Font by Mehr Nastaliq Web

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

रद करें डाउनलोड शेर

रज्अत-पसंद अदब क्या है?

मुमताज़ हुसैन


अनुवाद : Rekhta Editor

मुमताज़ हुसैन

रज्अत-पसंद अदब क्या है?

मुमताज़ हुसैन

MORE BYमुमताज़ हुसैन

    रज्अत पसंद (प्रतिक्रियावादी) साहित्य क्या है?

    इसकी परिभाषा तय करना इस बात से ज़्यादा मुश्किल है कि तरक़्क़ी पसंद (प्रगतिशील) साहित्य क्या है। क्योंकि तरक़्क़ी का रास्ता सिर्फ़ एक ही होता है और पीछे लौटने की राहें अलग-अलग होती हैं।

    इंसानी समाज की यह ख़ासियत रही है कि नए और पुराने की जंग हर दौर में होती रही है। वो ताक़तें जो नए के निर्माण में हिस्सा लेती हैं, उन्हें हम तरक़्क़ी पसंद कहते हैं। इसके उलट जो पुराने मूल्यों (क़दरों) से चिपटी रहना चाहती हैं, जो नए को बढ़ने से रोकती हैं और नए और पुराने की कशमकश का हल अतीत (माज़ी) में ढूँढती हैं, उन्हें हम रज्अत पसंद (प्रतिक्रियावादी) कहते हैं। यूँ कहने में तो यह बात मामूली सी लगती है और इससे इनकार करना एकाध रज्अत पसंद के लिए भी मुश्किल है, लेकिन पेंच तो वहाँ फँस जाता है जब हम एक ख़ास दौर में तरक़्क़ी की शक्ल तय करके रज्अत पसंदी की राहों का पता लगाते हैं, फिर तो आस्तीनों से भी बुत झड़ने लगते हैं (यानी छुपे हुए चेहरे सामने आने लगते हैं)।

    अब सवाल यह है कि तरक़्क़ी और रज्अत (प्रतिक्रिया) की राहों को कौन तय करे। इस सवाल का वर्गीय (तबक़ाती) समाज में उठना लाज़िमी है। क्योंकि मरने वाला वर्ग ख़ुद अपनी ज़बान से अपनी मौत को तरक़्क़ी की सीढ़ी नहीं कह सकता है। वह अपने अधीन (शासित) लोगों के ऐतिहासिक दावों का खंडन ज़रूर करेगा। वह उनके दर्शन (फ़लसफ़े) और नज़रिए को झुठलाएगा, उनकी तरक़्क़ी के रास्ते को तबाही (तख़रीब) का रास्ता बताएगा। यही वह कारण है कि तरक़्क़ी और रज्अत की वैचारिक जंगें भी लड़ी जाती हैं। ये लड़ाइयाँ तू-तू मैं-मैं, कुफ़्र और नास्तिकता, तोहमत और झूठ के इल्ज़ामों तक ही सीमित नहीं रहती हैं, बल्कि इंसानी ख़ून से रंग भी जाती हैं।

    ज़ाहिर तौर पर देखने में तो ऐसा मालूम होता है कि शायद चर्च और मस्जिद या मंदिर और मस्जिद के गुंबद टकरा गए हैं। दो अलग-अलग अक़ीदे (मान्यताएँ), या ख़याल आपस में गुँथ गए हैं। दो तहज़ीबें गुत्थम-गुत्था हो गई हैं, दो क़ौमें अपने नस्ली और क़ौमी अंतर के युद्ध-गीत गा रही हैं, लेकिन हक़ीक़त इससे अलग होती है। यूँ तो इन लड़ाइयों के बहुत से छोटे-मोटे कारण ढूँढे जा सकते हैं, लेकिन बुनियादी कारण आर्थिक हितों की रक्षा होता है और यह आर्थिक हित हमेशा वर्गों में बँटा होता है, इसलिए रज्अत और तरक़्क़ी दोनों का ही दर्शन वर्गीय हितों की तर्जुमानी (प्रतिनिधित्व) करता है। इस चीज़ को समझने के लिए अमूर्त (मुजर्रद) क़िस्म का दर्शन यह काम अंजाम नहीं दे सकता है। इसे सिर्फ़ मिसालों के ज़रिए ही समझा जा सकता है। ऐसी मिसालें जो आपके ज़माने की हों, जो आपके माहौल और आस-पास की हों।

    पाकिस्तान में सिर्फ़ एक ही तरक़्क़ी पसंद आंदोलन है। इस आंदोलन के उद्देश्य और लक्ष्य (नस्ब-उल-ऐन) तय हैं। इस आंदोलन की वर्गीय बुनियाद भी है। लेकिन इसी पाकिस्तान में रज्अत पसंदी की बेशुमार शक्लें हैं। कोई हमें इस्लाम के नाम पर अतीत की तरफ़ ले जाने की कोशिश करता है तो कोई इस्लामी समाजवाद (सोशलज़्म) का नारा बुलंद करता है, कोई एक देश और एक क़ौम के नाम पर बुर्जुआ राष्ट्रवाद का नाम लेता है तो कोई अमेरिका के लोकतंत्र का रास्ता बताता है। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इन तमाम मंज़िलों से आगे निकल कर फ़ासीवाद (फ़ासिज़्म) का हल पेश करते हैं।

    ये चीज़ें रज्अत पसंद हैं कि नहीं, इसका फ़ैसला उसी वक़्त हो सकता है जब आप उन हल्क़ों (गुटों) को जाँचें जहाँ से ये नारे उठाए जाते हैं। बात बड़ी साफ़ सी है। अतीत की तरफ़ वही वर्ग लौटेगा जिसका कोई भविष्य हो। मज़दूर, किसान और मध्यम वर्ग के इंसानों का भविष्य तो आज आधी धरती पर नए चाँद की तरह चमक रहा है। इस उजाले में अँधेरे की तरफ़ वही लौटेगा जिसके किसी ख़ास हित पर चोट पड़ रही हो। बड़ी पुरानी कहावत है, गया वक़्त फिर हाथ आता नहीं। और इस चीज़ का उन्हें भी इल्म है, फिर भी वे अफ़सोस में हाथ मलते हुए गुज़रे हुए वक़्त की डोर (तनाबें) खींचने पर अड़े हुए हैं ताकि जागीरदाराना (सामंती) निज़ाम के मूल्य ज़िंदा रहें। अवाम आगे बढ़ें। पुराने सामाजिक रिश्ते बरक़रार रहें और उनकी इजारादारी (एकाधिकार) महफ़ूज़ रहे और इन चीज़ों के साथ-साथ उनकी वह अक़ीदे और जज़्बात से जुड़ी ज़िंदगी जो पुराने सामाजिक मूल्यों से तय हो चुकी है, डगमगाने पाए।

    बात इतनी ही है, चाहे इसे लंबे-चौड़े दर्शन के साथ ही क्यों पेश किया जाए। अफ़लातून (प्लेटो) से लेकर बर्गसां और स्टीन के आदर्शवादी (ऐनी) दर्शनों का सहारा लिया जाता है। हक़ीक़त को भौतिक (माद्दी) और आध्यात्मिक (रूहानी) ख़ानों में बाँटा जाता है। भौतिक हक़ीक़त को परिवर्तनशील (बदलने वाली) और आध्यात्मिक हक़ीक़त को अपरिवर्तनशील बताया जाता है। यही द्वैत (दोहरापन) ज़माने के हक़ में भी क़ायम किया जाता है। गुज़रने वाले ज़माने को स्थानिक समय (ज़मान-ए-मकानी) बताते हैं और गुज़रने वाले ज़माने को अस्थानिक समय (ज़मान-ए-लामकाँ) कहते हैं। अल्लामा इक़बाल इसी दर्शन के तहत भौतिक हक़ीक़त को वापस लाने के दावेदार नहीं हैं बल्कि आध्यात्मिक हक़ीक़त को वापस लाने के। लेकिन यह तो आपको मालूम ही है कि ज़िंदा इंसानों की रूह उनके तन-बदन से जुदा नहीं होती है। फिर यह कैसे मुमकिन है कि वे आध्यात्मिक मूल्य जो एक ख़ास क़िस्म के भौतिक समाज का नतीजा थे और जो उस समाज के ख़ात्मे के साथ उसके जिस्म से जुदा हो गए, अब फिर एक नए जिस्म और एक नए समाज में लौट सकें। यह आवागमन (आवागौन) मेरी समझ में तो नहीं आता है, चाहे अल्लामा इक़बाल इसे नवनिर्माण (तश्कील-ए-नौ) का ही नाम क्यों दें।

