शा‘इरी की हक़ीक़त और माहियत
('शायरी की हक़ीक़त और माहियत' अल्लामा शिबली की किताब शेर-उल-अजम की चौथी जिल्द का शुरुआती मज़मून है।)
शायरी की हक़ीक़त
शायरी चूँकि आंतरिक एहसास की चीज़ है, इसलिए इसकी मुकम्मल और सटीक तारीफ़ चंद अल्फ़ाज़ में नहीं की जा सकती। इस बिना पर अलग-अलग तरीक़ों से इसकी हक़ीक़त को समझाना ज़्यादा मुफ़ीद होगा ताकि इन सबके मिलाप से शायरी का एक सही नक़्शा सामने आ जाए।
ख़ुदा ने इंसान को अलग-अलग अंग और अलग-अलग ताक़तें दी हैं, और इनमें से हर एक के फ़र्ज़ और ताल्लुक़ अलग हैं। इनमें दो ताक़तें, तमाम कामों और इरादों का स्रोत हैं: समझ और एहसास। समझ का काम चीज़ों को जानना और तर्क और निष्कर्ष से काम लेना है। हर क़िस्म की ईजादें, खोज, खुलासे और तमाम इल्म और फ़न इसी के नतीजे हैं।
एहसास का काम किसी चीज़ को समझना, या किसी मसले का हल करना, या किसी बात पर ग़ौर करना और सोचना नहीं है। इसका काम सिर्फ़ यह है कि जब कोई असरदार वाक़िया पेश आता है तो वह प्रभावित हो जाता है, ग़म की हालत में सदमा होता है, ख़ुशी में आनंद होता है, हैरतअंगेज़ बात पर ताज्जुब होता है। यही ताक़त जिसको एहसास, भावुकता, या फ़ीलिंग कह सकते हैं, शायरी का दूसरा नाम है। यानी यही एहसास जब अल्फ़ाज़ का जामा पहन लेता है, तो शेर बन जाता है।
जानवरों पर जब कोई जज़्बा हावी होता है तो अलग-अलग क़िस्म की आवाज़ों या हरकतों के ज़रिए से ज़ाहिर होता है। मसलन शेर दहाड़ता है, मोर चिंघाड़ते हैं, कोयल कूकती है, मयूर नाचता है, साँप लहराते हैं। इंसान के जज़्बात भी हरकतों के ज़रिए से अदा होते हैं, लेकिन उसको जानवरों से बढ़कर एक और ताक़त दी गई है। यानी बोलने और अभिव्यक्ति की ताक़त। इसलिए जब उस पर कोई मज़बूत जज़्बा हावी होता है तो बेसाख़्ता उसकी ज़बान से लयबद्ध अल्फ़ाज़ निकलते हैं। इसी का नाम शेर है।
(अब तार्किक अंदाज़ में शेर की तारीफ़ करना चाहें तो यूँ कह सकते हैं कि जो जज़्बात, अल्फ़ाज़ के ज़रिए से अदा हों वह शेर हैं।) और चूँकि ये अल्फ़ाज़, सुनने वालों के जज़्बात पर भी असर करते हैं, यानी सुनने वालों पर भी वही असर हावी होता है, जो जज़्बा महसूस करने वाले के दिल पर हावी हुआ है। इसलिए शेर की तारीफ़ यूँ भी कर सकते हैं कि जो कलाम इंसानी जज़्बात को उभारे, और उनको हरकत में लाए, वह शेर है।)
एक यूरोपियन लेखक लिखता है कि हर चीज़ जो दिल पर अचरज, या हैरत या जोश या और किसी क़िस्म का असर पैदा करती है शेर है, इस बिना पर नीला आसमान, चमकता तारा, सुबह की हवा, शाम की लाली, फूल की मुस्कुराहट, हवा की चाल, बुलबुल की फ़रियाद, जंगल की वीरानी, बाग़ की हरियाली, ग़रज़ तमाम दुनिया शेर है, यह आजकल का ख़याल है। लेकिन अजीब बात है कि हज़रत ख़्वाजा फ़रीदुद्दीन अत्तार ने आज से छह सौ बरस पहले कहा था...
पस जहान शायर बुवद चूँ दीगराँ
जो चीज़ें दिल पर असर करती हैं, बहुत सी हैं। मसलन संगीत, चित्रकारी, दस्तकारी वग़ैरह लेकिन शायरी के असर की हद सबसे ज़्यादा व्यापक है। संगीत सिर्फ़ सुनने की ताक़त को मज़ा दे सकता है। सुनने की ताक़त न हो तो वह कुछ काम नहीं कर सकता, तस्वीर से प्रभावित होने के लिए आँखों की रोशनी शर्त है, लेकिन शायरी तमाम इंद्रियों पर असर डाल सकती है, देखने, चखने, सूँघने और छूने की इंद्रियाँ, सब इससे लुत्फ़ उठा सकती हैं। फ़र्ज़ करो, शराब आँखों के सामने नहीं है इसलिए आँख इस वक़्त इससे मज़ा नहीं उठा सकती लेकिन जब एक शायर इसको 'तरल आग' (आतिश-ए-सैयाल) कहता है तो इन अल्फ़ाज़ से एक असरदार मंज़र आँखों के सामने आ जाता है, इसी तरह जब बोसे (चुंबन) को शायराना अंदाज़ में 'तंग शकर' कह देते हैं तो तालू और ज़बान को मज़ा महसूस होता है।
किसी चीज़ की हक़ीक़त और असलियत तय करने का आसान इल्मी तरीक़ा यह है कि पहले उसकी कोई ख़ास ख़ूबी ले ली जाए फिर यह देखा जाए कि इस ख़ूबी में और क्या-क्या चीज़ें इसके साथ शरीक हैं। फिर इन ख़ूबियों को एक-एक करके तय किया जाए जिनकी वजह से यह चीज़ अपनी और अपने जैसी चीज़ों से अलग और विशिष्ट होती गई है।
इतना सब मानते हैं कि शेर की ख़ास ख़ूबी इंसानी जज़्बात को उभारना है यानी इसको सुनकर दिल में रंज, या ख़ुशी, या जोश का असर पैदा होता है। यह ख़ासियत, शायरी को साइंस और इल्म-ओ-फ़न से अलग कर देती है, शायरी का संवाद जज़्बात से है और साइंस का तथ्यों से, साइंस, तर्क से काम लेता है और शायरी भावनाओं को जगाने वाले तत्वों का इस्तेमाल करती है, साइंस अक़्ल के सामने कोई इल्मी मसला पेश करता है, लेकिन शायरी एहसासात को दिलकश नज़ारे दिखाती है, लेकिन यह ख़ासियत, संगीत, तस्वीर बल्कि क़ुदरत के नज़ारों में भी पाई जाती है, इसलिए कलाम या अल्फ़ाज़ की शर्त लगानी चाहिए ताकि ये चीज़ें भी इस दायरे से निकल जाएँ।
फिर भी लेक्चर, तारीख़, अफ़साना और ड्रामा, शायरी की हद में दाख़िल रहेंगे। इनमें और शेर में फ़र्क़ की लकीर क़ायम करना मुश्किल है, ज़्यादा दिक़्क़त इसलिए होती है कि अक्सर आला नज़्में अफ़साने की शक्ल में होती हैं, और अक्सर अफ़सानों में शायरी की रूह पाई जाती है, इसलिए दोनों जब आपस में मिल जाती हैं, तो इनमें फ़र्क़ करना मुश्किल हो जाता है, लेकिन हक़ीक़त यह है कि अफ़साना उसी हद तक अफ़साना है, जहाँ तक उसमें बाहरी वाक़ियात और ज़िंदगी की तस्वीर होती है। जहाँ से अंदरूनी जज़्बात और एहसासात शुरू होते हैं, वहाँ शायरी की हद आ जाती है। (अफ़साना निगार, बाहरी चीज़ों का गहराई के साथ मुताला करता है, इसके विपरीत शायर, अंदरूनी जज़्बात और एहसास की रंगीनियों का माहिर बल्कि तजुर्बेकार होता है।)
तारीख़ और शेर का फ़र्क़
तारीख़ और शेर का फ़र्क़ एक मिसाल के ज़रिए से अच्छी तरह समझ में आ सकता है। एक शख़्स जंगल में जा रहा है। किसी कोने से एक भयानक शेर दहाड़ता हुआ निकला, उसकी रोबदार गूँज, भयानक चेहरा, ग़ुस्से से भरी आँखों ने इस शख़्स के दिल को कंपा दिया, यह शख़्स किसी के सामने शेर का हुलिया और शक्ल-ओ-सूरत जिन असरदार लफ़्ज़ों में बयान करेगा, वह शेर है।
प्राणी विज्ञान का एक विद्वान किसी अजायब घर में जाता है, वहाँ एक शेर कटघरे में बंद है, यह विद्वान शेर के एक-एक अंग को इल्मी नज़रिए से देखता है, और इल्मी तरीक़े से किसी मजमे के सामने शेर पर लेक्चर देता है, यह साइंस, तारीख़ या वाक़िया-निगारी (घटना-वर्णन) है।
(शायरी की क़िस्मों में एक क़िस्म वाक़िया-निगारी है। यानी शायर, बाहरी वाक़ियात की तस्वीर खींचता है। लेकिन इस हैसियत से नहीं कि अपने आप में वे क्या हैं बल्कि इस हैसियत से कि वे हमारे जज़्बात पर क्या असर डालते हैं) शायर इन चीज़ों की, सादा रूप-रंग की तस्वीर नहीं खींचता बल्कि उनमें कल्पना शक्ति का रंग भरता है ताकि वे असरदार बन जाएँ।
इस चर्चा से शायरी और घटना-वर्णन का फ़र्क़ साफ़ हो जाता है, लेकिन भाषण-कला और शायरी की विभाजन रेखा, अब भी तय नहीं हुई। (भाषण-कला में भी शायरी की तरह जज़्बात और एहसासों को उभारना मक़सद होता है, लेकिन हक़ीक़त में शायरी और भाषण-कला बिल्कुल अलग-अलग चीज़ें हैं। भाषण-कला का मक़सद श्रोताओं को संबोधित करना होता है। वक्ता श्रोताओं की रुचि, मान्यताओं और स्वभाव की परख करता है, ताकि उसके लिहाज़ से भाषण का ऐसा ढंग अपनाए जिससे वह उनकी भावनाओं को उभार सके और अपने काम में ला सके। इसके विपरीत, शायर को दूसरों से कोई मतलब नहीं होता। वह यह नहीं जानता कि कोई उसके सामने है भी या नहीं? उसके दिल में जज़्बात पैदा होते हैं, वह बेसाख़्ता (अनायास) उन जज़्बातों को ज़ाहिर करता है, जिस तरह दर्द की हालत में अपने आप आह निकल जाती है। बेशक ये अशआर (शेर) औरों के सामने पढ़े जाएं तो उनके दिल पर असर करेंगे, लेकिन शायर ने इस मक़सद को अपने ध्यान में नहीं रखा था। जिस तरह कोई व्यक्ति अपने किसी करीबी के मरने पर विलाप करता है, तो उसका मक़सद यह नहीं होता कि लोगों को सुनाए, लेकिन अगर कोई व्यक्ति सुन ले तो ज़रूर तड़प जाएगा।)
असली शायर वही है जिसे श्रोताओं से कोई मतलब न हो। लेकिन जो लोग बनावटी तौर पर शायर बनते हैं, उनका भी फ़र्ज़ है कि उनके कलाम के अंदाज़ से यह बिल्कुल न लगे कि वे श्रोताओं को संबोधित करना चाहते हैं। (एक एक्टर को ख़ूब मालूम है कि बहुत से दर्शक उसके सामने मौजूद हैं। लेकिन अगर एक्टिंग की हालत में, वह इस बात को ज़ाहिर कर दे तो सारा पार्ट बर्बाद हो जाएगा। शायर अगर खुद की बजाय, दूसरों को संबोधित करता है, दूसरों के जज़्बात को उभारना चाहता है, जो कुछ कहता है, अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए कहता है, तो वह शायर नहीं बल्कि वक्ता है।) इससे यह साफ़ होगा कि शायरी एकांतवास और आत्म-चिंतन का नतीजा है, इसके विपरीत भाषण-कला, लोगों से मिलने-जुलने और संबंध रखने का फल है। अगर एक व्यक्ति के अंदरूनी एहसास तेज़ और उत्तेजित हैं तो वह शायर हो सकता है, लेकिन वक्ता के लिए ज़रूरी है कि वह दूसरों के जज़्बात और एहसास की नब्ज़ पहचानने वाला हो।
शायरी के असली तत्व क्या हैं?
एक बेहतरीन शेर में बहुत सी बातें पाई जाती हैं। उसमें वज़न (छंद) होता है, मुहाकात (चित्रण) होती है यानी किसी चीज़ या किसी हालत की तस्वीर खींची जाती है, ख़याल-बंदी (कल्पना) होती है, लफ़्ज़ सादे और मधुर होते हैं, बंदिश साफ़ होती है, बयां करने के अंदाज़ में नयापन होता है, लेकिन क्या ये सब चीज़ें शायरी के अंग हैं? क्या इनमें से हर एक ऐसी चीज़ है कि अगर वह न होती तो शेर, शेर न होता? अगर ऐसा नहीं है, और बिल्कुल नहीं है, तो इन तमाम खूबियों में ख़ास उन चीज़ों को तय कर देना चाहिए जिनके बिना शेर, शेर नहीं रहता। आम लोगों के नज़दीक यह चीज़ वज़न है। इसलिए आम लोग लयबद्ध कलाम को शेर कहते हैं, लेकिन विद्वानों की यह राय नहीं है। वे वज़न को शेर का एक ज़रूरी हिस्सा समझते हैं, फिर भी उनके नज़दीक वह शायरी का असली तत्व नहीं है।
अरस्तू के नज़दीक यह चीज़ मुहाकात यानी चित्रकारी है, लेकिन यह भी सही नहीं। अगर किसी शेर में तख़य्युल (कल्पना) हो और मुहाकात न हो तो क्या वह शेर नहीं होगा? सैकड़ों अशआर हैं जिनमें मुहाकात की बजाय सिर्फ़ तख़य्युल है, और इसके बावजूद वे बेहतरीन अशआर माने जाते हैं। शायद यह कहा जाए कि मुहाकात का अर्थ इतना व्यापक है कि तख़य्युल इसके दायरे से बाहर नहीं जा सकता। इसलिए तख़य्युल भी मुहाकात है। लेकिन यह ज़बरदस्ती की बात है। आगे चलकर जब हम मुहाकात और तख़य्युल की परिभाषा लिखेंगे तो साफ़ हो जाएगा कि दोनों अलग-अलग चीज़ें हैं, हालांकि यह मुमकिन है कि कुछ मिसालों में दोनों की सरहदें मिल जाएं। हक़ीक़त यह है कि शायरी दरअसल दो चीज़ों का नाम है: मुहाकात और तख़य्युल। इनमें से एक भी पाई जाए तो शेर, शेर कहलाने का हक़दार होगा। बाक़ी और खूबियां यानी रवानी, सफ़ाई, बंदिश की ख़ूबसूरती वगैरह शेर के असली हिस्से नहीं बल्कि बाहरी चीज़ें और सजावट (मुस्तहसनात) हैं।
मुहाकात की परिभाषा
मुहाकात का मतलब किसी चीज़ या किसी हालत को इस तरह बयां करना है कि उस चीज़ की तस्वीर आंखों में घूम जाए। तस्वीर और मुहाकात में यह फ़र्क़ है कि तस्वीर में हालांकि भौतिक चीज़ों के अलावा, हालातों या जज़्बातों की भी तस्वीर खींची जा सकती है, चुनांचे आला दर्जे के चित्रकार इंसान की ऐसी तस्वीर खींच सकते हैं कि चेहरे से इंसानी जज़्बात मसलन दुख, ख़ुशी, चिंता, हैरानी, अचरज, परेशानी और बेचैनी ज़ाहिर हो। जहांगीर के सामने एक चित्रकार ने एक औरत की तस्वीर पेश की थी, जिसके तलवे सहलाए जा रहे हैं। तलवों को सहलाते वक़्त चेहरे पर गुदगुदी का जो असर पैदा होता है, वह तस्वीर के चेहरे से साफ़ नज़र आ रहा था। फिर भी तस्वीर हर जगह मुहाकात का साथ नहीं दे सकती। सैकड़ों तरह-तरह की घटनाएं, हालात और वारदातें हैं जो तस्वीर की पहुंच से बाहर हैं। मसलन, क़ाआनी एक मौक़े पर बहार का समां दिखाता है:
नरमक नरमक नसीम, ज़ेरे-गुलां मे-ख़ज़द
ग़बग़बे-ईं मे-मकद, आरिज़े-आं मे-मज़द
सुंबुले-ईं मे-कशद, गर्दने-आं मे-गज़द
गह ब-चमन मे-चमद, गह ब-समन मे-वज़द
गाह ब-शाख़े-दरख़्त, गाह ब-लबे-जूएबार
यानी हल्की-हल्की हवा आई, फूलों में घुसी, किसी फूल का गाल चूम लिया, किसी की ठुड्डी चूस ली, किसी के बाल खींचे, किसी की गर्दन दांत से काटी, क्यारियों में खेलते-खेलते चमेली के पास पहुंची और दरख़्त की टहनियों में से होती हुई नहर के किनारे पहुंच गई। इस समां को चित्रकार तस्वीर में कैसे दिखा सकता है?
ये तो भौतिक चीज़ें थीं, ख़यालात, जज़्बात और कैफ़ियतों (दशाओं) को बयां करना और ज़्यादा मुश्किल है। तस्वीर इससे कैसे पार पा सकती है? मसलन इस शेर में:
नसब नामए-दौलते-कैक़ुबाद
वरक़ बर वरक़, हर सूए बुर्द बाद
यह ख़याल बयां किया गया है कि दारा के मरने से क्यानी ख़ानदान बिल्कुल बर्बाद हो गया। यह ख़याल तस्वीर के ज़रिए कैसे बयां हो सकता है?
(या मसलन हवस-पेशा (वासना-ग्रस्त) आशिक़ों के साथ अक्सर यह वाक़या पेश आता है कि किसी माशूक़ से दिल लगाते हैं, कुछ दिनों के बाद उसकी बेरुख़ी और नख़रों से तंग आकर चाहते हैं कि उसे छोड़ दें, और किसी और से दिल लगाएं। फिर रुक जाते हैं कि ऐसा दिलफ़रेब (मनमोहक) माशूक़ कहां हाथ आएगा। इस तरह अपने आप ही रूठते और मानते रहते हैं, माशूक़ को इन बातों की ख़बर तक नहीं होती। इस हालत को एक शायर यूं बयां करता है:)
सद बार जंग करदा ब-ऊ सुल्ह करदा-एम
ऊ रा ख़बर न-बूदा ज़-सुल्ह ओ ज़-जंग मा
(इस हालत को चित्रकार तस्वीर के ज़रिए कैसे दिखा सकता था? इसके विपरीत शायराना चित्रकारी, हर ख़याल, हर वाक़ये, हर कैफ़ियत की तस्वीर खींच सकती है।)
आम चित्रकारी और शायराना चित्रकारी में एक बड़ा फ़र्क़ यह है कि तस्वीर की असली ख़ूबी यह है कि जिस चीज़ की तस्वीर खींची जाए, उसका एक-एक नक़्श-ओ-निगार (रेखा) दिखाया जाए, वरना तस्वीर अधूरी और बेमेल होगी। इसके विपरीत शायराना चित्रकारी में यह पाबंदी ज़रूरी नहीं। शायर अक्सर सिर्फ़ उन चीज़ों को लेता है और उन्हें उजागर करता है, जिनसे हमारे जज़्बात पर असर पड़ता है। बाक़ी चीज़ों को वह नज़रअंदाज़ करता है या उन्हें धुंधला रखता है ताकि असर डालने में उनसे कोई ख़लल न आए। फ़र्ज़ करो एक फूल की तस्वीर खींचनी हो, तो चित्रकार का कमाल यह है कि एक-एक पंखुड़ी और एक-एक रग-रेशा दिखाए, लेकिन शायर के लिए यह ज़रूरी नहीं। मुमकिन है कि वह इन चीज़ों को संक्षेप और हल्के रूप में दिखाए, फिर भी कुल मिलाकर वह असर पैदा कर दे जो असली फूल को देखने से पैदा होता है।
चित्रकारी और मुहाकात (चित्रण) में एक और बड़ा फ़र्क़ यह है कि चित्रकार किसी चीज़ की तस्वीर खींचने से ज़्यादा से ज़्यादा वह असर पैदा कर सकता है जो ख़ुद उस चीज़ को देखने से पैदा होता है। लेकिन शायर, बावजूद इसके कि तस्वीर का हर हिस्सा उजागर करके नहीं दिखाता, फिर भी उससे ज़्यादा असर पैदा कर सकता है जो असल चीज़ को देखने से पैदा हो सकता है। हरियाली पर ओस देखकर वह असर नहीं पैदा हो सकता जो इस शेर से हो सकता है:
खा खा के ओस और भी सब्ज़ा हरा हुआ
था मोतियों से दामन-ए-सहरा भरा हुआ
तस्वीर का असली कमाल यह है कि वह असल के मुताबिक़ हो, और अगर चित्रकार इस काम में कामयाब हो गया तो उसे माहिर फ़नकार का ख़िताब मिल सकता है। लेकिन शायर को अक्सर मौक़ों पर दो मुश्किल पड़ावों का सामना करना पड़ता है, यानी न तो वह असल की पूरी-पूरी तस्वीर खींच सकता है, क्योंकि कुछ जगहों पर इस तरह की पूरी समानता एहसासात को उभार नहीं सकती, और न ही वह असल से ज़्यादा दूर हो सकता है, वरना उस पर एतराज़ होगा कि सही तस्वीर नहीं खींची। इस मौक़े पर उसे तख़य्युल (कल्पना) से काम लेना पड़ता है। वह ऐसी तस्वीर खींचता है जो असल से चमक-दमक और हुस्न-ओ-जमाल में बढ़ जाती है, लेकिन वह अपनी क़ुव्वत-ए-तख़य्युल (कल्पना शक्ति) से सुनने वालों पर यह असर डालता है कि यह वही चीज़ है, बस लोगों ने इसे गहरी नज़र से नहीं देखा था, इसलिए इसका हुस्न पूरी तरह ज़ाहिर नहीं होता था।
तख़य्युल
तख़य्युल की परिभाषा हेनरी लुईस ने यह की है, वह ताक़त जिसका यह काम है कि उन चीज़ों को जो दिखाई नहीं देतीं, या जो हमारे हवास (इंद्रियों) की कमी की वजह से हमें नज़र नहीं आईं, हमारी नज़र के सामने कर दे। लेकिन यह परिभाषा पूरी तरह मुकम्मल और सटीक नहीं है, और हक़ीक़त यह है कि इस तरह की चीज़ों की तार्किक, मुकम्मल और सटीक परिभाषा हो भी नहीं सकती।
तख़य्युल दरअसल कुछ नया गढ़ने की ताक़त का नाम है। आम लोगों के नज़दीक मंतिक़ (तर्क) और फ़लसफ़े के जन्मदाता को तख़य्युल वाला (कल्पनाशील) नहीं कहा जा सकता, बल्कि अगर ख़ुद किसी फ़लसफ़ी को इस लक़ब से पुकारा जाए तो उसे बुरा लगेगा। लेकिन हक़ीक़त यह है कि फ़लसफ़ा और शायरी में क़ुव्वत-ए-तख़य्युल की बराबर ज़रूरत है। यही क़ुव्वत-ए-तख़य्युल है जो एक तरफ़ फ़लसफ़े में ईजाद और मसलों की खोज का काम देती है, और दूसरी तरफ़ शायरी में शायराना मज़ामीन (विषय) पैदा करती है। चूँकि अक्सर साइंसदां शायरी का ज़ौक़ नहीं रखते और शायर फ़लसफ़े और साइंस से अनजान होते हैं, इसलिए यह ग़लतफ़हमी पैदा होती है कि क़ुव्वत-ए-तख़य्युल का फ़लसफ़े और साइंस से कोई ताल्लुक़ नहीं है। लेकिन यह सही नहीं है। बिला-शुब्हा आम साइंस या फ़लसफ़ा जानने वाले, जिनमें ईजाद करने की ताक़त नहीं होती, वे क़ुव्वत-ए-तख़य्युल नहीं रखते, लेकिन जो लोग किसी मसले या फ़न के जन्मदाता हैं, उनकी क़ुव्वत-ए-तख़य्युल से कौन इनकार कर सकता है।
न्यूटन और अरस्तू में भी उतनी ही ज़बरदस्त क़ुव्वत-ए-तख़य्युल थी जितनी होमर और फ़िरदौसी में। अलबत्ता दोनों के मक़सद अलग-अलग हैं और दोनों की क़ुव्वत-ए-तख़य्युल के इस्तेमाल का तरीक़ा अलग-अलग है। फ़लसफ़े और साइंस में क़ुव्वत-ए-तख़य्युल का इस्तेमाल इस मक़सद से होता है कि एक इल्मी मसला हल कर दिया जाए। लेकिन शायरी में तख़य्युल से यह काम लिया जाता है कि इंसानी जज़्बात में हरकत पैदा हो।
फ़लसफ़ी को सिर्फ़ उन मौजूद चीज़ों से मतलब है जो हक़ीक़त में मौजूद हैं। इसके बरअक्स (विपरीत), शायर उन चीज़ों से भी काम लेता है जो बिल्कुल मौजूद नहीं हैं। फ़लसफ़े के दरबार में हुमा, सीमुर्ग़, गावे-ज़मीन, तख़्त-ए-सुलेमान की बिल्कुल क़द्र नहीं है, लेकिन यही चीज़ें शायरी के महल की सजावट हैं। फ़लसफ़ी की ज़बान से अगर 'सुनहरे परों वाले सीमुर्ग़' का लफ़्ज़ निकल जाए तो हर तरफ़ से सुबूत की माँग होगी, लेकिन शायर इस तरह की फ़र्ज़ी मख़्लूक़ात (काल्पनिक प्राणियों) से अपने ख़यालों की दुनिया आबाद करता है और कोई उससे सुबूत नहीं माँगता। क्योंकि फ़लसफ़ी की तरह वह किसी मसले की तालीम देने का दावा नहीं करता, बल्कि वह हमें सिर्फ़ ख़ुश करना चाहता है और बिला-शुब्हा वह इसमें कामयाब होता है। एक फूल को देखकर साइंसदां यह तहक़ीक़ (खोज) करना चाहता है कि वह पेड़-पौधों के किस ख़ानदान से है, उसके रंग में किन रंगों की मिलावट है, उसकी ख़ुराक ज़मीन के किन तत्वों से है? उसमें नर और मादा दोनों के हिस्से हैं या सिर्फ़ एक के? लेकिन शायर को इन चीज़ों से कोई मतलब नहीं, फूल देखकर बेसाख़्ता उसके मन में यह ख़याल पैदा होता है:
ऐ गुल ब-तो ख़ुरसन्दम तो बू-ए-कसे दारी
चाँद के बारे में एक खगोलशास्त्री को इन मसलों से मतलब है कि वह किन तत्वों से बना है? आबाद है या वीरान? रोशन है या तारीक (अँधेरा)? समंदर के ज्वार-भाटे से उसका क्या ताल्लुक़ है, वग़ैरह-वग़ैरह। लेकिन शायर को चाँद से सिर्फ़ यह मतलब है कि वह माशूक़ का रोशन चेहरा है। शायर के सामने (क़ुव्वत-ए-तख़य्युल की बदौलत) तमाम बेजान चीज़ें जानदार बन जाती हैं। उसके कानों में हर तरफ़ से ख़ुशगवार सदाएँ (आवाज़ें) आती हैं; ज़मीन, आसमान, सितारे, बल्कि ज़र्रा-ज़र्रा उससे बातें करता है।
क़ुव्वत-ए-तख़य्युल के ज़रिए से अक्सर शायर एक नया दावा करता है, और ख़याली दलीलें पेश करता है। मुमकिन है कि एक तर्कशास्त्री उसकी दलील तस्लीम न करे। लेकिन जिन लोगों को वह क़ुव्वत-ए-तख़य्युल के ज़रिए अपने असर में ले लेता है, वे इसे तस्लीम करने में बिल्कुल हिचकिचाहट नहीं कर सकते। मिसाल के तौर पर एक शायर कहता है:
दोश अज़ बरम चो रफ़्ती आगह नगश्तम आरे
उमरी ओ रफ़्तन-ए-उम्र आवाज़-ए-पा नदारद
यानी माशूक़ जो पहलू से निकल कर चला गया तो मुझे ख़बर नहीं हुई, क्योंकि माशूक़ आशिक़ की ज़िंदगी है और ज़िंदगी के जाने के वक़्त जाने की आहट नहीं मालूम होती। इस दलील के दो मुक़द्दमे (तर्क के आधार) हैं: 1. माशूक़ आशिक़ की ज़िंदगी है। 2. ज़िंदगी के जाने की आहट नहीं मालूम होती। इन दोनों में से तुम किसका इनकार कर सकते हो?
मुहाकात की तकमील (पूर्णता) किन-किन चीज़ों से होती है?
