सेकूलरिज़्म और तसव्वुफ़
विचारों की दुनिया में आजकल जो स्थापित फ़ैशन हैं, उनमें से एक सेकुलरिज्म भी है। बहुत कम लोग सही-सही जानते हैं कि सेकुलरिज्म है क्या, सिवाय इसके कि यह कोई मज़हब नहीं है। हालाँकि ऐसे लोग भी हैं जो सेकुलरिज्म का दम तो भरते हैं क्योंकि इसे ऐसी बात समझा जाता है जिसे रोशन-ख़याल (खुले विचारों वाले) लोगों को मानना ही चाहिए। लेकिन वे सेकुलरिज्म का दम भरने के बावजूद ऐसी बातों पर भी अमल करते रहते हैं जिन पर चलने की उनके मज़हब में ताकीद (ज़ोर) दी गई है।
ऐसे लोग भी हैं जो अपने आप को सेकुलर कहते हैं, सिर्फ़ इसलिए कि कोई उनसे यह न पूछे कि ज़िंदगी का असल मक़सद और लक्ष्य क्या है। ऐसे लोग भी हैं जो सारे मज़हबों को नेक नीयती से देखते हैं और यह उम्मीद करते हैं कि सेकुलरिज्म को आम तौर पर अपना लेने से मज़हबी झगड़े ख़त्म हो जाएँगे। सेकुलरिज्म में यक़ीन रखना मानो ऐसा है जैसे सुरक्षित हो जाना, क्योंकि फिर कोई यह नहीं पूछता कि आप इस पर क्यों यक़ीन रखते हैं। यह तो एक फ़ैशन है और फ़ैशन का सिर्फ़ पालन किया जाता है, उसे जाँचा नहीं जाता।
सेकुलरिज्म को समझने का बेहतरीन तरीक़ा यह है कि इसके इतिहास पर ग़ौर किया जाए। यह एक लैटिन शब्द से निकला है जिसके मायने हैं नस्ल या दौर। विशेषण के तौर पर सेकुलर के कई मायने हैं और संज्ञा के तौर पर इसके मायने हैं पादरी। मध्य युग की ईसाई दुनिया में आदमियों और मामलों (यानी इंसानी गतिविधियों) की दो क़िस्में थीं: मज़हबी और दुनियावी। ऐसे आदमी भी थे जो आला मज़हबी ज़िंदगी गुज़ारते थे या गुज़ारने की तमन्ना करते थे और दूसरे वे लोग थे जो महज़ दुनियावी प्राणी (यानी दुनियादार) ही रहने पर संतुष्ट रहते थे। तपस्या, ब्रह्मचर्य (अविवाहित जीवन) और इच्छाओं को मारने के दूसरे तरीक़े, इन सबका ताल्लुक़ चर्च से होता था, जिसमें पादरियों की दर्जेबंदी और ख़ानक़ाही (मठ वाले) सिलसिले होते थे।
दुनियादार आदमी अपनी ज़िंदगी ताक़त और दौलत हासिल करने की कोशिश में बसर करते थे या अपने-अपने तौर पर जिस तरह भी ख़ुश रह सकें। सैद्धांतिक रूप से मज़हबी ज़िंदगी श्रेष्ठ ज़िंदगी समझी जाती थी, लेकिन चर्च को भी अपने आप को क़ायम रखने के लिए ताक़त और दौलत की ज़रूरत होती थी और इस वजह से बादशाहों और शहज़ादों से उनकी अनबन भी हो जाती थी, जो ताक़त और दौलत को अपना ही हक़ समझते थे। आहिस्ता-आहिस्ता यूरोप के उस बड़े हिस्से में जो विचारों और आर्थिक रूप से सबसे ज़्यादा सक्रिय था, मज़हबी आदमियों और मज़हबी मामलों या गतिविधियों का महत्व ख़त्म हो गया। मज़हबी आदमियों का इसलिए कि वे आक्रामक हद तक तंग-नज़र होते थे और मज़हबी गतिविधियों का इसलिए कि उन्हें दुनिया से कटा हुआ समझा जाने लगा।
सियासी और आर्थिक ताक़त को बढ़ाते रहना ही ज़िंदगी का मक़सद बन गया और ख़ुशी का मतलब यह समझा जाने लगा कि यह ख़ुशी के साधनों को अपने क़ब्ज़े और इस्तेमाल में लेने से हासिल हो जाती है। सेकुलरिज्म के इतिहास से इसके मतलब और मायने पर जो रोशनी पड़ती है, उस पर यक़ीन रखने का मतलब यह है कि हमें अपना पूरा ध्यान भौतिक (माद्दी) दुनिया पर केंद्रित कर देना चाहिए और जो कुछ हम इससे हासिल कर सकते हैं, हमें वह हासिल करके अच्छी से अच्छी तरह ज़िंदगी गुज़ारनी चाहिए। हमारे ज़माने में साइंस और टेक्नोलॉजी की तरक़्क़ी और आर्थिक रूप से विकसित देशों में ऊँचे जीवन स्तर को सीधे तौर पर सेकुलर नज़रिए का नतीजा समझा जाता है।