    मज़े की बात तो यह है कि इसका एहसास ख़ुद उनके यहाँ भी मौजूद है और जब उन्हें अपने इस ख़याल में कुछ खोट या कुछ विरोधाभास (टकराव) सा नज़र आता है (क्योंकि इतिहास की गति और पदार्थ के परिवर्तन को मानने के बाद विरोधाभास का महसूस करना लाज़िमी है) तो वे मशीनों पर झपट पड़ते हैं। क्योंकि मशीनी दौर ने ही पूँजी और मेहनत के उस टकराव को जन्म दिया जो आज सिर्फ़ पूँजीवादी निज़ाम के ही पीछे पड़ा है बल्कि वर्गीय निज़ाम और शोषण (इस्तेहसाल) की बुनियाद को ही ख़त्म करना चाहता है। और वर्गीय निज़ाम की बुनियाद के ख़त्म होने की संभावनाएँ तो उसी वक़्त पैदा हो सकती हैं जब आप भौतिक और आध्यात्मिक मूल्यों का आपसी रिश्ता ढूँढें। और उनकी बदलती हुई तस्वीर को भौतिक ऐतिहासिक विकास (इर्तेक़ा) के नज़रिए से देखें। हाकिम के सिर पर 'ज़िल्ले सुब्हानी' (ईश्वर की छाया) का छत्र लगाएँ, सामाजिक रिश्तों को ईश्वरीय क़ानून (रब्बानी शरीयत) से तय करें।

    सामाजिक कारण और प्रभाव (इल्लत-ओ-मालूल) के सिलसिले को जो भौतिक हैं, ग़ैर-सामाजिक और ग़ैर-भौतिक कारण पर ख़त्म करें। ऐतिहासिक प्रेरक तत्वों का कारण विचारों को ठहराएँ। सामाजिक कारणों को और ऐतिहासिक विकास को ख़याल का विकास समझें बल्कि इंसानों की ज़िंदगी का विकास समझें। क्योंकि विकास के आदर्शवादी विचार इंसानों को अपना इतिहास बनाने में रुकावटें पैदा करते हैं। उसे सामाजिक कारणों पर हाकिमाना नियंत्रण हासिल करने से रोकते हैं। इंसान (इब्ने आदम) की रूह पर 'पहले पाप' (गुनाह-ए-अव्वलीन) का साया डाले रहते हैं। वह आदम के धरती पर उतरने (नुज़ूल-ए-आदम) को तौबा (क्षमा-याचना) की मंज़िल समझता है। अपनी ज़मीनी ज़िंदगी को महज़ एक सफ़र बना देता है और अगर वह भौतिक ज़िंदगी की तरफ़ ध्यान देता भी है, और क्यों दे, वह भी तो पदार्थ (माद्दे) से ही बना है, तो वह भौतिक ज़िंदगी को आध्यात्मिक ज़िंदगी के लिए सिर्फ़ एक ज़रिऐ की तरह इस्तेमाल करना चाहता है। ज़ाहिर है कि वह भौतिक ज़िंदगी के ज़रिऐ को अपने मक़सद के लिए इस्तेमाल कर सकता है। जिसका नियंत्रण ज़िंदगी के ख़ज़ाने पर हो, जिसका नियंत्रण उत्पादन के साधनों (ज़राए-पैदावार) पर हो।

    आज पाकिस्तान के बहुत से साहित्यिक हलके इसी रूहानी फलसफे (आध्यात्मिक दर्शन) के शिकार हैं। मुमकिन है कि इन हलकों के लोग पूंजीपति या जागीरदार हों, लेकिन उनकी अपनी इस महरूमी (वंचना) से इस फलसफे के वर्गीय आधार में कोई कमज़ोरी नहीं आती है। यह फलसफा इंसानी मेहनत को लूटने वाले शासक वर्ग का फलसफा है। यह शासितों को भरपूर ताक़त के साथ उभरने से रोकता है। यह रूहानियत के नाम पर पुराने सामाजिक रिश्तों को क़ायम रखना चाहता है। और जिस हद तक इस फलसफे में ताक़त हासिल करने की शिक्षा दी जाती है, उसका मक़सद رجअत पसंदी (प्रतिक्रियावाद) और वर्गीय हितों को मज़बूत करना होता है। इस फलसफे का विरोध साहित्य और जीवन में बड़ी शिद्दत के साथ करना चाहिए क्योंकि यह फलसफा जागीरदाराना और पूंजीवादी व्यवस्था के शोषण की बुनियाद को क़ायम रखना चाहता है और अगर यह फलसफा पूंजीवाद का विरोध करता है तो इसका मक़सद इतिहास के उस दौर की तरफ लौटना होता है जब पूंजीपति और मज़दूर का टकराव नहीं था।

    यह फलसफा पूंजी और मेहनत के टकराव को समझने में असमर्थ रहता है। यह ऐतिहासिक टकराव को आगे बढ़ाकर भविष्य में हल ढूंढ़ने के बजाय इतिहास को पीछे ले जाना चाहता है। यह पूंजीवाद का विरोध इसलिए भी करता है कि पूंजीवाद ने अपने उरूज और शबाब (उत्कर्ष और यौवन) के ज़माने में भौतिक विज्ञानों के बढ़ने में मदद की है और भौतिकवाद का प्रचार किया है। इसने इंसानी वजूद को जैविक विकास की रोशनी में पेश किया है। इसने इंसानी समाज के वर्गीय टकराव को उभारकर इस बात का मौक़ा दिया कि हम ऐतिहासिक विकास के भौतिक कारणों का पता चला सकें। दूसरे शब्दों में यह कहना सही होगा कि पूंजीवाद ने तक़दीर की हुकूमत के उठ जाने का मौक़ा खुद मुहैया कराया है क्योंकि तक़दीर की हुकूमत उस वक़्त तक नहीं उठ सकती थी जब तक कि माहौल पर क़ाबू पाने की सलाहियत (क्षमता) हो।

    यह सलाहियत साइंस और भौतिक विज्ञानों ने मुहैया कराई है। यह सलाहियत विशाल मशीनों के धड़कते हुए सीने में है। यह सलाहियत, एटम के जिगर में है। ऐसा क्यों है कि रूहानी फलसफा पाकिस्तान के पूंजीपतियों के लिए भी स्वीकार्य है? वे भी तक़दीर-परस्ती (भाग्यवादिता) और पुनरुत्थानवादी रुझानों की शिक्षा दे रहे हैं। इसका बुनियादी कारण यह है कि पाकिस्तान के पूंजीपति पूंजीवाद के बुढ़ापे की औलाद हैं। इसलिए उनके हिस्से में फलसफा, हिकमत (ज्ञान) और शिक्षा तो दरकिनार, ज़्यादा दौलत भी हाथ आई। वे अपने छोटे-मोटे सरमाये (पूंजी) के बावजूद ज़्यादातर दलाली का काम अंजाम दे रहे हैं। चाहे वह दलाली विदेशी साम्राज्यवाद की हो या जागीरदारों की, और जब प्रगतिशील ताक़तें उनके इस घिनौने पेशे पर हमला करती हैं, साम्राज्यवादी व्यवस्था पर हमला करती हैं, तो वे साम्राज्यवाद से गठजोड़ करके उन्हें दबाने की कोशिश करते हैं और अपनी इन رجअत पसंद (प्रतिक्रियावादी) कोशिशों पर विदेशी साम्राज्यवाद से उजरत (मज़दूरी) के तलबगार होते हैं।