1. मुहाकात जब मौज़ूँ कलाम (छंदबद्ध रचना) के ज़रिए की जाए तो सबसे पहले वज़्न (मीटर) का तनासुब (संतुलन) शर्त है। यह ज़ाहिर है कि दर्द, ग़म, रंज, जोश, ग़ैज़ (क्रोध), ग़ज़ब—हर एक के इज़हार का लहजा और आवाज़ अलग-अलग है। इसलिए जिस जज़्बे की मुहाकात मक़सूद हो, शेर का वज़्न भी उसी के मुनासिब होना चाहिए ताकि उस जज़्बे की पूरी हालत अदा हो सके। मिसाल के तौर पर, फ़ारसी में 'बहर-ए-तक़ारुब' जिसमें 'शाहनामा' है, रज़्मिया (युद्ध संबंधी) ख़यालात के लिए मौज़ूँ (उपयुक्त) है। चुनाँचे फ़ारसी में जितनी भी रज़्मिया मसनवियाँ लिखी गईं, इसी बहर में लिखी गईं। इसी तरह ग़ज़ल और इश्क़-ओ-आशिक़ी के ख़यालात के लिए ख़ास बहरें हैं; इन ख़यालात को क़सीदे की बहरों में अदा किया जाए तो तासीर घट जाती है।
2. मुहाकात का असली कमाल यह है कि वह असल के मुताबिक़ हो। यानी जिस चीज़ का बयान किया जाए, इस तरह किया जाए कि ख़ुद वह चीज़ मुजस्सम (साकार) होकर सामने आ जाए। शायरी का असली मक़सद तबीयत का इंबिसात (प्रसन्नता) है; किसी चीज़ की असली तस्वीर खींचना ख़ुद तबीयत में इंबिसात पैदा करना है (वह चीज़ अच्छी है या बुरी, इससे बहस नहीं)। मिसाल के तौर पर, छिपकली एक बदसूरत जानवर है जिसे देखकर नफ़रत होती है, लेकिन अगर एक माहिर चित्रकार छिपकली की ऐसी तस्वीर खींच दे कि बाल बराबर फ़र्क़ न हो, तो उसे देखने से ख़्वाह-मख़्वाह लुत्फ़ आएगा। इसकी यही वजह है कि नक़्ल का असल के मुताबिक़ होना ख़ुद एक असरदार चीज़ है। अब अगर वे चीज़ें जिनकी मुहाकात मक़सूद है, ख़ुद भी दिलआवेज़ (आकर्षक) और लुत्फ़-अंगेज़ (आनंददायक) हों, तो मुहाकात का असर बहुत बढ़ जाएगा।
असल की मुताबक़त (समानता) अलग-अलग तरीक़ों से हुई है:
(1) जिस चीज़ का बयान करना है, उसकी बारीकियों का इस तरह विस्तार से वर्णन किया जाए कि पूरी चीज़ की तस्वीर नज़र के सामने आ जाए। मसलन, अगर दोस्तों की जुदाई का वाक़्या लिखना है, तो उन तमाम छोटी-छोटी हालतों और कैफ़ियतों का पूरा ब्यौरा देना चाहिए जो उस वक़्त पेश आती हैं। यानी इस हालत में एक दूसरे की तरफ़ किस निगाह से देखते हैं? किस तरह गले मिलकर रोते हैं? किस क़िस्म की दर्द भरी बातें करते हैं? किन बातों से दिल को तसल्ली देते हैं? विदाई के वक़्त क्या बे-इख़्तियार (अनजाने में) हरकतें होती हैं? शुरुआत में जो कैफ़ियत थी, किस तरह धीरे-धीरे बढ़ती जाती है? मौजूद लोगों पर इसका क्या असर पड़ता है? इन बातों में से एक बात भी रह गई तो असल की मुताबक़त में कमी रह गई। फ़िरदौसी और निज़ामी में बड़ा फ़र्क़ यही है कि फ़िरदौसी निहायत छोटी-छोटी बारीकियों को लेता है। निज़ामी अपनी कल्पना (तख़य्युल) के ज़ोर में बारीकियों पर नज़र नहीं डालते। मसलन, फ़िरदौसी एक मौक़े पर एक दावत के जलसे का हाल लिखता है:
दिगर बारा बिसतद ज़मीन दाद बोस
(दूसरी बार प्याला हाथ में लिया और ज़मीन चूमी और)
चुनीं गुफ़्त कीं बादा बर रूए तूस
(कहा कि यह प्याला तूस की यादगार में पीता हूँ)
सरान-ए-जहाँदार बरख़ास्तंद
(तमाम सरदार खड़े हो गए)
अबर पहलवान ख़्वाहिश आरास्तंद
(और रस्म की मर्ज़ी का पालन किया)
उस ज़माने में क़ायदा था कि किसी की यादगार में शराब पीते थे तो ज़मीन को चूमते थे, फिर उस शख़्स की तरफ़ मुख़ातिब होकर कहते थे कि यह याद फ़लाँ की। इसके साथ ही महफ़िल में मौजूद और लोग खड़े हो जाते थे, जैसा कि आजकल भी दस्तूर है। फ़िरदौसी ने इन तमाम वाक़्यात को बयान किया। इसी मौक़े को अगर निज़ामी लिखते तो शराब और जाम की तश्बीह (उपमा) और इस्तिआरा (रूपक) का तिलिस्म बाँधते, लेकिन इन छोटी-छोटी बातों को नज़रअंदाज़ कर जाते। क़ाआनी का एक बहारिया क़सीदा (वसंत ऋतु पर कविता) है, जिसके चंद अशआर यह हैं:
यके बर लाला पा कोबद कि है है रंग-ए-मय दारद
(बहार में कोई लाला पर पाँव दे-दे मारता है)
यके अज़ गुल ब-वज्द आयद कि दह दह बू-ए-यार आयद
(कि अहाहा इसमें शराब का रंग है, कोई फूल देखकर)
यके ईंजा गुसारद मय यके आंजा नवाज़द नै
(झूमता है कि सुभान अल्लाह माशूक़ की ख़ुशबू आती है)
सदा-ए-हाए हूए दहे, ज़ि हर सूए हज़ार आयद
(कोई यहाँ शराब उड़ा रहा है, कोई वहाँ बाँसुरी)
ज़ि हर कूए सदा-ए-अरग़नूँ ओ चंग ओ नै ख़ेज़द
(बजा रहा है। हर तरफ़ से हो-हा की आवाज़ें आ रही हैं)
ज़ि हर सूए सदा-ए-बरबत ओ तंबूरा ओ तार आयद
(हर गली में ऑर्गन और सितार बज रहा है)
यके बर लाला मे ग़लतद यके दर सब्ज़ा मे रक़्सद
(कोई लाला पर लोट रहा है, कोई सब्ज़े पर नाच रहा है)
यके गाहे रवद अज़ होश यक गह होशियार आयद
(कोई बेहोश हुआ जाता है, कोई होश में आने लगा है)
अलाइया साक़िया! मय देह, ब-जान-ए-मन पयापे देह
(हाँ! ऐ साक़ी शराब दे और बराबर दिए जा)
दमादम मय ख़ुरद मय देह, कि मे तरसम ख़ुमार आयद
(ख़ुद पी और दम-ब-दम पिलाता जा वरना मुझको डर है कि ख़ुमार आ जाए)
इन अशआर में बहार की दिलचस्पी, और लोगों की सरमस्ती की तस्वीर खींची है, मुहाकात (सटीक चित्रण) का आला दर्जा है, एक-एक छोटी हालत का पूरा ब्यौरा देकर इस तरह बयान किया है कि पूरा समाँ आँखों के सामने फिर जाता है।
3. अक्सर चीज़ें इस क़िस्म की हैं कि उनके अलग-अलग प्रकार होते हैं और हर प्रकार में अलग ख़ासियत होती है। मसलन, आवाज़ एक आम चीज़ है, इसकी अलग-अलग क़िस्में हैं: पस्त (धीमी), बुलंद (तेज़), शीरीं (मीठी), करख़्त (कठोर), सुरीली, वग़ैरह-वग़ैरह। ज़ौक़ी (सौंदर्यबोध से जुड़ी) चीज़ों में यह फ़र्क़ और नाज़ुक हो जाता है। मसलन, माशूक़ की अदा एक आम चीज़ है, लेकिन अलग-अलग ख़ासियतों की बिना पर उनके जुदा-जुदा नाम हैं, यानी: नाज़, इशवा, ग़म्ज़ा, शोख़ी और बेबाकी। जो ज़बानें वसीअ (व्यापक) और लतीफ़ (सूक्ष्म) हैं, उनमें इन बारीक फ़र्क़ों की बिना पर हर चीज़ के लिए अलग-अलग अल्फ़ाज़ पैदा हो जाते हैं।
अब जब किसी चीज़ की मुहाकात (चित्रण) मक़सूद हो, तो ठीक वही अल्फ़ाज़ इस्तेमाल करने चाहिए जो इन ख़ासियतों को ज़ाहिर करते हैं। साउदी (Southey) ने एक नज़्म लिखी थी, जिसके लिखे जाने की वजह (शान-ए-नुज़ूल) यह है कि उससे उसके कमसिन (छोटे) बच्चे ने पूछा कि सैलाब कैसे आता है? साउदी ने इसके जवाब में यह नज़्म लिखी और दिखाया कि सैलाब किस तरह आहिस्ता-आहिस्ता शुरू होता है और किस तरह बढ़ता जाता है। इस नज़्म में तमाम अल्फ़ाज़ इस क़िस्म के आए हैं कि पानी के गिरने, बहने, फैलने, वग़ैरह-वग़ैरह के वक़्त जो आवाज़ें पैदा होती हैं, अल्फ़ाज़ के लहज़े से उनका इज़हार होता है। यहाँ तक कि अगर कोई शख़्स अच्छी तरह से इस नज़्म को पढ़े, तो सुनने वाले को मालूम होगा कि ज़ोर-ओ-शोर से सैलाब बढ़ता हुआ चला आता है।
मेरा तालिब-इल्मी (विद्यार्थी जीवन) का ज़माना था कि एक दिन एक महफ़िल में किसी ने कलीम का यह शेर पढ़ा:
सर-ब-बुस्तान चो दहद जल्वा-ए-यग़माई रा
अव्वल अज़ सर्व कुनद जामा-ए-रानाई रा
वालिद मरहूम (स्वर्गीय पिता) भी तशरीफ़ रखते थे। मैंने कहा, कपड़ा उतारने को 'जामा कशीदन' भी कहते हैं। इसलिए शायर अगर 'कुनद' की बजाय 'कशद' कहता तो ज़्यादा फ़सीह (प्रांजल/शुद्ध) होता; 'जामा कुंदन' गो (हालाँकि) सही है, लेकिन फ़सीह नहीं। सब चुप हो गए। वालिद मरहूम ने ज़रा सोचकर कहा कि नहीं, यही लफ़्ज़ (कुनद) शेर की जान है। शेर का मतलब यह है कि माशूक़ बाग़ में जब ग़ारतगरी (लूट-मार) की शान दिखाता है, तो पहले सर्व (सनोबर के पेड़) की रानाई (सुंदरता) का लिबास उतार लेता है। लिबास उतारने के दो मायने हैं। एक यह कि मसलन कोई शख़्स गर्मी वग़ैरह की वजह से कपड़ा उतार कर रख दे या उसका नौकर उतार ले। दूसरे यह कि सज़ा के तौर पर किसी के कपड़े उतरवा लिए जाएँ या नुचवाए जाएँ। फ़ारसी में इनके लिए दो अलग-अलग लफ़्ज़ हैं: 'जामा कशीदन' और 'जामा कुंदन'। चूँकि यहाँ मक़सद यह है कि माशूक़, ज़िल्लत (अपमान) के तौर पर सर्व का कपड़ा उतार लेता है, इसलिए यहाँ 'जामा कुंदन' का लफ़्ज़ 'जामा कशीदन' से ज़्यादा मौज़ूँ (उचित) है। तमाम मौजूद लोगों ने इस तौजीह (व्याख्या) की बेसाख़्ता (सहज रूप से) तारीफ़ की।
अली क़ुली का शेर है:
बुज़श्त ज़ि पेश-ए-मन ओ ग़ैरश ब-हिकायत
पेचीद कि हरगिज़ न-तवानद ब-क़फ़ा दीद
शेर का मतलब यह है कि माशूक़ सामने से जा रहा था, रक़ीब (प्रतिद्वंद्वी) भी साथ था, उसने इस तरह उसको बातों में लगा लिया कि माशूक़ मुड़कर पीछे न देख सका। (वरना शायद मेरी तरफ़ भी उसकी निगाह पड़ जाती। 'पेचीद' के लफ़्ज़ से वाक़्ये की सूरत जिस तरह ज़ेहन में आ जाती है, और किसी लफ़्ज़ से नहीं आ सकती।)
सिकंदर ने जब दारा को बराबरी के दावे से ख़त लिखा, तो दारा को सख़्त रंज (दुख) और हैरत हुई। इस मौक़े पर निज़ामी कहते हैं:
ब-ख़ंदीद ओ गुफ़्त अंदराँ ज़हर-ख़ंद
कि अफ़सोस बर कार-ए-चर्ख़-ए-बुलंद
फ़लक बीं चि ज़ुल्म आशकारा कुनद
कि इस्कंदर आहंग-ए-दारा कुनद
जब कोई कमीना शख़्स किसी मोअज़्ज़ज़ (इज़्ज़तदार) आदमी से बराबरी का दावा करता है, तो बाज़ वक़्त (कभी-कभी) उसको ग़ुस्से में हँसी आ जाती है। यह हँसी, रंज, ग़ुस्सा और इबरत (सबक़/चेतावनी) का गोया मजमूआ (संग्रह) होती है। फ़ारसी में इस हँसी को 'ज़हर-ख़ंद' कहते हैं। दारा पर सिकंदर के ख़त से जो हालत तारी हुई (बीती), 'ज़हर-ख़ंद' के लफ़्ज़ के सिवा और किसी तरीक़े से उसकी तस्वीर नहीं खिंच सकती थी। इसी तरह ख़ास-ख़ास मुहावरे और इस्तलाहें (पारिभाषिक शब्द), ख़ास-ख़ास मज़ामीन (विषयों) के लिए मख़्सूस (तय) हैं। इन मज़ामीन को इनके सिवा और तरीक़े से अदा किया जाए तो पूरी मुहाकात (सटीक चित्रण) नहीं हो सकती।
4. जब किसी क़ौम या किसी मुल्क, या किसी मर्द, या औरत, या बच्चे की हालत बयान की जाए तो ज़रूरी है कि उनकी तमाम ख़ासियतों का ध्यान रखा जाए, मसलन अगर किसी बच्चे की किसी बात की नक़ल करना मक़सद हो तो बच्चों की ज़बान का, कहने के अंदाज़ का, ख़यालात का, लहजे का, ध्यान रखना चाहिए, यानी इन तमाम बातों को हू-ब-हू अदा करना चाहिए, मसलन,
चिल्लाती है सकीना कि ''अच्छे मिरे चचा''
महमल में घुट गई ''मुझे गोदी में लो ज़रा''
बाबा से कह दो अब कहीं ख़ेमा करें बपा
ठंडी हवा में ले के चलो तुम पे मैं फ़िदा
साया किसी जगह है न चश्मा न आब है
तुम तो हवा में हो मिरी हालत ख़राब है
यह वह मौक़ा है कि अहल-ए-बैत निहायत सख़्त गर्मियों में कर्बला को रवाना हुए हैं और सकीना (हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की साहबज़ादी) अपने चचा हज़रत अब्बास से गर्मी की शिकायत करती हैं। इस बंद में बच्चों की बातचीत के अंदाज़ और ख़यालात की तमाम ख़ासियतों का ध्यान रखा गया है। ''अच्छे चचा'' ख़ास बच्चों की ज़बान है, गोदी में बच्चों को ख़ास मज़ा आता है, इसलिए गोदी में लेने की फ़रमाइश से बच्चों जैसी ख़्वाहिश का इज़हार होता है। बच्चे अपना मक़सद हासिल करने का सबसे बड़ा ज़रिया ताना देना समझते हैं, इसलिए हज़रत अब्बास को ताना दिया है कि आप तो मज़े से हवा में हैं, आपको मेरी क्या फ़िक्र है। ''आप'' के बजाय ''तुम'' कहना इंतिहाई प्यारा और बच्चों जैसी बड़ाई और हुकूमत है, इन ख़ासियतों के इकट्ठा होने ने मुहाकात (चित्रण) को कमाल के दर्जे तक पहुँचा दिया है और वाक़ये की पूरी तस्वीर उतर आई है।
मुहाकात के कमाल के लिए दुनिया-जहान की हर क़िस्म की चीज़ों का मुताला करना ज़रूरी है। शायर कभी लड़ाइयों और जंगों का हाल लिखता है, कभी क़ौमों के अख़लाक़ और आदतों की तस्वीर खींचता है, कभी इंसानी जज़्बात का आलम दिखाता है, कभी शाही दरबारों की शान-ओ-शौकत बयान करता है, कभी टूटे-फूटे झोंपड़ों की सैर कराता है, इस हालत में अगर उसने दुनिया-जहान का मुशाहिदा (अवलोकन) न किया हो और एक-एक चीज़ की ख़ासियतों और चुनने लायक़ बातों को बारीकी से न देखा हो, तो वह इन मरहलों को कैसे तय कर सकता है। शेक्सपियर तमाम दुनिया का सबसे बड़ा शायर माना जाता है, इसकी यही वजह है कि उसने हर दर्जे और तबक़े के लोगों के अख़लाक़ और आदतों की तस्वीर खींची है, और इस तरह खींची है कि इससे बढ़कर मुमकिन नहीं। इस शर्त की कमी की वजह से बड़े-बड़े शायरों के कलाम में साफ़ ख़ामियाँ नज़र आती हैं, निज़ामी ख़ुदा-ए-सुख़न (शायरी के ख़ुदा) हैं, फिर भी दारा के ख़त में जो सिकंदर के नाम था, लिखते हैं,
वगर न चुनानत दहम गोश पेच
(वरना मैं तेरे ऐसे कान मलूंगा)
कि दानी तो हीची ओ कमतर ज़-हीच
(कि तू जान जाए कि तू नाचीज़ से भी नाचीज़ है)
निज़ामी एकांत में रहने वाले शख़्स थे, शाही दरबारों में आने-जाने का कम ही मौक़ा मिला था, शाहाना आदाब और बातचीत के तरीक़े से वाक़िफ़ न थे, इसलिए वही आम बाज़ारी लफ़्ज़ ''गोश पेच'' (कान उमेठना) लिख गए, इस कमी की वजह से वाक़ये की सही तस्वीर न उतर सकी। इसके बरअक्स फ़िरदौसी ने सैकड़ों-हज़ारों अलग-अलग वाक़यात लिखे हैं। लेकिन कहीं इस फ़र्ज़ का सिरा हाथ से नहीं जाने पाता, बहुत सी और तफ़सीली मिसालें आगे आएँगी, यहाँ सिर्फ़ बात को समझाने के लिए हम एक मिसाल पर ही बस करते हैं।
ईरानियों की रिवायत है कि फ़रीदूँ ने अपने बेटों का रिश्ता शाह-ए-यमन की लड़कियों से करना चाहा, चुनाँचे क़ासिद (दूत) को पैग़ाम देकर शाह-ए-यमन के पास भेजा। शाह-ए-यमन ने अपने दरबारियों से कहा कि, तीन सूरतें हैं, अगर क़ुबूल कर लूँ तो मुझको सख़्त सदमा होगा, अगर झूठा वादा कर लूँ तो यह शान-ए-सल्तनत के ख़िलाफ़ है, इनकार करूँ तो फ़रीदूँ का मुक़ाबला करना आसान नहीं।
फ़िरदौसी मजूसी नस्ल (पारसी) का था और क़ौमियत का उसको सख़्त तअस्सुब (पक्षपात) था, चुनाँचे जहाँ-जहाँ अरब का नाम आता है, उनको हक़ीर साबित करना चाहता है, फिर भी चूँकि शायरी के फ़र्ज़ का ख़याल था और अरब के कैरेक्टर (मिज़ाज) से वाक़िफ़ था इसलिए दरबारियों की ज़बान से कहता है,
कि मा हमगनान ईं न बीनम राए
(हम लोगों की यह राय नहीं)
कि हर बाद रा तो बिजुम्बी अज़ जाए
(कि जो हवा चले आपको हिला दे)
अगर शुद फ़रीदूँ चुनीं शहरयार
(फ़रीदूँ बादशाह है तो हो)
न मा बंदगान-एम बा गोशवार
(हम भी कुछ उसके हलक़ा-ब-गोश ग़ुलाम नहीं हैं)
सुख़न गुफ़्तन ओ रंजिश आईन-ए-मा अस्त
(बोलना और झुँझलाहट हमारी फ़ितरत है)
इनान ओ सिनाँ बाख़्तन दीन-ए-मास्त
(घोड़ा दौड़ाना और बरछी चलाना हमारा दीन है)
ब-ख़ंजर ज़मीं रा मयिस्ताँ कुनेम
(हम तलवारों से ज़मीन लाल कर देंगे)
ब-नेज़ा हवा रा नयिस्ताँ कुनेम
(और बरछियों से हवा को नयिस्ताँ बना देंगे)
ये बातें अरब का ख़ास कैरेक्टर हैं। अरब, किसी दूसरी क़ौम को, चाहे वह किसी भी दर्जे की हो, बेटी देना शर्म समझते थे, इसलिए हालाँकि बादशाह ने मुल्की मस्लेहत (राज्य के हित) से फ़रीदूँ की दरख़्वास्त को रद्द करना मुनासिब न समझा लेकिन दरबारियों ने वही आज़ादाना जवाब दिया जो अरब की फ़ितरत और उनका जौहर है।
बारीक ख़ासियतों की मुहाकात
मुहाकात में दर्जों का बहुत फ़र्क़ होता है और इसी फ़र्क़ की बिना पर शायरी के दर्जों में बहुत अंतर है, इसको पहले महसूस होने वाली चीज़ों के ज़रिए से समझ लो। मसलन अगर सोते हुए शख़्स की तस्वीर खींची जाए तो एक मामूली मुसव्विर (चित्रकार) तस्वीर में सिर्फ़ इस क़दर दिखाएगा कि आँखें बंद हैं, जिससे ज़ाहिर हो कि वह शख़्स सो रहा है, लेकिन एक बारीकी को समझने वाला मुसव्विर इन ख़ासियतों का भी ध्यान रखेगा कि किस क़िस्म की नींद है? गहरी है या मामूली या कच्ची नींद? इससे बढ़कर इस बात का भी ध्यान रखेगा कि सोने की हालत में अंगों की जो हालत होती है वह भी नुमायाँ की जाए। बेख़बरी में लिबास और अंगों की शक्ल में जो बेढंगापन पैदा हो जाता है, वह भी ज़ाहिर हो। बच्चों, जवानों, औरतों और मर्दों की नींद में जो फ़र्क़ है उसकी ख़ासियतें भी नज़र आएँ। इसी तरह जिस क़दर ज़्यादा चित्रकारी के फ़न में कमाल होगा, उसी क़दर तस्वीर में बारीकियाँ पैदा होती जाएँगी।
यूनान में एक दफ़ा एक मुसव्विर ने एक आदमी की, जिसके हाथ में अंगूर का गुच्छा है, तस्वीर बनाकर मौक़े पर लटकाई, तस्वीर इस क़दर असल के मुताबिक़ थी कि परिंदे अंगूर को असली समझ कर उस पर गिरते थे और चोंच मारते थे, तमाम नुमाइश-गाह (प्रदर्शनी) में शोर मच गया और लोग हर तरफ़ से आ-आकर मुसव्विर को मुबारकबाद देने लगे, लेकिन मुसव्विर रोता था कि तस्वीर में कमी रह गई, लोगों ने हैरत से पूछा कि इससे बढ़कर और क्या कमाल हो सकता था, मुसव्विर ने कहा बेशक अंगूर की तस्वीर अच्छी बनी है लेकिन जिस आदमी के हाथ में अंगूर है, उसकी तस्वीर अच्छी नहीं वरना परिंदे अंगूर पर टूटने की जुर्रत न करते।
इसी क़िस्म की बारीकियाँ मुहाकात में पाई जाती हैं और यही नुक्ते हैं, जिनकी बिना पर शायरों के दर्जों में फ़र्क़ होता है। मुहाकात की ये बारीकियाँ हर चीज़ की मुहाकात में पाई जाती हैं। यानी चाहे किसी वाक़ये का बयान किया जाए, या किसी मंज़र या इंसानी जज़्बात का या किसी हालत या कैफ़ियत का, हम हर क़िस्म की मिसालें नीचे लिखते हैं।
दो दिन से बे-ज़बाँ पे जो था आब-ओ-दाना बंद
दरिया को हिनहिना के लगा देखने समंद
हर बार काँपता था सिमटता था बंद बंद
चुमकारते थे हज़रत अब्बास अर्जुमंद
तड़पाता था जिगर को जो शोर आबशार का
गर्दन फिरा के देखता था मुँह सवार का
यह वह मौक़ा है कि कर्बला में हज़रत अब्बास अहल-ए-बैत के लिए पानी लेने गए हैं, और नहर के किनारे पहुँचे हैं, लेकिन न ख़ुद पानी पीते हैं, न घोड़े को पिलाते हैं, सिर्फ़ मश्क भर ली है कि अहल-ए-बैत को लाकर पिलाएँगे। घोड़ा हज़रत अब्बास के इस इरादे से वाक़िफ़ है कि वह उसको पानी पिलाना नहीं चाहते। अब ख़याल करो कि एक जानवर कई दिन का प्यासा पानी के पास पहुँच जाए तो उसकी क्या हालत होगी। एक तरफ़ प्यास उसको बेक़ाबू करती है, दूसरी तरफ़ मालिक रोक रहा है। इस दोतरफ़ा कशमकश में बार-बार काँपना और अंग-अंग का सिमटना, असली, नेचुरल और फ़ितरी हालत है।
ज़ुल्फ़ें हवा में उड़ती थीं हाथों में हाथ थे
लड़के भी बंद खोले हुए साथ-साथ थे
यह वह मौक़ा है कि अहल-ए-बैत कर्बला के मैदान में उतरे हैं और नौजवान और बच्चे साथ-साथ चहलक़दमी कर रहे हैं। कोई मामूली शायर इस मंज़र को दिखाता तो बच्चों को खेलते-कूदते चलना बयान कर देता, लेकिन बारीकबीन शायर की निगाह इस पर पड़ती है कि बच्चे अकेले नहीं हैं, बल्कि अपने से बड़ी उम्र वालों के साथ हैं, इसलिए खुलकर खेल नहीं सकते। फिर भी बच्चे हैं और बच्चों की ख़ासियतें न दिखाई जाएँ तो वाक़ये की असली तस्वीर नहीं खिंचती, इसलिए कहता है कि बंद खोले हुए साथ-साथ थे।
कुछ जगह सिर्फ़ बारीकियों के अदा करने से मुहाकात (चित्रण) होती है
लेकिन हर जगह किसी चीज़ या वाक़ये के तमाम हिस्सों की मुहाकात ज़रूरी नहीं। चित्रकला के माहिर जानते हैं कि अक्सर कमाल का चित्रकार तस्वीर के कुछ हिस्से ख़ाली छोड़ देता है, लेकिन और अंगों या हिस्सों की तस्वीर इस ख़ूबी के साथ खींचता है कि देखने वाले की नज़र छूटे हुए हिस्से को ख़ुद पूरा कर लेती है। इसको मिसाल में यूँ समझो कि काग़ज़ पर जो तस्वीर होती है उसमें गहराई नहीं हो सकती क्योंकि काग़ज़ में ख़ुद गहराई नहीं, इसके बावजूद काग़ज़ पर निहायत मोटे आदमी की तस्वीर बना सकते हैं। इसकी वजह यही है कि चूँकि तस्वीर में लंबाई और चौड़ाई मौजूद होती है इसलिए उसकी मुनासिबत से कल्पना शक्ति ख़ुद, मोटाई और भारीपन पैदा कर लेती है और हमको तस्वीर में उसी तरह मोटापा महसूस होता है जिस तरह लंबाई और चौड़ाई महसूस होते हैं। शायर अक्सर कोई वाक़या या कोई समाँ बाँधता है और तमाम हालात का पूरा ब्योरा नहीं देता, लेकिन चंद ऐसी नुमायाँ ख़ासियतें अदा कर देता है कि पूरा वाक़या या पूरा समाँ आँखों के सामने आ जाता है।
बनफ़्शा तुर्रा-ए-मफ़्तूल ख़ुद गिरह मेज़द
सबा हिकायत-ए-ज़ुल्फ़-ए-तो दरमियाँ अंदाख़्त
शेर का असल मतलब सिर्फ़ इस क़दर है कि बनफ़्शा माशूक़ की ज़ुल्फ़ का मुक़ाबला नहीं कर सकता। इसको शायराना अंदाज़ में इस तरह अदा किया है, कि गोया बनफ़्शा एक माशूक़ है, वह अपनी ज़ुल्फ़ें सँवार रही थी और अपनी अदाओं पर इतरा रही थी कि इत्तेफ़ाक़ से किसी तरफ़ से सबा (हवा) (जिसको एक तमाशाई औरत फ़र्ज़ किया है) आ निकली। उसने माशूक़ की ज़ुल्फ़ों का ज़िक्र छेड़ दिया, अचानक बनफ़्शा शर्मा कर रह गई। बनफ़्शा का शर्मा जाना शेर में ज़िक्र नहीं है, और इस तमाम मंज़र में वही वाक़ये की जान है, लेकिन हालत का समाँ इस तरह खींचा है कि शर्मा जाना ख़ुद-ब-ख़ुद लाज़िमी नतीजे के तौर पर सामने आ जाता है।
हाँ वह नहीं ख़ुदा-परस्त जाओ वह बेवफ़ा सही
जिसको हो जान-ओ-दिल अज़ीज़ उसकी गली में जाए क्यों
इस शेर में उस हालत की तस्वीर खींची है कि आशिक़ इश्क़ में डूबा हुआ है, लोग उसके पास जाकर उसको समझाते हैं कि माशूक़ बेवफ़ा है, उससे दिल लगाना बेफ़ायदा है। आशिक़ झुँझलाकर कहता है, अच्छा है तो है, जिसको अपनी जान प्यारी है वह उससे दिल ही क्यों लगाता है, यानी मैंने अपनी जान पर खेलकर उससे दिल लगाया है। मेरा इश्क़ उसकी वफ़ा पर निर्भर नहीं। इस शेर में यह अल्फ़ाज़ कि लोग आशिक़ को समझाते हैं, इश्क़ माशूक़ की वफ़ा का पाबंद नहीं बिल्कुल छोड़ दिए गए हैं, लेकिन और वाक़यात इस तरह और इस अंदाज़ से अदा किए हैं कि छोड़े गए जुमले ख़ुद-ब-ख़ुद समझ में आ जाते हैं और तस्वीर का यह छूटा हुआ हिस्सा ख़ुद नज़र के सामने आ जाता है।
चेतावनी
यहाँ यह नुक्ता निहायत तवज्जो के साथ ध्यान में रखना चाहिए कि इन मौक़ों पर ग़लती का सख़्त अंदेशा है। अक्सर अशआर जो पेचीदा और समझ से बाहर हो जाते हैं, उसकी वजह यही होती है कि शायर मज़मून का कुछ हिस्सा छोड़ जाता है और समझता है कि आसपास का मसाला इस ख़ालीपन को भर देगा, हालाँकि वह उसको नहीं भर सका। इसी क़िस्म के अशआर कुछ जगह बेमानी बन जाते हैं।
विरोधी पहलू का दिखाना
मुहाकात की पूर्णता कभी-कभी विरोधी पहलू दिखाने से होती है। एक सफ़ेद चीज़ के सामने काली चीज़ रख दी जाए तो सफ़ेदी और ज़्यादा उजागर हो जाएगी। इसी तरह अक्सर किसी हालत को ज़्यादा उजागर करने में यह तरीक़ा काम आता है कि उसका विरोधी पहलू दिखाया जाए, मसलन:
बरहना दवाँ, दुख़्त-ए-अफ़रासियाब
(अफ़रासियाब की बेटी, नंगी)
बर रुस्तम आमद, दो दीदा पुर आब
(रुस्तम के पास दौड़ती और रोती आई)
मनीज़ा अफ़रासियाब की बेटी थी जो बीजन पर आशिक़ हो गई थी और इस जुर्म पर अफ़रासियाब ने उसको घर से निकाल दिया था। जब उसने रुस्तम का आना सुना तो उसके पास रोती हुई गई। इस मौक़े पर फ़िरदौसी को मनीज़ा की बेकसी और दयनीयता की तस्वीर दिखानी है, इसलिए एक तरफ़ तो उसको 'दुख़्त-ए-अफ़रासियाब' के लफ़्ज़ से पुकारता है ताकि उसकी इज़्ज़त और सम्मान का तसव्वुर सामने आए, दूसरी तरफ़ कहता है कि वह नंगी दौड़ती हुई आई, जिससे उसका अपमान साबित होता है। इन दोनों पहलुओं के दिखाने से मनीज़ा का बेकस और क़ाबिल-ए-रहम होना साकार बनकर सामने आ जाता है।
मनीज़ा मनम दुख़्त-ए-अफ़रासियाब
(मैं अफ़रासियाब की बेटी मनीज़ा हूँ)
बरहना नदीदा तनम आफ़ताब
(मेरा जिस्म आफ़ताब ने भी बरहना नहीं देखा)
बराए यके बीजन-ए-शोर-बख़्त
(कमबख़्त बीजन के लिए)
फ़तादम ज़े ताज ओ फ़तादम ज़े तख़्त
(मेरा ताज और तख़्त सब जाता रहा)
यह दोनों शेर भी इसी वजह से असरदार हैं कि विरोधी हालतें पेश की हैं। यानी जिसको आफ़ताब ने नंगा नहीं देखा वह एक बदबख़्त की वजह से इस हालत में गिरफ़्तार है।
तश्बीह (उपमा) के ज़रिए से मुहाकात
मुहाकात का एक बड़ा साधन तश्बीह है। अक्सर एक चीज़ की असली तस्वीर जिस तरह तश्बीह से दिखाई जा सकती है वह दूसरे तरीक़े से अदा नहीं हो सकती, लेकिन चूँकि तश्बीह की बहस आगे तफ़्सील से आएगी इसलिए इस मौक़े पर हम इसको छोड़ देते हैं।
अस्पष्ट तरीक़े से मुहाकात
हालाँकि जैसा कि हम ऊपर लिख आए हैं, मुहाकात का कमाल यही है कि उस चीज़ की पूरी तस्वीर खींची जाए जिसका तरीक़ा यह है कि तमाम बारीकियों का पूरा ब्योरा दिया जाए, या कुछ बारीकियों को उजागर करके दिखाया जाए, लेकिन कुछ जगह मुहाकात के असरदार होने के लिए यह ज़रूरी है कि तस्वीर ऐसी धुँधली खींची जाए कि अक्सर हिस्से अच्छी तरह नज़र न आएँ।
रूहों की दुनिया या फ़रिश्तों की जो फ़र्ज़ी तस्वीर खींची जाती है, उसमें सूरतों को और लिबास को उजागर नहीं करते क्योंकि इंसान पर एक चीज़ की महानता का असर उस वक़्त ज़्यादा पड़ता है जब वह अच्छी तरह नज़र न आए। विशाल समंदर की तस्वीर इस तरह खींचते हैं कि मौजें, और आसमान की फ़ज़ा धुँधली नज़र आए। अँधेरी रातों में दूर से जंगल में कोई धुँधला सा अक्स नज़र आता है तो इंसान भयभीत हो जाता है कि मालूम नहीं किस दर्जे की भयानक चीज़ है।
इसी तरह कभी-कभी जब किसी चीज़ की महानता की तस्वीर खींचना मक़सद होता है, तो तस्वीर के हिस्से स्पष्ट नहीं किए जाते और घटना के तमाम हिस्सों का ज़िक्र नहीं किया जाता। बर्क ने लिखा है कि मिल्टन की 'पैराडाइज़ लॉस्ट' (खोया हुआ स्वर्ग) में सबसे ज़्यादा शायरी उस मौक़े पर इस्तेमाल की गई है, जहाँ शैतान की तारीफ़ है और वहाँ इसी तरीक़े से काम लिया गया है।
फ़ारसी में इसकी मिसाल इस प्रकार है:
मगर शह नदानद कि दर रोज़े जंग मा
(क्या बादशाह नहीं जानता कि लड़ाई के दिन)
चि सरहा बुरीदम दर अक़्साए ज़ंग
(सेना में मैंने कितने सिर काटे)
ब यक ताख़्तन ता कुजा ताख़्तम
(एक हमले में कहाँ से कहाँ पहुँच गया)
चि गर्दन कशाँ रा सर अन्दाख़्तम
(कितने बाग़ियों के सिर उड़ा दिए)
यह वह मौक़ा है जहाँ सिकंदर ने दारा को ख़त लिखा है और अपने कारनामे बयान करता है। अगर इस मौक़े पर यह बता देता कि वह कहाँ से कहाँ तक गया था, तो वह बात पैदा न होती जो इस संक्षेप से पैदा होती है:
ब यक ताख़्तन ता कुजा ताख़्तम
तख़य्युल (कल्पना) की विस्तृत चर्चा
हालाँकि मुहाकात (चित्रण) और तख़य्युल (कल्पना) दोनों शेर के तत्व हैं। लेकिन हक़ीक़त यह है कि शायरी दरअसल कल्पना का ही नाम है। चित्रण में जो जान आती है वह कल्पना से ही आती है, वरना केवल चित्रण नक़ल करने से ज़्यादा कुछ नहीं। चित्रण की शक्ति का यह काम है कि जो कुछ देखे या सुने, उसको शब्दों के ज़रिए हूबहू बयान कर दे। लेकिन इन चीज़ों में एक ख़ास क्रम पैदा करना, अनुपात और तालमेल को काम में लाना, उन पर रंग-रूप चढ़ाना, कल्पना शक्ति का काम है। कल्पना शक्ति अलग-अलग रूपों में काम करती है।
(1) शायर की नज़र में इस दुनिया और कल्पना शक्ति से एक और ही दुनिया बन जाती है। हम सृष्टि को दो हिस्सों में बाँटते हैं: चेतन और अचेतन। लेकिन शायर की कल्पना की दुनिया का ज़र्रा-ज़र्रा जानदार और होश, अक़्ल और जज़्बातों से भरा हुआ है। सूरज, चाँद, सितारे, सुबह, शाम, गोधूलि, बाग़, फूल, पत्ते, सब उससे बातें करते हैं। सब उसके राज़दार हैं, सबसे उसके ताल्लुक़ात हैं। वह मिलन की रात और मिलन की सुबह को इस तरह संबोधित करता है:
ऐ शब! अगरत हज़ार कार अस्त मरौ
(ऐ रात! तुझे आज हज़ारों काम सही, लेकिन न जा)
ऐ सुब्ह गरत हज़ार शादी अस्त मख़न्द
(ऐ सुबह! तुझे हज़ारों ख़ुशियाँ सही, लेकिन न हँस)
मिलन की रात में वह आसमान से कहता है:
न गोयम ऐ फ़लक कज़ कजरवीहायत तो बर गर्दी
(ऐ आसमान! मैं तुझसे यह तो नहीं कहता कि तू अपनी टेढ़ी चाल से बाज़ आ)
शब-ए-वस्ल अस्त, ख़्वाहम ईं क़दर आहिस्ता तर गर्दी
(लेकिन इतना कि आज मिलन की रात है, ज़रा आहिस्ता चल कि जल्दी सुबह न हो)
प्रकृति की दुनिया शायर के प्रभाव में है, वह सब पर हुकूमत करता है, और उनसे काम लेता है। जब उसे अपने आश्रयदाता (जिसकी वह तारीफ़ करता है) के ताज पर मोती टाँकने की ज़रूरत पेश आती है, तो वह प्रकृति के कार्यकर्ताओं के नाम आदेश जारी करता है:
अलम बरकश ऐ आफ़ताब-ए-बुलंद
(ऐ सूरज! बुलंद हो)
ख़रामाँ शो, ऐ अब्र-ए-मुश्कीन परंद
(ऐ बादल! चल)
बबार ऐ हवा, क़तरा-ए-नाब रा
(ऐ हवा! पानी बरसा)
बगीर ऐ सदफ़, दुर कुन आँ आब रा
(ऐ सीप! इस पानी के क़तरे को मोती बना)
बर आ ऐ दुर अज़ क़ा'र-ए-दरिया-ए-ख़्वेश
(ऐ मोती! दरिया की तह से निकल)
ब ताज-ए-सर-ए-शाह कुन जाए ख़्वेश
(और बादशाह के ताज पर जाकर जगह ले)
सृष्टि के कण-कण उससे अजीब-अजीब राज़ कहते हैं, मिसाल के तौर पर:
गिले ख़ुशबूए दर हम्माम रोज़े
(मुझको एक दिन, एक दोस्त)
फ़िताद अज़ दस्त-ए-महबूबे ब-दस्टम
(ने, ख़ुशबूदार मिट्टी दी)
बदो गुफ़्तम कि मुश्की या अबीरी
(मैंने उससे कहा तू मुश्क है या अबीर)
कि अज़ बू-ए-दिल-आवेज़-ए-तो मस्तम
(कि मैं तेरी ख़ुशबू से मस्त हुआ जाता हूँ)
बगुफ़्ता मन गिले नाचीज़ बूदम
(बोली कि मैं एक नाचीज़ मिट्टी थी)
व-लेकिन मुद्दते बा-गुल निशस्तम
(लेकिन कुछ दिन फूल की सोहबत में रही)
जमाल-ए-हम-नशीं दर मन असर कर्द
(साथी के सौंदर्य ने मुझमें असर कर दिया)
व-गर्ना मन हमाँ ख़ाकम कि हस्तम
(वरना मैं तो अब भी वही मिट्टी हूँ जो पहले थी)
इसी दुनिया की एक और घटना है:
यके क़तरा-ए-बाराँ ज़-अब्रे चकीद
(पानी का एक क़तरा बादल से टपका)
ख़जिल शुद चू पहना-ए-दरिया बदीद
(दरिया का पाट देखकर शरमाया)
कि जाए कि दरियास्त मन कीस्तम
(कि दरिया के होते मैं क्या चीज़ हूँ)
गर ओ हस्त हक़्क़ा कि मन नीस्तम
(अगर दरिया है तो सचमुच मैं नहीं हूँ)
चू ख़ुद रा ब-चश्म-ए-हक़ारत बदीद
(चूँकि उसने अपने-आप को तुच्छ समझा)
सदफ़ दर कनारश ब-जान परवरीद
(इसलिए सीप ने उसको अपनी गोद में पाला)
इस दुनिया में शायर के जीवन का इतिहास अजीब दिलचस्पियों से भरा होता है। बुलबुल ने इसी दुनिया में उससे गीत गाने की तालीम पाई है, परवाने उसके साथ के खेले हुए हैं, शमा से रात-रात भर वह अपने दिल का दर्द कहता रहा है, सुबह की हवा को अक्सर उसने संदेशवाहक बनाकर महबूब के यहाँ भेजा है, कई बार उसने कली का ठीक उस वक़्त पर्दाफ़ाश किया जब वह माशूक़ की मुस्कान चुरा रही थी।
शायर का एहसास बहुत ही सूक्ष्म, तेज़ और उत्तेजित होता है। आम लोगों की भावनाएँ भी ख़ास-ख़ास हालतों में उत्तेजित हो जाती हैं और उस वक़्त वे भी प्रकृति के नज़ारों को इसी तरह संबोधित करने लगते हैं। सोचिए, एक औरत जिसका जवान बेटा मर गया है, वह किस-किस तरह मौत को, आसमान को, ज़मीन को कोसती है, किस तरह उनसे बातें करती है। उसे साफ़ नज़र आता है कि ये सब उसके दुश्मन हैं। इन्हीं ने उसके प्यारे बेटे को उससे छीन लिया है, उन्होंने जानबूझकर उस पर ज़ुल्म किया है। लेकिन शायर के तमाम एहसास और जज़्बात बहुत ही संवेदनशील, तेज़ और जल्दी भड़कने वाले होते हैं। वह माशूक़ की गली में जाता है, तो उसे स्पष्ट रूप से दर-ओ-दीवार से एक आनंद महसूस होता है। उसे वह एक ख़ास निशानी मानता है कि माशूक़ घर में मौजूद है, क्योंकि जब कभी माशूक़ घर में नहीं होता तो उसे यह आनंद महसूस नहीं होता। इसी आधार पर शायर कहता है:
मगर अज़ ख़ाना बरूँ बूद कि शब दर कूयश
(शायद वह कल घर में न था, क्योंकि कल मुझको)
हेच ज़ौक़म ज़-निगाह-ए-दर-ओ-दीवार न बूद
(दर-ओ-दीवार को देखने से कुछ आनंद नहीं मिलता था)
दुनिया की घटनाओं पर जब वह सबक़ लेने की नज़र डालता है, तो एक-एक ज़र्रा उपदेशक बनकर उसे नैतिकता और महानता की तालीम देता है। इस दुनिया में वह जब क़ब्रिस्तान में जा निकलता है, तो पुरानी हड्डियाँ स्पष्ट रूप से उसे संबोधित करती हैं:
कि ज़िन्हार, अगर मरदी आहिस्ता तर
(भाई! ज़रा देखकर चल)
कि चश्म ओ बिनागोश दरवे अस्त ओ सर
(यहाँ आँखें हैं, चेहरे हैं, सिर हैं)
शौक़ की दुनिया में वह फूल हाथ में उठा लेता है तो उसे साफ़ माशूक़ की ख़ुशबू आती है और फूल को संबोधित करके कहता है...
