनक़ीद में उससे उभरना भी होता है।
हर कलाकार के व्यक्तित्व के दो हिस्से होते हैं। एक हिस्सा तजुर्बा हासिल करता है, दुख भोगता है और तकलीफ़ उठाता है या राहत और ख़ुशी हासिल करता है, दूसरा इस दुख-सुख को ज़रा ऊंचाई से देखता है और उसकी क़ीमत तय करता है। इसलिए फ़नकार अगर कभी-कभी अपने दुख-सुख को ज़रा ऊंचाई से देख पाए तो यह बात समझ में आती है, मगर इससे नक़्क़ाद (आलोचक) की अहमियत और महानता कम नहीं होती बल्कि साबित हो जाती है। मीर ने 'निक़ात-उश-शोअरा' में अपना जो चुनाव किया है, उससे मीर हसन का चुनाव अच्छा है। जनवरी 1941 के 'निगार' (पत्रिका) में शायरों ने अपना जो चुनाव किया था, वह यक़ीनन हर जगह कलाम (रचना) का बेहतरीन चुनाव नहीं था। इसलिए यह बात स्पष्ट है कि नक़्क़ाद, शायर न होते हुए भी या उस स्तर का शायर न होते हुए भी, एक अच्छा नक़्क़ाद हो सकता है। हां, इसके लिए सुख़न-फ़हम (शायरी की समझ रखने वाला) होना ज़रूरी है, इसके लिए उस रूह तक पहुंचना ज़रूरी है जो शायरी की है। उसके अंदर उस व्यापक हमदर्दी की, उस लचकदार ज़ेहन (मस्तिष्क) की, उस सर्वव्यापी स्वभाव की मौजूदगी ज़रूरी है जो शायरी के माहौल में शायर के साथ, बल्कि कभी उससे भी आगे उड़ान भर सके। फ़नकार तजुर्बों को जन्म देता है, और सुख़न-फ़हम नक़्क़ाद फ़नकारों को सही मायनों में फ़नकार बनाता है।
टी. एस. इलियट ने ग़लत नहीं कहा है कि जब कोई रचनात्मक ज़ेहन दूसरे से बेहतर होता है, तो अक्सर उसकी वजह यह होती है कि जो बेहतर होता है, वह तनक़ीदी (आलोचनात्मक) क्षमता ज़्यादा रखता है। हडसन ने तो और साफ़ कहा है कि सच्ची तनक़ीद भी चूंकि अपनी सामग्री और जज़्बा ज़िंदगी से लेती है, इसलिए अपने रंग में वह भी रचनात्मक है। इसलिए तनक़ीदी अदब (आलोचनात्मक साहित्य) से इस वजह से भड़कना कि उसमें किताबों की महक होती है, सही नहीं है। अच्छी तनक़ीद किसी भी तरह अच्छी रचना से कम नहीं, बल्कि कुछ कारणों से उस पर श्रेष्ठता रखती है।
कुल मिलाकर, तनक़ीद को दूसरे दर्जे की चीज़ समझना एक बहुत बड़ी ग़लती है। अच्छी तनक़ीद सिर्फ़ जानकारी ही मुहैया नहीं कराती, बल्कि वह सब काम करती है जो एक इतिहासकार, मनोवैज्ञानिक, एक शायर और एक पैग़ंबर करता है। तनक़ीद ज़ेहन में रोशनी करती है और यह रोशनी इतनी ज़रूरी है कि कभी-कभी इसकी ग़ैर-मौजूदगी में रचनात्मक गुण के अंदर किसी चीज़ की कमी महसूस होती है। उन्नीसवीं सदी के शुरू का ज़माना इंग्लैंड में किस क़दर असाधारण रचनात्मक पैदावार का ज़माना था, मगर आर्नल्ड के नज़दीक यह शायरी इतनी रचनात्मकता के बावजूद, ज़ेहन नहीं रखती थी, जानती नहीं थी। इसके बड़े-बड़े शायर विचारहीन थे या अस्पष्ट, या उनमें विविधता और रंगारंगी की कमी थी। यह बात हमारी शायरी पर भी एक बड़ी हद तक लागू होती है। हमारा पुराना अदब (साहित्य) विचार कम रखता है, इसमें विविधता की भी कमी है, मगर फ़न (कला) की एक ख़ास समझ की वजह से यह अस्पष्ट नहीं है।