    बिल्कुल यही तस्वीर आपको यहाँ के उन رجअत पसंद अदीबों (साहित्यकारों) की तहरीरों (लेखों) में मिलेगी जो कभी पूंजीवाद के बचाव में साम्यवाद का विरोध बुर्जुआ क़द्रों (मूल्यों) के नज़रिए से करते हैं, तो कभी साम्यवाद का विरोध मज़हबी क़द्रों के नज़रिए से करते हैं। क्योंकि आज जागीरदार और पूंजीपति दोनों ही को ख़तरा सिर्फ मज़दूर वर्ग ही से है। इस पूंजीवादी व्यवस्था में सिर्फ यही वर्ग इस क़ाबिल है कि शोषण की बुनियादों को ख़त्म करके तमाम मेहनतकश इंसानों को आज़ाद कराए।

    पाकिस्तान में رجअत पसंदी का एक बड़ा वाज़ेह (स्पष्ट) रूप है। बस ऐसा मालूम होता है कि رجअत पसंदी की तमाम गलियाँ पुनरुत्थानवादी रुझान की शाहराह (राजमार्ग) से मिलती जा रही हैं। लेकिन رجअत पसंदी कुछ इन्हीं सूरतों में आकर दम नहीं तोड़ लेती। पश्चिम में जहाँ सिर्फ पूंजीवाद का दौर-दौरा है, जहाँ जागीरदाराना व्यवस्था के अक़ीदों (मान्यताओं) के ख़िलाफ़ पूंजीवाद ने बहुत कुछ जिहाद (संघर्ष) किया है, वहाँ رجअत पसंदी आज नित-नए अंदाज़ में सिर उठा रही है। इस पश्चिमी رجअत पसंदी को समझने के लिए थोड़े से ऐतिहासिक पस-मंज़र (पृष्ठभूमि) को सामने रखने की ज़रूरत है।

    पूंजीवाद की संकटपूर्ण ज़िंदगी 1825 ई. से शुरू होती है। यह वह साल है जब पूंजीवाद एक विश्वव्यापी क़िस्म के आर्थिक संकट में घिर जाता है। इसी साल के बाद से यह व्यवस्था आर्थिक संकट के दौर में मुब्तिला (ग्रस्त) हो जाती है। चुनांचे 1828 ई. में फ्रांस में मज़दूरों की संगठित जमात पूंजीपतियों से मोर्चा लेना शुरू कर देती है। यही वह शुरुआती जंग थी जो 1828 ई. में यूरोप के तमाम मुल्कों में मज़दूरों की क्रांतिकारी जद्दोज़हद के रूप में प्रकट हुई। लेकिन मज़दूरों का इंक़लाब नाकामयाब रहा क्योंकि मज़दूरों की क़ियादत (नेतृत्व) पेटी बुर्जुआ (निम्न-पूंजीपति) वर्ग के हाथ में थी। मज़दूरों की क्रांतिकारी जद्दोज़हद और इंक़लाब की नाकामी दोनों ही का असर सिर्फ फ्रांस ही के साहित्य पर पड़ा, बल्कि पूरे यूरोप के साहित्य पर पड़ा है। इस ज़माने से पहले डेढ़ सौ साल के साहित्य की यह ख़सूसियत (विशेषता) रही है कि उसका ताल्लुक़ सामाजिक जीवन से बहुत गहरा था।

    साहित्य और समाज के इस रिश्ते को खुद बुर्जुआ विचारकों ने तय किया था। क्योंकि उस वक़्त बुर्जुआ वर्ग अपने ऐतिहासिक दावे के साथ जागीरदाराना व्यवस्था से जंग कर रहा था। और वह यह जंग उस वक़्त तक नहीं कर सकता था जब तक कि वह इंसानी शऊर (चेतना) को बेदार (जागृत) करे, साहित्य को ज़िंदगी के क़रीब लाए, उसे जद्दोज़हद का आईना बनाए। चुनांचे ख़ास तौर पर क्लासिकी हक़ीक़त-निगारी (यथार्थवाद) के दौर का साहित्य उस वक़्त के सामाजिक जीवन का आईना बना रहा है। इसने इंसान को सिर्फ उसके माहौल में पेश किया है, बल्कि माहौल को उसकी फ़ितरत (प्रकृति) पर असरअंदाज़ होते भी दिखाया है। लेकिन जिस वक़्त से मज़दूर वर्ग बुर्जुआ वर्ग के ख़िलाफ़ संगठित जंग करने लगा, बुर्जुआ वर्ग अपने इस साहित्यिक नज़रिए से पीछे हटता गया। वह साहित्य को अपने सामाजिक जीवन से अलग करने लगा। 'अदब बराए अदब' (साहित्य के लिए साहित्य) की तहरीक इसी कोशिश का नतीजा थी। लेकिन सामाजिक जीवन से एक साथ गुरेज़ करना (बचना) अदीबों के लिए मुमकिन था। वे ज़्यादा से ज़्यादा आम मेहनतकश इंसानों से दूर होकर अपने को बुर्जुआ वर्ग तक सीमित कर सकते थे।

    चुनांचे शुरू-शुरू में यही हुआ और उन्होंने बड़ी जुर्रत के साथ बुर्जुआ वर्ग को बेनक़ाब भी किया है, लेकिन जिस हद तक उनका एतमाद (भरोसा) मज़दूर तहरीक और आम मेहनतकश इंसानों की जद्दोज़हद में कमज़ोर होता गया, उनकी ज़िंदगी में निष्क्रियता, फ़रारियत (पलायनवाद), नाउम्मीदी और अवाम-दुश्मनी का जज़्बा बेदार होता गया। और यह बात ज़ाहिर है कि जब भविष्य का उत्साहवर्धक तसव्वुर (कल्पना) कमज़ोर हो जाता है, जब अवामी ताक़तों से एतमाद उठ जाता है, तो ख़ुदकुशी करने और अराजकता फैलाने के सिवाय कोई और रास्ता नज़र नहीं आता है। फ्रांस में 'अदब बराए अदब' की तहरीक उन्नीसवीं सदी के आख़िरी दौर में इन्हीं ख़यालात के मातहत परवान चढ़ती रही। आख़िरकार 1890 के बाद नए अदीबों की नफ़्सियात (मानसिकता) इस क़दर बीमार हो जाती है कि अपनी ज़िंदगी से मुकम्मल नफ़रत पैदा हो जाती है।

    मैं इस सिलसिले में पॉल दिलेरी की तहरीर से एक मुख़्तसर सा इक़्तिबास (उद्धरण) पेश करना चाहता हूँ:

    तास्सुरात (अनुभूतियों) और इज़हार के दरमियान एक बहुत बड़ी खाई है। मुझमें उस चीज़ को समझने और उससे महज़ूज़ (आनंदित) होने की मुकम्मल सलाहियत है जिसके बयान पर मुझे इक़्तिदार (अधिकार) नहीं है। मुझे नहीं मालूम कि नॉवेल में किरदारों की तख़्लीक़ कैसे होती है। नॉवेल-निगार ज़िंदगी पेश करते हैं और मेरा मक़सद ज़िंदगी को ख़ारिज करने का है। मेरा यह मख़सूस ज़ाविया-ए-नज़र (विशिष्ट दृष्टिकोण), नॉवेल, इतिहास, सियासत किसी भी चीज़ के बारे में माक़ूल नज़रिया क़ायम करने में हायल (बाधक) होता है।