ऐ गुल ब-तो ख़ुरसन्दम तो बू-ए-कसे दारी
ये बातें किसी और की ज़बान से अदा हों तो हम उसे मजनूं (पागल) समझेंगे, लेकिन शायर इस अंदाज़ से कहता है कि सुनने वालों पर असर होता है, क्योंकि जो कुछ वह कहता है, असर में डूबा हुआ होता है और एक असली हालत की तस्वीर होता है। शायर कभी-कभी ख़ुद इक़रार करता है कि जो कुछ वह देख रहा है, मुमकिन है कि वह सच में न हो, सिर्फ़ उसी को ऐसा नज़र आता है, लेकिन इस बात को भी वह इस अंदाज़ से कहता है कि उसके प्रभावित होने से, सब प्रभावित हो जाते हैं, मसलन,
दारो जमाल रू-ए-तो, इमशब तमाशा-ए-दिगर
(तेरा हुस्न ही आज की रात कुछ बढ़ गया है)
या आन कि मन मे बीनमश, बेहतर ज़ शबहा-ए-दिगर
(या कुछ मुझी को और रातों की बनिस्बत ज़्यादा ख़ुशनुमा मालूम होता है)
(2) यह ख़याल नहीं करना चाहिए कि तख़य्युल (कल्पना) सिर्फ़ ख़याली और जादुई सूरतों का नाम है, जो जज़्बात के हावी होने के वक़्त नज़र आती हैं। तख़य्युल ने अक्सर वह राज़ खोले हैं जो न सिर्फ़ आम लोगों बल्कि ख़ास लोगों की नज़र से भी छिपे हुए थे। बारीकी पैदा करना और सच्चाई को तौलना जो फ़लसफ़े (दर्शन) की बुनियाद है, तख़य्युल ही का काम है। इसी आधार पर शायरी और फ़लसफ़ा दो बराबर दर्जे की चीज़ें मानी गई हैं क्योंकि दोनों में तख़य्युल एक समान काम करती है। होमर यूनान का मशहूर शायर उस ज़माने में था, जब यूनान में फ़लसफ़े का वजूद भी न था और इस वजह से वह फ़लसफ़े वग़ैरह से अनजान था, फिर भी अरस्तू ने अपनी किताब 'अल-मंतिक़' में शायर के जो इल्मी उसूल (वैज्ञानिक सिद्धांत) निर्धारित किए, उसी के कलाम से किए हैं, चुनांचे हर जगह उसके हवाले देता है। गीज़ो जो फ्रांस का मशहूर लेखक है, लिखता है,
होमर के शेर में जो ये बातें नज़र आती हैं कि वह भलाई और बुराई, कमज़ोरी और ताक़त, फ़िक्र और जज़्बात को साथ-साथ दिखाता है और ख़यालात और कथनों की विविधता और फ़ितरत (प्रकृति) के हालात को इस विस्तार और रंग-बिरंगे तरीक़ों से लिखता है कि शायराना जज़्बात को उत्तेजना मिलती है जिसकी मिसाल नहीं मिल सकती। इसकी वजह यह है कि उसके कलाम में हर असल की असल और इंसान और इस पूरी कायनात की हक़ीक़त दर्ज है।
अरस्तू ने इल्म-उल-अख़लाक़ (नीतिशास्त्र) पर जो किताब लिखी और जो मुहक़्क़िक़ तूसी और जलालुद्दीन दवानी के ज़रिए से फ़ारसी ज़बान में आ गई है, हमारे सामने है। लेकिन शायरी ने फ़लसफ़ा-ए-अख़लाक़ (नैतिक दर्शन) के जो नुक्ते अदा किए, वे अरस्तू की किताब में नहीं मिलते। न सिर्फ़ अख़लाक़ बल्कि दिल की आपबीती, इंसानी फ़ितरत, और आम समाज के मुताल्लिक़, शायरों ने जो दार्शनिक नुक्ते पैदा किए, फ़लसफ़े की किताबें उनसे ख़ाली हैं।
तख़य्युल (कल्पना), मानी हुई और तयशुदा बातों को सरसरी नज़र से नहीं देखती बल्कि दोबारा उन पर परख की नज़र डालती है और बात में बात पैदा करती है। मसलन तर्कशास्त्रियों ने तमाम चीज़ों की दो क़िस्में की हैं: बदीही (स्वयंसिद्ध) और नज़री (सैद्धांतिक)। बदीही उन चीज़ों को कहते हैं जो ग़ौर और फ़िक्र की मोहताज नहीं, इस आधार पर वे स्वयंसिद्ध बातों के मुताल्लिक़ ग़ौर-ओ-फ़िक्र को ज़रूरी नहीं समझते लेकिन शायर कहता है,
हर कस न शनासंदा-ए-राज़ अस्त व-गर-न
(हर शख़्स राज़ का जानकार नहीं वरना)
ईं-हा हमा राज़ अस्त कि मफ़हूम-ए-अवाम अस्त
(ये चीज़ें जो अवाम की मालूमात हैं सब के सब राज़ हैं)
सैकड़ों मसलों को लोग यक़ीनी और स्वयंसिद्ध समझते थे, लेकिन आज की नई तहक़ीक़ात (खोजों) ने साबित कर दिया कि वे ग़लत थे, इसलिए ग़ौर-ओ-फ़िक्र के मोहताज थे। आधुनिक साइंस ने आज साबित किया कि हर चीज़ गतिशील है, जिन चीज़ों को हम स्थिर समझते हैं, उनके भी ज़र्रे गतिशील हैं, हालाँकि हमको महसूस नहीं होते, हमारे शायर ने आज से दो सौ बरस पहले शायराना अंदाज़ में कहा था,
मौज-एम कि आसूदगी-ए-मा अदम-ए-मा अस्त
(हम मौज हैं, हमारा ठहर जाना हमारा फ़ना हो जाना है)
ज़िंदा ब-आनेम कि आराम न गीरेम
(हमारी ज़िंदगी यही है कि हम चैन से न बैठें)
फ़लसफ़े से साबित होता है कि पूरी दुनिया में विपरीत चीज़ें हैं और उनमें मुक़ाबला और टकराव है। मसलन गर्मी और सर्दी, स्थिरता और गति, विघटन और संयोजन, बहार और पतझड़, अंधेरा और रोशनी, इज़्ज़त और ज़िल्लत, सब्र और ग़ुस्सा, पवित्रता और पाप, उदारता और कंजूसी। इन्हीं की आपसी कशमकश और संतुलन से यह दुनिया क़ायम है वरना अगर इनमें सुलह हो जाए यानी सिर्फ़ एक तरह की चीज़ें रह जाएं तो दुनिया बर्बाद हो जाए, इस नुक्ते को मौलाना रूम ने इन मुख़्तसर लफ़्ज़ों में अदा कर दिया,
ईं जहाँ जंग अस्त कुल चूँ बिंगरी
आम तौर पर यह माना जाता है कि बहस और तक़रीर और वाद-विवाद और संवाद के लिए बड़ी लियाक़त (क़ाबिलियत) दरकार है लेकिन ख़्वाजा अत्तार फ़रमाते हैं,
बाज़ बायद फ़हम-ओ-अक़्ल-ए-बे-क़यास
ता शवद ख़ामोश यक हिकमत-शनास
यानी बोलने के लिए जितनी अक़्ल दरकार है, चुप रहने के लिए उससे भी ज़्यादा अक़्ल दरकार है, क्योंकि जब इंसान तहक़ीक़ (खोज) और तजुर्बे के तमाम मरहले तय कर चुकता है, उस वक़्त उसको यह मालूम होता है कि जो कुछ उसने अब तक जाना यह सब हेच (कुछ नहीं) था। चुनांचे सुक़रात से जब लोगों ने पूछा कि आपको इतने दिनों की ग़ौर-ओ-फ़िक्र के बाद क्या मालूम हुआ? तो उसने कहा यह मालूम हुआ कि कुछ नहीं मालूम हुआ। और जब यह मर्तबा हासिल होगा तो इंसान अपने आप चुप हो जाएगा, इसलिए चुप होने के लिए बोलने से ज़्यादा अक़्ल और तजुर्बा दरकार है।
जब्र-ओ-क़द्र (नियति और स्वतंत्र इच्छा) के मसले में बड़े ग़ौर और फ़िक्र के बाद स्वतंत्र इच्छा के समर्थकों ने यह तर्क दिया था कि हमारा इरादा हमारा अपना ऐच्छिक काम है, इसलिए हम मजबूर नहीं बल्कि मुख़्तार (स्वतंत्र) हैं, लेकिन सहाबी ने इस तर्क की ग़लती का पर्दा इस तरह फ़ाश किया,
बे-हुक्मश नेस्त हर सरज़द अज़ मा
मामूरा-ए-ओस्त नफ़्स-ए-अम्मारा-ए-मा
यानी यह हमारा इख़्तियार भी मजबूरी है, हमारा नफ़्स हमको बेशक हुक्म देता है, लेकिन इस हुक्म देने में वह ख़ुद किसी और का महकूम (अधीन) है। ग़रज़ इस क़िस्म के सैकड़ों हज़ारों नुक्ते हैं जो क़ुव्वत-ए-तख़य्युल (कल्पना शक्ति) ने हल किए हैं। दार्शनिक शायरी पर जहाँ रिव्यू आएगा वहाँ इसकी मिसालें कसरत से मिलेंगी।
क़ुव्वत-ए-तख़य्युल के तर्क का तरीक़ा आम तर्क से अलग होता है, वह उन बातों को जो और तरह से साबित हो चुकी हैं, नए तरीक़े से साबित करती है। यह तर्क का तरीक़ा हालाँकि एक क़िस्म का तार्किक भ्रम होता है, या भाषण-कला पर आधारित होता है। लेकिन क़ुव्वत-ए-तख़य्युल के आलम से शायर इसको इस अंदाज़ में बयान करता है कि सुनने वाला इसके सही या ग़लत होने की तरफ़ ध्यान नहीं दे सकता, बल्कि इसकी दिलफ़रेबी (आकर्षण) से मंत्रमुग्ध हो जाता है और बे-साख़्ता (अनायास) 'आमन्ना' (हमने मान लिया) बोल उठता है। मसलन यह बात कि जो लोग पहुंचे हुए और साहब-ए-कमाल होते हैं वे ख़ाकसार (विनम्र) होते हैं। इसको शायर इस तरह साबित करता है,
फ़रोतनी अस्त दलील-ए-रसीदगान-ए-कमाल
(ख़ाकसारी, कामिल होने की दलील है)
कि चूँ सवार ब-मंज़िल रसद पियादा शवद
(क्योंकि सवार जब मंज़िल पर पहुँच जाता है तो पियादा (पैदल) हो जाता है)
इज़्ज़त-ए-शाह-ओ-गदा ज़ेर-ए-ज़मीं यकसाँ अस्त
मी कुनद ख़ाक बरा-ए-हमा कस जा ख़ाली
क़ब्र में जाकर बादशाह और फ़क़ीर सब बराबर हो जाते हैं और सबकी इज़्ज़त एक समान रह जाती है। इस दावे को शायर यूँ साबित करता है कि देखो ज़मीन सब के लिए जगह ख़ाली कर देती है, (जगह ख़ाली करना ताज़ीम (सम्मान) को कहते हैं)
रौशन-दिलान ख़ुशामद-ए-शाहाँ न करदा अंद
आईना ऐब-पोश-ए-सिकंदर नमी शवद
यानी जो लोग रौशन-दिल और साफ़ नीयत वाले हैं वे बादशाहों और अमीरों की ख़ुशामद नहीं करते। इसका सुबूत यह है कि आईने ने सिकंदर की ऐब-पोशी (दोष छिपाना) नहीं की। हालाँकि (बक़ौल शायर) आईना सिकंदर ही की ईजाद है।
क़त-ए-उम्मीद करदा न-ख़्वाहद नईम-ए-दहर
शाख़-ए-बुरीदा रा नज़रे बर-बहार नेस्त
यानी जिसने उम्मीद छोड़ दी, उसको फिर दुनिया के ऐश-ओ-आराम की परवाह नहीं रहती, जो शाख़ पेड़ से काट ली जाती है, उसको बहार का इंतज़ार नहीं होता।
रोशनदिलाँ, हुबाब सिफ़त दीदा बस्ता अंद
रौज़न चे एहतियाज अगर ख़ाना तार नीस्त
यानी जो लोग रोशन-दिल हैं, वे बाहरी आँखें बंद कर लेते हैं, और दिल की आँखों से देखते हैं। इसलिए सूफ़ियों के तमाम अनुभव दिल की बातें होते हैं, जिनका बाहरी नज़र से कोई ताल्लुक़ नहीं। इसको शायर इस तरह साबित करता है कि घर अगर ख़ुद रोशन है तो रोशनदान और खिड़की की क्या ज़रूरत है। जिस तरह बुलबुले का घर ख़ुद रोशन है, इसलिए उसमें रोशनदान और खिड़की नहीं होती।
वजह और असर, और कारण और नतीजों का आम तौर पर जो सिलसिला माना जाता है, शायर के तख़य्युल (कल्पना की ताक़त) का सिलसिला उससे बिल्कुल अलग है। वह तमाम चीज़ें अपने नज़रिए से देखता है और ये तमाम चीज़ें उसको एक सिलसिले में जुड़ी हुई नज़र आती हैं। हर चीज़ का मक़सद, लक्ष्य, कारण, वजह और नतीजे, उसके नज़दीक वह नहीं जो आम लोग समझते हैं। मसलन,
दर अदम, हम ज़े इश्क़ शोरे हस्त
गुल गरेबाँ दरीदा मी आयद
फूल जो खिलता है उसको 'गरेबाँ दरीदा' (फटे हुए गरेबाँ वाला) कहते हैं। शायर कहता है कि अदम (शून्यता) में भी इश्क़ का चर्चा है और वहाँ भी लोग इश्क़ और मुहब्बत के जोश में कपड़े फाड़ डालते हैं, इसलिए फूल जो अदम की दुनिया से आया है, फटे हुए गरेबाँ के साथ आया है,
बुरक़ा ब-रुख़ अफ़गंदा बुरद नाज़ ब-बाग़श
ता निगहत-ए-गुल बेख़्ता आयद ब-दिमाग़श
माशूक़ जाली का नक़ाब पहन कर बाग़ की सैर को निकला। शायर को अपने तख़य्युल से यह नज़र आता है कि माशूक़ चूँकि निहायत नाज़ुक और नाज़ुक-मिज़ाज है, इसलिए चाहता है कि फूलों की ख़ुशबू दिमाग़ में आए तो छन कर आए, इसलिए उसने जाली का नक़ाब पहन लिया है।
ज़ाहिद ज़े ख़ुदा इरम ब-दावा तलबद
शद्दाद हमाना, पिसर दाश्ता अस्त
शायर को मालूम है कि शद्दाद एक शख़्स था जिसने एक जन्नत बनाई थी, और उसका नाम इरम रखा था। फ़रिश्ते ख़ुदा के हुक्म से उस जन्नत को उड़ा ले गए और अब वह और जन्नतों के साथ शामिल है। शायर को यह भी मालूम है कि ज़ाहिदों (धार्मिक लोगों) को दावा होता है कि उनको जन्नत ज़रूर मिलेगी। अब शायर का तख़य्युल यह नतीजा पैदा करता है कि ग़ालिबन ज़ाहिद शद्दाद के ख़ानदान में से है, इसलिए उसको दावा है कि जन्नत चूँकि उसके पूर्वज (शद्दाद) की विरासत है, इसलिए उसको विरासत में ज़रूर मिलेगी।
वज़ा-ए-ज़माना क़ाबिल-ए-दीदन दोबारा नीस्त
(ज़माने की हालत, दोबारा देखने के क़ाबिल नहीं)
रू पस न कर्द हर कि अज़ीं ख़ाकदाँ गुज़श्त
(इसीलिए जो यहाँ से जाता है फिर वापस नहीं आता)
यह सब जानते हैं कि कोई शख़्स मर कर ज़िंदा नहीं होता। शायर के नज़दीक इसकी वजह यह है कि दुनिया की बुराइयाँ और दुख इस क़ाबिल नहीं कि कोई शख़्स इसको एक दफ़ा देखकर दोबारा देखना चाहे, इसलिए जो शख़्स दुनिया से जाता है फिर वापस नहीं आता।
सिपेहर मर्दुम-ए-दूँ रा कुनद ख़रीदारी
बख़ील सू-ए-मताए रवद कि अर्ज़ां अस्त
अक्सर नालायक़ लोग बड़े मर्तबे पर पहुँच जाते हैं। शायर के नज़दीक इसकी वजह यह है कि कंजूस जब कोई चीज़ ख़रीदने बाज़ार में जाता है तो सस्ती ही चीज़ों की तरफ़ झुकता है। इसलिए ज़माना भी नीच और नालायक़ आदमियों की तरफ़ तवज्जो करता है।
दीदी कि ख़ून-ए-नाहक़-ए-परवाना शम्अ रा
(तुमने देखा! परवाने के नाहक़ ख़ून ने शमा को)
चंदाँ अमाँ नदाद कि शब रा सहर कुनद
(इतनी मोहलत भी न दी कि एक रात भी ज़िंदा रहने पाती)
परवाना शमा पर गिरकर जल जाता है, शमा सुबह के वक़्त बुझा दी जाती है। अब शायर का तख़य्युल इन वाक़यात से यह नतीजा पैदा करता है कि यह वही परवाने का इंतक़ाम (बदला) है कि शमा एक रात भी ज़िंदा न रहने पाई।
तख़य्युल (कल्पना) एक चीज़ को सौ-सौ दफ़ा देखता है और हर दफ़ा उसको उसमें एक नया करिश्मा नज़र आता है। फूल को तुमने सैकड़ों बार देखा होगा और हर दफ़ा तुमने सिर्फ़ उसके रंग और ख़ुशबू से लुत्फ़ उठाया होगा। लेकिन शायर तख़य्युल के ज़रिए से हर बार नए-नए पहलू से देखता है और हर दफ़ा उसको नया आलम नज़र आता है। वह उसकी ख़ुशबू से लुत्फ़ उठाता है तो बे-साख़्ता (अचानक) माशूक़ की ख़ुशबू याद आ जाती है और कहता है,
ऐ गुल ब-तो ख़ुरसन्दम तो बू-ए-कसे दारी
(ऐ फूल मैं तुझसे ख़ुश हूँ, तुझसे किसी की ख़ुशबू आ रही है)
वह देखता है कि दो ही चार रोज़ के अरसे में फूल का पेड़ उगा, कली फूटी, फूल खिला, और फिर सूख कर गिर पड़ा, इससे उसको ज़माने की बेवफ़ाई का ख़याल आता है और कहता है,
बे-मेहरी-ए-दहर बीं कि दर यक हफ़्ता
(ज़माने की बेरुखी देखो कि एक ही हफ़्ते में)
गुल सर ज़द ओ ग़ुंचा कर्द ओ ब-शुगुफ़्त ओ ब-रीख़्त
(फूल ने सिर निकाला, कली बना, खिला, और फिर गिर पड़ा)
फूल पर शबनम (ओस) देखता है तो कहता है,
न शबनम अस्त चमन रा ब-रू-ए-आतिशनाक
अरक़ ज़े-रू-ए-तो करदा अस्त गुल ब-दामन पाक
यानी शबनम नहीं है बल्कि फूल ने अपने दामन से माशूक़ के चेहरे का पसीना पोंछा है। हरी-भरी टहनी में फूल देखे तो ख़याल पैदा हुआ कि शराब के लाल-लाल गिलास हैं, फिर यह रश्क (ईर्ष्या) हुआ कि काश मैं भी एक हाथ में इस क़दर गिलास ले सकता। इस ख़याल को यूँ अदा करता है,
दीदा-अम शाख़-ए-गुले बर ख़्वेश मे पेचम कि काश
(मैंने एक फूल की शाख़ देखी, मुझको रश्क आता है कि)
मी तवानिस्तम ब-यक-दस्त ईं क़दर साग़र गिरिफ़्त
(काश मैं भी, एक हाथ में इतने प्याले ले सकता)
फूल में जो रेज़े (कण) होते हैं, उनको 'ज़र-ए-गुल' कहते हैं, कली जब खिलती है तो यह मालूम होता है कि गिरह (गाँठ) खुल रही है। इन दोनों बातों को मिलाकर शायर ने यह ख़याल पैदा किया:
दर चमन बाद-ए-सहर, बू-ए-तो सौदा, मी कर्द
(बाग़ में, बाद-ए-सबा, माशूक़ की ख़ुशबू बेच रही थी)
गुल ब-कफ़ दाश्त ज़र ओ ग़ुंचा गिरह वा मी कर्द
(इसलिए उसे ख़रीदने के लिए फूल के हाथ में ज़र (सोना) था, कली गिरह खोल रही थी)
ओछे और कम-ज़र्फ़ (छोटी सोच वाले) लोगों का क़ायदा है कि हर शख़्स से पहली ही मुलाक़ात में बे-तकल्लुफ़ हो जाते हैं और खुल खेलते हैं, लेकिन बा-वक़ार (गंभीर) लोग जब किसी महफ़िल में पहले-पहल शरीक होते हैं तो रुके-रुके रहते हैं। शायर ने देखा कि फूल जब निकलता है तो ग़ुंचा (कली) होता है, फिर खिल कर फूल बन जाता है। इससे उसको ख़याल पैदा हुआ कि यह वही उसूल है। इसलिए कहता है,
दर मजलिसे कि ताज़ा दर आई गिरिफ़्ता बाश
अव्वल ब-बाग़, ग़ुंचा, गिरह बर जबीं ज़नद
'गिरिफ़्ता' के मायने रुके रहने के हैं। 'गिरह बर जबीं ज़दन' (माथे पर शिकन होना) भी इसी के क़रीब है। शेर का मतलब यह है कि जिस महफ़िल में पहले-पहल जाओ तो ख़ुद्दारी के साथ बैठो, कली जब बाग़ में आती है तो उसकी पेशानी पर गिरह होती है।
फूल के पत्ते को हवा में उड़ते देखा, तो यह ख़याल पैदा हुआ कि बाग़ ने ख़त देकर माशूक़ के पास क़ासिद (संदेशवाहक) भेजा है।
बर्ग-ए-गुल रा ब-कफ़-ए-बाद-ए-सबा मे बीनम
(बाद-ए-सबा के हाथ में फूल का पत्ता नज़र आता है)
बाग़ हम जानिब-ए-ऊ नामा-बरे पैदा कर्द
(ग़ालिबन बाग़ ने माशूक़ के यहाँ क़ासिद भेजा है)
सुर्ख़-सुर्ख़ (लाल) फूल देखे, तो ख़याल हुआ कि बाग़ में चराग़ाँ (रोशनी) किया गया है, ऊपर बादल नज़र पड़े तो समझा कि यह उसी का धुआँ है,
अब्र दर सहन-ए-चमन दूद-ए-चराग़ान-ए-गुल अस्त
पुराने ज़माने में दस्तूर (रिवाज़) था कि जब कोई किताब या काग़ज़ बेकार हो जाता था तो उसको पानी से धो डालते थे। शायर ने फूल का पत्ता पानी में तैरता हुआ देखा तो ख़याल पैदा हुआ कि,
दुख़्तर-ए-हुस्न-ए-बहार अस्त के दर अहद-ए-तो शुस्त
बर्ग-ए-गुल नेस्त कि अज़ बाद दर आब उफ़्तादा अस्त
यानी यह फूल का पत्ता नहीं जो पानी में नज़र आ रहा है, बल्कि बहार ने माशूक़ का हुस्न देखकर अपने हुस्न का दफ़्तर पानी से धो डाला।
किसी ख़ूबसूरत, हसीन के हाथ में फूल देखा तो उससे ज़्यादा ख़ुशनुमा मालूम हुआ जितना उस वक़्त मालूम होता था, जब वह टहनी में था, इस आधार पर कहता है,
ज़-ग़ारत-ए-चमनत, बर बहार मिन्नत-हा अस्त
(तूने बाग़ को लूटा तो बहार पर एहसान किया क्योंकि तेरे हाथ में फूल)
कि गह ब-दस्त-ए-तो अज़ शाख़ ताज़ा-तर मान्द
(उससे ज़्यादा ख़ुशनुमा है जितना पहले था यानी जब टहनी में था)
पौ फटते जो रोशनी फैल जाती है, उसको 'शीर-ए-सुब्ह' कहते हैं, मुस्कुराहट और हँसी को शीरीं (मीठा) बाँधते हैं, सुबह के वक़्त फूलों का खिलना निहायत ख़ुशगवार होता है, इन बातों से शायर की कल्पना शक्ति ने यह ख़याल पैदा किया,
शीरीनी-ए-तबस्सुम-ए-हर ग़ुंचा रा मपुर्स
दर शीर-ए-सुब्ह ख़ंदा-ए-गुल-हा शकर गुज़ाश्त
यानी कली की मुस्कुराहट में जो मिठास है उसका बयान नहीं हो सकता, यह मालूम होता है कि शीर-ए-सुब्ह में फूल की हँसी ने शकर घोल दी है।
इस क़िस्म के सैकड़ों ख़यालात हैं जो कल्पना शक्ति ने सिर्फ़ एक फूल से पैदा किए। इससे अंदाज़ा कर सकते हो कि कल्पना शक्ति की बारीक़ियाँ और सूक्ष्मताएँ किस हद तक हैं।
शायर कल्पना शक्ति से तमाम चीज़ों को निहायत बारीक़ नज़र से देखता है, वह हर चीज़ की एक-एक ख़ासियत, एक-एक गुण पर नज़र डालता है, फिर और चीज़ों से उनका मुक़ाबला करता है, उनके आपसी संबंधों पर नज़र डालता है, उनके समान गुणों को ढूँढकर उन सबको एक सिलसिले में पिरोता है। कभी इसके बरख़िलाफ़ जो चीज़ें एक जैसी और एक ही ख़याल की जाती हैं उनको ज़्यादा बारीक़ी की निगाह से देखता है और उनमें फ़र्क़ और अंतर पैदा करता है। नीचे दी गई मिसालों से इसका अंदाज़ा होगा,
चुनाँ बा दोस्त आमेज़ ब-दिल-गर्मी ओ जाँ-सोज़ी
(मैं माशूक़ से इस तरह जोश-ए-शौक़ में लिपटा हूँ)
कि दर हंगाम-ए-जाँबाज़ी ब-दुश्मन, दुश्मन आमेज़द
(जिस तरह लड़ाई में दुश्मन से दुश्मन लिपट जाता है)
दुश्मन का दुश्मन से, और आशिक़ का माशूक़ से मिलना विपरीत हालतें हैं। लेकिन दोनों में शायर ने एक साझा पहलू पैदा कर दिया। आशिक़ मुद्दत के बाद माशूक़ से जब मिलता है तो जिस जोश और तड़प से मिलता है, उसका बाहरी रूप उससे मिलता-जुलता होता है जब दुश्मन, दुश्मन से ग़ुस्से में लिपट जाता है।
ऐ बरहमन! चे ज़नी ताना कि दर माबद-ए-मा
सुबहा नेस्त कि आँ ग़ैरत-ए-ज़ुन्नार-ए-तो नेस्त
ब्राह्मण ताना देता था कि मुसलमानों के पास ज़ुन्नार (जनेऊ) नहीं। शायर कहता है कि आजकल मुसलमानों के कर्म और वचन वही हैं जो काफ़िरों के हैं, इसलिए उनमें और काफ़िरों में फ़र्क़ नहीं। इस आधार पर उनकी तस्बीह ज़ुन्नार से कम नहीं। ज़ुन्नार और तस्बीह बिल्कुल अलग बल्कि विपरीत चीज़ें हैं लेकिन शायर ने दोनों को समानता के लिहाज़ से देखा तो एक निकले।
नाला-ए-मे कशम अज़ दर्द-ए-तो गाहे लेकिन
ता ब-लब मी रसद अज़ ज़ोफ़ नफ़स मे गर्दद
शायरी की मान्यताओं में यह शामिल है कि माशूक़ आशिक़ों की फ़रियाद और आह से ख़ुश होते हैं। शायर इस शेर में माशूक़ को संबोधित करता है कि तू मुझको चुप देखकर यह समझता है कि मैं आह नहीं भरता लेकिन यह सही नहीं, मैं आह भरता हूँ लेकिन कमज़ोरी इस क़दर है कि होंठों तक आते-आते वही आह साँस बनकर रह जाती है, इसमें परोक्ष रूप से यह भी साबित करता है कि मैं हर वक़्त आह भरता हूँ क्योंकि मेरी हर साँस आह ही है। जो कमज़ोरी की वजह से साँस बन गई है।
मन आँ नियम कि हराम अज़ हलाल न-शनासम
शराब बा तो हलाल अस्त ओ आब बे तो हराम
शराब और पानी अलग-अलग नियमों वाली चीज़ें हैं। यानी शराब हराम है और पानी हलाल। शायर कहता है कि दरअसल दोनों का एक ही नियम है। माशूक़ के साथ पी जाए तो शराब और पानी दोनों हलाल हैं और माशूक़ के बग़ैर पी जाए तो दोनों हराम हैं। इस विषय को निहायत सुंदर अंदाज़ में अदा किया है। पहले मिसरे में कहता है कि मैं ऐसा शख़्स नहीं कि हराम और हलाल की मुझको तमीज़ न हो। यानी मैं फ़िक़्ह (इस्लामी धर्मशास्त्र) के मसलों से बाख़बर हूँ और फ़क़ीह (धर्मशास्त्री) हूँ। फिर माशूक़ को संबोधित करके कहता है तेरे साथ शराब पी जाए तो हलाल है और पानी तेरे बग़ैर पिया जाए तो हराम है। दोनों हालतों में दावे के एक-एक हिस्से को छोड़ दिया है क्योंकि कहने की ज़रूरत नहीं।
ब-तकल्लुम ब-ख़ामोशी ब-तबस्सुम ब-निगाह
मी तवाँ बुर्द ब-हर शेवा, दिल आसान अज़ मन