हमारा आधुनिक अदब इसके मुक़ाबले में विचार भी रखता है और वज़न भी और विविधता भी, मगर इसमें अस्पष्टता ज़्यादा है। पहले चाशनी या चटखारे पर ज़ोर था, अब सनसनी फैलाने या चौंकाने पर ध्यान है। इसकी वजह यह है कि अव्वल तो ज़ेहन ज़्यादा नुमायां (प्रकट) नहीं है, जज़्बा ज़्यादा नुमायां है। दूसरे, ज़ेहन में रोशनी कम है, धुंधलका या उलझन ज़्यादा है (इस उलझन के कारण और हैं, तनक़ीद की वजह से यह उलझन नहीं है)। ज़ेहन और जज़्बे के फ़र्क़ पर मनोवैज्ञानिक मुस्कुराएंगे, मगर मैंने इनको यहां लाक्षणिक (प्रतीकात्मक) अर्थ में इस्तेमाल किया है। मुमकिन है कुछ लोग होरेस (Horace) की तरह सिर्फ़ जज़्बे ही को शायरी समझते हों, मगर मैं विचार और जज़्बे के तालमेल को ज़रूरी मानता हूं। अदब में ज्ञान और विद्वता की कमी, इस ज्ञान में तहज़ीब और तरबियत (प्रशिक्षण) की कमी है। यहां सिर्फ़ किताबों के ज्ञान से नहीं, बल्कि ज़िंदगी और सृष्टि के ज्ञान से तात्पर्य है। यह तनक़ीदी चेतना की तरफ़ ध्यान न देने और ज़ौक़ (रुचि) के सुधार व परिष्कार से बेपरवाह रहने की ही देन है।
हर इंसान में सौंदर्य से प्रभावित होने और सौंदर्य-सृजन का असर क़ुबूल करने की थोड़ी-बहुत क्षमता होती है, मगर हर शख़्स का ज़ौक़ (रुचि) परिष्कृत, पुख़्ता और रचा-बसा नहीं होता। कुछ लोगों का मानसिक विकास उनकी उम्र के साथ नहीं होता, कुछ को ज़माने के ग़म इस विकास का मौक़ा नहीं देते, कुछ अदब में सस्ता नशा ढूंढते हैं और उसी पर संतुष्ट हो जाते हैं। ठीक उसी तरह जैसे कितने ही लोग आराम-तलबी की ज़िंदगी बसर करते हैं और दर्द-ओ-दाग़-ओ-सोज़-ओ-साज़ और आरज़ू-ओ-जुस्तुजू (पीड़ा, कसक, तड़प और इच्छा व खोज) इक़बाल के इबलीस (शैतान) के लिए छोड़ देते हैं। 'बीसवीं सदी', 'मस्त क़लंदर', 'कहकशां' और इस क़िस्म की दूसरी पत्रिकाओं की लोकप्रियता का यही राज़ है।
मगर यहां मेरा संबोधन उन लोगों से नहीं है जो अदब में बे-अदबी की तलाश करते हैं, बल्कि उनसे है जो अदब के ज़रिए ज़माने के दुखों को आसान ही नहीं बनाते, बल्कि उन दुखों से संघर्ष करने का हौसला पैदा करते हैं और इंसानियत और ज़िंदगी की संभावनाओं को बुलंद करते हैं। ये लोग अच्छे अदब से आनंदित होते हैं। किसी अदबी शख्सीयत से सामना होने पर, किसी अदबी कारनामे या किसी अदबी विजय से परिचित होने पर, उन्हें ख़ुशी हासिल होती है। लेकिन उनकी इस ख़ुशी में प्रशंसा और तारीफ़ का रंग हावी होता है। किसी दूसरे अदबी कारनामे से सामना होने पर यह प्रशंसा दूसरा रंग इख़्तियार कर लेती है, इस प्रशंसा में संतुलन नहीं होता, यह गुमराह भी हो सकती है। इसलिए हर नई खोज को उसकी मुनासिब जगह देना, हर नए सच को ज़िंदगी की बड़ी सच्चाई के सांचे में ढालना, और झूठ को पहचानना—ख़ासकर जब वह सच का चोला पहन कर सामने आए—और भी ज़रूरी हो जाता है। इस प्रकार, तनक़ीद अदीबों (साहित्यकारों), अदब से ख़ुशी और भलाई हासिल करने वालों, और ख़ुद अदब के लिए एक मार्गदर्शक मशाल है।
तनक़ीद की भूमिका को स्पष्ट करने के बाद अब यह देखना ज़रूरी ہے कि तनक़ीद का काम क्या है? यहां भी पूरब और पश्चिम के साहित्य में विभिन्न नज़रिए, सैकड़ों कथन और हज़ारों अलग-अलग रुझान दिखाई देते हैं। तनक़ीद का काम फ़ैसला करना है, तनक़ीद दूध का दूध और पानी का पानी अलग कर देती है। तनक़ीद स्पष्टीकरण है, स्पष्टता है, तर्जुमानी (व्याख्या) है, तफ़्सीर (टीका) है, तशरीह (विवेचना) है, और तहलील व तज्ज़िया (विश्लेषण) है। तनक़ीद सिर्फ़ क़ीमत ही तय नहीं करती, बल्कि अदब और ज़िंदगी को एक पैमाना देती है। तनक़ीद इंसाफ़ करती