    तक़रीबन यही फ़लसफ़ा इंग्लैंड में ऑस्कर वाइल्ड का था जो फ्रांस के पतनशील (decadent) अदीबों से बहुत ज़्यादा मुतास्सिर था। लेकिन 'अदब बराए अदब' (कला के लिए कला) तो प्रतिक्रियावादी (رجعت پسند) ख़यालात के प्रचार का एक हथियार था, चुनांचे इसी हक़ीक़त को छुपाने के लिए उन्होंने अपने इज़हार को ज़्यादा से ज़्यादा मुश्किल बनाने की भी कोशिश की है। जो सफ़ाई फ़्लोबेयर (Flaubert) की शैली में है वह 1890 के पतनशील अदीबों में नहीं क्योंकि फ़्लोबेयर ने अपने को सिर्फ़ बुर्जुआ तबक़े तक महदूद कर लिया था। उसने ज़िंदगी को बिल्कुल ख़ारिज करने की कोशिश नहीं की थी। लेकिन यह बात मलार्मे (Mallarmé) और पॉल वलेरी (Paul Valéry) के यहाँ नहीं है। क्योंकि वे ज़िंदगी से दूर भागकर, अपने बाहरी माहौल से बचकर सिर्फ़ ज़हनी दुनिया की नामालूम बस्ती की सैर कराना चाहते थे। चुनांचे उनकी शाइरी ख़्वाबों के प्रतीकों की शाइरी बनकर रह गई, यह प्रतीकात्मक शाइरी, बीमार एहसासात, ख़्वाबों की दुनिया और जुनून की शाइरी पूरे यूरोप पर छा गई। यह चीज़ शाइर तक ही महदूद नहीं रही बल्कि ज़िंदगी से दूर भागने की कोशिश नॉवेलों में भी ज़ाहिर हुई। चुनांचे 1901 में जेम्स जॉयस ने एक मुख़्तसर से पैम्फ़लेट में लिखा कि कोई भी आदमी उस वक़्त तक सच्चाई और भलाई का आशिक़ नहीं बन सकता जब तक कि वह जनता से नफ़रत करे। और कलाकार बावजूद इस बात के कि वह जनता का इस्तेमाल कर सकता है, अपने को हमेशा उनसे अलग ही रखता है।

    जनता से नफ़रत करने का जज़्बा, अदब को बीमार एहसासात और ख़यालात तक महदूद रखने का जज़्बा, अदब को ज़िंदगी की तमाम रचनात्मक ताक़तों से अलग करके उसे ख़्वाबों की दुनिया में ले जाने की कोशिश बुर्जुआ तबक़े के लिए बेमानी थी क्योंकि यह ज़माना बुर्जुआ तबक़े के लिए एक ऐसा ज़माना था जब वह अपने जिस्मानी ऐशो-आराम से ऊब चुका था। वह हुस्न की तलाश में था, रूह की तलाश में था। और ये दोनों चीज़ें बाहरी दुनिया में उसके लिए बेमानी थीं। क्योंकि हुस्न की देवी ख़ून पीने वाली भूतनी बन चुकी थी। और रूह बॉलरूम के इश्क़ में मुब्तला थी। अब उसे ख़्वाब देखने की ज़रूरत थी, ऊपरी दुनिया की सैर करने की ज़रूरत थी। वह बाहरी दुनिया में ख़ुदकुशी करने के बाद अब अपनी भीतरी दुनिया में पनाह लेना चाहता था। क्योंकि उसका अपना यह ज़ाती तजुर्बा था कि उसने बाहरी माहौल की तख़्लीक़ (रचना) में क्या कुछ नहीं किया, फिर भी वह जानवर ही रहा। यही एहसास उसे मानसिक पीड़ा में मुब्तला करके पराभौतिक (metaphysical) दुनिया की तरफ़ मोड़ता है।

    लेकिन इससे पहले कि वह इस दुनिया की तरफ़ उड़ान भरे, अभी उसे चंद और मंज़िलों से गुज़रना था। इस ज़माने को आप आसानी की ख़ातिर महायुद्ध (विश्व युद्ध) के दो-चार बरस पहले का ज़माना कह सकते हैं। इसी ज़माने में फ्रायड ने बुर्जुआ और मध्यम वर्ग की नफ़्सियात (मनोविज्ञान) का फ़लसफ़ा भी पेश किया। यहाँ चूँकि फ्रायड के फ़लसफ़े की मुकम्मल समीक्षा करना मक़सद नहीं है, इसलिए मैं सिर्फ़ उन उसूलों को पेश करूँगा जिनका सीधा असर अदब पर पड़ा है। फ्रायड ने आर्थिक प्रेरणाओं की जगह जिंसी जज़्बे (यौन भावना) को ज़िंदगी की जद्दोजहद में स्थापित किया, और इस जज़्बे को तमाम सामाजिक घटनाओं की बुनियाद बताया। चुनांचे इंसानी जद्दोजहद की पूरी तारीख़ फ्रायड के हाथों जिंसी जज़्बे की जद्दोजहद की तारीख़ बन जाती है, लेकिन जद्दोजहद के अल्फ़ाज़ तो विरोधी ताक़तों से टकराने के मतलब को भी छुपाए हुए हैं। चुनांचे फ्रायड के यहाँ यह टकराव जिंसी जज़्बे और तहज़ीब के टकराव में ज़ाहिर होता है।

    फ्रायड का जिंसी जज़्बा मूल प्रवृत्ति (instinct) के स्तर पर अपनी ज़िंदगी का इज़हार चाहता है लेकिन तहज़ीब उसकी राह में रुकावट पैदा करती है क्योंकि तहज़ीब का एक काम एक नई फ़ितरत के निर्माण का भी है। इंसान ने तहज़ीब ही की मदद से अपनी फ़ितरत पर क़ाबू पाया है, और उसे बदलता रहता है। चूँकि फ्रायड को इस नज़रिए से इनकार है इसलिए उसका जिंसी जज़्बा तहज़ीबी ताक़तों से टकराता रहता है।

    फ्रायड के इस फ़लसफ़े ने जहाँ अदब में प्रतिक्रियावाद (رجعت پسندی) की बेशुमार राहें खोलीं, वहीं फासीवाद (Fascism) की दरिंदगी के लिए एक तार्किक आधार भी पैदा किया। फासीवाद की यह कोशिश है कि वह इंसान को जज़्बाती रुझानों का शाहकार बनाए, जंग और लड़ाई-झगड़े तथा नस्ली भेदभाव को इंसान की हमेशा रहने वाली फ़ितरत बताए, सभ्यता और संस्कृति, साइंस, ज्ञान और हिकमत को अक़्ल की अस्थाई कारस्तानियां बताए। इसे हुस्न-ए-इत्तेफ़ाक़ (संयोग) समझिए कि नाज़ी हुकूमत ने फ्रायड को उसके मुल्क से देश निकाला दे दिया, लेकिन फ्रायड का फ़लसफ़ा डी. एच. लॉरेंस के हाथों फासीवाद की जड़ों को मज़बूत करता रहा। डी. एच. लॉरेंस ने फ्रायड के फ़लसफ़े को सिर्फ़ अपने नॉवेलों में ही नहीं बरता है बल्कि अमली तौर से इस फ़लसफ़े पर अमल करने की भी कोशिश की है। वह सभ्यता और संस्कृति से भागकर मेक्सिको में रेड इंडियनों के साथ ज़िंदगी बसर करने लगा था।

    लेकिन यह तो फ्रायड के फ़लसफ़े का सिर्फ़ एक हिस्सा हुआ। उसकी सबसे बड़ी खोज तो अचेतन (unconscious) की दुनिया की है। फ्रायड के यहाँ अचेतन की दुनिया चेतन (conscious) की दुनिया से बिल्कुल अलग है। यह दुनिया सभ्यता और संस्कृति के लेन-देन की दुनिया नहीं है। यह दुनिया जिंसी जज़्बे के मूल रुझानों की दुनिया है, यहाँ हर बात रहस्यमयी और अजीबोगरीब होती है, अचेतन की दुनिया जिंसी जज़्बे के एक ऐसे ड्रामे की दुनिया है जिसका हर किरदार एक प्रतीक, जिसका हर मंज़र एक इश्क़ की दास्तान होता है। चुनांचे जब यह ड्रामा याददाश्त के ज़रिए चेतन की दुनिया में मुंतक़िल होता है तो यह अपनी असली कहानी खो देता है। मौजूदा दौर में अचेतन के चित्रण की मुख़्तलिफ़ तहरीकें (आंदोलन) इस फ़लसफ़े से फ़ायदा हासिल करती रही हैं। सवाल यह है कि आख़िर यह फ़लसफ़ा क्यों प्रतिक्रियावादी है।