बातचीत और ख़ामोशी बिल्कुल विपरीत चीज़ें हैं, लेकिन चूँकि माशूक़ की ख़ामोशी और बातचीत दोनों दिलरुबा हैं इसलिए दिलरुबाई के गुण के लिहाज़ से दोनों एक समान हैं, इस विषय को निहायत ख़ूबी से अदा किया है। अव्वल तो विरोधाभासी चीज़ों को असर के लिहाज़ से एक समान साबित किया, हालाँकि अलग-अलग चीज़ों का असर अलग होना चाहिए, इसके साथ ब-हर शेवा (हर अंदाज़ से) से यह ख़याल ज़ाहिर होता है कि बातचीत और ख़ामोशी तक ही बात सीमित नहीं बल्कि माशूक़ की जो भी अदा है, दिल छीनने के लिए काफ़ी है। आसान के लफ़्ज़ से यह साबित करना है कि दिल स्वभाव से ही दर्द से परिचित है कि हर अदा पर फ़ौरन लुट जाता है।
कल्पना के लिए सामग्री
अक्सर लोगों का ख़याल है कि कल्पना के लिए जानकारी और अवलोकनों की ज़रूरत नहीं, या है तो बहुत कम, क्योंकि कल्पना का काम वास्तविक चीज़ों पर निर्भर नहीं, वह ख़याली बातों से हर क़िस्म का काम ले सकती है। इसकी इमारत के लिए असंभव बातों का मसाला उसी तरह काम आ सकता है जिस तरह संभव बातों का। वह एक छोटी सी चीज़ से सैकड़ों हज़ारों ख़यालात पैदा कर सकती है। चुनाँचे उन शायरों ने जिन्होंने घटनाओं या अवलोकनों को हाथ तक नहीं लगाया, ख़यालात की एक विविध दुनिया पैदा कर दी। जलाल असीर, ज़ुलाली, शौकत बुख़ारी, बेदिल, नासिर अली वग़ैरह ने सिर्फ़ गुल-ओ-बुलबुल (फूल और बुलबुल) से दीवान तैयार कर दिए और शायरी को ख़यालों का बाग़ बना दिया।
लेकिन यह ख़याल निहायत ग़लत है और इसी ग़लती ने बाद के दौर के शायरों की शायरी को तबाह कर दिया। पहली बात तो यह कि कोई ख़याल अवलोकनों और घटनाओं के बग़ैर पैदा नहीं हो सकता, जिन चीज़ों को नामुमकिन कहते हैं उनका ख़याल भी दरअसल मुमकिन चीज़ों के अवलोकन से ही पैदा हुआ है। मसलन हम कहते हैं कि यह नामुमकिन है कि एक चीज़ एक ही वक़्त में मौजूद भी हो और ग़ायब भी। मौजूद और ग़ायब अलग-अलग मुमकिन हैं, इन दोनों को मिलाकर 'मौजूद-ग़ायब' एक फ़र्ज़ी अवधारणा बनाई तो वह असंभव हो गई, लेकिन यह ज़ाहिर है कि इस मिश्रण के दोनों हिस्से अलग-अलग मुमकिन हैं। शायरी में अक्सर नामुमकिन या ग़ैर-मौजूद चीज़ों से काम लेते हैं। मसलन घोड़े की तेज़ रफ़्तारी की तारीफ़ करते हैं तो 'दरिया-ए-आतिश' (आग का दरिया) कहते हैं,
आतिशे मी दवीद आब चकाँ
शराब को पिघले हुए याक़ूत (माणिक) की उपमा देते हैं। अबू नवास शराब के बुलबुलों की तारीफ़ में कहता है,
हसबा-ए-दुर्रिन अला अर्ज़िन मिन-अज़-ज़हब
(सोने की ज़मीन पर मोती के कंकड़ हैं)
यह सब चीज़ें फ़र्ज़ी हैं, लेकिन उनका ख़याल वास्तविक चीज़ों से पैदा हुआ है। मसलन आग और दरिया अलग-अलग वास्तविक और बाहरी चीज़ें हैं, इन्हीं दोनों को मिलाकर दरिया-ए-आतिश एक ख़याली अवधारणा पैदा कर ली गई और उससे तेज़ घोड़े को उपमा दी गई। इससे साबित होगा कि कोई ख़याल अवलोकनों के बग़ैर पैदा नहीं हो सकता। इसलिए कल्पना के विस्तार के लिए घटनाओं का ज़्यादा से ज़्यादा अवलोकन करना हर हाल में ज़रूरी है।
इब्न-अल-रूमी अरब का मशहूर शायर था। एक दफ़ा उसको किसी ने ताना दिया कि तुम इब्न-अल-मोतज़ से बढ़कर हो। फिर इब्न-अल-मोतज़ जैसी तश्बीहें (उपमाएं) क्यों नहीं पैदा कर सकते? इब्न-अल-रूमी ने कहा कि इब्न-अल-मोतज़ की कोई तश्बीह सुनाओ जिसका जवाब मुझसे न हो सका हो, उसने यह शेर पढ़ा,
फ़ानज़र इलैह कज़ वरक़-ए-मिन फ़िज़्ज़ा
क़द असक़लतहु हमूलतुन मिन अंबर
यह शेर माहे-नौ (नये चाँद) की तारीफ़ में है। शेर का मतलब यह है कि पहली रात का चाँद ऐसा है जिस तरह एक चाँदी की कश्ती जिस पर इस क़दर अंबर लाद दिया गया है कि वह दब गई है। कश्ती पर जब बोझ ज़्यादा हो जाता है तो उसका ज़्यादा हिस्सा पानी में उतर जाता है और सिर्फ़ किनारे दिखाई देते हैं, इसलिए नये चाँद को कश्ती के किनारे से तश्बीह दी है और चूँकि आसमान का रंग नीला होता है इसलिए क़रार दिया कि कश्ती पर अंबर लदा हुआ है। इब्न-अल-रूमी यह सुनकर चीख उठा कि ला युकल्लिफ़ुल्लाहू नफ़्सन इल्ला वुसअहा (ख़ुदा किसी को उसकी ताक़त से ज़्यादा तकलीफ़ नहीं देता) इब्न-अल-मोतज़ बादशाह और बादशाहज़ादा है, घर में जो देखता है वही कह देता है, मैं यह कहाँ से लाऊँ।
चाँदी और अंबर कोई नायाब चीज़ नहीं लेकिन चूँकि इब्न-अल-रूमी ने चाँदी-सोने के बर्तन नहीं देखे थे, इसलिए वह चाँदी की कश्ती का ख़याल पैदा न कर सका। सैफ़-उद-दौला का वह मशहूर क़ितआ जिसमें उसने क़ौस-ए-क़ज़ह (इंद्रधनुष) की तश्बीह दी है, उसके बारे में आम अहल-ए-अदब (साहित्यकार) लिखते हैं कि यह बादशाहाना तश्बीह है जो हर एक के ख़याल में नहीं आ सकती। यानी जब तक शाहाना साज़-ओ-सामान नज़र से न गुज़रे हों, इस क़िस्म का ख़याल नहीं पैदा हो सकता।
हमें इससे इनकार नहीं कि एक मामूली से मामूली चीज़ पर क़ुव्वत-ए-तख़य्युल (कल्पना शक्ति) मुद्दतों ख़र्च की जा सकती है और सैकड़ों मज़ामीन (विषय) पैदा किए जा सकते हैं, जिसकी मख़सूस मिसाल बाद के शायरों की नुक्ता-आफ़रीनियाँ (बारीकियाँ) हैं। लेकिन इसकी मिसाल सर्कस के घोड़े की है जो एक ख़ेमे के अंदर तरह-तरह के तमाशे दिखा सकता है, लेकिन सफ़र तय करने में, मैदान-ए-जंग में, घुड़दौड़ में काम नहीं आ सकता है। इसी तरह तख़य्युल (कल्पना) का अमल भी एक महदूद दायरे में जारी रह सकता है, लेकिन इसकी वुसअत (फैलाव) क्या होगी? और ऐसी शायरी किस काम आएगी? वह शायरी जो हर क़िस्म के जज़्बात का आईना बन सकती हो, जो इंसानी फ़ितरत का राज़ खोल सकती हो, जो तारीखी वाक़ियात को दिलचस्पी के मंज़र पर ला सकती हो, जो अख़लाक़ी फ़लसफ़े (नैतिक दर्शन) की बारीकियाँ बता सकती हो, उसके लिए ऐसा महदूद तख़य्युल क्या काम आ सकता है।
तख़य्युल जिस क़दर मज़बूत, बारीक, तरह-तरह का और ज़्यादा काम करने वाला होगा, उसी क़दर उसके लिए मुशाहिदात (अवलोकनों) की ज़्यादा ज़रूरत होगी। जिस क़दर बुलंद परवाज़ परिंदा होगा, उसी क़दर उसके लिए मुशाहिदात की ज़्यादा ज़रूरत होगी, जिस क़दर बुलंद परवाज़ परिंदा होगा, उसी क़दर उसके लिए फ़िज़ा की वुसअत (फैलाव) ज़्यादा दरकार होगी। फ़िरदौसी ने शाहनामा लिखा था तो सैकड़ों-हज़ारों मुख़्तलिफ़ वाक़ियात लिखने पड़े, इसलिए क़ुव्वत-ए-तख़य्युल को पूरा मौक़ा मिला। यही सबब है कि शाहनामा में शायरी की तमाम क़िस्में मौजूद हैं। मसलन शायरी का एक बड़ा मैदान इंसानी जज़्बात का इज़हार है, जज़्बात की बहुत सी क़िस्में हैं मसलन मुहब्बत और दुश्मनी, ग़ुस्सा और ग़ज़ब, हैरत और अचरज, रंज और ग़म। फिर इनमें से एक-एक की मुख़्तलिफ़ क़िस्में हैं, मसलन बाप-बेटे की मुहब्बत, भाई-भाई की मुहब्बत, माँ-बेटे की मुहब्बत, बीवी और शौहर की मुहब्बत, अहल-ए-वतन (देशवासियों) की मुहब्बत। फ़िरदौसी को यह तमाम मौक़े हाथ आए, और हर मौक़े पर वह तख़य्युल से काम ले सका। चुनाँचे उसने जिस जज़्बे का जहाँ पर इज़हार किया है, तख़य्युल के अमल से उसे असरदार और जान-गुदाज़ (दिल को पिघला देने वाला) कर दिया है। इन बातों की तफ़सील आगे आएगी।
तख़य्युल की बे-एतेदाली (असंतुलन)
शेर की इससे ज़्यादा कोई बदक़िस्मती नहीं कि तख़य्युल का बेजा इस्तेमाल किया जाए। तिब्बियात (भौतिक विज्ञान) के मुताल्लिक़ जिस तरह यूनानी हकीमों (विद्वानों) की ताक़तें बेकार गईं और आज तक उनके पैरोकार, माद्दा और शक्ल की फ़ुज़ूल बहसों में उलझ कर कायनात की एक गुत्थी भी हल न कर सके, बिल्कुल यही हाल हमारे बाद के शायरों का हुआ। उनकी क़ुव्वत-ए-तख़य्युल, पुराने शायरों से ज़्यादा है लेकिन अफ़सोस बिल्कुल बेकार ख़र्च की गई। एक शायर कहता है,
गोशहा रा आशियाँ मुर्ग़-ए-आतिश-ख़्वारा कर्द
बर्क़-ए-आलम-सोज़ यानी शोला-ए-ग़ौग़ा-ए-मन
इस शेर को समझने के लिए नीचे दी गई बातों को पहले ज़ेहन-नशीन कर लेना (समझ लेना) चाहिए।
(1) मुर्ग़-ए-आतिश-ख़्वारा एक परिंदा है जो आग खाता है।
(2) आह और फ़रियाद में चूँकि गर्मी होती है इसलिए आह और फ़रियाद को शोले से तश्बीह देते हैं।
(3) मुर्ग़-ए-आतिश-ख़्वारा वहाँ-वहाँ रहता है जहाँ आग होती है। शायर कहता है कि मेरी फ़रियाद में इस क़दर गर्मी है कि कानों में पहुँची तो वहाँ आग पैदा हो गई, इस बिना पर मुर्ग़-ए-आतिश-ख़्वारा ने लोगों के कानों में जाकर घोंसले बना लिए हैं कि यहाँ आग नसीब होगी।
बाद के शायरों की अक्सर नुक्ता-आफ़रीनियाँ (बारीकियाँ) इसी क़िस्म की हैं जिसकी वजह यही है कि क़ुव्वत-ए-तख़य्युल का इस्तेमाल बेजा तौर से हुआ है। क़ुव्वत-ए-तख़य्युल की बे-एतेदाली (असंतुलन) की तमीज़ अगरचे सिर्फ़ सही ज़ौक़ (रुचि) ही कर सकता है, ताहम सिर्फ़ सही ज़ौक़ का हवाला काफ़ी नहीं, इसलिए जहाँ तक मुमकिन है, हम किसी क़दर इसकी तशरीह (व्याख्या) करते हैं।
(1) क़ुव्वत-ए-तख़य्युल को सबसे ज़्यादा बे-एतेदाली का मौक़ा मुबालग़े (अतिशयोक्ति) में मिलता है। यह तस्लीम कर लिया गया है कि मुबालग़े के लिए असलियत और वाक़ैयत (यथार्थ) की ज़रूरत नहीं। इस बिना पर क़ुव्वत-ए-तख़य्युल जी खोल कर बुलंद परवाज़ी दिखाती है और कज-रवी (टेढ़ेपन) और बे-राह-रवी (भटकने) की उसको परवाह नहीं होती। मसलन एक शायर घोड़े की तारीफ़ में कहता है,
ब-किश्वरी कि दर-ओ नाम-ए-ताज़ियाना बरंद
बर लौह-ए-संग न-गीरद शबीह-ए-ओ आराम
यानी अगर किसी पत्थर पर इस घोड़े की तस्वीर कुंदा कराई जाए (उकेरी जाए), और उस मुल्क में जहाँ यह पत्थर हो, कोड़े का नाम ले लिया जाए, तो तस्वीर पत्थर से उड़ जाएगी। असल बात इस क़दर थी कि घोड़ा इस क़दर तेज़ है कि कोड़े के इशारे से क़ाबू में नहीं रहता, अब मुबालग़े के दर्जे देखो।
(1) घोड़े की तेज़ रफ़्तारी का असर, तस्वीर तक में आ गया है।
(2) ताज़ियाना (कोड़ा) लगाने की ज़रूरत नहीं बल्कि ताज़ियाने का नाम लेना काफ़ी है।
(3) तस्वीर के सामने ताज़ियाने का नाम लेने की ज़रूरत नहीं बल्कि उस मुल्क में नाम ले लेना काफ़ी है।
(4) पत्थर पर कुंदा होने (उकेरे जाने) की हालत में भी तस्वीर में यह असर है।
शायर को चूँकि एक मुहाल (नामुमकिन बात) पर क़नाअत (संतोष) नहीं इसलिए वह मुहालात (नामुमकिन बातों) की तह पर तह क़ायम करता जाता है। लेकिन यह क़ुव्वत-ए-तख़य्युल की सख़्त बे-एतेदाली है, क़ुव्वत-ए-तख़य्युल की ख़ूबी यह है कि मुहाल बात इस तरह से अदा की जाए कि बज़ाहिर मुमकिन बन जाए। मसलन मीर अनीस इस मौक़े पर जहाँ हज़रत अब्बास का नहर के पास पहुँचना लिखा है, लिखते हैं,
उभरीं दुरूद पढ़ती हुई मछलियाँ बहम
बोले हुबाब आँखों पे शाहा तेरे क़दम
दरिया में रोशनी हुई जिस्म-ए-हुज़ूर से
ले लीं बलाएँ पंजा-ए-मरजान ने दूर से
मछलियों का दुरूद पढ़कर उभरना, हुबाब (बुलबुले) का बोलना, पंजा-ए-मरजान (मूँगे की शाख़) का बलाएँ लेना, सब नामुमकिनात में से हैं, लेकिन तख़य्युल की तिलिस्म-साज़ी (जादूगरी) ने एक वाक़ई तस्वीर पेश-ए-नज़र कर दी है। शायर ने अव्वल तो इन वाक़ियात को उस शख़्स के मुताल्लिक़ लिखा है, जिसके मोजिज़े (चमत्कार) की बदौलत (उसके नज़दीक) सब कुछ हो सकता है, दूसरे, वाक़िये के बाज़ अज्ज़ा (हिस्से) सही या सही के मुशाबेह (मिलते-जुलते) हैं। मछलियाँ पानी में उभरती हैं, हुबाब आँख के मुशाबेह होता है, मरजान की शक्ल पंजे की होती है। इन बातों की मजमूई हालत और उस पर शायर की लताफ़त-ए-बयानी (बयान की ख़ूबसूरती) की वजह से यह मालूम होता है कि वाक़ई हालत की तस्वीर है।
(2) वह कल्पना अक्सर बेकार और बेअसर होती है जिसमें पूरी इमारत की बुनियाद सिर्फ़ किसी शाब्दिक समानता या श्लेष (द्विअर्थी शब्दों) पर होती है। बाद के कवियों के ज़्यादातर चमत्कार इसी तरह के हैं। उदाहरण के लिए एक कवि कहता है,
मस्ताना कुश्तगान-ए-तो हर सू फ़तादा अंद
तेग़-ए-तोरा मगर कि ब-मय आब दादा अंद
शेर का मतलब यह है कि माशूक की तलवार के मारे हुए हर तरफ़ मस्त पड़े हुए हैं। मस्ती की वजह यह है कि माशूक ने जिस तलवार से क़त्ल किया है उस पर शराब की धार (आब) रखी गई है। इस ख़याल की पूरी बुनियाद 'आब' शब्द पर है। आब तलवार की चमक-दमक और धार को कहते हैं, आब का मतलब पानी भी है। शराब भी पानी की तरह तरल है। तलवार की धार का पानी से कोई ताल्लुक़ नहीं बल्कि पानी से तलवार को ज़ंग लग जाता है। लेकिन चूँकि धार को फ़ारसी में आब कहते हैं, इसलिए यह मान लिया गया कि तलवार में पानी है, और जहाँ पानी इस्तेमाल हो सकता है वहाँ शराब भी हो सकती है। इसलिए तलवार में शराब की धार है, इसलिए मारे गए लोग नशे में चूर हैं। इस पूरी इमारत की बुनियाद आब शब्द पर है, अगर इस शब्द के दो अर्थ न होते तो यह गोरखधंधा क़ायम नहीं रह सकता था।
सैकड़ों-हज़ारों शेर जो नाज़ुक ख़याली के नमूने समझे जाते हैं, उनकी पूरी बुनियाद इसी तरह की शाब्दिक विशेषताओं पर है। इसलिए अगर उनका किसी और भाषा में अनुवाद कर दिया जाए तो कल्पना बिल्कुल बेकार हो जाती है। मिर्ज़ा दबीर तलवार की तारीफ़ में फ़रमाते हैं,
तलवारों पर वह सैफ़ जो शोला-फ़िशाँ हुई
जल-भुन के आब तेग़ों की रन में, धुआँ हुई
तलवार की आब को पहले पानी मान लिया, फिर उसका जलना, भुनना और धुआँ हो जाना जो कुछ चाहा साबित करते चले गए।
(3) कल्पना की अति का बड़ा मौक़ा रूपक और उपमाएं (इस्तेआरे और तश्बीहें) हैं। रूपक और उपमाएं जब तक कोमल, आसानी से समझ में आने वाली और असलियत से मिलती-जुलती होती हैं, शायरी में हुस्न पैदा करती हैं। लेकिन जब कल्पना को अति का मौक़ा मिलता है, तो वह दूर की कौड़ी और फ़र्ज़ी रूपक और उपमाएं पैदा करती है और फिर उस पर और बुनियादें क़ायम करती जाती है, उदाहरण के लिए मिर्ज़ा बेदिल कहते हैं,
तबस्सुमे कि ब-ख़ून-ए-बहार तेग़ कशीद
कि ख़ंदा बर-लब-ए-गुल नीम-बिस्मिल उफ़्ताद अस्त
असल ख़याल बस इतना था कि माशूक की मुस्कुराहट फूल के अधखिले होने की हालत से ज़्यादा सुंदर है। इस बात को यूँ अदा किया है कि मुस्कुराहट एक क़ातिल है, उसने बहार का ख़ून करने के लिए तलवार खींची है। उसका वार फूल की हँसी (खिलने) पर पड़ा, और फूल की हँसी अधमरी होकर रह गई। इस कल्पना में जो अति है वह रूपकों की वजह से है। बहार का ख़ून, मुस्कुराहट की तलवार, फूल की हँसी का अधमरा होना, ये सब बेतुके रूपक हैं।
(4) कल्पना की अति यह है कि किसी चीज़ को किसी चीज़ से उपमा देते हैं, फिर उस चीज़ के जितने भी गुण और विशेषताएँ हैं, सब उसमें साबित करते हैं। हालाँकि उनसे किसी तरह का कोई तालमेल नहीं होता। उदाहरण के लिए कमर को बाल से उपमा देते हैं, अब इसके बाद बाल के जितने गुण हैं, कमर में साबित करते हैं। उदाहरण के लिए नासिख़ कहते हैं,
अभी हर-चंद वह बुत नौजवाँ है
सफ़ेद उसका मगर मू-ए-मियाँ है
यानी बाल बुढ़ापे में सफ़ेद होते हैं, लेकिन ताज्जुब यह है कि माशूक की कमर का बाल, जवानी में ही सफ़ेद हो गया है। चाँदी जैसा गोरा शरीर होने के लिहाज़ से कमर को सफ़ेद कहा है। या उदाहरण के लिए ग़नी फ़रमाते हैं,
दीदम मियान-ए-यार ओ नदीदम दहान-ए-यार
(मैंने माशूक की कमर देखी और मुँह न देख सका)
न-तवाँ ब-हीच दीद चो दर दीदा मू फ़ुताद
(क्योंकि जब आँख में बाल पड़ जाता है तो कोई चीज़ नज़र नहीं आती)
नियम है कि आँखों में जब बाल पड़ जाता है तो चुभता है और फिर आँखें खोली नहीं जातीं। कवि कहता है कि मैंने माशूक की कमर देखी लेकिन उसका मुँह न देख सका। क्योंकि जब आँखों में बाल आ गया तो कोई चीज़ नज़र नहीं आती।
या उदाहरण के लिए एक कवि ने नाभि के बारे में लिखा है कि कमर के बाल में गाँठ पड़ गई। या उदाहरण के लिए भौंह को तलवार माना, तो तलवार की तमाम विशेषताएँ—आब-ओ-ताब (चमक), दम-ख़म, जौहर, धार, मूठ, क़ब्ज़ा, म्यान—सब कुछ उसके लिए साबित करते जाते हैं।
(6) कल्पना का एक बड़ा मैदान 'हुस्न-ए-तालील' (काव्यगत कारण बताना) है, यानी कवि अपनी कल्पना की ताक़त से एक चीज़ को दूसरी चीज़ का कारण क़रार देता है। हालाँकि असल में वह उसका कारण नहीं होती, उदाहरण के लिए कवि कहता है,
किसी के आगे कोई हाथ पसारे क्या दख़ल
मुट्ठी बाँधे हुए पाता है तवल्लुद कोदक
बच्चे जब माँ के पेट से पैदा होते हैं तो उनकी मुट्ठी बँधी होती है, अब कवि इसकी यह वजह बताता है कि जिसकी तारीफ़ की जा रही है, उसने तमाम लोगों को इस क़दर मालामाल कर दिया है कि किसी को किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं रही। इसलिए बच्चा पैदा होता है तो उसकी मुट्ठियाँ बँधी होती हैं। ज़्यादातर काव्यात्मक विचार इसी 'हुस्न-ए-तालील' पर आधारित हैं, लेकिन जब कल्पना की ताक़त से संतुलन के साथ काम नहीं लिया जाता तो इसमें अक्सर अति हो जाती है। उदाहरण के लिए एक कवि, हकलाने वाले माशूक की तारीफ़ में कहता है,
गुफ़्तम सुख़नत शिकस्ता-वश, चूँ आयद
बा-आँ कि हमा चो दुर्र-ए-मकनूँ आयद
गुफ़्ता कि ब-ईं दहान-ए-तंगे कि मरास्त
गर न-शिकनमश चिगूना बैरूँ आयद
यानी मैंने माशूक से कहा कि तेरी ज़बान से जो शब्द निकलते हैं, वे टूट-टूट कर क्यों निकलते हैं। उसने कहा कि मेरा मुँह इतना छोटा है कि जब तक बात तोड़ कर टुकड़े-टुकड़े न कर ली जाए, मुँह से कैसे बाहर निकल सकती है। इन चंद मिसालों से कल्पना की अति का कुछ हद तक तुमने अंदाज़ा कर लिया होगा।
कल्पना के इस्तेमाल की ग़लती
कल्पना और मुहाकात (चित्रण) हालाँकि दोनों शायरी के तत्व हैं, लेकिन ज़्यादातर दोनों के इस्तेमाल के मौक़े अलग-अलग हैं। यह बहुत बड़ी ग़लती है कि एक की जगह दूसरे का इस्तेमाल किया जाए। उदाहरण के लिए प्राकृतिक दृश्यों का बयान, मुहाकात में आता है। यानी अगर बहार, पतझड़, बाग़, हरियाली, हरे मैदान, बहते पानी का बयान किया जाए तो मुहाकात (चित्रण) से काम लेना चाहिए, यानी इस तरह बयान करना चाहिए कि इन चीज़ों का असली नज़ारा आँखों के सामने घूम जाए। बाद के कवियों की बड़ी ग़लती, जिससे उनकी शायरी बिल्कुल बर्बाद हो गई, यह है कि वे इन मौक़ों पर मुहाकात की जगह कल्पना से काम लेते हैं। उदाहरण के लिए बहार की तारीफ़ में कलीम कहता है,
ब-नौए आतिश-ए-गुल दर-गिरिफ़्त अस्त
कि बुलबुल रफ़्त ओ दर आब आशियाँ कर्द
यानी फूलों की वजह से बाग़ में इस तरह आग लग गई है कि बुलबुल ने जाकर पानी में घोंसला बना लिया।
ब-सूरत बेद-ए-मजनूँ आबशार अस्त
रुतूबत बर्ग रा अज़ बस रवाँ कर्द
बेद-ए-मजनूँ एक पेड़ होता है जिसकी शाखाएँ ज़मीन तक लटकती रहती हैं। कवि कहता है कि बहार की वजह से इस क़दर नमी बढ़ गई है कि बेद-ए-मजनूँ एक आबशार, यानी पानी का झरना मालूम होता है।
ज़माना ईस्त कि बर क़ुफ़्ल अगर नसीम वज़ीद
ब-सान-ए-ग़ुंचा-अश अज़ इंबिसात ख़ंदाँ कर्द
यानी आब-ओ-हवा का यह असर है कि ताले को अगर हवा लग जाती है तो कली की तरह खुल जाता है। ग़ौर करो, क्या इन शेरों से बहार का किसी तरह का कोई असर दिल पर छा सकता है? अफ़सोस यह है कि बाद के कवियों का कलाम पूरी तरह इसी तरह की शायरी से भरा पड़ा है। ज़हूरी का 'साक़ी नामा' जिसकी इस क़दर धूम है, इन्हीं तरह के बेतुके ख़यालात का भंडार है।
इसी तरह प्रशंसात्मक शायरी मुहाकात (चित्रण) में दाख़िल है, यानी किसी व्यक्ति की तारीफ़ की जाए तो उसकी असली खूबियाँ बयान करनी चाहिए, जिससे उस व्यक्ति की इज़्ज़त और बड़प्पन दिलों में पैदा हो, लेकिन अक्सर शायर तारीफ़ में कल्पना से काम लेते हैं और इस क़िस्म के ख़याली विषय पैदा करते हैं जिनका मुहाकात और असलियत से कुछ वास्ता नहीं होता।
तश्बीह और इस्तियारा (उपमा और रूपक)
ये चीज़ें शायरी बल्कि आम बोलचाल की कला के रूप-रंग हैं। जिनके बिना लेखन कला की खूबसूरती क़ायम नहीं रह सकती। एक आम से आम आदमी भी जब जोश या गुस्से से भर जाता है तो जो कुछ उसकी ज़बान से निकलता है, वह इस्तियारों का रूप बदलकर निकलता है। दुख और रंज की हालत में लेखन कला और बनावट का किसे ख़याल हो सकता है, लेकिन इस हालत में भी बेसाख़्ता (अपने आप) इस्तियारे ज़बान से अदा होते हैं। मिसाल के तौर पर किसी का अज़ीज़ (प्रियजन) मर जाता है तो कहता है, सीना फट गया, दिल में छेद पड़ गए, आसमान टूट पड़ा, तुझको किसकी नज़र खा गई। ये सब इस्तियारे हैं। इससे ज़ाहिर होगा कि इस्तियारा दरअसल बयान का स्वाभाविक तरीक़ा है। लोगों ने ज़्यादती करके इसे बनावट की हद तक पहुँचा दिया। इस वजह से हम तश्बीह और इस्तियारे की बहस विस्तार से लिखना चाहते हैं। जिससे ज़ाहिर हो कि इनकी हक़ीक़त क्या है? कहाँ और कैसे काम आते हैं? इनमें अनोखापन और बारीकी कैसे पैदा होती है? किस तरह एक बड़े से बड़ा व्यापक ख़याल इनके ज़रिए से एक लफ़्ज़ में अदा हो जाता है।
तश्बीह की परिभाषा