है; यह अदना और आला (निम्न और उच्च), झूठ और सच, तथा पस्त और बुलंद के मानदंड क़ायम करती है। तनक़ीद हर दौर की शाश्वतता और शाश्वतता की समकालीनता की तरफ़ इशारा करती है। तनक़ीद अदब में ईजाद (सृजन) करने और महफ़ूज़ रखने, दोनों का काम अंजाम देती है। वह बुत-शिकनी (रूढ़ियां तोड़ना) भी करती है और बुत-गरी (नए प्रतिमान गढ़ना) भी। तनक़ीद के बिना अदब एक ऐसा जंगल है जिसमें पैदावार की अधिकता तो है, लेकिन संतुलन और सलीके का कोई पता नहीं। यह और इस क़िस्म की बहुत सी बातें कही जा सकती हैं, और इनमें سے कोई भी बात ग़लत नहीं है।
अगर अच्छे नक़्क़ादों (आलोचकों) की फ़ेहरिस्त पर नज़र डाली जाए, तो मालूम होगा कि कुछ नक़्क़ाद फ़ैसले की तरफ़ झुके रहे हैं, और कुछ विश्लेषण (तज्ज़िए) पर ज़ोर देते रहे हैं। कुछ तर्जुमानी (व्याख्या) का हक़ अदा करते रहे हैं और निष्पक्षता की कोशिश करते हैं, मगर अदब में निरंतर निष्पक्षता मुश्किल ही नहीं, क़रीब-क़रीब नामुमकिन है। तनक़ीद सिर्फ़ तस्वीर के दोनों रुख़ दिखाने का नाम नहीं है, न इसमें आदमी समझौते या सुलह की कोशिश करता है, और न ही महज़ ऐबश नीज़ बगो (उसके दोष भी बताओ) कहकर अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त होता है। बल्कि दोनों पहलुओं पर नज़र रखने के बाद, किसी की अहमियत को स्वीकार करना ज़रूरी होता है।
शाब्दिक आलोचना भी आलोचना की एक मामूली किस्म है, शब्दों के अंदर कला की जो समझ और कला में जीवन और सृष्टि का जो एहसास है, वह ज़्यादा ज़रूरी है। 'फ़ाइलातुन फ़ाइलात' की रट लगाना हालाँकि आलोचना नहीं है, मगर इससे यह नहीं समझना चाहिए कि कोई भी अच्छा आलोचक अरूज़ (छंद-शास्त्र) और उसके नियमों से बेपरवाह हो सकता है। साहित्य का अच्छा आलोचक भाषा की नब्ज़ पहचानने वाला भी होता है, वह न सिर्फ़ अरूज़, रोज़मर्रा और मुहावरे से वाक़िफ़ होता है बल्कि यह भी जानता है कि कभी-कभी इनकी अनदेखी (चूक) के बावजूद अच्छी और महान शायरी मुमकिन है। अफ़साना-निगारी (कहानी लेखन) में अब भी कुछ लोग 'इंशा-ए-लतीफ़' (काव्यात्मक गद्य) की तलाश करते हैं और बेदी की असाधारण कलात्मक ऊँचाई को इसीलिए नकार देते हैं, यह सही नहीं है। शायरी में भी रूमी से लेकर इक़बाल तक, सबने 'महज़ शायरी' को अपने ऊपर एक इल्ज़ाम माना है; 'महज़ शायरी' से यहाँ शायद केवल कला के प्रदर्शन से मतलब है।
भाषा के इस ज्ञान के बाद शैलियों (असालीब) का ज्ञान भी ज़रूरी है और हर शैली में सच्चाई, निजता (इनफ़िरादियत), अभिव्यक्ति और अभिव्यक्ति के सौंदर्य का एहसास भी। भाषा और अभिव्यक्ति के सौंदर्य से चमक-दमक तो आ सकती है, लेकिन रूह नहीं आ सकती। पहली चीज़ सामग्री की सत्यता या घटनाओं की सच्चाई है। अगर आलोचक यह ज्ञान नहीं रखता या उसका ज्ञान अधूरा है, तो उसकी बुनियादें कमज़ोर हैं। यही वजह है कि आधुनिक आलोचनाओं में ज़्यादातर ग़लतियाँ अज्ञानता या ग़लतफ़हमी की वजह से मिलती हैं। आलोचक केवल घटनाएँ तो बयान नहीं करता, इसलिए वह दस्तावेज़ीकरण (मिसल-बंदी) के लिए मजबूर नहीं है और आलोचना हरगिज़ दस्तावेज़ीकरण या घटनाओं का लेखा-जोखा (खतौनी) नहीं है। मगर घटनाओं के सही बयान और सही एहसास के बिना, यानी सही ऐतिहासिक बोध के बिना, उसका हर क़दम उसे तुर्किस्तान (भटकाव) की तरफ़ ले जाएगा।