    इसका जवाब बड़ा ही सादा है। अदब एक चेतन रचना है, इसके कच्चे माल को वह बाहरी दुनिया से अपनी ज़हनी ताक़तों से हासिल करता है। अदब दाख़िली (आंतरिक) बनकर फिर ख़ारिजी (बाहरी) हो जाता है। कोई भी अदबी तख़्लीक़ बाहरी दुनिया से परे के ख़यालात का चित्रण कर ही नहीं सकती है। चुनांचे जब कोई कलाकार अचेतन की प्रतीकात्मक दास्तान को पेश करता है तो वह जान-बूझकर खुली हुई हक़ीक़त को तोड़-मरोड़ कर अजीबोगरीब बनाने की कोशिश करता है। यह फ़लसफ़ा पूँजीपति तबक़े के लिए बहुत मुफ़ीद साबित हुआ है, क्योंकि उसकी सबसे बड़ी कोशिश यही रही है कि वह हक़ीक़त को तोड़-मरोड़ कर पेश करे, ऐसी सूरत और ऐसी शैलियों में पेश करे कि उनका पहचानना और समझना मुश्किल हो जाए और हक़ीक़त से दूर भागकर भीतरी दुनिया का एक ऐसा अफ़साना पेश करे जिसकी तमाम तस्वीरें उल्टी-सीधी और हैरान करने वाली हों।

    यह बात मैं कुछ अपनी ही तरफ़ से नहीं कह रहा हूँ। इसका इक़रार ख़ुद अचेतन का चित्रण करने वालों ने किया है। चुनांचे आंद्रे ब्रेटन (André Breton) और हर्बर्ट रीड (Herbert Read) दोनों ने ही अचेतन-चित्रण की तारीफ़ इस तरह की है कि सररियलिज़्म (Surrealism) का काम अराजकता (انتشار) को हैरत में तब्दील कर देना है। यह अराजकता बुर्जुआ निज़ाम की है जिसे वह हैरत के तमाशे में तब्दील करना चाहता है ताकि इस अराजकता के कारण बाहरी दुनिया में ढूँढे जा सकें, इस अराजकता की सूरत को पहचाना जा सके। इसकी असली कहानी का राज़ मालूम हो सके।

    यह दर्शन दूसरे विश्व युद्ध के ज़माने तक ऐसी बुरी तरह तमाम पूंजीवादी देशों में फैला कि बस यह मालूम होता था कि सारे लेखकों को फ्रायड का हिस्टीरिया हो गया। लेकिन दूसरे विश्व युद्ध में जब प्रगतिशील ताक़तों ने इस पुरानी वेश्या (यानी पूंजीवादी व्यवस्था) को गहरी चोट पहुंचाई तो हिस्टीरिया का दौरा कुछ हद तक कम हो गया। क्योंकि हिस्टीरिया का एक इलाज तमाचा भी है। इसलिए इस दौर में अब बिखराव हैरान करने वाला नहीं रहा है। अब अवचेतन में चूहे नहीं कूदते हैं। अब तो एक दूसरा ही दर्शन तैयार किया जा रहा है, वह नया दर्शन चर्च और धार्मिक मान्यताओं की तरफ़ लौटने का है। मज़दूरों की सामाजिक और वर्गीय चेतना को नष्ट करने का है। इंसानी महानता और उसकी तरक़्क़ी की दास्तान को तुच्छ साबित करने का है। इसलिए दर्शन का मक़सद भाग्यवाद को बढ़ावा देना है।

    सोमरसेट मॉम, टी. एस. इलियट, एज़रा पाउंड, आंद्रे मार्लो, सार्त्र वग़ैरह इसी दर्शन का प्रचार कर रहे हैं। लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था को चूंकि यह बात मालूम है कि अब यह दर्शन चलने वाला नहीं है। चढ़ते हुए सैलाब के मुक़ाबले में सिर्फ़ निष्क्रियता फैलाने ही से तो काम नहीं चल सकता है, इसलिए इसके समाधान और रोकथाम के तरीक़े निकालने चाहिए। नतीजतन हेग और पेरिस में यूरोप के संयुक्त देशों की जो कॉन्फ्रेंसें हुईं, उनमें एक साझा ख़तरे के मुक़ाबले में देश की आज़ादी और देशभक्ति को डॉलर के बदले में बेचने का फ़ैसला किया गया। ये कॉन्फ्रेंसें मिस्टर चर्चिल और मिस्टर ब्लूम की अध्यक्षता में हुईं। इन कॉन्फ्रेंसों में बहुत से लेखकों ने भी हिस्सा लिया। इसमें आंद्रे मार्लो का नाम ख़ास तौर पर उल्लेखनीय है। ज़ाहिर है कि इस सियासी साज़िश की कुछ तो झलक साहित्यिक आंदोलन में मिलनी चाहिए, इसलिए आज वे बड़े ज़ोर-शोर से पैन-यूरोपियनिज़्म और कॉस्मोपॉलिटनिज़्म के दर्शन का प्रचार कर रहे हैं।

    यह एक नई जागरूकता और एक नया संगठन इसी लिए वजूद में लाया गया है ताकि देश की आज़ादी और देशभक्ति को बेच कर जन-शक्तियों के ख़िलाफ़ जंग की जाए और अगर मुमकिन हो तो इंसानों को मध्य युग के दौर में वापस लाया जाए ताकि फ़ासीवादी अत्याचार क़ायम करने का औचित्य मिल सके। अब इस संदर्भ में देखिए कि आंद्रे मार्लो क्या चाहता है। वह एक भाषण में लिखता है कि हमारा तजुर्बा यह बताता है कि यूरोप के मूल्य तरक़्क़ी और तार्किकता के मूल्य नहीं हैं। पश्चिम की ताक़त रहस्यमयी ताक़तों को क़ुबूल करने में है।

    यहां भी आप वही चीज़ देखते हैं, प्रतिक्रियावाद की बेशुमार सड़कें, पुनरुत्थानवादी रुझान के राजमार्ग में मिलती जा रही हैं, साइंस और तरक़्क़ी से मुंह मोड़ कर चर्च की मान्यताओं का दामन पकड़ा जा रहा है, भविष्य से भाग कर अतीत की गुफा में पनाह लेने की कोशिश की जा रही है। यह सिर्फ़ इस वजह से है कि आज तरक़्क़ी का सिर्फ़ एक ही रास्ता है। और वह रास्ता आगे बढ़ने का है। ज़ाहिर है कि जो आगे बढ़ना नहीं चाहता, भले ही वह हक़ीक़त को कितना ही तोड़-मरोड़ कर क्यों पेश करे, कितना ही उलझा दे और वर्गीय बीच-बचाव की बातें क्यों करे, पीछे मुड़कर देखने के लिए मजबूर है। यह संक्षिप्त सा ऐतिहासिक ख़ाका मैंने इसलिए पेश कर दिया है कि आप प्रतिक्रियावाद को राजनीतिक कारणों और वर्गीय हितों की रोशनी में देख सकें।

    अब देखना यह है कि वर्गीय व्यवस्था में साहित्यिक मोर्चे पर प्रगतिशीलता और प्रतिक्रियावाद का संघर्ष कैसे चलता है, नए और पुराने की जंग कैसे होती है। उभरने वाला वर्ग मरने वाले वर्ग के ख़िलाफ़ कैसे जंग करता रहा है और कर रहा है।

    यह बात स्पष्ट है कि हमारी नज़र में तरक़्क़ी का अर्थ सामाजिक है। हम पहले यह देखने की कोशिश करते हैं कि इंसान ने अपनी ज़िंदगी को बेहतर बनाने में किस हद तक उत्पादन के साधनों को तरक़्क़ी दी है। पैदावार को कितना बढ़ाया है और उसे किस तरह समाज में संगठित किया है। इंसान का यही संघर्ष सभ्यता और कल्चर के संसाधनों को सिर्फ़ व्यापक करता है बल्कि उन्हें अवाम की संपत्ति भी बनाता है। क्योंकि यह इंसान की मेहनत ही है जो कल्चर के मूल्यों को जन्म देती है, चाहे वह मेहनत ग़ुलाम की हो, किसान की हो या मज़दूर की हो। यही मेहनतकश शासक वर्ग को पैदावार की मेहनत से आज़ाद करके इस बात का मौक़ा देते हैं कि वह सभ्यता की बुलंद इमारत को खड़ा कर सके। शासक वर्ग क़ानून बनाता है, स्टेट की मशीनरी को क़ायम करता है। दर्शन और साहित्य की रचना और उनका प्रसार करता है।