अगर हम यह कहना चाहें कि फलाँ व्यक्ति बहुत वीर और बहादुर है, तो अगर इन्हीं लफ़्ज़ों में इस बात को अदा करें तो यह बयान का मामूली तरीक़ा है, इसी बात को अगर यूँ कहें कि वह व्यक्ति शेर की तरह है तो ज़ोर और बढ़ जाएगा, लेकिन अगर उस व्यक्ति का बिल्कुल ज़िक्र न किया जाए और यूँ कहा जाए कि मैंने एक शेर देखा। और उससे मुराद वही व्यक्ति हो तो यह इस्तियारा है। इसी मतलब को अदा करने का एक तरीक़ा यह है कि शेर का नाम भी न लिया जाए बल्कि शेर की जो ख़ासियतें हैं, उस व्यक्ति के लिए इस्तेमाल की जाएँ। मिसाल के तौर पर यूँ कहा जाए कि वह जब मैदान-ए-जंग में दहाड़ता हुआ निकला तो हलचल मच गई (दहाड़ना ख़ास शेर की आवाज़ को कहते हैं) यह भी इस्तियारा है और पहले तरीक़े के मुक़ाबले में ज़्यादा बारीक (सूक्ष्म) है।
तश्बीह और इस्तियारे की ज़रूरत और उनका असर
1. अक्सर मौक़ों पर तश्बीह या इस्तियारे से कलाम (बात) में जो विस्तार और ज़ोर पैदा होता है, वह और किसी तरीक़े से नहीं पैदा हो सकता। मिसाल के तौर पर अगर इस बात को कि, फलाँ मौक़े पर बहुत बड़ी तादाद में आदमी थे। यूँ अदा किया जाए कि वहाँ आदमियों का जंगल था, तो बात का ज़ोर बढ़ जाएगा। यहाँ बात का असली मक़सद, आदमियों की बहुतायत को बयान करना है, जंगल की तश्बीह की वजह से बहुतायत का ख़याल कई वजहों से ज़्यादा व्यापक हो जाता है। जंगल की ज़मीन में उपजाऊपन बहुत होता है, इसलिए उसमें घास, पौधे और पेड़ बड़ी तादाद में पास-पास उगते हैं, इसके साथ बढ़ने का सिलसिला बराबर क़ायम रहता है। यह क़ायदा है कि जो चीज़ जहाँ बहुतायत से पैदा होती है, बेक़द्र हो जाती है। इसी वजह से जंगल में पेड़ और घास की कुछ क़द्र नहीं होती। ऊपर दी गई मिसाल में तश्बीह ने ये तमाम बातें सामने ला दीं, यानी आदमी इतनी बड़ी तादाद में थे, जिस तरह जंगल में घास होती है। आदमियों का सिलसिला टूटता नहीं था, बल्कि भीड़ बढ़ती जाती थी, एक जाता था तो दस आ जाते थे, बहुतायत की वजह से आदमियों की कुछ क़द्र न थी, ये तमाम बातें जिनकी वजह से बहुतायत के मतलब में विस्तार पैदा हो गया, एक 'जंगल' के लफ़्ज़ में छिपी हुई हैं और चूँकि ये तमाम बातें सिर्फ़ एक लफ़्ज़ ने अदा कर दीं, इसलिए ख़ुद-ब-ख़ुद कलाम में ज़ोर आ गया। फ़ारसी में इस क़िस्म के ख़याल अदा करने का यह तरीक़ा है:
ब बुर्क़ा-ए-मह-ए-कनान कि बूद हुस्न-आबाद
(कनान के चाँद की नक़ाब की क़सम जो कि हुस्न-आबाद था)
ब हिजला-गाह-ए-ज़ुलैख़ा कि बूद यूसुफ़-ज़ार
(ज़ुलैख़ा के ख़लवत-कदे [एकांत कक्ष] की क़सम जो कि यूसुफ़-ज़ार था)
पहले मिसरे (पंक्ति) में हज़रत यूसुफ़ के चेहरे का हुस्न बयान करना था, उसको यूँ अदा किया कि उनका नक़ाब हुस्न-आबाद था। हुस्न-आबाद के मायने वह बस्ती जहाँ हुस्न की आबादी हो, गोया हज़रत यूसुफ़ का नक़ाब एक बस्ती है जहाँ हुस्न ने निवास कर लिया है। दूसरे मिसरे में यह बात अदा करनी थी कि हज़रत यूसुफ़ की वजह से ज़ुलैख़ा का ख़लवत-कदा रोशन हो गया था, उसको यूँ अदा किया कि वह यूसुफ़-ज़ार हो गया था, गोया सैकड़ों-हज़ारों यूसुफ़ भर गए थे।
2. बाज़ (कुछ) मौक़ों पर जब शायर कोई ग़ैर-मामूली दावा करता है तो उसके मुमकिन (संभव) होने को साबित करने के लिए तश्बीह की ज़रूरत पड़ती है:
ब सोज़-ए-इश्क़ शाहाँ रा चि कार अस्त
कि संग-ए-लाल, ख़ाली अज़ शरार अस्त
शायर दावा करता है कि बादशाहों में इश्क़ और मुहब्बत की जलन नहीं होती। यह देखने में एक ग़लत दावा है क्योंकि बादशाहत और इश्क़ व मुहब्बत में कोई विरोध नहीं है। इसलिए शायर इसको तश्बीह के ज़रिए से साबित करता है कि हर क़िस्म के पत्थर में शरर (चिंगारियाँ) होते हैं। यानी उन पर चोट पड़े तो चिंगारियाँ झड़ने लगती हैं। लेकिन हीरे और लाल में चिंगारियाँ नहीं होतीं और ज़ाहिर है कि पत्थर की क़िस्मों में हीरा गोया बादशाह है।
इसी दावे का दूसरा सुबूत यह है:
ज़ोर-ओ-इश्क़-ए-शह, बेगाना बाशद
कि जाए गंज दर वीराना बाशद
अरबी में इसकी बहुत उम्दा मिसाल मुतनब्बी का शेर है:
फ़-इन्ना फ़िल-ख़मरि माना लईसा फ़िल-एनबि
(जो बात शराब में है, वह अंगूर में नहीं)
दावा यह है कि बादशाह तमाम इंसानों से रुतबे में बढ़कर है, इसको तश्बीह के ज़रिए से साबित करता है कि शराब अंगूर से बनती है, लेकिन जो बात शराब में है, अंगूर में नहीं। मिसालिया शायरी (दृष्टांत काव्य) जिसने बाद के दौर के शायरों के ज़माने में बहुत विस्तार पाया, तश्बीह और तमसील (दृष्टांत) पर ही आधारित है।
3. जब किसी बहुत नाज़ुक और बारीक (कोमल) चीज़ या हालत का बयान करना होता है तो अल्फ़ाज़ और इबारत (लेखन) काम नहीं देती और यह नज़र आता है कि अल्फ़ाज़ ने अगर उनको छुआ तो उनको ठेस पहुँच जाएगी, जिस तरह बुलबुला छूने से टूट जाता है, ऐसे मौक़ों पर शायर को तश्बीह से काम लेना पड़ता है, वह इसी क़िस्म के बारीक और नाज़ुक रूप को ढूँढकर पैदा करता है और सामने पेश करता है, मिसाल के तौर पर नज़ीरी कहता है:
हमा शब बर लब-ओ-रुख़्सार-ओ-गेसू मे-ज़नम् बोसा
(मैं माशूक़ के लब और रुख़्सार और गेसू को तमाम रात चूमता रहा)
गुल-ओ-नसरीन-ओ-सुम्बुल रा सबा दर ख़िर्मन अस्त इमशब
(आज गुल और नसरीन और सुम्बुल के ख़िर्मन में हवा घुस आई है)
लब और रुख़्सार की नज़ाकत और उनका नर्म और बारीक बोसा (चुंबन), अल्फ़ाज़ की बर्दाश्त के क़ाबिल न था, इसलिए शायर ने उसको इस हालत से तश्बीह दी कि गोया हल्की-हल्की हवा फूलों को छूकर गुज़र जाती है और बार-बार आकर छूती और निकल जाती है।
या मिसाल के तौर पर यह शेर:
न गुफ़्त ओ मन ब-शनीदम, हर आँ-चि गुफ़्तन दाश्त
(उसने कुछ नहीं कहा और मैंने उसकी बात इस वजह से)
कि दर बयान निगहश कर्द बर ज़बाँ तक़दीम
(सुन ली कि उसकी निगाह ने ज़बान से पहल की)
लबश चु नौबत-ए-ख़्वेश अज़ निगाह बाज़ गिरिफ़्त
(जब उसके होंठ ने अपनी बारी ली तो मेरे)
फ़िताद सामिआ दर मौज-ए-कौसर-ओ-तसनीम
(कान कौसर की मौज में डूब गए)
यह उस वक्त का बयान है जब उरफ़ी ममदूह (जिसकी प्रशंसा की जा रही हो) के दरबार में गया है और ममदूह ने पहले मेहरबानी की नज़र से उसको देखा है, फिर बातें की हैं। कहता है कि ममदूह ने कुछ नहीं कहा और मैंने वह सब बातें सुन लीं जो वह कहना चाहता था क्योंकि उसकी निगाहों ने मतलब बयान करने में ज़बान से पहल की। फिर जब उसके होंठों की बारी आई तो सुनने की शक्ति कौसर (स्वर्ग की नदी) की लहर में डूब गई। महबूब की बातों से सुनने की शक्ति जो मज़ा उठाती है, उसको इस तरीके के सिवा और कैसे अदा किया जा सकता था कि सुनने की शक्ति कौसर की लहर में डूब गई।
तश्बीह (उपमा) में हुस्न कैसे पैदा होता है?
तश्बीह एक ऐसी आम चीज़ है कि हर शख्स इससे काम लेता है, इसलिए जब तक तश्बीह में कोई अनोखापन और खास खूबी न हो, वह कोई असर पैदा नहीं कर सकती। तश्बीह में जिन-जिन कारणों से खूबियां पैदा होती हैं, हालांकि उनकी गिनती नहीं हो सकती, फिर भी कुछ सूरतें मिसाल के तौर पर हम लिखते हैं, जिनसे एक आम खयाल कायम हो सकेगा।
(1) हर तश्बीह शुरुआत में नायाब और मज़ेदार होती है, लेकिन बार-बार के इस्तेमाल से उसकी ताज़गी और अनोखापन जाता रहता है और वह बेअसर हो जाती है। इसलिए शायर का फ़र्ज़ यह है कि नायाब और नई तश्बीहें और इस्तिआरे (रूपक) ढूंढ कर पैदा करे। बड़े-बड़े शायरों के कमाल की कसौटी यही है कि उनके कलाम में अछूती तश्बीहें और नए-नए इस्तिआरे पाए जाते हैं। मिसाल के तौर पर बोसा (चुंबन) को एशियाई शायर शीरीं, शकरीं, गुलू-सोज़ (मीठा, शक्कर जैसा, गला जलाने वाला) कहते आते हैं। लेकिन यूरोप का जादूगर कहता है कि:
वह वफ़ा का एक वादा है जो साकार हो जाता है।
एक छुपा हुआ राज़ है जो कानों के बजाय स्वाद से कहा जाता है।
एक ठंडी हवा है जो दिल की खुशबू लाती है।
मज़े से भरी निगाहें हैं जो सिमट कर बिंदु बन गई हैं।
इसी किस्म के नाज़ुक और बारीक इस्तिआरे फ़ारसी ज़बान में, उरफ़ी और तालिब आमुली के यहाँ मिल सकते हैं। उरफ़ी ने एक कसीदे में बहुत सी चीज़ों की कसम खाई है, उसमें एक मौके पर कहता है:
ब-बर शगुफ़्तन-ए-इमरोज़, गुंचा गश्तन-ए-दी
कल का दिन जो गुज़र गया और आज का दिन जो शुरू हो रहा है, उसको खिलने वाले फूल और मुरझाने वाली कली से तश्बीह दी है।
जहांगीर एक दफ़ा तालिब आमुली से नाराज़ हो गया था और उसको दरबार से अलग कर दिया। किसी अमीर ने उसको अपने यहाँ बुला लिया और दरबार में जो बड़ा शायर था, उससे मुकाबला कराया। तालिब गालिब रहा (जीत गया), अमीर ने यह देखकर जहांगीर से तालिब की सिफ़ारिश की, और वह दोबारा दरबार में हाज़िर हुआ। इन वाकयात को तालिब ने निहायत बारीक इस्तिआरे और तश्बीह के अंदाज़ में अदा किया है:
ब-निस्बत-ए-गुहरम, दादा बूदी अज़ कफ़-ए-ख्वेश
(तूने मुझको मोती समझ कर, फेंक दिया था)
तरा ज़-जूद, ज़ियाने चुनीं हज़ार उफ़्ताद
(सखावत की वजह से ऐसे बहुत से नुकसान उठाए हैं)
चू रद शुदम ज़ कफ़त, चर्ख़म अज़ हवा ब-रबूद
(जब तूने मुझको फेंक दिया तो आसमान ने मुझको लपक लिया)
ब-गर्मी कि ज़बानम ब-ज़ीनहार उफ़्ताद
(इस तेज़ी के साथ कि मैं अल-अमान बोल उठा)
यके मुक़ाबिल-ए-खुर्शीद दाश्त आईना-अम
(आसमान ने थोड़ी देर मेरे आईने को सूरज के सामने किया)
बदीद कज़ अरक़श, मौज बर उज़ार उफ़्ताद
(सूरज के चेहरे पर पसीना आ गया)
अज़ीं निशात, मगर दस्त-ए-आसमान लरज़ीद
(शायद इस खुशी से आसमान का हाथ कांप उठा)
कि बाज़ दर कफ़-ए-खाक़ान-ए-कामगार उफ़्ताद
(कि मैं फिर शहंशाह के हाथ में आकर गिरा)
(2) तश्बीह-ए-मुरक्कब (मिश्रित उपमा) आमतौर पर ज़्यादा बारीक होती है। मुरक्कब से यह मुराद है कि कई चीज़ों के मिलने से जो मिली-जुली हालत पैदा होती है, वह तश्बीह के ज़रिए से अदा की जाए, मसलन:
का-अन्ना मुसारन नक़-ए फ़ौक़ा रुऊसिना
व अस्याफ़ना लैलुन तहावा कवाकिबुह
यानी मैदान-ए-जंग में जो धूल उड़ती है और उसमें तलवारें चमकती हैं, तो यह मालूम होता है कि रात को तारे टूट रहे हैं।
यहाँ अलग-अलग चीज़ों की तश्बीह मक़सद नहीं बल्कि एक मिली-जुली हालत को अदा करना है, जिसके हिस्से यह हैं: 'धूल' जो हवा में छा गई है, 'उस' में तलवारें, 'तलवारों' का चलना और चमकना, 'तलवारों' के चलने में बेतरतीबी और अलग-अलग दिशाएं। इन सब बातों से जो मिला-जुला नज़ारा पैदा होता है, उसकी तश्बीह तारों से दी है जो रात के अंधेरे में सीधे, तिरछे, आड़े हर तरफ़ टूटते हैं।
या मसलन:
दो ज़ुल्फ़-ए-ताबदार-ए-ऊ ब-चश्म-ए-अश्कबार-ए-मन
चू चश्मा कि अंदर ऊ शना कुनंद मारहा
यानी मेरी आंसुओं से भरी आँखों में, माशूक की ज़ुल्फ़ों का अक्स (परछाईं) इस तरह पड़ता है मानो चश्मे (झरने) में सांप लहरा रहे हैं।
बाद दर कोहसार, जाम-ए-लाला रा बर संग ज़द
(हवा ने लाला का प्याला उठाकर ज़मीन पर पटक दिया)
गुल ब-खंदा गुफ़्त आरे ईं चुनीं बायद हमीं
(फूल ने हंस कर कहा खूब, यही करना चाहिए था)
हवा जब तेज़ चलती है तो नाज़ुक टहनियां और फूल ज़मीन पर गिर पड़ते हैं। इस हालत को यूँ अदा किया है कि मानो हवा ने लाला का प्याला उठाकर ज़मीन पर पटक दिया।
नरगिस कि शब न खुफ़्त ज़-फ़रियाद-ए-बुलबुलां
(नरगिस को रात बुलबुलों के शोर-ओ-गुल से नींद नहीं आई थी)
ब-निहाद सर ब-बालिश-ए-गुल मैल-ए-ख्वाब कर्द
(इसलिए फूल के तकिए पर सिर रखकर सो गई)
जिद्दत और लुत्फ़-ए-अदा
शायरी के लिए यह सबसे अहम चीज़ है, बल्कि कुछ जानकारों के नज़दीक जिद्दत-ए-अदा (अंदाज़ के नएपन) का ही नाम शायरी है। एक बात सीधी तरह से कही जाए तो एक मामूली बात है, उसी को अगर नए अंदाज़ और नए तरीके से अदा कर दिया जाए तो यह शायरी है।
एक दफ़ा हज्जाज ने एक बद्दू से पूछा कि तुमसे कोई राज़ की बात कही जाए तो तुम उसको छुपा सकते हो या नहीं? उसने कहा कि मेरा सीना राज़ की कब्र है। राज़ सीने में मर कर रह जाता है, सीने से निकल कैसे सकता है? इस बात को वह अगर यूँ अदा करता कि मैं राज़ को किसी हालत में कभी ज़ाहिर नहीं करता, तो मामूली बात होती। लेकिन अंदाज़ के बदल देने ने एक खास मज़ा पैदा कर दिया और अब वही बात शेर बन गई। शायरी, इंशा-परदाज़ी (लेखन कला), बलाग़त (वाक्पटुता), इन तमाम चीज़ों की जादूगरी इसी जिद्दत-ए-अदा पर टिकी है। जिद्दत-ए-अदा की तार्किक परिभाषा और इसके उसूल और नियमों को तय करना सख्त मुश्किल बल्कि नामुमकिन है। वह एक ज़ौक (रुचि) की चीज़ है जिसकी सही समझ सिर्फ़ सही ज़ौक से हो सकती है। इसका अंदाज़ हर जगह अलग है और इस कदर बेहिसाब है कि न इन सबका शुमार (गिनती) हो सकता है, न इनमें कोई साझा पहलू पैदा किया जा सकता है। इसलिए जिद्दत-ए-अदा का मतलब ज़हन में बिठाने के लिए इसके सिवा कोई तरीका नहीं कि कई मिसालें पेश करके बताया जाए कि असल खयाल क्या था? उसको किस नए अंदाज़ से अदा किया गया? और नयापन ने क्या असर पैदा किया? हम कुछ मिसालें नीचे लिखते हैं:
ज़ख्म-हा बर्दाश्तेम ओ फ़तह-हा करदेम लेक
(हमने बहुत ज़ख्म खाए और जीत हासिल कीं लेकिन)
हरगिज़ अज़ खून-ए-कसे रंगीन न-शुद दामान-ए-मा
(किसी के खून से हमारा दामन रंगीन नहीं हुआ)
असल खयाल यह था कि हमें कला के प्रतिद्वंद्वियों से मुकाबले का अक्सर इत्तेफ़ाक हुआ, लोगों ने हमें बुरा-भला कहा, गालियां दीं (बदज़बानियां कीं), लेकिन हमने सब्र और खामोशी से काम लिया। रफ़्ता-रफ़्ता हमारे ज्ञान और विद्वत्ता का सिक्का लोगों के दिलों में बैठता गया, यहाँ तक कि प्रतिद्वंद्वी भी कायल हो गए और सबने हमारी महानता स्वीकार कर ली। इस खयाल को यूँ अदा किया है कि मैदान-ए-जंग में हमने ज़ख्म उठाकर फतह हासिल की, लेकिन हमारा दामन किसी के खून से रंगीन नहीं हुआ। कहने के इस ढंग में इसके अलावा तश्बीह (उपमा) में अनोखापन है। यह हैरतअंगेज़ बात साबित की है कि मैदान-ए-जंग में कोई ज़ख्मी नहीं हुआ और जंग जीत ली गई।
साक़ी तवल्ली ओ सादा दिली बीं कि शैख़-ए-शहर
बावर नमी कुनद कि मलक मय-गुसार शुद
शेर का मतलब है कि माशूक जब साक़ी बना तो फरिश्तों यानी फरिश्तों जैसे स्वभाव वाले लोगों ने भी शराब पीनी शुरू कर दी। इस मतलब को यूँ अदा किया है कि माशूक को मुखातिब करके कहता है, वाइज़ (उपदेशक) की बेवकूफी देखते हो, तुम साक़ी हो और उसको यक़ीन नहीं आता कि फरिश्ते ने शराब पीना शुरू कर दिया। नएपन के अलावा कहने के इस तरीके में बलाग़त (अर्थपूर्णता) यह है कि जब कोई घटना, घटना की हैसियत से बयान की जाती है, तो उसके सही होने में शक हो सकता है, इसलिए शायर उसको घटना की हैसियत से नहीं बयान करता बल्कि एक मानी हुई बात बताकर, वाइज़ की बेवकूफी पर ताज्जुब करता है। गोया उसका मक़सद फरिश्ते का शराब पीना बयान करना नहीं है, न ही उसके नज़दीक यह कोई हैरतअंगेज़ घटना है जो बयान करने के क़ाबिल हो, अलबत्ता वाइज़ की बेवकूफी हैरतअंगेज़ है कि उसको ऐसी ज़ाहिर बात का यक़ीन नहीं आता।
शायर ने खुद वाइज़ को मुखातिब नहीं किया, वरना खयाल होता कि शायद यूँ ही वाइज़ को छेड़ने के लिए कहा है। माशूक को संबोधित करने में यह बलाग़त भी है कि उसकी फरिश्तों को लुभाने की अदा की तारीफ़ इस अंदाज़ से की है कि तारीफ़ करना मक़सद नहीं है, सिर्फ वाइज़ की बेवकूफी पर हैरानी का इज़हार है।
ऐ कि हमराह-ए-मुवाफ़िक़ ब-जहान मे तलबी
(अगर तुम सच्चा दोस्त दुनिया में ढूँढते हो)
आँ क़दर बाश कि अनक़ा ज़ सफ़र बाज़ आयद
(तो इतना ठहर जाओ कि अनक़ा सफ़र से वापस आ जाए)
यह एक घिसा-पिटा मज़मून (विषय) है कि जब किसी चीज़ को नायाब कहना चाहते हैं तो कहते हैं कि अनक़ा है। शेर का असली मतलब इस क़दर है कि हमराह-ए-मुवाफ़िक़ यानी सच्चा दोस्त मिलना मुहाल (असंभव) और अनक़ा है। इसको यूँ कहता है कि अगर तुमको सच्चे दोस्त की तलाश है तो इतना ठहर जाओ कि अनक़ा जो सफ़र में गया है, वह वापस आ जाए। यानी न अनक़ा वापस आ सकता है न सच्चा दोस्त मिल सकता है। इसमें बलाग़त का यह पहलू है कि पहले उम्मीद दिलाई है जिससे ज़ाहिर होता है कि सच्चा दोस्त मिल सकता है, अलबत्ता ज़रा इंतज़ार करना पड़ेगा। फिर जिस बात पर इसे टाला गया है, वह भी बज़ाहिर नामुमकिन नहीं क्योंकि किसी का सफ़र से वापस आ जाना कोई नामुमकिन बात नहीं। इस हालत के बाद जब नाउम्मीदी छा जाती है तो नाउम्मीदी का असर ज़्यादा सख्त और दुखदायी होता है। गोया यह दिखाना है कि सच्चे दोस्त की तलाश में उम्मीद भी होगी तो इसी क़िस्म की होगी कि खात्मा नाकामी पर हो।
न ब-अंदाज़ा-ए-बाज़ूस्त कमंदम हैहात
वरना बा गोशा-ए-बामेम सरोकारे हस्त
शेर का मतलब इस क़दर है कि मैं माशूक तक पहुँचना तो चाहता हूँ लेकिन पहुँच का कोई सामान नहीं। इसको यूँ अदा किया है कि मुझको एक गोशा-ए-बाम (छत के कोने) से कुछ काम तो है, लेकिन क्या कहिए जितनी ताक़त मेरे बाज़ू में है उसके लायक कमंद (रस्सी) नहीं है। 'बामे' (कोई छत) और 'सरोकारे' (कोई काम) की तन्कीर (अनिश्चितता) ने एक खास लुत्फ़ पैदा किया है।
हुस्न-ए-अल्फ़ाज़ (शब्दों का सौंदर्य)
यह एक निहायत ज़रूरी बहस है। इसलिए हम इसको तफ़सील से लिखते हैं। 'किताब-उल-उम्दा' में 'बाब-उल-लफ़्ज़ वल-मानी' एक खास उनवान (शीर्षक) क़ायम किया है, इसका खुलासा यह है: लफ़्ज़ जिस्म है और मज़मून रूह है। दोनों का आपसी संबंध ऐसा है जैसा रूह और जिस्म का संबंध, कि वह कमज़ोर होगा तो यह भी कमज़ोर होगी। पस अगर मानी (अर्थ) में कोई कमी न हो और लफ़्ज़ में हो, तो शेर में ऐब समझा जाएगा। जिस तरह लंगड़े या लूले में रूह मौजूद होती है, लेकिन बदन में ऐब होता है, इसी तरह अगर लफ़्ज़ अच्छे हों लेकिन मज़मून अच्छा न हो, तब भी शेर खराब होगा और मज़मून की खराबी, अल्फ़ाज़ पर भी असर करेगी। अगर मज़मून बिल्कुल बेमानी हो और अल्फ़ाज़ अच्छे हों, तो अल्फ़ाज़ भी बेकार होंगे, जिस तरह मुर्दे का जिस्म कि यूँ देखने में सब कुछ सलामत है, लेकिन असल में कुछ भी नहीं। इसी तरह मज़मून चाहे अच्छा हो लेकिन अल्फ़ाज़ अगर बुरे हैं, तब भी शेर बेकार होगा, क्योंकि रूह, बिना जिस्म के पाई नहीं जा सकती।
कला के जानकारों के दो गुट बन गए हैं। एक लफ़्ज़ को तरजीह (प्राथमिकता) देता है और उसकी पूरी कोशिश अल्फ़ाज़ की खूबी और खूबसूरती पर केंद्रित होती है, अरब का असली अंदाज़ यही है। कुछ लोग मज़मून को तरजीह देते हैं और अल्फ़ाज़ की परवाह नहीं करते। यह इब्न-ए-रूमी और मुतनब्बी का तरीका है। लेकिन ज़्यादातर कला के जानकारों का यही मत है कि लफ़्ज़ को मज़मून पर तरजीह हासिल है। वे कहते हैं कि मज़मून तो सब पैदा कर सकते हैं लेकिन शायरी में कमाल का पैमाना यही है कि मज़मून किन अल्फ़ाज़ में कहा गया है? और बंदिश कैसी है?
हक़ीक़त यह है कि शायरी या इंशा-परदाज़ी (लेखन कला) का दारोमदार ज़्यादातर अल्फ़ाज़ पर ही है। 'गुलिस्ताँ' में जो मज़मून और खयालात हैं, वे ऐसे अछूते और नायाब नहीं हैं, लेकिन अल्फ़ाज़ की फसाहत (स्पष्टता), क्रम और संतुलन ने उनमें जादू पैदा कर दिया है। इन्हीं मज़ामीन और खयालात को मामूली अल्फ़ाज़ में अदा किया जाए तो सारा असर जाता रहेगा। ज़हूरी का 'साक़ी नामा' नाज़ुक खयाली, बारीकी और मज़मून बाँधने का तिलिस्म है, लेकिन 'सिकंदर नामा' का एक शेर पूरे 'साक़ी नामा' पर भारी है। इसकी वजह यही है कि 'साक़ी नामा' में अल्फ़ाज़ की वह संजीदगी, शान-ओ-शौकत और बंदिश की वह पुख्तगी नहीं है जो 'सिकंदर नामा' की आम खूबी है। हाफ़िज़ का शेर है:
गुफ़्तम ईं जाम-ए-जहाँ बीं ब-तो कै दाद हकीम
गुफ़्त आँ रोज़ कि ईं गुम्बद-ए-मीना मी करद
जो खयाल इस शेर में अदा किया गया है, उसको अल्फ़ाज़ बदलकर अदा करो, शेर खाक में मिल जाएगा। नीचे दिए गए दोनों मिसरों में:
था बुलबुल-ए-खुशगू कि चहकता है चमन में
बुलबुल चहक रहा है रियाज़-ए-रसूल में
मज़मून बल्कि कुछ अल्फ़ाज़ तक एक जैसे हैं, फिर भी ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ है। हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने जब यज़ीद की फ़ौज के सामने इत्माम-ए-हुज्जत (अंतिम चेतावनी) पेश की, तो अपने हथियार और लिबास को, जो रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से विरासत में पाए थे, दिखाकर पूछा है कि ये किसके तबर्रुकात (पवित्र निशानियाँ) हैं। इस घटना को मीर ज़मीर ने यूँ अदा किया है:
पहचानते हो? किसकी मिरे सर पे है दस्तार
देखो तो? अबा किसकी है काँधे पे नुमूदार
यह किसकी ज़िरह? किसकी सिपर? किसकी है तलवार
मैं जिस पे सवार आया हूँ किसका है? यह रहवार
बाँधा है कमर जिससे भला किसकी रिदा है?