आलोचक के लिए ज़रूरी है कि अतीत के किसी कारनामे का विश्लेषण करते वक़्त वह ख़ुद अतीत में पहुँच जाए, अतीत से मुँह मोड़ कर बैठना किसी भी हाल में सही नहीं है। आधुनिक आलोचना में पहली कमज़ोरी यह है कि वह कुछ घटनाओं को नज़रअंदाज़ या विकृत (मस्ख़) कर देती है और अपने ख़िलाफ़ बातें सुनना गवारा नहीं करती। दूसरी कमज़ोरी यह है कि वह अतीत का सही एहसास नहीं रखती। हालाँकि हमारे साहित्य में अतीत-पूजा बहुत ज़्यादा रही है और बरसों तक शायरों और साहित्यकारों के सामने आविष्कार के बजाय आलोचना, रचनात्मकता (उपज) के बजाय रस्मी और पारंपरिक शैली, और साहित्य के बजाय कला ज़्यादा अहम रही है, मगर इसके मायने यह नहीं होने चाहिए कि हम चिढ़ की ज़िद में अतीत के कारनामों से बिल्कुल बेपरवाही बरतें। प्रगतिशील आलोचना शुरू में प्रचार ज़्यादा थी और आलोचना कम, इसलिए कि अतीत की क़द्र करना उसने उस वक़्त तक नहीं सीखा था। मगर अब जो आलोचनाएँ लिखी जा रही हैं, उनमें ऐतिहासिक बोध, विकास का लिहाज़ और अतीत का सही एहसास मिलता है।
अच्छी आलोचना महज़ क्लासिकल या रूमानी के फेर में नहीं रह सकती। वह इस तरह तंग ख़ानों में नहीं बँट सकती। कितने ही आलोचक अब भी शायरों और साहित्यकारों का विश्लेषण इस तरह करते हैं कि वे इन बातों में अपने पूर्ववर्तियों (पेशरौओं) से अलग हैं। यह ठीक है मगर नाकाफ़ी है। यह भी देखना चाहिए कि वे किस हद तक उस पूँजी के अमीन (रक्षक), उस परंपरा के आईनादार और उस मिज़ाज के प्रतीक हैं, जो सभ्यता और संस्कृति ने दिया है। वे किस हद तक नए हैं और किस हद तक पुराने हैं, और यही नहीं, उनके नएपन में किस हद तक पुरानापन है। यानी उनकी क़द्र-ओ-क़ीमत का अंदाज़ा महज़ उनके नएपन और अनोखेपन से नहीं, उनकी साहित्यिकता (अदबियत) से भी करना चाहिए। और साहित्यिकता से यहाँ मुराद उस साहित्यिक पैमाने से है जो इस अरसे में बन चुका है। इक़बाल की मिसाल से यह बात साफ़ हो जाएगी।
इक़बाल की नज़्म 'शम्अ-ओ-शायर' में या 'बाल-ए-जिब्रील' की ग़ज़लों में हमें नए ख़यालात मिलते हैं, मगर ये नए ख़यालात उस शेरियत (काव्यात्मकता) के साथ मिलते हैं जो जानी-पहचानी है और तयशुदा साँचों के मुताबिक़ है। यानी इक़बाल आधुनिक हैं, मगर उनकी नवीनता (जिद्दत) उन्हें प्राचीन शेरियत से बेपरवाह नहीं करती। जिस 'बादा-ओ-साग़र' (शराब और प्याले) के परदे में ईश्वरीय दर्शन (मुशाहिदा-ए-हक़) बयान होता था, उसी को वे जीवन के दर्शन (मुशाहिदा-ए-हयात) के लिए इस्तेमाल करते हैं। इक़बाल अपनी नवीनता के बावजूद महज़ बाग़ी नहीं हैं, न ही हाली महज़ बाग़ी हैं। दोनों एक नई परंपरा ज़रूर क़ायम करते हैं, मगर यह परंपरा ज़बरदस्ती से ज़्यादा इख़्तियार (स्वतंत्रता) और त्याग से ज़्यादा विस्तार और बढ़ोतरी की है। हाली और इक़बाल, बिजनौरी और अज़मतुल्लाह ख़ाँ से इसलिए बुलंद हैं कि वे अपने दौर में आज़ाद होने के बावजूद अतीत से इतने बेगाने नहीं हैं, न इतने चरमपंथी (इंतिहा-पसंद) हैं, और न ही इस क़दर (Exclusive) हैं।
कलीमुद्दीन बहुत से आलोचकों से ज़्यादा नई बातें, सोची-समझी बातें और विचारोत्तेजक (ख़याल-आफ़रीं) बातें करते हैं। मगर उनकी आलोचना और बुलंद होती, अगर वे अपनी प्राचीन पूँजी से इस क़दर बेज़ार (ऊबे हुए) न होते, और उनके यहाँ इतिहास और साहित्य की निरंतरता का बोध और ज़्यादा नुमायाँ (उजागर) होता, और उनकी आलोचना गुलिस्ताँ में काँटों की तलाश न बन जाती।