    जिस हद तक ये सभ्यता संबंधी कोशिशें कल्चर की बुनियादी ताक़तों को मज़बूत करती हैं और उत्पादन के साधनों को तकनीकी लिहाज़ से आगे बढ़ाती हैं, पैदावार की कमी और अव्यवस्था को दूर करती हैं, कल्चर सिर्फ़ तरक़्क़ी पाता रहता है बल्कि उसके मूल्य मेहनतकश इंसानों के क़रीब भी पहुंचते हैं। लेकिन जिस हद तक ये सभ्यता संबंधी कोशिशें कल्चर की बुनियादी ताक़तों को मज़बूत नहीं करती हैं, उत्पादन के साधनों को आगे नहीं बढ़ाती हैं, पैदावार की कमी और अव्यवस्था को दूर नहीं करती हैं, उसके मूल्य सिर्फ़ मेहनतकश इंसानों से दूर रहते हैं बल्कि सामाजिक तरक़्क़ी में रुकावट बन जाते हैं, इंसानी आज़ादी को व्यापक करने के बजाय इंसानों को ग़ुलाम बनाए रखने की कोशिश करते हैं और जिस हद तक मेहनतकश अवाम इस रुकावट, इस अव्यवस्था के ख़िलाफ़ जंग करते हैं, शासक वर्ग का कल्चर नित-नए रूप से उन्हें पंगु करने की कोशिश करता है।

    क्योंकि सभ्यता के संसाधनों पर अधिकार रखने के कारण वह इस स्थिति में होता है कि जिस तरह चाहे बाहरी हक़ीक़तों की व्याख्या करे और उन्हें आम इंसानों के बीच फैलाए। ये तमाम चीज़ें चेतन ही नहीं होती हैं बल्कि अवचेतन भी होती हैं। क्योंकि इंसानी ज़ेहन जिन मूल्यों को सच्चाई समझ कर क़ुबूल कर लेता है, उन्हीं मूल्यों के पैमाने पर वह बाहरी हक़ीक़तों की बदलती या बिगड़ती हुई सूरतों के बारे में अपना फ़ैसला भी सुनाता रहता है।

    हम तरक़्क़ी और प्रतिक्रियावाद के इन्हीं सिद्धांतों पर कल्चर के आला से आला मूल्य, सूक्ष्म से सूक्ष्म ख़यालात, पेचीदा से पेचीदा दर्शन और हसीन से हसीन साहित्य को जांचने की कोशिश करते हैं। ज़ाहिर है कि हमारा यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण अतीत के तमाम कल्चर और साहित्य को एक सिरे से ख़ारिज नहीं कर सकता है। हमारा दृष्टिकोण सिर्फ़ आलोचनात्मक होता है, हम प्रतिक्रियावादी चीज़ों को ख़ारिज कर देते हैं भले ही वे किसी युग के तरक़्क़ी के दौर ही में क्यों पेश की गई हों और हम प्रगतिशील चीज़ों को क़ुबूल करके एक नए समन्वय की तरफ़ आगे बढ़ाते हैं। यह तो हमारी जांच-पड़ताल का एक बुनियादी उसूल हुआ। लेकिन तरक़्क़ी और प्रतिक्रियावाद की तमाम राहों को पहचानने के लिए यह काफ़ी नहीं है। क्योंकि इंसानी इतिहास बड़ी पेचीदा और विरोधाभासी सूरतों में हरकत करता रहा है। इसने ग़ुलामी, ठहराव और जड़ता के क़िले में अजीबोग़रीब तरीक़ों से दरारें पैदा की हैं। यही ज़रूरत और अधिक स्पष्टीकरण के लिए मजबूर कर रही है।

    इंसान अपनी ज़िंदगी के शुरुआती दिनों से सामाजिक कोशिशों के ज़रिए प्रकृति के नियम को समझने और प्रकृति की ताक़तों पर क़ाबू पाने का संघर्ष करता आया है। क्योंकि इंसान ही एक ऐसा जीवित प्राणी है जो अपनी आजीविका पैदा करने वाला ख़ुद बना है, और वह यह तब तक नहीं बन सकता था जब तक कि उसे निर्माण का ज्ञान हो, चीज़ों के रूप और उनके बदलाव का राज़ जानता हो। इंसान के इस संघर्ष ने भौतिक विज्ञानों और सामाजिक विज्ञानों को बढ़ावा दिया है और वह इन सब चीज़ों को व्यावहारिक अनुभवों से सीखता रहा है, इसलिए सिर्फ़ वही ज्ञान रचनात्मक ज्ञान और साइंस का दर्ज़ा पा सकता है जो व्यवहार की कसौटी पर पूरा उतर सके। ऐसे तमाम अंतर्ज्ञान आधारित, काल्पनिक, अनुमानित और ज्ञानी ज्ञान जो अपनी सच्चाई को व्यवहार के मैदान में मनवा नहीं सकते हैं, जो इंसानी अनुभवों की सीमाओं से बाहर हैं, ज्ञान के मैदान से ख़ारिज हैं। प्रकृति के नियम को समझने के सिर्फ़ एक ही मायने हैं कि हम इसके नियमों के अधीन इंसानी अमल और गतिविधि के ज़रिए मनचाहे नतीजे प्राप्त कर सकें। यह मुमकिन है कि हम एक ही समय में मनचाहे नतीजे प्राप्त कर सकें, लेकिन जिस हद तक हम इस मंज़िल के क़रीब होते जाते हैं, वह ज्ञान और पुख़्ता होता जाता है।

    चूँकि हमने ये तमाम ज्ञान ज़िंदगी के अनुभवों और ज्ञान से हासिल किए हैं, इसलिए हमारे ज्ञान के स्रोत भौतिक इंद्रियाँ हैं जो एक भौतिक दिमाग़ की मशीनरी के अधीन हैं। इन स्रोतों के अलावा हमारे पास ज्ञान का कोई और ज़रिया नहीं है। अगर हमारा साहित्य अपनी ऐतिहासिक मंज़िल के मुताबिक़ समझ और बोध के इन स्रोतों के क़रीब नहीं है तो वह व्यर्थ और प्रतिक्रियावादी (رجعت پسند) है। अगर हमारा साहित्य अपने वक़्त की भौतिक खोज और भौतिक विज्ञानों के विरोधी है तो वह प्रतिक्रियावादी है। अगर हमारा साहित्य प्रकृति के नियम को इंसानी समझ और बोध से परे बताता है तो वह प्रतिक्रियावादी है। अगर वह इंसान को अपनी रचनात्मक शक्तियों में पूरी तरह बेबस साबित करता है तो वह प्रतिक्रियावादी है। अगर हमारा साहित्य एक ख़ास दौर के सामाजिक नियम को शाश्वत और अनंत साबित करके इंसानों को आगे बढ़ने से रोकता है तो वह प्रतिक्रियावादी है।

    ये तमाम सिद्धांत पहले से नहीं गढ़े गए हैं। ये सिर्फ़ व्यावहारिक आलोचना के बाद ही वजूद में आए हैं, लेकिन इनका सही प्रयोग उस वक़्त तक नहीं हो सकता है जब तक कि हम एक ख़ास दौर के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक हालात का जायज़ा लें। वैचारिक संघर्ष की भौतिक और वर्गीय बुनियादों को जाँचें। नई और पुरानी ताक़तों को निर्धारित करें। क्योंकि अतीत की बहुत सी ऐसी चीज़ें हैं जो आज बेमानी हो चुकी हैं और जिनका व्यावहारिक दोहराव प्रतिक्रियावाद है। लेकिन अपने वक़्त में तरक़्क़ी की ताक़तों का साथ दे चुकी हैं, लेकिन इसके यह मायने नहीं कि उन्होंने तरक़्क़ी की ताक़तों का पूरी तरह साथ दिया है। वे अक्सर विरोधाभासी रुझानों के साथ भी मदद करती रही हैं। डार्विन जैसा भौतिकवादी विचारक भी बुर्जुआ विचारकों के प्रभाव से आज़ाद हो सका। इतिहास की ये जटिलताएँ ऐसी हैं कि हमें बेइंतिहा सावधान और आलोचनात्मक होने की ज़रूरत है। इस आलोचनात्मक दृष्टिकोण का केंद्र इंसान की आज़ादी, उसकी अपने माहौल की ग़ुलामी से आज़ादी, ज़रूरत की दुनिया से आज़ादी की दुनिया की तरफ़ छलाँग लगाने का केंद्र है।