क्या फ़ातिमा ज़हरा ने नहीं इसको सिया है?
हूबहू इसी घटना को मीर अनीस अदा करते हैं:
यह क़बा किसकी है? बतलाओ यह किसकी दस्तार
यह ज़िरह किसकी है? पहने हूँ जो मैं सीना-फ़िगार
बर में किसका है? यह चार-आईना-ए-जौहर-दार
किसका रहवार है? यह आज मैं जिस पर हूँ सवार
किसका यह ख़ोद है यह तेग़-ए-दो-सर किसकी है?
किस जरी की यह कमान है यह सिपर किसकी है?
दोनों बंदों में मज़मून और मानी बिल्कुल एक जैसे हैं, अल्फ़ाज़ के अदल-बदल और उलट-पुलट ने कलाम को कहाँ से कहाँ तक पहुँचा दिया है।
इस बात का यह मतलब नहीं है कि शायर को सिर्फ़ अल्फ़ाज़ (शब्दों) से मतलब रखना चाहिए और अर्थ से बिल्कुल बेपरवाह हो जाना चाहिए, बल्कि मक़सद यह है कि मज़मून (विषय) कितना ही ऊँचा और नाज़ुक क्यों न हो, लेकिन अगर अल्फ़ाज़ मुनासिब नहीं हैं तो शेर में कोई असर नहीं पैदा हो सकेगा। इसलिए शायर को यह सोच लेना चाहिए कि जो मज़मून उसके ख़याल में आया है, उसी दर्जे के अल्फ़ाज़ उसे मिल सकेंगे या नहीं? अगर न मिल सकें तो उसे ऊँचे मज़ामीन को छोड़कर उन सादे और मामूली मज़ामीन पर संतोष करना चाहिए जो उसके बस के हैं और जिन्हें वह बेहतरीन अंदाज़ और उम्दा अल्फ़ाज़ में बयान कर सकता है। किसी ने बहुत सच कहा है:
बराए पाकी-ए-लफ़्ज़े शबे बरोज़ आरद
कि मुर्ग़ ओ माही बाशंद ख़ुफ़्ता ओ बेदार
यानी शायर एक-एक लफ़्ज़ की तलाश में रात-रात भर जागता रह जाता है, जबकि परिंदे और मछलियाँ तक सो रही होती हैं। यह बिल्कुल मुमकिन है कि एक बेहतरीन से बेहतरीन ख़याल, बेहतरीन से बेहतरीन मज़मून, बेहतरीन से बेहतरीन नज़्म, इस वजह से बर्बाद हो जाए कि उसमें सिर्फ़ एक लफ़्ज़ अपने दर्जे से गिर गया।
जिन बड़े मशहूर शायरों के बारे में कहा जाता है कि उनके कलाम में ख़ामी है, उसकी ज़्यादातर वजह यही है कि उनके यहाँ अल्फ़ाज़ की गंभीरता, वक़ार (गरिमा) और बंदिश की दुरुस्ती में कमी पाई जाती है। मध्यकालीन और बाद के शायरों ने जो शाहनामे लिखे, वे मज़ामीन और ख़यालात में फ़िरदौसी के शाहनामे से कम नहीं हैं। लेकिन फ़िरदौसी के शाहनामे के सामने उनका नाम लेना भी बेवक़ूफ़ी है। इसकी एक बहुत बड़ी वजह यह है कि फ़िरदौसी जिन अल्फ़ाज़ में अपने ख़यालात को बयान करता है, उसके सामने औरों के अल्फ़ाज़ बिल्कुल कमतर और बेअहमियत मालूम होते हैं। शायद यह एतराज़ किया जाए कि अल्फ़ाज़ का असर भी अर्थ की ही वजह से होता है। यानी एक लफ़्ज़ इसी बिना पर महान होता है कि उसके अर्थ में महानता होती है। मिसाल के तौर पर निज़ामी का यह शेर:
दराँ दजला-ए-ख़ूँ बुलंद आफ़्ताब
चू नीलोफ़र अफ़गंद ज़ौरक़ बर आब
इस शेर में हालाँकि ज़ाहिर तौर पर यह मालूम होता है कि अगर 'दजला' (बड़ी नदी) की जगह 'चश्मा' (झरना), और 'ज़ौरक़' की जगह 'कश्ती' (नाव) कर दिया जाए, तो भले ही अर्थ वही रहेंगे लेकिन शेर का दर्जा कम हो जाएगा। लेकिन ज़्यादा ग़ौर से देखा जाए तो इसकी वजह लफ़्ज़ की ख़ासियत नहीं बल्कि अर्थ का असर है। 'दजला' के अर्थ में 'चश्मा' से ज़्यादा फैलाव है, क्योंकि चश्मा छोटी सी नाली को भी कह सकते हैं, इसके उलट दजला एक बड़े दरिया का नाम है। इसी तरह ज़ौरक़ और कश्ती की हक़ीक़त में फ़र्क़ है। इस बिना पर दजला और ज़ौरक़ में जो महानता है, वह अर्थ के लिहाज़ से है, न कि लफ़्ज़ की हैसियत से।
यह एतराज़ एक हद तक सही है, लेकिन पहली बात तो यह है कि बहुत से ऐसे लफ़्ज़ हैं जिनके अर्थ में नहीं बल्कि रूप और आवाज़ में बुलंदी और शान होती है। 'ज़ैग़म' और 'शेर', दोनों के अर्थ बिल्कुल एक हैं, लेकिन लफ़्ज़ों के दबदबे में साफ़ फ़र्क़ है। इसके अलावा, इस क़िस्म के अल्फ़ाज़ में लफ़्ज़ी हैसियत इस क़दर हावी हो गई है कि भले ही वह बुलंदी अर्थ ही की वजह से पैदा हुई हो, फिर भी सुनने वाला यही समझता है कि यह लफ़्ज़ ही का असर है। इसलिए ऐसे अल्फ़ाज़ का असर भी अल्फ़ाज़ ही की तरफ़ मंसूब करना चाहिए (जोड़ना चाहिए)।
अल्फ़ाज़ की क़िस्में और उनके अलग-अलग असर
इस बात को साबित करने के बाद कि शायरी का दारोमदार ज़्यादातर अल्फ़ाज़ पर है, हमें थोड़ी तफ़सील से बताना चाहिए कि अल्फ़ाज़ की क्या क़िस्में हैं? और हर क़िस्म का क्या ख़ास असर है? और कौन से अल्फ़ाज़ कहाँ काम आते हैं?
अल्फ़ाज़ कई क़िस्म के होते हैं। कुछ नाज़ुक, कोमल, साफ़-सुथरे, रवाँ और मीठे, और कुछ शानदार, संजीदा और बुलंद। पहली क़िस्म के अल्फ़ाज़ इश्क़ और मुहब्बत के मज़ामीन को बयान करने के लिए मुनासिब हैं। इश्क़ और मुहब्बत इंसान के कोमल और नाज़ुक जज़्बात हैं। इसलिए उन्हें बयान करने के लिए लफ़्ज़ भी इसी क़िस्म के होने चाहिए। यही बात है कि पुराने शायरों के मुक़ाबले में बाद के शायरों की ग़ज़ल अच्छी होती है। पुराने शायरों के ज़माने तक फ़ौजी सभ्यता बाक़ी थी। इसलिए उसका असर तमाम चीज़ों में पाया जाता था, यहाँ तक कि अल्फ़ाज़ भी बुलंद, संजीदा और ज़ोरदार होते थे। फ़िरदौसी ने शाहनामा के बाद 'ज़ुलैख़ा' लिखी तो उसका यह अंदाज़ है:
बदादी जवाबे कि सरबस्ता बूद
बगुफ़्ती हदीसे कि बुगसस्ता बूद
ब-बेहूदा गोयम नसब साख़्ती
सुख़नहा-ए-नाख़ुश दर अंदाख़्ती
ज़-हर गूना गुफ़्ती सुख़नहा-ए-सुस्त
सरंजामशाँ गुफ़्ती ऐ नेकबख़्त
कि गर आज़माई मरा, आज़माए
कि दारद दिलम, पाए दानिश बजाए
कुनूँ दिलबरा! गुफ़्त-ए-मन कार कुन
दिलत रा बदीं मेहरबाँ यार कुन
इस मौक़े से बढ़कर भावुकता, दर्द और सोज़-ओ-गुदाज़ (तड़प) का क्या मौक़ा हो सकता था। फ़िरदौसी ने ख़यालात वही बयान किए जो एक आशिक़ माशूक़ से कर सकता है, लेकिन अल्फ़ाज़ और बयान का अंदाज़ ऐसा है कि मैदान-ए-जंग का रजज़ (जंगी तराना) मालूम होता है। निज़ामी ने जहाँ इस क़िस्म के मज़ामीन बयान किए हैं, ऐसे लहज़े में बयान किए हैं कि पत्थर का दिल पानी हो जाता है। सादी जो ग़ज़ल के बानी (जन्मदाता) माने जाते हैं, उसकी ज़्यादातर वजह यही है कि उन्होंने ग़ज़ल में कोमल, नाज़ुक, मीठे और दर्द भरे अल्फ़ाज़ इस्तेमाल किए। इस पर भी कहीं-कहीं पुराने रूखे और सख़्त अल्फ़ाज़ आ जाते हैं तो वह बात जाती रहती है। मिसाल के तौर पर:
तो मीरवी ओ ख़बर न दारी
व अंदर अक़बत क़ुलूब ओ अबसार
ईं क़ायदा-ए-ख़िलाफ़ बुगदाज़
वीं ख़ू-ए-मुआनिदत रिहा कुन
गर बरानी नरवद, दर बरवद बाज़ आयद
नागुज़ीर अस्त मगस दुक्का-ए-हलवाई रा
मुतनब्बी के कलाम पर अल्लामा सालबी ने जो नुक्ताचीनियाँ (आलोचनाएँ) की हैं, उनमें एक यह भी है कि वह ग़ज़ल और तश्बीब में ऐसे अल्फ़ाज़ लाता है जो आशिक़ाना ख़यालात के लिए मुनासिब नहीं हैं।
बुलंद और शानदार अल्फ़ाज़, रज़्मिया (जंगी) मज़ामीन और क़सीदों वग़ैरह के लिए मुनासिब हैं। बाद के शायरों यानी कलीम और साइब वग़ैरह के बारे में यह तस्लीम किया जाता है (माना जाता है) कि वे क़सीदा अच्छा नहीं कहते। इसका सबब यही है कि उनके ज़माने में सभ्यता और रहन-सहन में बहुत ज़्यादा नज़ाकत-परस्ती आ गई थी और इश्क़िया जज़्बात आम हो गए थे। इसका असर ज़बान पर भी पड़ा, यानी ज़बान ज़्यादा नाज़ुक और कोमल हो गई, जो ग़ज़ल कहने के लिए तो मुनासिब थी लेकिन क़सीदों की धूम-धाम और शान-ओ-शौकत के क़ाबिल न थी। उरफ़ी क़सीदे में ईद के ऐश-ओ-इशरत का बयान करता है तो उसका यह अंदाज़ है:
सबाहु-ल-ईद कि दर तकिया-गाह-ए-नाज़ ओ नईम
गदा कुलाह-ए-नमद कज निहाद ओ सर-ओ-यहीम
कलीम ने एक क़सीदे की तमहीद (भूमिका) में हिंदुस्तान की ऐश-अंगेज़ी (सुख-सुविधा) का समाँ बाँधा है, उसका मतला है:
असीर-ए-किश्वर-ए-हिंदम कि अज़ वफ़ूर-ए-सुरूर
गदा बदस्त गिरिफ़्त अस्त कासा-ए-तंबूर
इन दोनों शेरों में जो फ़र्क़ है, वह इसी बिना पर है कि उरफ़ी के वक़्त तक ऐश-ओ-इशरत के ख़यालात और उसका असर इतना आम नहीं हुआ था। नज़ीरी नेशापूरी अकबर के दौर का शायर है, लेकिन ग़ज़ल का रुझान हावी था और ज़बान में बहुत ज़्यादा घुलावट और नज़ाकत आ गई थी, इसलिए उसके क़सीदों में ज़ोर नहीं है, और तश्बीब तो साफ़ ग़ज़ल मालूम होती है। क़सीदे की शुरुआत में जो इश्क़िया मज़ामीन लिखते हैं, उसको तश्बीब कहते हैं और वह गोया ग़ज़ल ही होती है। फिर भी, कला की बारीकियों को जानने वाले हमेशा इस बात का लिहाज़ कर लेते हैं कि चूँकि वह क़सीदे का हिस्सा है, इसलिए उसकी ज़बान ग़ज़ल की ज़बान से न मिलने पाए। इसी बिना पर उरफ़ी तश्बीब लिखता है तो इस अंदाज़ से लिखता है:
मनम आँ सीर ज़-जाँ गश्ता कि बा तेग़ ओ कफ़न
(मैं अपनी जान से ऐसा ऊब चुका हूँ कि तलवार और कफ़न लेकर)
ता दर-ए-ख़ाना-ए-जल्लाद ग़ज़ल-ख़्वाँ रफ़्तम
(जल्लाद के घर तक ग़ज़ल पढ़ता हुआ गया)
कस इनाँ-गीर न शुद वर्ना मन अज़ बैत-ए-हरम
(किसी ने रोक-टोक न की, वर्ना मैं तो काबा से)
ता दर बुतकदा दर साया-ए-ईमान रफ़्तम
(बुतकदे तक, ईमान के साये में गया)
ज़ां शिकस्तम कि ब-दुंबाल-ए-दिल-ए-ख़्वेश मुदाम
(मैंने इस वजह से हार खाई कि अपने दिल के)
दर नशीब-ए-शिकन-ए-ज़ुल्फ़-ए-परेशां रफ़्तम
(पीछे-पीछे ज़ुल्फ़ की शिकनों में गिरता गया)
क़सीदे के अलावा मसनवी में इस तरह की ज़बान पसंद की जाती है और यही वजह है कि बाद के कवि अच्छी मसनवी नहीं लिख सकते, उनकी ज़बान बिल्कुल ग़ज़ल की ज़बान बन गई है। इसलिए जो कहते हैं ग़ज़ल बन जाती है। अलबत्ता इश्क़िया मसनवियां इसका अपवाद हैं। यानी उनमें वही ग़ज़ल की ज़बान इस्तेमाल करनी चाहिए, 'नलदमन' और 'नौई के सोज़-ओ-गुदाज़' चूंकि इश्क़िया मसनवियां हैं इसलिए उनमें यही ज़बान मुनासिब थी। लेकिन फ़ैज़ी ने यहां भी इस बात का ध्यान रखा है कि जहां अपनी बड़ाई लिखी है, ज़बान बदलकर क़सीदे की शान-ओ-शौकत आ गई है, मुलाहज़ा हो:
इमरोज़ शायरम, हकीमम
(मैं आज शायर नहीं बल्कि दार्शनिक हूं,)
दानिंदा-ए-हादिस-ओ-क़दीमम
(मैं हादिस (नश्वर) और क़दीम (शाश्वत) का जानने वाला हूं)
बांग-ए-क़लमम दरीं शब-ए-तार
(मेरी क़लम की आवाज़ ने, इस अंधेरी रात में)
सद मानी-ए-ख़ुफ़्ता कर्द बेदार
(सैकड़ों सोते हुए विषयों को जगा दिया)
रोबह मनशां ब-मन चे दारंद
(लोमड़ियों को मुझसे क्या काम? ये शेर की)
पेशानी-ए-शेर रा चे ख़ारंद
(पेशानी क्यों खुजलाती हैं? जिन लोगों)
आनां कि ब-मन नज़र फ़गंदंद
(ने मेरी तरफ़ नज़र उठाई, मेरे)
दर मारका-अम सिपर फ़गंदंद
(मुक़ाबले में सिपर (ढाल) डाल दी)
यह पूरी बहस अल्फ़ाज़ की अलग-अलग हैसियत के बारे में थी। लेकिन इससे ज़्यादा अहम अल्फ़ाज़ का आपसी संबंध और तालमेल है। यह मुमकिन है कि एक शेर में जितने भी लफ़्ज़ आएं, अलग-अलग देखा जाए तो सब मुनासिब और साफ़ हों, लेकिन बनावट के लिहाज़ से उनमें बेढंगापन पैदा हो जाए। इसलिए यह बहुत ज़रूरी है कि जो अल्फ़ाज़ एक साथ किसी कलाम में आएं, उनमें आपस में ऐसा तालमेल, संतुलन, लय और एक जैसी आवाज़ हो कि सब मिलकर मानो एक लफ़्ज़ या एक ही शरीर के अंग बन जाएं। यही बात है जिसकी वजह से शेर में वह खूबी पैदा होती है जिसे अरबी में 'इन्सिजाम' कहते हैं और जिसका नाम हमारी ज़बान में सरलता, सफ़ाई और रवानी है। यही चीज़ है जिस पर ख़्वाजा हाफ़िज़ को नाज़ है और जिसकी बिना पर वह अपने विरोधी के बारे में कहते हैं:
सनअतगर अस्त अम्मा शेर-ए-रवां नदारद
यही खूबी है जिसकी वजह से शेर में संगीत पैदा हो जाता है और शायरी और संगीत की सरहदें मिल जाती हैं। अली हज़ीं का एक शेर है:
चूं सर कुनम हदीस-ए-लब-ए-लाल-ए-यार रा
(जब मैं माशूक़ के होंठों की बात शुरू करता हूं)
गर्द अज़ निहाद-ए-चश्मा-ए-हैवान बर आवरम
(तो चश्मा-ए-हैवान (अमृत के झरने) से गर्द उड़ने लगती है)
ख़ान आरज़ू ने पहले मिसरे में यूं सुधार किया:
चूं सर कुनम हदीसे अज़ां ख़त-ए-पुश्त-ए-लब
आरज़ू के मिसरे में जितने भी अल्फ़ाज़ हैं, यानी हदीस, ख़त, पुश्त, लब, सब अपने आप में साफ़ हैं, लेकिन उनके मिलाने से यह हालत पैदा हो गई है कि मिसरा पढ़ते वक़्त मालूम होता है कि हर क़दम पर ठोकर लगती जाती है, इसके उलट हज़ीं का मिसरा मोती की तरह ढुलकता आता है।
अर्थ के लिहाज़ से अल्फ़ाज़ का असर
यहां तक अल्फ़ाज़ के बारे में जो बहस थी, वह ज़्यादातर लफ़्ज़ की हैसियत यानी आवाज़, रूप और लहज़े के लिहाज़ से थी, लेकिन शायरी का असली दारोमदार अल्फ़ाज़ के अर्थ पर है, यानी अर्थ के लिहाज़ से अल्फ़ाज़ का क्या असर होता है, और इस लिहाज़ से उनके दर्जों में कैसे फ़र्क़ होता है।
हर ज़बान में पर्यायवाची अल्फ़ाज़ होते हैं जो एक ही अर्थ को बताते हैं, लेकिन जब ग़ौर से देखा जाए तो इन अल्फ़ाज़ में आपस में फ़र्क़ होता है, यानी हर लफ़्ज़ के मतलब और अर्थ में कोई ऐसी ख़ासियत होती है जो दूसरे में नहीं पाई जाती। मिसाल के तौर पर ख़ुदा को फ़ारसी में ख़ुदा, परवरदिगार, दादार और आफ़रीदगार सब कहते हैं। ज़ाहिर तौर पर इन सब अल्फ़ाज़ के एक ही अर्थ हैं, लेकिन असल में हर लफ़्ज़ में एक ख़ास बात और ख़ास असर है जो उसी के साथ जुड़ा है। इसलिए शायर की समझदारी इसी में है कि जिस बात को कहने के लिए जो ख़ास लफ़्ज़ मुनासिब और असरदार है, वही इस्तेमाल किया जाए, वरना शेर में वह असर पैदा नहीं होगा। यह एक बहुत बारीक बात है, और जब तक किसी ख़ास मिसाल में एक-एक लफ़्ज़ पर बहस करके न समझाया जाए, यह समझ में नहीं आ सकती।
फ़ैज़ी का शेर है:
बांग-ए-क़लमम दरीं शब-ए-तार
बस मानी-ए-ख़ुफ़्ता कर्द बेदार
शेर का असली मतलब यह है कि शायरी में मैंने बहुत से नए विषय पैदा किए। इसको रूपक (इस्तियारे) के अंदाज़ में यूं कहा गया है कि मेरी क़लम की आवाज़ ने बहुत से सोते हुए विषयों को जगा दिया। अब इसके एक-एक लफ़्ज़ पर ग़ौर करो।
'बांग' ख़ास तौर पर उस आवाज़ को कहते हैं जिसमें बुलंदी और भारीपन हो, जो जगाने के लिए मुनासिब है। बांग, आवाज़ और स़रीर हम-मानी हैं, इसलिए 'बांग-ए-क़लम' की जगह 'आवाज़-ए-क़लम' और 'स़रीर-ए-क़लम' भी कह सकते हैं। इस मौक़े के लिए सिर्फ़ 'बांग' मुनासिब है। क़लम को फ़ारसी में ख़ामा और किल्क भी कहते हैं, लेकिन क़लम के लफ़्ज़ में जो भारीपन और रोब है, वह और लफ़्ज़ों में नहीं। बात करने वाले (उत्तम पुरुष) के 'मीम' (म) ने मिलकर इस भारीपन को और बढ़ा दिया है। बांग और क़लम के जोड़ ने लफ़्ज़ को और ज़्यादा वज़नदार कर दिया है। 'तार' को तीरा और तारीक भी कहते हैं, लेकिन इस मिसरे में रूप की सुंदरता के लिहाज़ से 'तार' ही मुनासिब है। 'बस' के हम-मानी बहुत से अल्फ़ाज़ हैं, मसलन बिस्यार, सख़्ते, ख़ैले, वग़ैरह, लेकिन 'बस' के लफ़्ज़ में अधिकता का जो फैलाव है, वह और लफ़्ज़ों में नहीं है।
इन तमाम बातों पर ग़ौर करो, तब यह बात समझ में आएगी कि इस शेर में जो असर है, उसका कारण यह है कि विषय की एक-एक ख़ासियत ज़ाहिर करने के लिए जो अल्फ़ाज़ ज़रूरी थे और जिनके बिना वह ख़ासियत अदा नहीं हो सकती थी, वे सब शायर ने जमा कर दिए, और इन बातों के साथ असल विषय में असलियत और कहने के अंदाज़ में नयापन और अनोखापन पैदा किया।
बड़े-बड़े ख़यालात और जज़्बात लफ़्ज़ के अधीन होते हैं, एक लफ़्ज़ एक बहुत बड़े ख़याल या बहुत बड़े जज़्बे को साकार करके दिखा सकता है। एक बहुत बड़ा चित्रकार एक चित्र के ज़रिए से ग़ुस्से, जोश और क़हर, महानता और शान का जो नज़ारा दिखा सकता है, शायर सिर्फ़ एक लफ़्ज़ से वही असर पैदा कर सकता है। मिसाल के तौर पर फ़िरदौसी ने जहां रुस्तम और सोहराब की दास्तान शुरू की है, लिखता है:
कुनूं जंग-ए-सोहराब-ओ-रुस्तम शिनो
(अब सोहराब और रुस्तम की लड़ाई सुनो, बहुत से वाक़यात)
दिगरहा शनीदस्ती ईं हम शिनो
(सुन चुके हो, अब ज़रा इसको भी सुनो)
इस शेर में यह ज़ाहिर करना था कि सोहराब का वाक़या तमाम पिछले वाक़यात से ज़्यादा असरदार, ज़्यादा अजीब, ज़्यादा दर्दनाक और ज़्यादा सबक़ देने वाला है। शायर ने सिर्फ़ 'ईं हम' (इसको भी) के लफ़्ज़ से जो ख़याल अदा कर दिया है, वह इन सब बातों में शामिल है और फिर इन तक सीमित नहीं बल्कि और आगे बढ़ता है, यानी मालूम नहीं इस दास्तान में और क्या असर होगा।
सिकंदर जब दारा के पास उसके आख़िरी वक़्त में गया है, तो दारा उससे कहता है:
ज़मीन रा मनम ताज रा तक नशीं
(मैं ज़मीन के सिर का ताज हूं, मुझको)
मजुंबान मरा ता ब-जुंबद ज़मीं
(न हिला, वरना ज़मीन हिल जाएगी)
दूसरे मिसरे ने वह असर पैदा किया है जो एक विशाल सेना नहीं पैदा कर सकती है।
बहुत से शब्द ऐसे होते हैं जिनके अर्थ हालाँकि अकेले होते हैं, लेकिन उनमें विभिन्न पहलू होते हैं और इस लिहाज़ से वह शब्द मानो कई विचारों का समूह होता है। इस तरह का एक शब्द एक व्यापक विचार व्यक्त कर सकता है और इसलिए उनके बजाय अगर उनके पर्यायवाची शब्द इस्तेमाल किए जाएँ तो कथन का प्रभाव और व्यापकता कम हो जाती है। उदाहरण के लिए काबा को हरम भी कहते हैं, लेकिन काबा शब्द से एक विशेष इमारत का बोध होता है, इसके विपरीत हरम शब्द में कई अर्थ शामिल हैं। 'इमारत' विशेष, यह 'विचार' कि वह एक पवित्र जगह है। यह 'विचार' कि वहाँ हत्या और प्रतिशोध अवैध है। ये विचार इस आधार पर हैं कि हरम के शाब्दिक अर्थ यही थे। इसी कारण से इस इमारत का यह नाम पड़ा और अब हालाँकि यह शब्द हरम बन गया है, फिर भी शाब्दिक अर्थ की झलक अब तक मौजूद है। इस आधार पर हरम शब्द जिन मौक़ों पर जो प्रभाव पैदा कर सकता है, काबा शब्द नहीं पैदा कर सकता है। पैगंबर के परिवार को भी हरम कहते हैं और वहाँ भी इज़्ज़त और पवित्रता की विशेषता ध्यान में रखी गई है।
इन बातों को सामने रखने से मालूम होगा कि नीचे दिए गए शेर में हरम शब्द क्या प्रभाव पैदा करता है और यह शब्द बदल जाए तो शेर का स्तर क्या रह जाएगा।
अज़ साहिब-ए-हरम चे तवक़्क़ो कुनंद बाज़
आँ ना-कसाँ कि दस्त बर अहल-ए-हरम ज़नंद
यह शेर अहल-ए-बैत (पैगंबर के परिवार) की शान में है और उस मौक़े की तरफ़ इशारा है जब यज़ीद की फ़ौज ने अहल-ए-बैत के तंबुओं में घुस कर उनके ज़ेवर और कपड़े लूटने शुरू कर दिए थे। शेर का मतलब यह है कि जो लोग अहल-ए-बैत पर हाथ डालते हैं, उनको साहिब-ए-हरम यानी ख़ुदा से माफ़ी की क्या उम्मीद हो सकती है।
शुद्ध और परिचित शब्दों का चुनाव
शायर के लिए बहुत ज़रूरी है कि वह शुद्ध और परिचित शब्दों की खोज करे और कोशिश करे कि कोई शब्द फ़साहत (भाषा की शुद्धता) के ख़िलाफ़ न आने पाए। फ़साहत की परिभाषा हालाँकि विशेषज्ञों ने तार्किक रूप से 'जिंस और फ़स्ल' (जाति और भेद) के माध्यम से की है। यानी अक्षरों में टकराव (कठोरता) न हो, शब्द का प्रयोग दुर्लभ न हो, और वह व्याकरण के नियमों के विरुद्ध न हो। लेकिन हक़ीक़त यह है कि फ़साहत का मापदंड सिर्फ़ अच्छी रुचि और सही विवेक है। मुमकिन है कि एक शब्द में अक्षरों का टकराव, प्रयोग की दुर्लभता, या नियमों का विरोध कुछ भी न हो, इसके बावजूद वह शुद्ध (फ़सीह) न हो। यह भी मुमकिन है कि कोई शब्द बिल्कुल कम इस्तेमाल होता हो और फिर भी फ़सीह हो। भाषा के वे शब्द जो कभी हमने इस्तेमाल नहीं किए थे, बल्कि हमारे कानों में भी नहीं पड़े थे, शुरू-शुरू में जब हम सुनते हैं तो उनमें से कुछ हमें फ़सीह (शुद्ध) मालूम होते हैं, और कुछ अपरिचित और अप्रिय, हालाँकि प्रयोग की दुर्लभता में दोनों बराबर हैं।
एक बात ख़ास तौर पर यहाँ ध्यान रखने के क़ाबिल है। अक्सर शब्द ऐसे होते हैं कि उनमें भारीपन होता है, लेकिन शुरुआती दौर में जब लोगों का एहसास नाज़ुक नहीं होता, तो उनका भारीपन महसूस नहीं होता। अधिक प्रयोग इस भारीपन को और कम कर देता है, लेकिन अंततः जब एहसास नाज़ुक हो जाता है तो वे शब्द साफ़ खटकने लगते हैं और धीरे-धीरे अप्रचलित हो जाते हैं। लेकिन पारखी और परिष्कृत रुचि वाला शायर आम राय बनने से पहले ही इस तरह के शब्द छोड़ देता है और उसका छोड़ना मानो उन शब्दों को अप्रचलित करने का ऐलान होता है। यही वे शायर हैं जिनकी शायरी भाषा का नियम और क़ानून बन जाती है। इसका उदाहरण उर्दू में शैख़ इमाम बख़्श 'नासिख़' हैं। बहुत से भद्दे और अप्रिय शब्द मसलन आए है, जाए है, खोए है, या उर्दू शब्दों के फ़ारसी बहुवचन मसलन ख़ूबान वग़ैरह शब्द नासिख़ के ज़माने में आमतौर पर प्रचलित थे और दिल्ली और लखनऊ के तमाम शायर उन्हें बरतते थे। लेकिन नासिख़ की सही रुचि ने बरसों के बाद आने वाली स्थिति का पहले ही अंदाज़ा कर लिया और ये तमाम शब्द छोड़ दिए, जो अंततः दिल्ली वालों को भी छोड़ने पड़े। ख़्वाजा हाफ़िज़ ने न जाने कैसे सौ बरस आगे के एहसासों का अंदाज़ा कर लिया था कि आज तक उनकी भाषा का एक भी शब्द अप्रचलित नहीं हुआ।
तात्पर्य यह है कि शायर जिस तरह नए विचारों की खोज में रहता है, उसे हर वक़्त शब्दों की जाँच-पड़ताल और नाप-तौल में भी व्यस्त रहना चाहिए। उसे बहुत गहरी नज़र से देखना चाहिए कि कौन से शब्दों में वह छिपी हुई और नज़र से दूर अप्रियता मौजूद है जो आगे चलकर सबको महसूस होने लगेगी।
यह बात भी बता देने के क़ाबिल है कि कुछ शब्द हालाँकि अपने आप में भारी (कठिन) होते हैं, लेकिन आस-पास के शब्दों का संतुलन उनके भारीपन को मिटा देता है या कम कर देता है। इसलिए शायर को समग्र स्थिति पर नज़र रखनी चाहिए। अगर अर्थ के लिहाज़ से इस तरह का शब्द उसे किसी मौक़े पर मजबूरन इस्तेमाल करना पड़े, तो कोशिश करनी चाहिए कि ऐसे मौक़े पर उसके लिए ऐसी जगह ढूँढे कि यह दोष जाता रहे या कम हो जाए।
अभिव्यक्ति की सरलता
अभिव्यक्ति की सरलता का अर्थ यह है कि जो विचार शेर में व्यक्त किया गया है, वह सहजता से समझ में आ जाए। यह बात निम्नलिखित कारणों से प्राप्त होती है:
1. जैसा कि ऊपर ज़िक्र हुआ, वाक्यों के अंगों का वही क्रम क़ायम रखा जाए जो आमतौर पर असली हालत में होता है। वज़न (मात्रा) और बहर-ओ-क़ाफ़िया (छंद और तुक) की ज़रूरत से वाक्य के अंग अपनी-अपनी निर्धारित जगह से ज़्यादा न हटने पाएँ।
2. विचार के जितने भी हिस्से हैं, उनमें से कोई हिस्सा छूट न जाए जिसकी वजह से यह मालूम हो कि बीच में ख़ालीपन रह गया है। जिस तरह सीढ़ी से कोई डंडा अलग कर लिया जाता है, मसलन अनवरी का यह शेर:
ता ख़ाक-ए-कफ़-ए-पा-ए-तो-रा नक़्श न बस्तंद
अस्बाब-ए-तप-ए-लर्ज़ा न-दादंद क़सम रा
इस शेर का मतलब समझना निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखने पर निर्भर है: 'झूठी' क़सम खाने से कँपकँपी वाला बुख़ार आ जाता है। ममदूह (जिसकी प्रशंसा की जा रही है) के पैरों की धूल की लोग क़सम खाते हैं। शेर का मतलब यह है कि क़सम में जो यह तासीर (प्रभाव) रखी गई है कि कोई झूठी क़सम खाएगा तो उसे बुख़ार चढ़ आएगा। यह बात उस वक़्त से हुई है जब ममदूह के पैर के तलवे का निशान ज़मीन पर बना। अब अगर कोई शख़्स ममदूह के पैर के तलवे की झूठी क़सम खाता है तो उसे कँपकँपी चढ़ आती है, वरना पहले झूठी क़सम खाने से कुछ नुक़सान नहीं होता था।