मगर अतीत का एहसास और चीज़ है और अतीत का पाबंद होना और चीज़। अगर आलोचक महज़ परंपराओं का एहतराम (सम्मान) करता है, महज़ लकीर का फ़क़ीर है, महज़ बीसवीं सदी के ज़ेहन को सत्रहवीं सदी की तरफ़ ले जाना चाहता है, तो वह अपने मक़ाम से गिर जाएगा। अतीत का एहसास और अतीत के धुँधलके में एक साहित्यिक निरंतरता का जलवा भी उसे प्रयोग (तजुर्बे), अनोखेपन, नएपन और रचनात्मकता (उपज) से बेपरवाह नहीं कर सकता। आज़ाद शायरी (मुक्त छंद) की ज़रूरत क्या है, नज़्म काफ़ी है; इसका जवाब यह है कि ख़ुद नज़्म की क्या ज़रूरत है। ग़ज़ल में क्या बुराई है? आख़िर कमरे की सजावट के लिए जब कोई एक तरीक़ा नहीं है, जब सौंदर्य दायरों में भी ज़ाहिर हो सकता है और सीधी लकीरों में भी, जब चित्रकार काग़ज़ पर अपने ज़ेहन का अक्स सैकड़ों तरीक़ों से उतार सकता है, तो शब्दों की तरतीब और लयबद्धता का एक ही साँचा क्यों हो? क्यों हर ख़याल के लिए ज़रूरी हो कि वह क़ाफ़िए की तंग गली से गुज़रने के लिए अपने आप को सिकोड़ सके? क्यों एक ख़याल तक पहुँचने के लिए कई मिसरों को पार करना पड़े?
हाली ने भी यह तस्लीम किया है कि शायरी के लिए क़ाफ़िया और रदीफ़ ज़रूरी नहीं, सिर्फ़ वज़्न (छंद/लय) ज़रूरी है। इसलिए हर प्रयोग पर यह एतराज़ कि वह क्यों किया गया, सही नहीं है। प्रयोग यह ज़ाहिर करता है कि जाने-पहचाने साँचों से लोग संतुष्ट नहीं हैं। प्रयोग सौंदर्य को सीमित नहीं रहने देता, प्रयोग नए सौंदर्य को उजागर करके ज़ेहन को व्यापक बनाता है। हर साहित्य में प्रयोग ज़रूरी हैं, मगर प्रयोगों के लिए यह ज़रूरी नहीं कि वे सिर्फ़ नए फ़ॉर्म (रूप) में ज़ाहिर हों; उन्हें नए विषयों, नई संकल्पनाओं और नए शीर्षकों में भी ज़ाहिर होना चाहिए। हर अच्छे आलोचक के लिए पुरानेपन की तरह इस नएपन का एहतराम (सम्मान) भी ज़रूरी है, उसके जानने की ख़्वाहिश को भी मुर्दा नहीं होना चाहिए।
'मुदावा' में नई शायरी पर जो आलोचना की गई थी, उसमें सबसे ज़्यादा आपत्तिजनक बात नएपन से इस क़दर बेज़ारी (चिढ़) थी, और जानी-पहचानी राहों से इस क़दर अंधी मुहब्बत और उसका सतहीपन था। आलोचक और पुजारी दो अलग मख़्लूक़ (प्राणी) हैं। आलोचक पुजारी नहीं होता, न ही वह मोहतसिब (निरीक्षक) या कोतवाल होता है। इस दौर की नज़्मों या अफ़सानों (कहानियों) पर यह एतराज़ कि इनमें तल्ख़ी (कड़वाहट) क्यों है, इनमें मुस्कुराहट या आशावादिता क्यों नहीं, इनके लिखने वाले जिंसी भूख (यौन कुंठा) के शिकार क्यों हैं, ये रोते क्यों हैं, हँसते क्यों नहीं, इनमें कल्बियत (निराशावाद/Cynicism) क्यों आ गई है—यह ज़ाहिर करता है कि एतराज़ करने वाले इस दौर की विशिष्ट समस्याओं को समझने की कोशिश नहीं करते। इस दौर की एक ख़ासियत मैं ज़रा तफ़्सील से बयान करना चाहता हूँ।