    हर दौर के साहित्यकार ने इंसानों ही के बारे में लिखा है। लेकिन अगर उसने इस अंदाज़ से नहीं लिखा कि उसकी आज़ादी की सीमाएँ व्यापक हों, उसकी ज़िंदगी सफल हो, उसकी रचनात्मक शक्तियाँ जाग्रत हों, बल्कि इस अंदाज़ से लिखा है कि उसकी ग़ुलामी बरक़रार रहे, उसकी रचनात्मक शक्तियाँ निष्क्रिय रहें, उसकी ज़िंदगी का संघर्ष कमज़ोरी और पछतावे का शिकार होकर रह जाए और मेहनत का सुनहरा पसीना शर्मिंदगी का पसीना बनकर उसके गर्वित सिर को दासता की भावना में झुका दे, तो यह कहना पड़ेगा कि वह साहित्य प्रगतिशील नहीं हो सकता है। भले ही माहौल की मजबूरियाँ कितनी ही पुरज़ोर सिफ़ारिश क्यों करें।

    अब सवाल यह पैदा होता है कि अगर वह साहित्य एक ऐसे अंधकारमय माहौल का हो, जबकि भौतिक विज्ञानों पर पहरे बिठा दिए गए हों और शासक वर्ग ने लगातार गुलामों के सिर को झुकाए ही रखने की कोशिश की हो तो हमारा दृष्टिकोण क्या होना चाहिए। इसका जवाब बहुत ही स्पष्ट है। इंसानी समाज कभी भी स्थिर और गतिहीन नहीं रहा है और रह सकता है। ऐसा हुआ है कि तरक़्क़ी की ताक़तें बहुत ही कमज़ोर और धीमी हो गई हैं। अंधेरे ने माहौल पर क़ाबू पा लिया है। फिर भी इंसान तरक़्क़ी की तरफ़ रेंगता ही रहा है, भले ही उसने यह तरक़्क़ी की दिशा इंकार ही के रास्ते से क्यों चुनी हो। यूरोप और एशिया दोनों ही के इतिहास में ऐसे दौर आए हैं जबकि पुरानी व्यवस्था और उसको क़ायम रखने वाला शासक वर्ग पतन, सड़न और अंधेरे की मंज़िलों में सड़ता-गलता रहा है, लेकिन वह नई ताक़त जो इस व्यवस्था को ख़त्म करके नई व्यवस्था और नए मूल्य उस वक़्त ला सके, वजूद में नहीं आई हैं।

    ऐसी सूरत में इस अंधेरे को सिर्फ़ चीरने की कोशिश, इस मनहूस क़िले को चोट पहुँचाने की कोशिश, इसके नियम से इंकार करने की कोशिश, तत्वमीमांसा (मेटाफ़िज़िक्स) के जाल से बाहर निकलने की कोशिश, अपनी भौतिक इंद्रियों को काम में लाने की कोशिश, भौतिक आनंद की तरफ़ झुकने की तमन्ना और दासता की भावना से इंकार की कोशिश तरक़्क़ी का रास्ता था और जिस हद तक उस दौर के साहित्य में ये चीज़ें हैं, वे प्रगतिशील रुझानों को दर्शाती हैं और जिस हद तक वे इन चीज़ों के साथ विरोधी अवधारणाएँ लाए हैं, प्रतिक्रियावादी हैं।

    यूरोप में पुनर्जागरण के साहित्य ने ईसाई वैराग्य और चर्च के दर्शन के ख़िलाफ़ इसी तरह जंग की है। इसी संघर्ष ने यूनान के दर्शन को क़ुबूल करके आगे बढ़ाने में मदद की है। चुनाँचे पुनर्जागरण का इंसान जब चौदहवीं सदी ईसवी में इस अंधेरे से बाहर निकलता है तो सबसे पहले अपनी महानता को स्वीकार करता है और अपने सीने को स्वर्ग से दूरी के ग़म से मुक्त करता है। पुनर्जागरण के साहित्य का सबसे बड़ा योगदान यह है कि उसने मध्यकाल के इंसान को आध्यात्मिक जेल से बाहर निकालकर उसे भौतिक आनंद और शारीरिक अनुभूतियों की सैर कराई। उसने इंसानों को उन गुनाहों की तरफ़ बढ़ने का हौसला दिया जिनका नाम सुनकर मालाएँ हिलने लगती थीं। यह एक विरोध की आवाज़ थी उस आध्यात्मिक दर्शन के ख़िलाफ़ जिसमें जिस्म का निषेध किया जाता था, यह विरोध था चर्च के उस धर्मशास्त्रीय दर्शन के ख़िलाफ़ जो पूरी तरह काल्पनिक और अवैज्ञानिक था और जिसका ताल्लुक़ भौतिक इंद्रियों और इंसानी अनुभवों से था। यह सिर्फ़ विरोध की आवाज़ ही थी बल्कि एक हमला था उस आध्यात्मिक दर्शन के क़िले पर जिसमें इंसान क़ैद था।

    ऐसा नहीं है कि हमारे साहित्यिक इतिहास में इस क़िले को ढहाने की कोशिश की गई हो। फ़ारसी साहित्य में इस क़िले को ढहाने में गब्र-ओ-तरसा (अग्निपूजक और ईसाई) के पैगन (Pagan) जीवन दर्शन, यूनानी विज्ञानों, बुद्धिवाद के आंदोलन और शरीयत से इंकार के संघर्ष ने बहुत बड़ा हिस्सा लिया है। लेकिन ये तमाम कोशिशें सिर्फ़ क़िले को कमज़ोर करने ही में कामयाब रही हैं, वे इस क़िले को ढहा सकीं क्योंकि इस धरती में भौतिक विज्ञान विकसित हो सके। यहाँ का व्यापारी वर्ग TRADERS COMUNITY यूरोप के बुर्जुआ वर्ग की तरह राजशाही का प्रतिद्वंद्वी बन सका और जब उसने हाथ-पैर निकालने शुरू किए तो विदेशी साम्राज्यवाद ने उसे अपाहिज कर दिया। यही वजह है कि जब तक नया सूरज रूस की धरती से उदित नहीं हुआ और वहाँ के मज़दूरों ने अपने मुल्क के पिछड़े इंसानों को आज़ाद नहीं किया। पूँजीवादी व्यवस्था के क़िले में दरार पैदा नहीं की। यहाँ का इंसान 1918 ई. के पहले यह ऐलान कर सका कि,

    तोड़ डालीं फ़ितरत-ए-इंसां ने ज़ंजीरें तमाम

    दूरी-ए-जन्नत को रोती चश्म-ए-आदम कब तलक

    आज जब कि पूरी धरती पर ग़ुलाम और मज़लूम इंसानों की दुनिया अपनी ग़ुलामी की ज़ंजीरें तोड़ रही है, तो रज्अत-पसंद (प्रतिक्रियावादी) ताक़तें अपने ख़ौफ़नाक और भयानक अतीत को भी जगा रही हैं। आज पूंजीवादी देशों के साहित्यकार मजबूर, सताए हुए और क़ैद इंसान की अवधारणा को फिर हमारे ज़ेहनों पर थोपने की कोशिश कर रहे हैं। एज़रा पाउंड इंसानों को वनस्पति जगत के दर्जे से भी नीचे गिरा रहा है, आंद्रे मार्लो तरक़्क़ी और साइंस के मूल्यों से इंकार करके भाग्यवादिता की तालीम दे रहा है, ज्यां पॉल सार्त्र इंसान की आज़ादी जीवन के नकार में ढूंढ रहा है। टी. एस. इलियट और ऑडेन उसे चर्च की मान्यताओं की तरफ़ लौटा रहे हैं, सोसाट इंसान को मैकियावेली की लोमड़ी से भी ज़्यादा ख़तरनाक बनाकर पेश कर रहा है। वह इंसान को सिर्फ़ जैविक प्रवृत्तियों का शिकार बनाता है, जहां अक़्ल का काम उसके नाख़ुनों को तेज़ करने का है।