इस विचार में यह हिस्सा कि झूठी क़सम से बुख़ार आ जाता है वर्णित नहीं है, न ही यह बात इतनी मशहूर है कि बुख़ार के ज़िक्र से इसका ख़याल आ जाए। अक्सर अशआर में जो शब्दों का उलझाव (ताक़ीद) और जटिलता रह जाती है, उसकी यही वजह होती है कि विचार का कोई ज़रूरी हिस्सा छूट जाता है।
इसके साथ यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि अक्सर मौक़ों पर विचारों के कुछ हिस्सों का छोड़ देना ख़ास आनंद पैदा करता है। ये वे अवसर होते हैं जहाँ सुनने वालों का दिमाग़ ख़ुद-ब-ख़ुद उस हिस्से की तरफ़ चला जाता है, मसलन यह शेर:
सख़्त शर्माते हैं इतना न समझता था उन्हें
छेड़ना था तो कोई शिकवा-ए-बेजा करता
शेर का मतलब यह है कि मैं माशूक़ को भोला-भाला समझता था, इसलिए मैंने उसे छेड़ना चाहा तो सच्ची शिकायतें कीं कि वह इससे नाराज़ या शर्मिंदा न होगा, लेकिन वह समझ गया और बहुत शर्माया। अब मुझे अफ़सोस है कि केवल छेड़ना ही मक़सद था, इसलिए झूठी शिकायत करनी चाहिए थी ताकि वह शर्मिंदा भी न होता और छेड़-छाड़ का मज़ा भी क़ायम रहता। इस विचार में से ये हिस्से कि मैंने उनको छेड़ा और सच्ची शिकायतें कीं छोड़ दिए गए हैं, लेकिन विचार के बाक़ी हिस्से उनको पूरा कर देते हैं। यह शायरी का एक ख़ास नाज़ुक पहलू है और मिर्ज़ा ग़ालिब का यह ख़ास अंदाज़ है।
3. इस्तेआरे (रूपक) और तश्बीहें (उपमाएँ) समझ से परे न हों। इसका विवरण इस्तेआरा और तश्बीह की बहस में आएगा।
4. अक्सर अशआर (शेरों) में कहानियों से जुड़े हवाले होते हैं और उन पर अक्सर शायराना मज़ामीन (विषयों) की बुनियाद क़ायम होती है, इन्हें तल्मीहात कहते हैं। ये तल्मीहात ऐसी नहीं होनी चाहिए जो किसी को मालूम न हों। खाक़ानी की ज़्यादातर शायरी इसी क़िस्म की अनजान तल्मीहात पर आधारित है और इसी वजह से उसके अक्सर अशआर लोगों की समझ में नहीं आते। मसलन परवेज़ ओ तुरंज-ए-ज़र, किसरा ओ तरह-ए-ज़रीं, ज़रीं तरह को बर ख़्वान, रद कम तर कवा बर ख़्वान। परवेज़ का तुरंज-ए-ज़र तो ख़ैर लोगों को मालूम भी होगा लेकिन किसरा के तरह-ए-ज़रीं को कौन जानता है और 'कम तर कवा' की तरफ़ तो सिवाय बहुत तेज़ हाफ़िज़े (याददाश्त) वाले के, जो आलिम (विद्वान) भी हो, किसी का ख़याल भी नहीं जा सकता।
5. बयान की सादगी में इस बात की बहुत अहमियत है कि रोज़मर्रा और बोलचाल का ज़्यादा ध्यान रखा जाए। रोज़मर्रा चूँकि आम ज़बानों पर चढ़ा हुआ होता है, इसलिए एक लफ़्ज़ अदा होने के साथ फ़ौरन पूरा जुमला ज़ेहन में आ जाता है और इसके सहारे से मुश्किल से मुश्किल मज़मून (विषय) को समझने में आसानी होती है। बड़े-बड़े मशहूर शायरों का असली कमाल यही है कि वे ऊँचे-ऊँचे ख़याल रोज़मर्रा और बोलचाल में इस तरह अदा करते हैं कि मानो कोई मामूली बात हो। मसलन सूफ़ियों के यहाँ, सुलूक (आध्यात्मिक यात्रा) की मंज़िलों में कुछ पड़ाव मसलन तवक्कुल, रज़ा, तर्क-ए-ख़ुदी, बहुत मुश्किल होते हैं। दाग़ ने इस बात को कितनी सादगी से अदा किया है:
रहरो-ए-राह-ए-मोहब्बत का ख़ुदा हाफ़िज़ है
इसमें दो चार बहुत सख़्त मक़ाम आते हैं
यहाँ शायद किसी को यह ख़याल पैदा हो कि सादगी कोई आम चीज़ नहीं मानी जा सकती। आम लोगों के लिए मामूली ख़यालात भी समझने में मुश्किल होते हैं और ख़ास लोग मुश्किल मज़ामीन को भी आसानी से समझ सकते हैं, लेकिन यह ख़याल सही नहीं है। सादगी यही है कि आम और ख़ास दोनों आसानी से समझ सकें, फ़र्क़ जो होगा वह यह होगा कि आम आदमी शेर का ज़ाहिरी और सरसरी मतलब समझ लेंगे लेकिन ख़ास लोगों की नज़र उसकी बारीकियों, ख़ूबियों और गहराइयों तक पहुँचेगी और उन पर शेर का असर आम लोगों से ज़्यादा होगा। मसलन यह शेर:
मा दर प्याला अक्स-ए-रुख़-ए-यार दीदा-एम
ऐ बे-ख़बर ज़-लज़्ज़त-ए-शराब-ए-मुदाम-ए-मा
इसका मतलब हर ख़ास-ओ-आम समझ सकता है। अलबत्ता इसमें तसव्वुफ़ (सूफ़ीवाद) का जो मसला बयान किया गया है, वह ख़ास अरबाब-ए-हाल (आध्यात्मिक अनुभव रखने वालों) के समझने की चीज़ है।
शायरी की बड़ी ख़ूबी बयान का नयापन (जिद्दत-ए-अदा) है। बयान के नएपन में बात को ख़्वाह-मख़्वाह कुछ हद तक मामूली अंदाज़ से बदलकर और असली रास्ते से हटाकर बयान करना होता है। इसलिए शायर को इस मौक़े पर सख़्त मुश्किल का सामना करना पड़ता है। क्योंकि इस सूरत में बयान की सादगी को क़ायम रखना मानो दो विरोधी चीज़ों को एक साथ जमा करना होता है, लेकिन हक़ीक़त में शायरी के कमाल का यही मौक़ा है। इसकी यही सूरत है कि नएपन के सिवा सादगी की और तमाम बातें मौजूद हों, यानी अल्फ़ाज़ आसान हों, तश्बीहात (उपमाएँ) आसानी से समझ में आने वाली हों, वाक्य-रचना में उलझाव न हो, रोज़मर्रा और मुहावरे मौजूद हों, इन सब बातों के साथ बयान के नएपन में संतुलन की हद पार न की जाए। इस सूरत में नएपन की वजह से सादगी में कुछ हद तक फ़र्क़ पैदा होगा तो और बातें उसकी भरपाई कर देंगी।
जुमलों के हिस्सों की तरतीब
यह शेर की ख़ूबी का बड़ा ज़रूरी हिस्सा है। हर ज़बान में अल्फ़ाज़ के आगे-पीछे होने की एक ख़ास तरतीब (क्रम) होती है जिससे हटना जायज़ नहीं। जब इसी तरतीब से ये हिस्से कलाम में आते हैं तो मज़मून आसानी से समझ में आ जाता है। जब ये हिस्से अपनी असली जगह से हट जाते हैं तो मतलब में उलझाव पैदा हो जाता है और जिस क़दर यह तब्दीली ज़्यादा होती जाती है, उसी क़दर कलाम उलझता जाता है। लेकिन शेर में वज़्न, बहर और क़ाफ़िया की ज़रूरत से असली तरतीब पूरी-पूरी क़ायम नहीं रह सकती। फिर भी शायर को यह कोशिश करनी चाहिए कि जहाँ तक मुमकिन हो, वह मशीन के पुर्ज़ों की तरह हर लफ़्ज़ को अपनी-अपनी जगह क़ायम रखे और कम से कम ये ज़्यादा न हटने पाएँ। जिस क़दर यह ख़ूबी शायर के कलाम में ज़्यादा होगी, उसी क़दर शेर में ज़्यादा रवानी और सादगी होगी। यही ख़ूबी है जिसने सादी के कलाम को तमाम शायरों से अलग और ख़ास कर दिया है। उनके कई अशआर ऐसे हैं कि उन्हें नस्र (गद्य) में बदलना चाहें तो नहीं बदल सकते, क्योंकि उनमें जुमले के हिस्सों की वही तरतीब है जो नस्र में हो सकती है, और ऐसे तो बहुत हैं जिनकी नज़्म और नस्र में बहुत मामूली सा फ़र्क़ है।
मसलन,
ख़त-ए-सब्ज़ ओ लब-ए-लाअलत ब-चे मानद? दानी
मन बगोयम ब-सर-ए-चश्मा-ए-हैवान मानद
चे कुनद कुश्ता-ए-इश्क़त कि न-गोयद ग़म-ए-दिल
तो म-पिंदार कि ख़ूँ रेज़ी ओ पिन्हाँ मानद
ऐ तमाशा-गाह-ए-आलम रू-ए-तो
तो कुजा बहर-ए-तमाशा मे-रवी
बिस्यार ख़िलाफ़-ए-वादा करदी
आख़िर ब-ग़लत यके वफ़ा कुन
बर-ख़ेज़द दर सराय बर-बंद
बिनशीं ओ क़बा-ए-बस्ता वा कुन
वाक़इयत
अदब (साहित्य) के फ़न का यह एक बहुत ही विवादित और भ्रम पैदा करने वाला मसला है। एक पक्ष का ख़याल है कि वाक़इयत (असलियत), शेर की ज़रूरी शर्त है, दूसरा गुट कहता है कि शायरी की ख़ूबियों में मुबालग़ा (बढ़ा-चढ़ाकर कहना) भी शामिल है और ज़ाहिर है कि मुबालग़ा और वाक़इयत, एक-दूसरे के विरोधी हैं। यह मसला मुद्दत से बहस का विषय है और फ़ैसला इसलिए नहीं होता कि हर पक्ष सिर्फ़ अपनी दलीलें पेश करता है और विरोधी के तर्क को धुँधला करके दिखाता है। इसलिए ज़रूरत है कि दोनों तरफ़ की दलीलें पूरे ज़ोर के साथ बयान करके इंसाफ़ के साथ फ़ैसला किया जाए, साथ ही यह भी बताया जाए कि जो पक्ष ग़लती पर है, उसे जो ग़लतफ़हमी पैदा हुई है, उसकी वजहें क्या हैं?
मुबालग़े का तरफ़दार कहता है कि उस्ताद शायरों ने साफ़ तौर पर कहा है कि झूठ और मुबालग़ा, शायरी का ज़ेवर है। नाबिग़ा ज़ुब्यानी से लोगों ने पूछा कि 'अशअर-उन-नास' (सबसे बड़ा शायर) कौन है? उसने कहा, 'मन उस्तुजीदा किज़्बुहू' यानी जिसका झूठ पसंद किया जाए।
निज़ामी फ़रमाते हैं:
दर शेर पेच ओ दर फ़न-ए-ओ
चूँ अक्ज़ब-ए-ओस्त अहसन-ए-ओ
तमाम बड़े-बड़े शायर जिनकी शायरी को सब मानते हैं, उनके कलाम में आमतौर पर मुबालग़ा और ग़ुलू (हद से ज़्यादा बढ़ा-चढ़ाकर कहना) मौजूद है। इसके अलावा अक्सर वही अशआर शायरी का कमाल माने जाते हैं जिनमें झूठ और मुबालग़ा है। मसलन फ़िरदौसी के ये अशआर:
फ़रो-शुद ब-माही ओ बर-शुद ब-माह
बुन-ए-नेज़ा ओ क़ुब्बा-ए-बारगाह
ज़ि-बस गर्द-ए-मैदान कि बर शुद ब-दश्त
ज़मीं शश शुद ओ आसमाँ गश्त हश्त
यके ख़ेमा दाश्त अफ़रासियाब
ज़ि-मशरिक़ ब-मग़रिब तनीदा तनाब
इससे इनकार नहीं हो सकता है कि फ़न के कुछ उस्तादों ने झूठ और मुबालग़े को शायरी की ख़ूबी क़रार दिया है, लेकिन ज़्यादातर उस्ताद इसके ख़िलाफ़ हैं।
हस्सान बिन साबित कहते हैं:
व-इन्न अशअर बैतिन अंता क़ाइलुहू
बैतुन युक़ालु इज़ा अंशदतहू सदक़ा
(अच्छा शेर वह है कि जब पढ़ा जाए तो लोग बोल उठें कि सच कहा।)
इब्न-ए-रशीक़ ने 'किताब-उल-उम्दा' में उस्तादों के बहुत से क़ौल (कथन) इसके हक़ में नक़ल किए हैं।
ये शायर बलाग़त (प्रभावशाली अभिव्यक्ति) की बारीकियों को समझने वाले हैं। वे अपनी तबीयत के ज़ोर (रचनात्मक जोश) की वजह से मुबालग़ा करना चाहते हैं तो साथ ही कोई शर्त लगा देते हैं, जिससे मुबालग़ा नहीं रहता। मसलन बुहतरी ने मुतवक्किल की तारीफ़ में एक निहायत ज़ोरदार क़सीदा लिखा है, जिसमें मुतवक्किल के ईद की नमाज़ में जाने का ज़िक्र किया है। इस क़सीदे का मशहूर शेर यह है:
फ़-लौ अन्ना मुश्ताक़न तकल्लफ़ा फ़ौक़ा मा
फ़ी वुसइही ल-मशा इलैकल मिंबरु
यानी अगर कोई व्यक्ति अपनी क्षमता से ज़्यादा काम कर सकता तो ऐ ममदूह (प्रशंसित व्यक्ति), मिंबर (मंच) तुम्हारी तरफ़ बढ़कर चला आता। चूँकि मिंबर का हिलना असंभव बात थी, इसलिए शायर ने शर्त लगा दी कि अगर ऐसा मुमकिन होता तो यह होता। यहाँ एक ख़ास बात ध्यान में रखनी चाहिए, शायरी और गद्य-लेखन सभ्यता के साथ-साथ चलते हैं। यानी जिस तरह की सभ्यता होती है, उसी तरह की शायरी भी होती है। क़ौम (राष्ट्र) की शुरुआती तरक़्क़ी का जो ज़माना होता है, उस वक़्त शायराना ख़यालात सादे होते हैं। जब तरक़्क़ी करती है और तमाम नेक जज़्बात भड़क उठते हैं, तो हालाँकि शायरी में जोश और ज़ोर पैदा हो जाता है, लेकिन अब भी वह सच्चाई और सत्य के केंद्र से नहीं हटती, क्योंकि यह वह ज़माना होता है जब क़ौम पूरी तरह कर्मशील होती है। इसके बाद जब ऐश और सुख-सुविधाओं की नौबत आती है, तो हर-हर बात में दिखावा, बनावट और आवर्द (ज़बरदस्ती का प्रयास) पैदा हो जाती है। यही ज़माना है जब शायरी में मुबालग़ा (अतिशयोक्ति) शुरू होता है, इसी का नतीजा है कि शुरुआती प्राचीन कवियों के कलाम में बिल्कुल मुबालग़ा नहीं है, जब अब्बासिया (अब्बासी ख़िलाफ़त) का दौर आया और ऐश-परस्ती की हवा चली तो मुबालग़े का ज़ोर हुआ।
इस चर्चा से यह मक़सद है कि जिन शायरों के कलाम से मुबालग़े की ख़ूबी पर तर्क दिया जाता है, उनके बारे में यह देखो कि वे किस ज़माने के हैं? अगर वे बाद के शायरों (मुताख़िरीन) में से हैं, तो समझ लेना चाहिए कि यह सभ्यता की ख़राबी है जिसका असर साहित्यिक रुचि (मज़ाक़) पर भी पड़ा है कि लोग मुबालग़ा पसंद कर रहे हैं। इसलिए न शायर प्रमाण के क़ाबिल है, न पसंद करने वालों की रुचि से कोई तर्क दिया जा सकता है, बल्कि यह समझ लेना चाहिए कि सभ्यता की ख़राबी ने शायर और सुनने वालों, दोनों की रुचि को ख़राब कर दिया है।
जिन लोगों ने झूठ और मुबालग़े को शेर का ज़ेवर (आभूषण) क़रार दिया है, उनकी ग़लती की वजह यह हुई कि झूठ और मुबालग़े में तख़य्युल (कल्पना) का इस्तेमाल करना पड़ता है। मिसाल के तौर पर अगर घोड़े के बारे में यह कहा जाए कि वह एक मिनट में एक करोड़ कोस तय कर लेता है, तो शेर बिल्कुल बेमज़ा और बेतुका होगा, इसलिए जब कोई शायर इस तरह का मुबालग़ा करना चाहेगा, तो ज़रूरी है कि वह तख़य्युल से काम ले। मिसाल के तौर पर एक शायर कहता है,
रू-ब-रू से अगर आईने के उस गुलगूँ को
फेंक दे ले के कभी शर्क़ (पूरब) से तू ग़र्ब (पश्चिम) तलक
इतने अरसे में फिर आए तो इसे बावर (यक़ीन) कर
अक्स भी आईने से होने न पाए मुन्फ़क (अलग)
इससे ज़ाहिर होगा कि मुबालग़े में अगर कोई हुस्न (सौंदर्य) पैदा होता है तो वह तख़य्युल की बुनियाद पर होता है, न कि इसलिए कि वह झूठ और मुबालग़ा है। कुछ मुबालग़ों में तख़य्युल की बजाय कोई और शायराना हुस्न होता है। मिसाल के तौर पर कमज़ोरी और दुबलेपन के मुबालग़े में यह शेर,
तनम अज़ ज़ोफ़ चुनाँ शुद कि अजल जुस्त ओ नयाफ़्त
नाला हर चंद निशाँ दाद कि दर पैरहन अस्त
यानी मेरा जिस्म ऐसा घुल गया कि मौत ने आकर बहुत ढूँढा लेकिन न पाया, बावजूद इसके कि नाले (आह-ओ-फ़रियाद) ने पता भी दिया कि वह पैरहन (कपड़ों) में है। इस शेर में मुबालग़े ने हुस्न नहीं पैदा किया है, बल्कि यह हुस्न-ए-अदा (अभिव्यक्ति के सौंदर्य) की ख़ूबी है। इस बात को कि नाले से जिस्म की मौजूदगी मालूम हो सकती थी, यूँ अदा किया है कि मानो नाला कोई जानदार चीज़ है और उसी ने पता बताया।
ग़रज़ जब ज़्यादा ग़ौर और कोशिश करोगे तो मालूम होगा कि मुबालग़े के जितने भी अशआर मक़बूल (लोकप्रिय) हैं, उनमें मुबालग़े के सिवा और ख़ूबियाँ हैं और दरअसल यह उन्हीं का असर है।
इस बहस में एक बड़ी ग़लती यह होती है कि शायरी की अलग-अलग क़िस्मों और उनकी ख़ासियतों का लिहाज़ नहीं किया जाता। शेर की दो क़िस्में हैं: तख़य्युली (काल्पनिक) और ग़ैर-तख़य्युली (अकाल्पनिक)। तख़य्युली में घटना से मतलब नहीं होता, बल्कि ज़्यादातर यह मक़सद होता है कि तख़य्युल की ताक़त कितनी ज़ोरदार और व्यापक है। इस आधार पर इस क़िस्म की शायरी में मुबालग़े से काम लिया जाए तो वह बुरा नहीं लगता, लेकिन वहाँ भी सुनने वालों की तबीयत पर हैरत का जो असर पैदा होता है, वह मुबालग़े की वजह से नहीं बल्कि तख़य्युल की ताक़त की बुनियाद पर होता है। लेकिन शायरी की और क़िस्मों, मसलन दार्शनिक, नैतिक, ऐतिहासिक, इश्क़िया, और नेचुरल (प्राकृतिक) में मुबालग़ा बिल्कुल बेतुकी चीज़ है। इसलिए अगर शेर में मुबालग़ा जायज़ भी हो, तो सिर्फ़ शेर की एक ख़ास क़िस्म (तख़य्युल) में होगा, इससे यह कोई आम ख़ूबी साबित नहीं हो सकती।
शायरी से अगर सिर्फ़ मनोरंजन मक़सद हो तो मुबालग़ा काम आ सकता है, लेकिन वह शायरी जो एक ताक़त है, जो क़ौमों को उलट-पुलट कर सकती है, जो मुल्क में हलचल मचा सकती है, जिससे अरब क़बीलों में आग लगा देते थे, जिससे नौहे (शोक-गीत) के वक़्त दर-ओ-दीवार से आँसू निकल पड़ते थे, वह अगर वाक़ेइयत (यथार्थ) और असलियत से ख़ाली हो तो कुछ काम नहीं कर सकती। तुमने इतिहास में पढ़ा होगा कि जाहिलियत (इस्लाम से पहले के दौर) में, एक शेर एक मामूली आदमी को पूरे अरब में मशहूर कर देता था। इसके बरअक्स (विपरीत), ईरान के शायरों ने जिन संरक्षकों की तारीफ़ में पन्नों के पन्ने काले कर दिए, उनका नाम भी कोई नहीं जानता। इसकी यही वजह है कि जाहिलियत के दौर के शायरों के कलाम में वाक़ेइयत होती थी, इसलिए उसका वाक़ई असर होता था। ईरानी शायर बातों के तोते-मैना बनाते थे (हवाई बातें करते थे), जिससे पल भर का मनोरंजन हो सकता था, बाक़ी कुछ नहीं।
यह असर उसी वक़्त पैदा हो सकता है जब शेर में वाक़ेइयत हो, वरना ख़ाली बातों की बाज़ीगरी से क्या हो सकता है। अरब की शायरी में जो यह असर था कि क़बीले के क़बीले में एक शेर आग लगा देता था, वह उसी वक़्त तक था जब तक शायरी में वाक़ेइयत थी, कि जो कुछ कहते थे सरासर सच होता था। जब अब्बासिया दौर में मुबालग़ा शुरू हो गया तो शायरी एक बेअसर आवाज़ बनकर रह गई। शायर दीवान के दीवान लिख डालते थे और कोई असर नहीं होता था। यह ज़रूरी नहीं कि शेर में जो कुछ कहा जाए वह सिर से पैर तक वाक़ेइयत हो, बल्कि मक़सद यह है कि वह असलियत के असर से ख़ाली न हो। मिसाल के तौर पर एक वाक़या हक़ीक़त में नहीं हुआ, लेकिन शायर को उसका पूरा यक़ीन है। यह वाक़या शेर में बयान होगा तो असर से ख़ाली न होगा। मीर अनीस कहते हैं,
हमला ग़ज़ब है बाज़ू-ए-शाह-ए-हिजाज़ का
लंगर न टूट जाए ज़मीन के जहाज़ का
इस शेर में बज़ाहिर (देखने में) मुबालग़ा है, किसी इंसान के हमले से ज़मीन अपनी जगह से नहीं हिल सकती, लेकिन जब यह तसव्वुर (कल्पना) किया जाए कि यह कलाम किसकी ज़बान से निकला है, तो कलाम में वाक़ेइयत का असर आ जाता है और फिर मुबालग़ा नहीं रहता। वाक़ेइयत की दूसरी सूरत यह है कि हालाँकि वह वाक़या जिसकी तरफ़ मंसूब किया गया है (जोड़ा गया है), उसकी तरफ़ यह निस्बत (संबंध) सही नहीं है, लेकिन अपने आप में वह वाक़या मुमकिन है, और पाया जा सकता है, इस सूरत में शेर का असर बातिल (व्यर्थ) नहीं होता। उरफ़ी ने ख़ूब कहा है,
मुनकिर नतवाँ गश्त अगर दम ज़नम अज़ इश्क़
ईं नशा ब-मन गर न बुवद बा-दिगरे हस्त
यानी मैं अगर इश्क़ का दावा करूँ तो इनकार नहीं करना चाहिए। यह नशा मुझमें न सही, किसी न किसी में तो है। इश्क़िया अशआर में मुबालग़े इसलिए ज़्यादा बुरे मालूम नहीं होते कि शायर में हालाँकि वे बातें न हों, लेकिन इश्क़ और मुहब्बत के जोश में इस क़िस्म के वाक़यात नामुमकिन नहीं हैं।
शेर (कविता) में मुबालग़ा (अतिशयोक्ति) के पैदा होने का असली कारण यह हुआ कि शायर का एहसास, आम लोगों की तुलना में ज़्यादा तीव्र और प्रबल होता है, इसलिए हर घटना उस पर औरों की तुलना में ज़्यादा असर करती है। शायर इसी असर को व्यक्त करता है लेकिन चूँकि आम लोग इस स्तर का एहसास नहीं रखते, उनको यह मुबालग़ा मालूम होता है और अब जो लोग दरअसल शायर नहीं हैं और शायर बनना चाहते हैं, वे बिना झिझक मुबालग़ा शुरू कर देते हैं और असली हद से बाहर निकल जाते हैं। पुराने शायर इसी जायज़ हद तक मुबालग़ा करते थे लेकिन बाद के शायरों ने, जो दरअसल स्वभाव से शायर नहीं थे, जानबूझकर अपने एहसास को और अधिक तीव्र बनाना चाहा और चूँकि इसका उनको ख़ुद तजुर्बा नहीं था, इसलिए वे कहीं से कहीं निकल गए, यहाँ तक कि जिस क़दर ज़्यादा नामुमकिन बात को व्यक्त किया जाए, उसी क़दर उसे मुबालग़े का सौंदर्य समझा जाने लगा।
कलाम (काव्य) के लिए असलियत ऐसी ज़रूरी चीज़ है कि बलाग़त (काव्य-सौंदर्य) की बहुत सी शैलियों में सिर्फ़ इसी वजह से हुस्न और असर पैदा होता है कि उसमें असलियत का पहलू होता है, उदाहरण के लिए वह मौक़ा जहाँ शायर किसी बात को शक और संदेह के तौर पर बयान करता है, जैसे,
दारद जमाल-ए-रू-ए-तो इमशब तमाशा-ए-दिगर
या आन कि मन मे-बीनश बेहतर ज़ शबहा-ए-दिगर
यानी माशूक़ के चेहरे में आज ज़्यादा चमक है, या यह कि मुझी को ऐसा नज़र आता है। इस शेर में तारीफ़ का तक़ाज़ा यह था कि शायर निश्चित रूप से दावा करता कि माशूक़ का हुस्न बढ़ गया है, लेकिन उसने शक ज़ाहिर किया और कहा कि या तो हुस्न में इज़ाफ़ा हुआ है, या असल में इज़ाफ़ा नहीं हुआ लेकिन मुझ पर ख़ास असर है। चूँकि यह बात ज़्यादा तर्कसंगत है, और इसलिए इसमें असलियत का ज़्यादा पहलू है, इसलिए अभिव्यक्ति का यह ढंग ज़्यादा आनंददायक मालूम होता है, या जैसे,
या मगर काविश-ए-आँ नश्तर-ए-मिज़्गाँ कम शुद
या कि ख़ुद ज़ख़्म-ए-मरा लज़्ज़त-ए-आज़ार न-मान्द
या जैसे जहाँ किसी चीज़ को कुछ घटा कर बयान किया जाता है, वहाँ एक ख़ास लुत्फ़ पैदा होता है, यह इसी असलियत का असर है। जैसे,
पास-ए-अदब से रह गई फ़रियाद कुछ इधर
मैं क्या कहूँ कि चर्ख़-ए-बरीं कितना दूर था
ग़रज़ शेर उस वक़्त तक कुछ असर नहीं पैदा कर सकता जब तक उसमें असलियत न हो। अरब में शायरी का चरमोत्कर्ष 'जाहिलियत' (इस्लाम से पूर्व का युग) का ज़माना माना जाता है, इस ज़माने में शायर जो कुछ कहते थे वह पूरी तरह से यथार्थ होता था। मैदान-ए-जंग से शायर अगर भाग आया है तो उसको भी ज़ाहिर कर देता था। एक जुहनी शायर ने अपना और दुश्मनों का युद्ध लिखा है, चूँकि लड़ाई बराबर रही थी, इसलिए एक-एक बात में समानता का पलड़ा बराबर रखा है, यहाँ तक कहता है,
फ़-आबू बिर-रिमाहि मुकस्सरातिन
(वे लोग टूटे हुए नेज़ों के साथ वापस गए)
व उब्ना बिस-सुयूफ़ि क़द इनख़ैना
(और हम पलटे तो हमारी तलवारें मुड़ गई थीं)
किसी रईस, या बादशाह की तारीफ़ करते थे, तो असलियत की हद से आगे नहीं बढ़ते थे। सलामता बिन जुंदल से एक रईस ने कहा कि मेरी प्रशंसा लिखो, चूँकि उसमें कोई गुण प्रशंसा के क़ाबिल नहीं था, शायर ने इंकार किया और कहा 'इफ़अल हत्ता अक़ूल' (तुम कुछ कर के दिखाओ तो मैं कहूँ)।
तख़य्युल (कल्पना) में ज़ाहिरी तौर पर असलियत की ज़रूरत नहीं मालूम होती लेकिन वास्तव में कल्पना भी उसी वक़्त आनंददायक और प्रभावशाली होती है, जब उसकी तह में असलियत हो। जैसे यह शेर,
कै ब-हर ना-महरमे, चाक-ए-जिगर ख़्वाहम नुमूद
मन जराहत रा निहाँ अज़ चश्म-ए-सोज़न दाश्तम
शेर का तर्जुमा यह है कि ऐ माशूक़! मैं ना-महरम (ग़ैर) को अपने जिगर का चाक (घाव) भला कैसे दिखा सकता हूँ, मैंने तो तेरे ज़ख़्मों को, सुई की आँखों से भी छिपा रखा है।
इस शेर में सुई को एक जानदार चीज़ क़रार देना और उससे ज़ख़्म छिपाना कल्पना है, लेकिन मज़मून (विषय) की असल बुनियाद असलियत पर आधारित है। असल मज़मून यह है कि मैं आम आदमियों के सामने माशूक़ के गिले-शिकवे नहीं करता, बल्कि अपने ख़ास हमदर्द लोगों से भी अपने राज़ को छिपाता हूँ।
शेर क्यों असर करता है
यह बात बिल्कुल स्पष्ट है कि शेर एक प्रभावशाली चीज़ है लेकिन यह बहस का विषय है कि इस असर का असली कारण क्या है? अरस्तू ने 'किताब-उश-शेर' (Poetics) में इसकी जो वजह लिखी है, उसका सार यह है:
इंसान में नक़ल और मुहाकात (अनुकरण) का प्राकृतिक गुण होता है, जानवरों में या तो यह गुण बिल्कुल नहीं होता, या होता है तो कम होता है। उदाहरण के लिए तोता सिर्फ़ आवाज़ की नक़ल कर सकता है, हरकतों और गतिविधियों की नक़ल नहीं कर सकता; बंदर हरकतों और गतिविधियों की नक़ल उतारता है लेकिन आवाज़ से काम नहीं ले सकता। इसके विपरीत इंसान, आवाज़ से, इशारे से, हरकतों से, गतिविधियों से, और विभिन्न तरीक़ों से हर चीज़ की नक़ल उतार सकता है। यह भी इंसान की फ़ितरत है कि उसको अनुकरण से एक ख़ास आनंद प्राप्त होता है। फ़र्ज़ करो अगर एक बदसूरत जानवर की हूबहू तस्वीर खींची जाए तो हर शख़्स को मज़ा आएगा, हालाँकि ख़ुद उस जानवर को देखने से तबीयत ख़राब होती है। इससे मालूम हुआ कि किसी चीज़ का अनुकरण ख़ुद आनंददायक है, चाहे वह चीज़ अपने आप में बुरी हो या भली। और चूँकि शेर भी एक क़िस्म की नक़ल और चित्रकारी है, इसलिए लाज़िमी तौर पर इससे तबीयत पर असर पड़ता है। दूसरी वजह यह है कि मौसीक़ी (संगीत) और राग स्वभाव से ही प्रभावशाली चीज़ें हैं और शेर में मौसीक़ी का अंश शामिल होता है। इसलिए जिस शेर में ज़्यादा मौसीक़ी होती है, वह ज़्यादा प्रभावशाली होता है।