पहले जंग इस तरह से होती थी कि पेशेवर सिपाही लड़ते थे या उनके सरदार आपस में ज़ोर-आज़माई करते थे, सरदार की हार पर या फ़ौज की हार-जीत पर लड़ाई तय हो जाती थी। सब लोगों का काम लड़ना न था, न सबका हुस्न का आनंद लेना, कुछ लोग चांदनी, हरियाली, हुस्न और औरत से लुत्फ़ उठाने के लिए पैदा होते थे, कुछ हल जोतने, क़र्ज़ अदा करने और भेड़-बकरी की तरह ज़िंदगी बसर करने के लिए। अब सुलह और जंग के पैमाने बदल गए, लड़ाई सबकी होती है, सुलह भी सबके लिए। चर्चिल इंग्लैंड का बचाने वाला था, मगर सुलह होते ही अवाम ने उसे दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंका। जंग ने दिखा दिया है कि हर ख़्वाब का सच होना मुमकिन है और हर झोंपड़ा महल बन सकता है। इसने ख़्वाबों को और रंगीन और नाकामियों को और कड़वा बना दिया है, इसने निर्माण और विनाश दोनों के पैमाने बदल दिए हैं, दिल की हसरतों के दाग़ की गिनती ज़्यादा हो गई है, इसका असर अदब (साहित्य) पर पड़ना स्वाभाविक है और कोई आलोचक इससे अछूता नहीं रह सकता।
पुरानी आलोचना हर शायर को अलग-अलग देखती थी। यह निराशावाद का इमाम है, यह आशावाद का पैग़ंबर, यह सूफ़ी है, यह दुनियादार; इसमें ज़ाती हालात और व्यक्तिगत अनुभवों का ज़िक्र होता था। व्यक्तित्व का एहसास भी मौजूद था मगर माहौल किस हद तक रचनात्मक कार्यों को प्रभावित करता है, व्यक्तित्व में कैसे छुप-छुप कर ज़ाहिर होता है, कैसे-कैसे अजीब-ओ-ग़रीब रास्तों से कला में राह पाता है, इसकी उसे ख़बर न थी। आधुनिक आलोचना ने वस्तुनिष्ठता, यथार्थवाद, सामाजिक चेतना, और सांस्कृतिक आलोचना जैसी शब्दावलियों को आम किया है, इसने बारीकियों के चित्रण से लेकर समग्र भावनाओं तक मार्गदर्शन किया है, इसने जज़्बात की परछाइयों को विचार की रोशनी दी है, अदब को इस रोशनी की ज़रूरत थी।
हाली की शायरी को ग़दर और सर सैयद के आंदोलन से अलग करके देखिए तो बे-रूह नज़र आएगी और उसकी महानता का राज़ समझ में न आ सकेगा, चकबस्त और इक़बाल और मौजूदा प्रगतिशील शायरों में और प्रेमचंद और उनके अनुयायियों में जो फ़र्क़ है वह माहौल के एहसास के बग़ैर समझ में न आ सकता। आलोचना का काम इसकी वजह से और भी मुश्किल हो जाता है। इसे कलाकार के व्यक्तित्व को समझना, उसके अपने अनुभवों का विश्लेषण करना है, फिर उसके तत्वों को माहौल की रोशनी में देखना है तब जाकर सही साहित्यिक दृष्टि हासिल हो सकती है। उसी वक़्त फ़ानी का निराशावाद, और आधुनिक शायरों की मायूसी, उदासी, कड़वाहट, बेज़ारी बल्कि मौत की आरज़ू समझ में आ सकती है।
आलोचक अपने दौर को समझता हुआ और दूसरे दौरों से वाक़िफ़ हो तो भी उसके लिए एक ख़तरा बाक़ी रह जाता है। वह आसानी से दर्शन, राजनीति या मनोविज्ञान की गोद में पहुँच सकता है। आर्नल्ड ने जब अदब के लिए सीमाएँ तय करना चाहीं तो उनको आम करने के लिए अपने दौर के भटके हुए लोगों के ख़िलाफ़ भी संघर्ष करना पड़ा। वह संघर्ष कामयाब हुआ या नहीं मगर आर्नल्ड के लिखने से अदब की कमी ज़ाहिर हो गई। यह ख़तरा सिर्फ़ नैतिकता के शिक्षक को ही नहीं राजनीति के पैरोकारों को भी है।
आलोचना को राजनीति की ग़ुलामी नहीं करनी चाहिए, राजनीति का साथ देना चाहिए, उसकी मित्रता करनी चाहिए, इसी तरह आलोचना मनोविज्ञान के दलदल में भी गिरफ़्तार नहीं हो सकती। मनोविज्ञान का ज्ञान हमारे लिए बड़ा फ़ायदेमंद है मगर वह बड़ा भ्रामक भी है, वह उस आईने की तरह है जो बड़ी चीज़ों को छोटा और छोटी चीज़ों को बड़ा कर देता है, चेहरों को चपटा और लंबूतरा बना देता है, वह राई को पहाड़ करके दिखाता है, वह एक गांठ खोलता है मगर सैकड़ों डाल देता है। मनोवैज्ञानिक आलोचना हल्दी की गांठ लेकर पंसारी बन बैठी है, यह साइंस होने का दावा करती है और साइंस के कुछ हथकंडे भी उधार लेती है मगर अभी साइंस नहीं बन सकी। इसीलिए मैं मनोवैज्ञानिक चेतना की अहमियत को मानते हुए मौजूदा मनोवैज्ञानिक आलोचना को भ्रामक समझता हूँ, अभी तक मनोविज्ञान के पैमाने समंदर को कूज़े (घड़े) में भरने की कोशिशें हैं।