लेकिन आदमी की फ़ितरत कुछ ऐसी है कि वह पूरी तरह सिर्फ़ भौतिक ज़िंदगी पर ही संतुष्ट नहीं रह सकता। वह तरह-तरह से और ज़्यादातर सेकुलरिज्म और सेकुलर नज़रिए की तरफ़ आकर्षित तो हो जाता है, लेकिन उसकी फ़ितरत कुछ ऐसी है कि वह उसे भौतिक ज़रूरतों और भौतिक वजूद के होते हुए भी, इस दुनिया से परे (मावरा) के बारे में सोचने पर प्रेरित कर देती है। इसलिए जब राजनेताओं, वैज्ञानिकों और बुर्जुआ यानी शहरी मध्यम वर्ग या कारख़ानेदार (entrepreneur) और बुद्धिजीवियों की कामयाबियों की वजह से सेकुलरिज्म का डंका बज रहा था, तो सेकुलर नज़रिए और मज़हबी नज़रिए में एक समझौता हो गया। यानी आदमी जितना भी मज़हबी होना चाहे हो जाए, लेकिन उसका मज़हब उसी तक रहे, उसे यह हक़ न हो कि वह यह चाहे कि दूसरे भी उससे सहमत हों। मज़हबी आज़ादी का तो उसे हक़ हो लेकिन (इसकी बुनियाद पर) ताक़त हासिल करने का नहीं। उसका मज़हब उसकी ज़ात तक रहे, पूरी तरह सेकुलर मामलों से उसे कोई वास्ता न हो।
हम नहीं कह सकते कि इस समझौते पर पूरी तरह अमल हो रहा है (क्योंकि हम देखते हैं कि) सियासत तक में और बहुत से बेहद विकसित देशों तक में पूरी तरह सेकुलर मामलों पर मज़हबी संबंधों का असर पड़ता है। कुछ लोग तो यह कहते हैं और वे बेवजह नहीं कहते कि कोई भी मामला इतना सेकुलर और महज़ सेकुलर नहीं हो सकता जिससे किसी न किसी हद तक मज़हबी अक़ीदे (आस्था) पर असर न पड़े। सेकुलर नज़रिए का सबसे साफ़ खंडन (या विरोध) वह ताक़त और रुतबा है जो रोमन कैथोलिक चर्च को हासिल है। लेकिन यह कहने का मतलब व्यक्तिगत मज़हब के सही होने का या उसके उस गहरे असर का इनकार करना नहीं है जो उन लोगों पर भी होता है जो सेकुलरिज्म का दम भरते हैं। सच्चा मज़हबी अक़ीदा हमेशा गहरे तौर पर व्यक्तिगत ही होता है।
इस व्यक्तिगत मज़हब में यक़ीनी तौर पर सबसे ज़्यादा ज़ोर ख़ुलूस (सच्चाई) पर होता है। और यह तमाम मज़हबों के बीच एक कड़ी की मिसाल है, हालाँकि वे बाहरी (या ज़ाहिरी बातों के) रूप से एक दूसरे से बहुत अलग होते हैं लेकिन असल रूप में एक होते हैं। सेकुलरिज्म और सूफ़ीवाद (तसव्वुफ़) के बीच भी यह एक कड़ी का काम करता है।
सूफ़ीवाद या तसव्वुफ़ सदियों से मुसलमानों में बौद्धिकता का एक फ़ैशन था। जिस तरह सेकुलरिज्म ग़ैर-मज़हबी है लेकिन अगर कोई मजबूरी आन पड़े तो मज़हब के ख़िलाफ़ भी हो सकता है, उसी तरह तसव्वुफ़ भी हालाँकि कट्टरपंथी नहीं होता था (ग़ैर-परंपरागत होता था) लेकिन वह कट्टरपंथ का विरोधी बन सकता था। शायर तसव्वुफ़ के इस पहलू को जान-बूझकर और लगातार प्रमुख तौर पर पेश करते रहे। वे दिखावा करने वाले धर्मगुरुओं के पाखंड का मज़ाक़ उड़ाते नहीं थकते थे। लेकिन कट्टरपंथ के महत्व से तसव्वुफ़ का यह