अरस्तू ने जो कारण बयान किए, हालाँकि वे अपने आप में सही हैं, लेकिन शेर का प्रभाव इन्हीं बातों पर निर्भर नहीं है। शेर में और भी बहुत सी बातें हैं जिनकी वजह से वह दिलों को प्रभावित करता है। इस विषय को अच्छी तरह समझने के लिए पहले यह नुक्ता (बिंदु) समझना चाहिए कि इंसानी समाज की मशीन फ़लसफ़े (दर्शन) और साइंस से नहीं बल्कि जज़्बात (भावनाओं) से चल रही है। फ़र्ज़ करो एक बूढ़े शख़्स का बेटा मर गया और लाश सामने पड़ी है, यह शख़्स अगर साइंस से राय ले तो यह जवाब मिलेगा कि ऐसे कारण जमा हो गए जिनकी वजह से ख़ून का दौरा, या दिल की धड़कन बंद हो गई, इसी का दूसरा नाम मरना है।
यह एक अचानक होने वाली घटना है जो अटल रूप से घटित हुई, और चूँकि दोबारा ज़िंदा होने का कोई उपाय नहीं है, इसलिए रोना-धोना बेकार, बल्कि एक बेवक़ूफ़ी का काम है। लेकिन क्या पूरी दुनिया में एक शख़्स का भी इस पर अमल है? क्या ख़ुद साइंसदाँ (वैज्ञानिक) इस उसूल से काम ले सकता है? बच्चों का प्यार, माँ की ममता, मुहब्बत का जोश, ग़म का हंगामा, मौत का रंज, पैदाइश की ख़ुशी, क्या इन चीज़ों का साइंस से कोई ताल्लुक़ है? लेकिन ये चीज़ें अगर मिट जाएँ तो अचानक सन्नाटा छा जाएगा और दुनिया एक बेजान शरीर, बिना नशे की शराब, बेरंग फूल, और बिना चमक के मोती की तरह होकर रह जाएगी। दुनिया की चहल-पहल, रंगीनी, आकर्षण और दिलकशी, साइंस की वजह से नहीं बल्कि इंसानी जज़्बात की वजह से है जो अक़्ल की हुकूमत से लगभग आज़ाद हैं।
शायरी का जज़्बात से ही ताल्लुक़ है इसलिए तासीर (प्रभाव) इसका मूल तत्व है। शायरी हर क़िस्म के जज़्बात को उभारती है, इसलिए रंज, ख़ुशी, जोश, अचरज और हैरत में जो असर है, शेर में भी वही असर होता है। चित्रकारी वाली शायरी इसलिए दिल पर असर करती है कि जो दृश्य प्रभावशाली होते हैं, शायरी उनको आँखों के सामने पेश कर देती है।
सुबह की हवा के झोंके, बहते पानी की रफ़्तार, फूलों का खिलना, कलियों की मुस्कान, हरियाली की लहलहाहट, ख़ुशबुओं की लपट, बादलों की फुहार, बिजली की चमक—यह मंज़र आँख के सामने हो तो दिल पर परमानंद की दशा तारी हो जाएगी। शायरी इन दृश्यों को हूबहू पेश कर देती है, इसलिए इसके प्रभाव से कैसे इंकार किया जा सकता है।
शायरी सिर्फ़ महसूस होने वाली चीज़ों की तस्वीर नहीं खींचती, बल्कि भावनाओं और एहसासों को भी सामने ला देती है। अक्सर हम खुद अपने नाज़ुक और छुपे हुए जज़्बातों से वाक़िफ़ नहीं होते या होते हैं तो सिर्फ़ एक धुंधला-धुंधला सा नक़्श नज़र आता है। शायरी, इन पर्दे के पीछे की चीज़ों को सामने ला देती है, धुंधली चीज़ें चमक उठती हैं, मिटा हुआ नक़्श उजागर हो जाता है, खोई हुई चीज़ हाथ आ जाती है, खुद हमारी रूहानी तस्वीर, जो किसी आईने के ज़रिए से हम नहीं देख सकते, शेर हमको दिखा देता है।
दुनिया का कारोबार जिस तरह चल रहा है उसका असली फ़लसफ़ा, खुदगर्ज़ी और मुआवज़े (लेन-देन) का उसूल है, और जब इसको ज़्यादा फैलाया जाए तो हमारे तमाम काम और कर्म, एक सिलसिलेवार कड़ी बन जाते हैं। बच्चों से मुहब्बत और उनकी परवरिश इसलिए है कि वो आगे चलकर हमारे काम आएंगे, बाप की बात मानना उसके पिछले एहसानों का मुआवज़ा है, मेहमान-नवाज़ी इस उसूल पर है कि हमको भी कभी मेहमान होने की ज़रूरत पेश आएगी, क़ौमी काम इसलिए किए जाते हैं कि घुमा-फिरा कर खुद करने वाले को इससे फ़ायदा पहुंचता है।
इस फ़लसफ़े से बेशक काम करने की ताक़त बढ़ जाती है, व्यापार को तरक़्क़ी मिलती है, कारोबार फैल जाते हैं, दौलत की भरमार हो जाती है, लेकिन तमाम जज़्बात मर जाते हैं, दिल मुर्दा हो जाता है, कोमल और नाज़ुक एहसास ख़त्म हो जाते हैं, इश्क़ और मुहब्बत बर्बाद हो जाते हैं, और तमाम दुनिया एक बेजान मशीन बन जाती है जो खुदगर्ज़ी की ताक़त से चल रही है। इस हालत में शेर शरीफ़ाना जज़्बातों को तरो-ताज़ा करता है, वो महसूस होने वाली चीज़ों के दायरे से निकालकर हमको एक और विशाल और दिलकश दुनिया में ले जाता है, वो हमको बेलाग और निस्वार्थ दोस्ती की तालीम देता है, वो हमको सच्ची खुशी और सच्चा आनंद दिलाता है। जब कारोबार की भीड़, मुक़ाबले की कशमकश, मामलों की उलझन, और चिंताओं की जकड़ से दिल बिल्कुल हिम्मत हार देता है तो शेर साक्षात सुकून और इत्मीनान बनकर हमारे सामने आता है और कहता है,
शराब-ए-तल्ख़ वो साक़ी कि मर्द-अफ़गन बुवद ज़ोरश
कि ता लख़्ते बियासायम ज़े दुनिया ओ ज़े शरो-शोरश
जब साइंस और मुशाहिदों (अवलोकनों) का अभ्यास हमको सख़्त दिल और कट्टर बना देता है और तमाम आम मान्यताओं और तयशुदा बातों के लिए दिल में हिक़ारत (नफ़रत) पैदा हो जाती है, किसी बात पर एतबार नहीं आता, किसी चीज़ का असर नहीं रहता। माद्दे (पदार्थ) के सिवा तमाम चीज़ों की हुकूमत दिल से उठ जाती है, उस वक़्त शायरी हमारे दिल को मुलायम और नर्म करती है, जिससे स्वीकार करने की भावना, असर क़ुबूल करने की सलाहियत और विश्वास पैदा होता है, माद्दियत (भौतिकवाद) की बजाय रूहानियत क़ायम होती है, वो हमको कल्पना की दुनिया में ले जाती है, जहां थोड़ी देर के लिए मुशाहिदों की बेरहम हुकूमत से हमको निजात मिल जाती है।
जब दौलत और अमीरी की जादूगरी हमारे दिल को रश्क (ईर्ष्या) और हसरत से भर देती है, सुल्तानों और अमीरों की आंखों को चकाचौंध करने वाली ज़िंदगी हमारे दिल पर रश्क के चरके (घाव) लगाती है, उस वक़्त ग़ैब से आने वाली यह आवाज़,
बस कुन ज़े किब्रो-नाज़ कि दीद अस्त रोज़गार
चीन-ए-क़बा-ए-क़ैसर ओ तर्फ़-ए-कुलाह-ए-कय
शायरी का इस्तेमाल
शेर एक ताक़त है जिससे बड़े-बड़े काम लिए जा सकते हैं, बशर्ते कि इसका इस्तेमाल सही तौर से किया जाए। अरब में शायरी की शुरुआत 'रज़ज़' (युद्ध-काव्य) से हुई, यानी मैदान-ए-जंग में दो विरोधी जब मुक़ाबले के लिए बढ़ते थे, तो जोश में फ़ख़्र से भरे लयबद्ध जुमले उनकी ज़बान से निकलते थे। ये दो-चार शेर से ज़्यादा नहीं होते थे, लेकिन जंग के नगाड़े का काम देते थे। इसके बाद मर्सिया शुरू हुआ। यानी जब कोई अज़ीज़ या दोस्त मर जाता था तो उसकी लाश पर नौहा (विलाप) करते थे। बाज़-बाज़ (कुछ) शायरों ने तमाम उम्र मर्सिए के सिवा कुछ न कहा। ख़नसा एक औरत थी, वो अपने भाई से निहायत मुहब्बत रखती थी, वो मर गया तो उसको इस क़दर सदमा हुआ कि तमाम उम्र रोया की, चुनांचे उसके सैकड़ों-हज़ारों अशआर उसी के मर्सिए में हैं। हतमम बिन नुवैरा का भी भाई के मरने पर यही हाल हुआ। शहर-शहर, मारा-मारा फिरता था, जहां पहुंच जाता मर्द-औरत उसके पास जमा हो जाते। भाई का मर्सिया पढ़ता, खुद रोता और लोगों को रुलाता।
मर्सिए के बाद क़सीदा शुरू हुआ।
अरब के शायर अक्सर तलवार और अलम (झंडे) वाले होते थे, इसलिए क़सीदों में अपने जंग के कारनामे लिखते थे। अम्र बिन हिंद अरब का मशहूर बादशाह गुज़रा है, जब उसका क़ब्ज़ा तमाम मुल्क पर हो गया तो उसने एक दिन दरबार में कहा, अरब में आज कोई है जो मेरे सामने गर्दन न झुकाए? दरबारियों ने कहा, अम्र कुलसूम शायर। अगर वो आपका ताबेदार हो जाए तो फिर कोई शख़्स आपके सामने सर नहीं उठा सकता। बादशाह ने अम्र कुलसूम को घर की औरतों के साथ बुला भेजा। अम्र कुलसूम की मां शाही हरम में गई और वो खुद दरबार में बैठा। बादशाह की मां ने अम्र कुलसूम की मां से किसी चीज़ की तरफ़ इशारा करके कहा कि उठा देना, उसने कहा कि तुम खुद उठा लो। बादशाह की मां ने दोबारा हुक्म दिया और फिर यही जवाब मिला। तीसरी दफ़ा जब फ़रमाइश की तो अम्र कुलसूम की मां चीख उठी कि 'वा तग़लिबाह' (क़बीला-ए-तग़लिब की दुहाई)। अम्र कुलसूम ने आवाज़ सुनी, समझा कि उसकी मां की बेइज़्ज़ती की गई है, फ़ौरन तलवार म्यान से घसीट कर बादशाह का सर उड़ा दिया और दरबार से निकल आया।
फिर बड़ा रन पड़ा (घमासान युद्ध हुआ) जिसमें दोनों तरफ़ के हज़ारों आदमी मारे गए। उकाज़ के मेले का दिन आया तो अम्र कुलसूम ने आम भीड़ में खड़े होकर क़सीदा पढ़ा, जिसमें इस वाक़ये की तफ़सील थी। इस क़सीदे में तमाम वाक़यात और अपनी ग़ैरत और आत्मसम्मान को इस जोश से लिखा है कि दो बरस तक, क़बीला-ए-तग़लिब का हर बच्चा इसके अशआर बचपन ही से सीखता और याद करता था। इतिहास वालों का बयान है कि इस क़सीदे की बदौलत कई सौ बरस तक इस क़बीले में बहादुरी और दिलेरी की खूबियां क़ायम रहीं। आज भी ये अशआर बुझे हुए दिलों को गरमा देते हैं। यह क़सीदा काबे के दरवाज़े पर लटकाया गया था और इस वजह से 'सबा मुअल्लक़ा' (सात लटके हुए क़सीदों) में दाख़िल है।
यह शायरी का सही इस्तेमाल था और इसी का असर था कि अरब में क़ौम की बागडोर, शायरों के हाथ में थी। वो क़ौम को जिधर चाहते थे झोंक देते थे और जिधर से चाहते थे रोक लेते थे। अफ़सोस है कि ईरान ने कभी यह ख़्वाब नहीं देखा, यहां के शायर शुरुआत से ग़ुलामी में पले और हमेशा ग़ुलाम रहे और अपने लिए नहीं बल्कि दूसरों के लिए पैदा हुए थे।
शरीफ़ाना अख़लाक़ (नेक आचरण) पैदा करने का शायरी से बेहतर कोई ज़रिया नहीं हो सकता। इल्म-ए-अख़लाक़ (नीतिशास्त्र) एक मुस्तक़िल (स्वतंत्र) फ़न है और फ़लसफ़े का एक बड़ा हिस्सा है, हर ज़बान में इस फ़न पर बहुत सी किताबें लिखी गई हैं, लेकिन अख़लाक़ी तालीम के लिए एक-एक शेर भारी-भरकम किताब से ज़्यादा काम दे सकता है। शायरी एक असरदार चीज़ है, इसलिए जो ख़याल इसके ज़रिए से अदा किया जाता है, दिल में उतर जाता है और जज़्बातों को उभारता है। इस बिना पर अगर शायरी के ज़रिए से अख़लाक़ी मज़ामीन (विषय) बयान किए जाएं और शरीफ़ाना जज़्बात मसलन बहादुरी, हिम्मत, ग़ैरत, आत्मसम्मान और आज़ादी को अशआर के ज़रिए से उभारा जाए तो कोई और तरीक़ा इसकी बराबरी नहीं कर सकता। इस्लाम से पहले अरब, एक सख़्त जाहिल और मुफ़लिस क़ौम थी। गाय और ऊंटनी के दूध के सिवा और कुछ उनको मयस्सर नहीं आ सकता था। मकान के बदले झोपड़े या कंबल के तंबू थे, रात-दिन आपस में लड़ते-कटते-मरते थे, इन सबके बावजूद इन्हीं वहशियों में, सच्चाई, वादा निभाना, मेहमान-नवाज़ी, सख़ावत (दानशीलता), हिम्मत और ग़ैरत के जो गुण पाए जाते थे, आज सभ्य क़ौमों को नसीब नहीं, निहायत सच कहा है,
जैसे राहज़न और लुटेरे थे हमारे रास्त-बाज़
रहनुमाओं में नहीं पाते हम आज उनकी नज़ीर
जंग के मैदान में जंगी बाजे वह काम नहीं दे सकते जो रज़ज़ (जंगी शायरी) का एक-एक मिसरा दे सकता है। हज़रत आयशा सिद्दीक़ा जब हज़रत उस्मान के खून का दावा लेकर जनाब अमीर अलैहिस्सलाम से जंग के मैदान में उतरीं और उनकी फ़ौज पर हार के आसार पैदा हुए, तो ज़ब्बा क़बीले के एक व्यक्ति ने आगे बढ़कर उनके ऊंट की मुहार पकड़ ली और ये अशआर पढ़े:
नहनु बनू ज़ब्बती असहाबुल जमल
(हम ज़ब्बा क़बीले के लोग हैं, हमको मौत शहद से ज़्यादा)
अल-मौतु अहला इन्दना मिनल असल
(मीठी मालूम होती है, हम उस्मान के मरने की ख़बर बरछी की)
मनई इब्न अफ़्फ़ान ब-अतराफ़िल असल
(ज़बान से सुनाते हैं, हमारे शेख़ (उस्मान)
रुद्दू अलैना शैख़ना सुम्मा ब-हबल
(को वापस दे दो, फिर कोई झगड़ा नहीं)
यह व्यक्ति ख़ुद लड़कर मारा गया, लेकिन यह हालत हुई कि एक के बाद एक, बड़े-बड़े सरदार आगे बढ़ते थे, हज़रत आयशा के ऊंट की मुहार थाम कर लड़ते थे और मारे जाते थे। तक़रीबन डेढ़ सौ आदमियों ने इस तरह जानें दे दीं।
दृढ़ता और बहादुरी की शिक्षा अरस्तू की 'किताब-उल-अख़लाक़' से उस क़दर नहीं मिल सकती, जिस क़दर इस शेर से मिल सकती है:
मन आंगह इनान बाज़ पेचम ज़े राह
(मैं उस वक़्त मैदान से हटूंगा?)
कि या सर दिहम या सितानम कुलाह
(कि या तो सिर दे दूं, या ताज छीन लूं)
अख़लाक़ (नैतिकता) की किताबों में दिखावे की बुराई के पन्ने के पन्ने भरे पड़े हैं, लेकिन यह एक रुबाई उन सबसे ज़्यादा असर कर सकती है:
ज़ाहिद ब-ज़न-ए-फ़ाहिशा गुफ़्ता मस्ती
कज़ ख़ैर गुसस्ती ओ ब-शर पैवस्ती
ज़न गुफ़्त चुनां कि मे नुमायम हस्तम
तू नीज़ चुनां कि मे नुमाई हस्ती
यानी ज़ाहिद (तपस्वी) ने एक वेश्या से कहा कि तू बड़ी नालायक़ है। औरत ने कहा, मैं जैसा अपने आपको ज़ाहिर करती हूं, भीतर से भी वैसी ही हूं (यानी मेरा बाहर-भीतर एक समान है), क्या हुज़ूर भी भीतर से ऐसे ही हैं जैसा बाहर से नज़र आ रहे हैं? 'अख़लाक़-ए-जलाली' और 'अख़लाक़-ए-नासिरी' इल्म-उल-अख़लाक़ (नीतिशास्त्र) की बहुत प्रामाणिक और विद्वतापूर्ण किताबें हैं, लेकिन यह ज़ाहिर सी बात है कि ईरान के आचरण और आदतों पर 'गुलिस्तां' और 'बोस्तां' ने उनसे कहीं ज़्यादा असर किया है।
शायरी की जितनी भी क़िस्में हैं, यानी दार्शनिक, नैतिक, इश्क़िया और कल्पनाशील, सबसे फ़ायदेमंद काम लिए जा सकते हैं। दार्शनिक शायरी मुश्किल विचारों को आसानी के साथ ज़हन में उतार सकती है, नैतिक शायरी अख़लाक़ को संभालती है, इश्क़िया शायरी से ज़िंदादिली और रूह की ताज़गी पैदा होती है। कल्पना से तबीयत में उमंग और खुशी पैदा होती है, लेकिन अफ़सोस है कि ईरान के ज़्यादातर शायरों ने शायरी का सही इस्तेमाल नहीं किया। मुख्य रूप से, शायरी सिर्फ़ दो कामों के लिए सीमित होकर रह गई: सुल्तानों और अमीरों की तारीफ़, जिसमें झूठ और मनगढ़ंत बातों का पुलिंदा बांधा जाता था, और इश्क़-आशिक़ी, जो बेतुके मुबालग़ों (बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बातों) और फ़िज़ूल की बातों से भरी हुई थी।
बाद के शायरों ने कल्पना को अलबत्ता बहुत विस्तार दिया, लेकिन इसमें वे संतुलन की हद से इस क़दर गुज़र गए कि वह कल्पना नहीं रही, बल्कि पहेली बन गई।
शेर और शायरी की अज़मत
अरब में जब कोई शायर पैदा होता था, तो हर तरफ़ से बधाई के पैग़ाम आते थे, खुशी के जलसे किए जाते थे, क़बीले की औरतें जमा होकर फ़ख़्र (गर्व) के गीत गाती थीं। क़बीले की इज़्ज़त और शान एकदम से बुलंद हो जाती थी। एक-एक शेर एक क़बीले या एक व्यक्ति का नाम क़यामत तक के लिए ज़िंदा कर देता था। शम्माख़ बिन ज़िरार ने अराबा औसी की शान में यह शेर कहा:
इज़ा मा राया रुफ़िअत लि-मजद
(जब अज़मत और बड़ाई का झंडा कहीं बुलंद किया जाता है)
तलक़्क़ा हा अराबा बिल-यमीन
(तो अराबा उसको दाहिने हाथ से थाम लेता है)
तो अराबा का नाम पूरे अरब में मशहूर हो गया और आज तक यह मिसरा एक कहावत (ज़र्ब-उल-मसल) बना हुआ है।
अरब में मुहल्लिक़ एक गुमनाम व्यक्ति था। उसकी तीन बेटियां थीं और उनको वर (दूल्हा) नसीब नहीं होता था। इत्तेफ़ाक़ से 'आशा' शायर का उस तरफ़ से गुज़र हुआ। मुहल्लिक़ की बीवी ने उसके आने की ख़बर सुनी तो मुहल्लिक़ से कहा कि यह वह व्यक्ति है कि जिसकी तारीफ़ कर देता है, वह पूरे देश में इज़्ज़तदार हो जाता है। मुहल्लिक़ ने आशा की दावत की। खाने के बाद शराब का दौर चला तो आशा ने मुहल्लिक़ से उसके बाल-बच्चों का हाल पूछा। मुहल्लिक़ ने बेटियों का ज़िक्र किया कि जवान हो गई हैं और कहीं से शादी का पैग़ाम नहीं आता। आशा ने कहा, इसका इंतज़ाम कर दिया गया, तुम बेफ़िक्र रहो। उकाज़ के मेले का ज़माना आया तो आशा ने आम लोगों की भीड़ में क़सीदा पढ़ा। भूमिका के बाद ये शेर थे:
ल-अमरी लक़द लाहत उयून कसीरा
इला ज़ौ-ए-नारिन बिल-बिक़ाई तुहरक़ु
तुशब्बु लि-मक़रूरैन यस्तलियानिहा
व बाता लदन-नारिन-नदा वल-मुहल्लिक़ु
क़सीदा ख़त्म भी नहीं होने पाया था कि मुहल्लिक़ के इर्द-गिर्द भीड़ लग गई। अरब के शरीफ़ लोगों ने आ-आकर उससे रिश्तेदारी की ख़्वाहिश ज़ाहिर की और तीनों लड़कियां इज़्ज़तदार घरानों में पहुंच गईं।
नुमैर एक बहुत इज़्ज़तदार क़बीला था। उनको अपने ख़ानदान और वंश का इस क़दर ग़ुरूर था कि जब इस क़बीले के किसी आदमी से कोई व्यक्ति पूछता था कि तुम किस क़बीले से हो, तो वह ग़ुरूर के लहज़े में भारी आवाज़ से नुमैर का नाम लेता था। जरीर, जो मशहूर शायर था, उसको इस क़बीले के एक आदमी से तकलीफ़ पहुंची। जरीर घर में आया, बेटे से कहा, आज चराग़ में तेल ज़्यादा डालना। उस क़बीले की हजो (निंदा) में अशआर लिखने शुरू किए। जब यह शेर ज़बान से निकला:
फ़-ग़ुज़्ज़त-तर्फ़ा इन्नका मिन नुमैरिन
फ़ला का'बन बलग्ता वला किलाबा
तो वह उछल पड़ा और कहा, वल्लाह अख़ज़ैतुहू आख़िर-अद-दहर, यानी ख़ुदा की क़सम, मैंने इसको हमेशा के लिए रुसवा (बदनाम) कर दिया। पूरे अरब में यह शेर मशहूर हो गया और यह हालत हो गई कि इस क़बीले के किसी आदमी से लोग क़बीले का नाम पूछते, तो वह नुमैर का नाम छोड़कर ऊपर की पीढ़ियों का नाम बताता था, यहां तक कि सिरे से क़बीले का नाम ही मिट गया।
सुल्तान महमूद की अज़मत व शान और उसका दबदबा व ताक़त किसी के बताने की मोहताज नहीं, लेकिन फ़िरदौसी ने हजो (निंदा) के जो शेर कह दिए, महमूद किसी तरह उनको मिटा न सका। पूरे देश में मुनादी थी कि जिसके पास यह हजो निकलेगी, वह गिरफ़्तार होगा। फ़िरदौसी ख़ुद शहर-दर-शहर छिपता और भागता फिरता था, लेकिन उसके अशआर बच्चे-बच्चे की ज़बान पर थे। आज 'शाहनामा' की जितनी भी प्रतियां दुनिया में मौजूद हैं, कोई इस हजो से ख़ाली नहीं।
अरब में शायर का यह रुतबा था कि शायर किसी की तारीफ़ लिखना अपने लिए शर्म की बात समझता था। शुरुआती शायरी से लेकर एक लंबी मुद्दत तक तारीफ़ वाले क़सीदे नहीं लिखे गए। शायर पर कोई कुछ एहसान करता था, तो शुक्रिया के तौर पर वह उसका ज़िक्र कर देता था, लेकिन एहसान करने वाला बादशाह भी हो, तब भी 'मद्दाह' (तारीफ़ करने वाला) का लफ़्ज़ उसकी ज़बान से नहीं निकलता था। सबसे पहला व्यक्ति जिसने तारीफ़ लिखी, वह नाबिग़ा ज़ुब्यानी है। हालांकि इस तारीफ़ की बदौलत नाबिग़ा इस क़दर दौलतमंद हो गया कि सोने-चांदी के बर्तनों में खाना खाता था, लेकिन अरब में उसकी इज़्ज़त जाती रही।
नाबिग़ा के बाद आशा ने शायरी को पेशा बना लिया, जगह-जगह मदह (तारीफ़) कहता और इनाम लेता फिरता था। धीरे-धीरे यह आम रिवाज हो गया और अब एक मुद्दत से क़सीदा और कासा-ए-गदाई (भीख का प्याला), हम-मानी (पर्यायवाची) लफ़्ज़ बन गए हैं। फिर भी इस्लाम के ज़माने में भी कुछ-कुछ शायर मदह से आर रखते थे (बुरा मानते थे)। उमर बिन अबी रबीआ अल-क़ुरैशी जो ग़ज़ल-गो शायर था, उसने कभी किसी की मदह नहीं की और जब ख़लीफ़ा अब्दुल मलिक ने उससे मदह की फ़रमाइश की तो उसने कहा कि मैं मर्दों की नहीं बल्कि औरतों की मदह करता हूँ। जमील एक दफ़ा वलीद बिन अब्दुल मलिक का हमसफ़र था। वलीद ने जमील से कहा कि शेर सुनाओ, उसको ख़याल था कि जमील उसकी मदह कहेगा, जमील ने अपनी शान में यह फ़ख़रिया (गर्व से भरा) शेर पढ़ा,
अना जमील फ़िस्-सनाम मिन मअद
फ़िज़्-ज़िर्वतिल् उल्या वर-रुक्निल् अशद
इस मौक़े पर यह ध्यान रखना चाहिए कि वलीद वह शख़्स है जिसने एक तरफ़ स्पेन और दूसरी तरफ़ सिंध फ़तह किया था और बनू उमय्या में उससे बढ़कर कोई बादशाह नहीं गुज़रा, फिर भी जमील से कुछ तअर्रुज़ (विरोध) न कर सका।
मरदान बिन अबी हफ़्सा कहता है,
मा ज़िल्त आनफ़ अन ऊनफ़ मदहह
इल्ला लिसाहिब मिम्बर व शरीर
यानी मुझको मदह से हमेशा आर रहा (बुरा लगा), और मदह करता हूँ तो साहब-ए-ताज-ओ-तख़्त (बादशाह) की करता हूँ। इब्न मय्यादा ने ख़लीफ़ा मंसूर की मदह में यह क़सीदा लिखा और बग़दाद जाने का इरादा किया कि दरबार में सुनाए। थोड़ी देर के बाद नौकर दूध लेकर आया, इब्न मय्यादा ने दूध पीकर पेट पर हाथ फेरा और कहा जब तक यह मयस्सर (उपलब्ध) है, मुझको मंसूर से क्या ग़रज़ है।
सैफ़ुद्दौला की जाह-ओ-जलालत (शान-ओ-शौकत) मशहूर है। मुतनब्बी उसके दरबार का शायर था। सैफ़ुद्दौला उसको और दरबारी शायरों के साथ बराबर बिठाता था। मुतनब्बी ने जलकर क़सीदा लिखा और दरबार में सुनाया, सैफ़ुद्दौला से मुख़ातिब होकर कहता है,
व मा इंतिफ़ाउ अख़िद्-दुन्या बि-नाज़िरतिन
इज़ा इस्तवत इन्दहुल् अनवारु वज़्-ज़ुलम
यानी इंसान को आँख से क्या हासिल जब उसको रोशनी और तारीकी (अँधेरा) यकसाँ (एक जैसा) नज़र आती हो।
या अअदलन्-नासि इल्ला फ़ी मुआमलती
फ़ीकल् ख़िसामु व अंतल् ख़स्मु वल्-हकम
यानी ऐ सबसे ज़्यादा इंसाफ़ करने वाले (सिवाए मेरे मामले के) तेरी ही बाबत (बारे में) झगड़ा है और तू ही फ़रीक़-ए-मुख़ालिफ़ (विरोधी पक्ष) है और तू ही पंच है।
यह क़सीदा सुनाकर दरबार से चला गया और मिस्र में आया। मिस्र से बग़दाद होता हुआ, शीराज़ का इरादा किया। शीराज़ में अज़दुद्दौला हुक्मरान था जो शहंशाह का लक़ब रखता था और जिसका हमसर (बराबरी का) उस ज़माने में कोई बादशाह न था, अज़दुद्दौला को ख़बर हुई तो उसके इस्तक़बाल (स्वागत) के लिए दरबानों को भेजा। मुतनब्बी दरबार में आया लेकिन इन शर्तों पर कि दरबार में शोअरा (शायरों) के साथ नहीं बैठेगा और क़सीदा खड़े होकर नहीं पढ़ेगा। अज़दुद्दौला ने यह शर्तें मंज़ूर कीं। एक मौक़े पर अज़दुद्दौला ने किसी से कहा कि मुतनब्बी ने जो क़सीदे शाम (सीरिया) में लिखे यह क़सीदे उस रुतबे के नहीं। मुतनब्बी ने कहा कि जिस दर्जे का शख़्स होता है उसी के मुवाफ़िक़ (अनुसार) शेर कहा जाता है।
हाशिये
(1)
(2)
(3) मुक़द्दमा तर्जुमा इलियड बज़बान-ए-अरबी, मतबूआ मिस्र (मिस्र में छपी), सफ़्हा 62
(4) उम्दा इब्न रशीक़, जिल्द दोम (भाग दो), सफ़्हा 184
(5) जिन लोगों के नज़दीक शेर में वज़्न (मीटर) ज़रूरी नहीं वह हर शायराना अंदाज़-ए-बयान को शेर कहते हैं।
(6) यहाँ पर शेर-उल-अजम 4 तबा अव्वल (पहला संस्करण) सफ़्हा 68 सतर 1-2-3 में ग़ैर-मफ़हूम इबारत (नासमझ आने वाला पाठ) थी, असल देखने से मालूम हुआ कि वह कटी हुई इबारत थी, कातिब (लिखने वाले) ने ग़लती से उसको लिख दिया था, लिहाज़ा वह सवा दो सतरें हज़्फ़ करके (हटाकर) असल के मुताबिक़ कर दी गईं, वह कटी हुई इबारत यह है,
इत्तिफ़ाक़ से कोई मद्द-ए-मुक़ाबिल (मुक़ाबले में) न था, इसलिए बहरहाल उन्हीं लोगों की नज़र पड़ी और ज़्यादा दाम लगे इसलिए अफ़सोस के तौर पर कहता है कि 'क्या कहिए इस साल भी इनकी क़ीमत ज़्यादा ही रही।'
(7) किताब-उल-उम्दा, जिल्द दोम मतबूआ मिस्र सफ़्हा, 50
(8) किताब-उल-उम्दा, जिल्द अव्वल, सफ़्हा 49
- रचनाकार :शिबली नोमानी
- प्रकाशन : मुबारक अली ताजिर कुतुब, लाहौर
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