संक्षेप में, आलोचक केवल दार्शनिक या प्रचारक या मनोवैज्ञानिक नहीं होता, वह पारखी होता है। वह रिचर्ड्स के शब्दों में, ज़ेहन के साथ वही काम करता है जो डॉक्टर जिस्म के साथ। वह मूल्यों का रचनाकार, उन्हें बरतने वाला और फैलाने वाला है। मूल्यों के रचनाकार की हैसियत से वह मूल्यों को बरते जाने के तमाशे को ज़रा ऊंचाई से भी देख सकता है और बरतने वाले की हैसियत से वह महज़ फैलाने वाले (या प्रचारक) से ऊँचा स्थान रखता है। इस वजह से उसका प्रचार दूसरे के प्रचार से बेहतर होता है। इसमें ज़्यादा स्थायित्व होता है।
यह स्पष्ट करने के बाद कि आलोचना में परंपरा और विद्रोह, अतीत और वर्तमान, परिवेश और वैयक्तिकता, कला और दर्शन में संतुलन क़ायम करना होता है, इतना और कहना ज़रूरी है कि कुछ आलोचकों ने इस संतुलन को क़ुर्बान करके भी अहमियत हासिल की है। शेफ़्ता अपने दौर के बड़े अच्छे आलोचक थे, वह क्लासिकल अनुशासन और व्यवस्था के क़ायल थे और अदब को एक शरीफ़ कला समझते थे, अवाम से उन्हें सरोकार न था, नज़ीर को नज़रअंदाज़ करके उन्होंने अपना नुक़सान किया मगर उनकी अहमियत को स्वीकार करना भी ज़रूरी है। वह हाली से पहले के आलोचकों में सबसे अच्छी आलोचनात्मक चेतना रखते थे और उनका 'गुलशन-ए-बे-ख़ार' अपने ज़माने का बेहतरीन कारनामा है। अज़मतुल्लाह ख़ाँ ने नएपन के जोश में यहाँ तक कह दिया कि ग़ज़ल की गर्दन बे-तकल्लुफ़ मार देनी चाहिए। इस वजह से उनका दर्जा ज़्यादा बुलंद न हो सका। मगर नए रास्ते पर चलने वालों में भी उनका बड़ा दर्जा है लेकिन उनसे बड़ा दर्जा उन लोगों का है जिन्होंने अपना मानसिक संतुलन क़ायम रखा। जिनका एक क़दम यहाँ है और एक वहाँ, जो अपने ज़माने के भी हैं और हर ज़माने के भी, यानी जो व्यापक और सार्वभौमिक ज़ेहन रखते हैं।
अब सिर्फ़ सवाल यह रह जाता है कि क्या आलोचना के लिए कोई एक व्यापक पारिभाषिक शब्द गढ़ा जा सकता है या नहीं, मेरे ख़याल में इसके लिए 'परख' का लफ़्ज़ सबसे ज़्यादा उपयुक्त है। इसमें परिचय, व्याख्या और फ़ैसला, सब आ जाते हैं। परख के लफ़्ज़ के साथ हमारे ज़ेहन में एक मानदंड या कसौटी आती है। आलोचक के ज़ेहन में एक ऐसा मानदंड ज़रूरी है। परखने और तोलने के लिए व्याख्या और विश्लेषण ज़रूरी है, समीक्षक या पारखी अपना फ़ैसला मनवाने के पीछे नहीं रहता और तमाम आलोचक इस बात से सहमत हैं कि आलोचक को भी तानाशाह नहीं होना चाहिए। एलियट कहता है कि अहम मामलों में आलोचक को ज़बरदस्ती नहीं करनी चाहिए और न उसे अच्छे या बुरे का फ़ैसला (झट से) सुनाना चाहिए, उसे सिर्फ़ स्पष्टीकरण करना चाहिए और पढ़ने वाला ख़ुद ही एक सही नतीजे पर पहुँच जाएगा।