इनकार तो तसव्वुफ़ का एक कम अहम पहलू था। इसके सकारात्मक तत्व तो दरअसल इसके इस दावे में निहित थे कि आदमी और उसके पैदा करने वाले में सीधा रिश्ता हो सकता है, इस रिश्ते के क़ायम होने में किसी एक या उन तमाम माध्यमों की ज़रूरत नहीं थी, जिन्हें कट्टरपंथी लोग ज़रूरी समझते थे। इसके इन सकारात्मक तत्वों में यह यक़ीन भी शामिल था कि बंदे और ख़ुदा का रिश्ता 'शेख़' के मार्गदर्शन में सबसे ज़्यादा बेहतर तौर पर क़ायम हो सकता है। लेकिन 'शेख़' का मार्गदर्शन उसी वक़्त तक ज़रूरी होता था जब तक 'मुरीद' रूहानी रूप से अपने पैरों पर खड़ा न हो जाए और जब वह इस क़ाबिल हो जाता था तो फिर वह शेख़ का दर्जा सँभाल लेता था और दूसरों के लिए मार्गदर्शक बन जाता था।
जब सूफीवाद या तसव्वुफ़ फ़ैशन बन गया तो इसकी भी अपनी रस्में और बाहरी निशानियाँ बन गईं। जो इसमें यक़ीन रखते थे, वे उन कट्टर 'उलेमा' से भी ज़्यादा आख़िरत (परलोक) को मानने लगे, जो दुनियावी माल-असबाब और दुनियावी ख़ुशी के चंद रोज़ा (अस्थायी) होने की बात जताने के बावजूद, दुनियावी फ़र्ज़ से जुड़े हुक्मों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते थे। व्यक्तिगत मज़हब का तत्व, यानी ख़ुदा से सीधे रिश्ते का विचार, होते-होते एक ऐसा दर्शन बन गया जिसके मुताबिक़ पूरे अस्तित्व को एक इकाई माना जाता है और तमाम घटनाओं को ईश्वरीय इच्छा का प्रकटीकरण। और इस तरह इसने रचनात्मक और निर्माणकारी काम करने के स्वाभाविक जज़्बे या प्रेरणा को खोखला कर दिया। लेकिन यह तो बाद में हुआ। अपने चरम के ज़माने में तसव्वुफ़ यक़ीनन अंधी नक़ल, सामाजिक नाइंसाफ़ी और व्यक्ति की भावनाओं को कुचल देने के ख़िलाफ़ वाक़ई बग़ावत का प्रतीक बन गया था।
अगर मज़हब का यह विचार कि वह बुनियादी तौर पर व्यक्तिगत मामला है, सेकुलरिज़्म और तसव्वुफ़ दोनों में समान है, तो इन दोनों के आपसी मतभेदों पर भी ग़ौर करना चाहिए। सेकुलरिज़्म में जो इस बात पर ज़ोर है कि मज़हब (व्यक्ति का) व्यक्तिगत मामला है, उसमें असल ख़याल यह है कि हर आदमी अपने ही काम से काम रखे। यानी मज़हब व्यक्तिगत मामला है महज़ राजनीतिक और क़ानूनी लिहाज़ से, इसमें नीयत यह नहीं है कि धार्मिकता को बढ़ावा दिया जाए, बल्कि यह है कि धार्मिकता एक विनाशकारी तत्व न बन जाए (क्योंकि) व्यक्तिगत मज़हब का मतलब यह भी तो हो सकता है कि कोई मज़हब ही न हो, या कोई भी मज़हब हो, या किसी ऐसे संप्रदाय से जुड़ाव ही हो जिसमें सबके अक़ीदे (मान्यताएँ) एक हों, बशर्ते कि यह जुड़ाव राज्य या प्रचलित सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था से न टकराए।
सेकुलरिज़्म का आइडियल या लक्ष्य मज़हब को दोनों लिहाज़ से बहस से बाहर कर देना है। अंतर्दृष्टि प्राप्त करने के सिद्धांत के तौर पर भी और आध्यात्मिक कृपा के स्रोत के तौर पर भी। इसके साथ-साथ आदमी को जहाँ तक मुमकिन हो आत्मनिर्भर या बेनियाज़ (स्वतंत्र) बना देना। यह मान लिया गया है कि आदमी बेनियाज़ हो सकता है और अगर किसी में यह क्षमता नहीं है, तो फिर उसके लिए तो हार ही हार है। अगर वह नैतिक लिहाज़ से टूट जाए और क़ानून तोड़ने का दोषी हो जाए, तो उसे सज़ा मिलेगी। अगर वह इस नतीजे पर पहुँचे कि किसी संगठित और पारंपरिक अक़ीदे के सहारे के बिना वह अपना कोई व्यक्तिगत मज़हब नहीं अपना सकता, तो वह उस मज़हबी संप्रदाय से जुड़ा रह सकता है जिसमें वह पैदा हुआ हो, या वैसा ही संप्रदाय तलाश करके उसमें शामिल हो सकता है।