आलोचक जब किसी का परिचय कराता है तो उसका परिचय किसी मुनादी करने वाले की पुकार नहीं होता। एक यात्री की खोज होता है। आलोचक भी अपनी दुनिया का कोलंबस है, वह पढ़ने वालों को उसी फ़िज़ा में ले जाता है जिसकी ख़ूबसूरती उसने खोजी है। हर आलोचना एक ज़हनी सफ़र की शुरुआत है, परिचय को ऐलान नहीं होना चाहिए और न तर्जुमानी (व्याख्या) को फ़लसफ़ा। आलोचक को तर्जुमानी के फ़र्ज़ को अच्छी तरह निभाने के लिए तटस्थता (objectivity) सीखनी चाहिए। तटस्थता को कुछ लोग अख़लाक़ (नैतिकता) की बुनियाद कहते हैं। अगर आलोचक लेखक को यह मौक़ा देता है कि वह उसकी आवाज़ से बोले और उसकी क़लम से लिखे, उसे थोड़ी देर के लिए अपने अंदर समा जाने दे और इस तरह उसके साथ इंसाफ़ करे तो वह अच्छा आलोचक है। साइंस हमें एक बड़ी हद तक यह तटस्थता सिखाती है। इसलिए आलोचक को वैज्ञानिक उसूलों से मदद लेनी चाहिए। इस तर्जुमानी के लिए कई बार अपने ख़िलाफ़ भी बोलना पड़ता है। इसमें होना चाहिए को थोड़ी देर के लिए है की ख़ातिर ताक पर भी रखना पड़ता है, इस मरहले (चरण) से गुज़रने के बाद आलोचक को हक़ हासिल है कि वह चाहिए पर भी ज़ोर दे।
मिसाल के तौर पर इस्मत चुग़ताई के बहुत से अफ़सानों में यौन रुझान ही नहीं, यौन भटकाव भी है, उनके अफ़साने पतरस के शब्दों में जिस्म की पुकार हैं और उनका ख़ाका 'दोज़ख़ी', अपनी बेमिसाल हक़ीक़त-निगारी (यथार्थवाद) के बावजूद कुछ बीमार (Morbid) सा है, मगर इसके बावजूद इस्मत की हक़ीक़त-निगारी, रचनात्मकता, चरित्र-चित्रण, फ़न्नी पुख़्तगी (कलात्मक परिपक्वता), ज़बान पर पकड़, अपने माहौल से वाक़िफ़ियत और अदबियत (साहित्यिकता) में कोई शक नहीं। उनकी इतनी ख़ूबियों को तस्लीम करने के बाद उन पर एतराज़ करने का हक़ पहुँचता है। आलोचक नैतिकता का शिक्षक भी होता है मगर महज़ नैतिकता का शिक्षक नहीं होता, वह जज भी होता है मगर महज़ जज नहीं, वह समीक्षक या पारखी होता है। आलोचना में भी जोश और जज़्बे की ज़रूरत है मगर बुरी आलोचना महज़ जोशीली या जज़्बाती होती है, अच्छी आलोचना में जज़्बे को एक नाज़ुक, पुख़्ता और सभ्य एहसास का निखार मिल जाता है, इसीलिए अच्छी आलोचना महज़ विध्वंसक नहीं होती, महज़ ख़ामियों या कोताहियों को नहीं देखती, वह बुलंदियों को देखती है और यह अंदाज़ा लगाती है कि यह बुलंदी कैसी है।
हाली के अल्फ़ाज़ में वह हैरतअंगेज़ जलवों का पता लगाती है, वह पस्ती (गिरावट) का एहसास रखती है मगर पस्त नहीं होती, वह मीर के अशआर में अम्रद-परस्ती (लड़कों के प्रति आकर्षण) की तरफ़ इशारे देखकर मीर के मिज़ाज और अवचेतन की उधेड़बुन में खो नहीं जाती, शायर की बुलंदियों पर भी नज़र रखती है। अच्छा आलोचक पढ़ने वाले को शायर से शायरी की तरफ़ ले जाता है। मामूली आलोचक शायर में उलझ कर रह जाता है। उर्दू में भी अब तक ख़ास-ओ-आम दूसरों की राय के पाबंद होते हैं, वे हर फ़ैसले को आँख बंद करके क़बूल कर लेते हैं, इसमें हीरो-परस्ती के अलावा ज़हनी काहिली (मानसिक आलस्य) भी शामिल है, इसीलिए तस्वीर के दोनों रुख़ देखने की तकलीफ़ गवारा नहीं करते, एक रुख़, एक फ़ैसला, एक फ़ार्मूला उन्हें मुतमइन कर देता है, वे हर चीज़ को परखने की तकलीफ़ गवारा नहीं करते। पारखी बनने के लिए बड़े अनुशासन, बड़े रियाज़ और कुशाग्र बुद्धि की ज़रूरत है, जभी तो उर्दू आलोचना में प्रचारक और मुनादी करने वाले बहुत हैं, पारखी और समीक्षक कम।
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