यह रवैया या नज़रिया तसव्वुफ़ से बिल्कुल अलग है। तसव्वुफ़ तो मज़हब को व्यक्तिगत मामला कहकर मज़हब को और गहरा (जज़्बा) बनाना चाहता है। कट्टरता या अंधी नक़ल से जो इसका विरोध है, या उस मज़हब से जो इसका विरोध है, जो धार्मिक साहित्य के ज़रिए आगे बढ़ता है और जिस पर एक आदत के तौर पर अमल किया जाता है, वह इस बुनियाद पर है कि ऐसा मज़हब महज़ नक़ल होता है, बेजान और ग़ैर-रचनात्मक। अक़ीदा व्यक्तिगत होना चाहिए, वह व्यक्ति के अपने आध्यात्मिक अनुभव का नतीजा होना चाहिए। तब ही यह उस व्यक्ति का सच्चा अक़ीदा होगा। तसव्वुफ़ का मक़सद बेहतर भौतिक हालात पैदा करना नहीं है, बल्कि बेहतर, ज़्यादा मुकम्मल और ज़्यादा समृद्ध व्यक्तित्व बनाना है। ऐसे व्यक्तित्व बनाना (जिनके दिल) उस बेनियाज़ाना ख़ुशी के एहसास से भरे हों, जो एक आध्यात्मिक तोहफ़े के तौर पर उन्हें हासिल होता है।
मानवीय विकास के लिहाज़ से संस्थागत (या बाक़ायदा) धर्मों, तसव्वुफ़ या सेकुलरिज़्म के अध्ययन से यह नहीं समझना चाहिए कि आदमी का सफ़र ख़त्म हो गया (आख़िरी मंज़िल आ गई)। अतीत, वर्तमान और भविष्य एक-दूसरे में विलीन होते रहेंगे, सोच-विचार और ज़िंदगी के नए रूप वजूद में आते रहेंगे। संस्थागत या बाक़ायदा मज़हब ने हमें वे मूल्य दिए हैं जिन्हें अब हम वेलफ़ेयर स्टेट या कल्याणकारी राज्य की शक्ल में देखना-दिखाना चाहते हैं। कल्याणकारी राज्य से मुराद वह लक्ष्य या आइडियल है जिसमें पूरे राजनीतिक समाज का यह सरोकार हो कि उसके हर व्यक्ति को काम करने और मज़दूरी पाने के पूरे-पूरे मौक़े मिलें, और जिसमें सबसे कमज़ोर लोगों के हितों को प्राथमिकता दी जाए और सबको बुनियादी अधिकार हासिल हों।
तसव्वुफ़ या सूफीवाद का विचार अब यह है कि यह समान विचार वाले व्यक्तियों और समूहों का सारी इंसानियत के फ़ायदे के लिए काम करने का एहसास है। बच्चों को, और राजनीतिक हालात तथा प्राकृतिक आपदाओं के मारे हुए लोगों को, अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ अपने विवेक से मदद देती हैं, और इन संस्थाओं को उन इंसान-दोस्त लोगों से मदद मिलती है जो इंसान-दोस्ती को अपनी मर्ज़ी की बात नहीं समझते, बल्कि अपना फ़र्ज़ समझते हैं। नैतिक हुक्म के पालन का जज़्बा जो ख़ुदा की तरफ़ से दिल में पैदा होता है, ख़ुदा जो बंदों के दिलों पर राज करता है, हमेशा की तरह आज भी ज़िंदा है। मज़हब और तसव्वुफ़ ने अपना नाम हटाकर सेकुलरिज़्म के उच्चतर रूपों की हैसियत अपना ली है। हो सकता है कि जैसे तसव्वुफ़ में हुआ था, इन उच्चतर रूपों की भी कोई ऐसी अपनी शायरी सामने आ जाए और आध्यात्मिक अनुभव के नए रूपों की तरफ़ ले जाए।
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