    ये तमाम रज्अत-पसंद साहित्यकार अतीत की भयानक परंपराओं को रज्अत-पसंदी की ख़िदमत में इकट्ठा कर रहे हैं। यह काम सिर्फ़ यूरोप ही में नहीं हो रहा है बल्कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान में भी हो रहा है। आज हसन अस्करी और उनके साथी 'अदब बराए अदब' (साहित्य के लिए साहित्य) का नारा बुलंद नहीं कर रहे हैं बल्कि इंसान को हैवान साबित करने की कोशिश कर रहे हैं, उसे माहौल पर क़ाबू पाने वाला पूर्ण जानवर बनाकर उसे दासता की भावना में डुबोना चाहते हैं। हसन अस्करी ने इंसान की शाश्वत और अनंत विशेषता ज़ुल्म और अज्ञानता बतलाई है। इन दो लफ़्ज़ों में रज्अत-पसंदी का पूरा विवरण छुपा है। उसे अज्ञानता अपनानी चाहिए ताकि वह इंसानी अक़्ल और चेतना, तरक़्क़ी और साइंस के मूल्यों से महरूम हो जाए। उसे ज़ुल्म करना चाहिए ताकि वह अपने देश की तरक़्क़ी-पसंद ताक़तों पर हमला करे, उसे ज़ुल्म करना चाहिए ताकि वह पड़ोसी देशों पर हमला करे, उसे ज़ुल्म करना चाहिए ताकि वह तीसरे विश्व युद्ध में डॉलर की ख़िदमत अंजाम दे सके।

    ऐसा क्यों है कि आज मध्यकाल के अंधकारमय दर्शनों ने पूंजीवाद के रज्अत-पसंद दर्शनों को गले लगा लिया है। इसका बुनियादी कारण यह है कि आज इंसान अपनी आज़ादी की वह जंग लड़ रहा है जिसके बाद वह इंसानों की ग़ुलामी और अपने माहौल की ग़ुलामी से आज़ाद हो जाएगा। ज़ाहिर है कि तरक़्क़ी और रज्अत (पिछड़ेपन) की इस जंग में, नए और पुराने के इस संघर्ष में, इंसानी ग़ुलामी की तमाम अवधारणाएं और तमाम दर्शन ख़त्म होने वाले हैं। यह जंग दो गुटों की जंग नहीं है। यह आज़ादी और ग़ुलामी की जंग है, यह जंग इंसानियत की महानता, गर्व, संकल्प और विश्वास की जंग है। उन नापाक दरिंदों के ख़िलाफ़ जो इंसान को एक निष्क्रिय उपकरण समझते हैं और जो उसके संकल्प, विश्वास और गर्व को तोड़ना चाहते हैं, यह जंग शोषण की बुनियादों को ख़त्म करने की जंग है। और यही कारण है कि वर्ग-व्यवस्था के वे तमाम रज्अत-पसंद दर्शन और साहित्यिक नज़रिए जो अपने-अपने दौर में शोषण को सहारा दिए हुए थे, पूंजीवादी व्यवस्था की मदद के लिए दौड़ रहे हैं।

    आज वह वक़्त है कि हम भी दुश्मनों की सफ़ के सामने अपने रहनुमा को पहचानें, अपने अतीत को जगाएं, उसकी तरक़्क़ी-पसंद परंपराओं को ढूंढें, उस इंसान को ढूंढें जिसने ज़ख़्मों से चूर होकर भी अपनी ग़ुलामी को स्वीकार नहीं किया। उस संकल्प और विश्वास की फौलादी ताक़त को तलाश करें जो फांसी के फंदे के नीचे आकर भी यह कहती रहती कि, अगर ज़िंदगी दोबारा मिले तो मैं इसी रास्ते पर चलूंगा। उस सच्चाई को ढूंढें जो पन्नों से आज़ाद होकर अपनी हक़ीक़त को मनवाती रही... और यह काम हम सिर्फ़ मज़दूर वर्ग के नेतृत्व में ही कर सकते हैं क्योंकि यह वर्ग सिर्फ़ भविष्य का रक्षक है बल्कि इंसानी अक़्ल और चेतना का मुहाफ़िज़ भी है। आज पूंजीवादी व्यवस्था इंसानी अक़्ल और चेतना को नष्ट करके पाशविक प्रवृत्तियों, दासता की भावना, कामुक और उन्मादी भावनाओं की तालीम दे रहा है, इसके विपरीत दुनिया का सिर्फ़ मेहनतकश वर्ग और सोवियत रूस और चीन का नया इंसान अक़्ल और चेतना, साइंस और तरक़्क़ी की रखवाली कर रहा है।

    यही वे हक़ीक़तें हैं जिनके कारण रज्अत-पसंदी की शक्लें सिर्फ़ बेनक़ाब हो रही हैं, बल्कि एक तंग और अंधेरी गली में सिमटती भी जा रही हैं और जिस हद तक उनकी सड़ांध और गंदगी बेनक़ाब होती जा रही है, हमारी तरक़्क़ी-पसंदी का सोना भी निखरता जा रहा है। हमारा भविष्य उज्ज्वल होता जा रहा है और आप यक़ीन कीजिए कि अतीत की तरक़्क़ी-पसंद परंपराओं का वही मुनकिर (इनकार करने वाला) और दुश्मन होता है जिसको भविष्य पर यक़ीन हो और जिसको भविष्य अज़ीज़ हो।

    चुनांचे मैं ऐसी इंक़लाब-पसंदी (क्रांतिवादिता) को भी रज्अत-पसंदी समझता हूं जो अतीत को बिना किसी फ़र्क़ के मिटाना चाहती हो। जो 'इंक़लाब बराए इंक़लाब' (क्रांति के लिए क्रांति) की दावेदार हो और जिसे अतीत में सिर्फ़ वीरानियां ही वीरानियां नज़र आती हों। लेकिन हम अतीत की कुछ चीज़ों को ख़ारिज भी करते हैं और उससे अलग भी होते जाते हैं। हम अतीत की रज्अत-पसंद चीज़ों को ख़ारिज कर देते हैं, हम सिर्फ़ तरक़्क़ी-पसंद चीज़ों को चुनकर उन्हें एक नए गुणात्मक परिवर्तन के लिए आगे बढ़ाते हैं और जिस हद तक हम अपनी इस कोशिश में इंक़लाबी छलांग लगाते हैं, हम अतीत से अलग भी होते जाते हैं। इसी को पुराने से नए की तरफ़ छलांग लगाना भी कहते हैं।

    अगर आप इस मज़मून में रज्अत-पसंदी की कुछ और शक्लें भी तलाश करना चाहें तो इसके यह मायने नहीं कि वे रज्अत-पसंद नहीं हैं, क्योंकि यहां सिर्फ़ बुनियादी उसूलों पर बहस की गई है। और अगर आप ग़ौर करेंगे तो देखेंगे कि इन्हीं उसूलों पर हैयत-परस्ती (रूपवाद) के ऐसे रज्अत-पसंद रुझान को भी जांचा जा सकता है। हैयत-परस्ती हक़ीक़त की सही तर्जुमानी में आड़े आती है, हैयत-परस्ती रज्अत-पसंद ख़यालात के प्रचार का ज़रिया बनती है, हैयत-परस्ती साहित्य को ज़िंदगी के स्रोत से सिंचित होने से रोकती है, हैयत-परस्ती साहित्य को अवाम की संपत्ति बनने से रोकती है, हैयत-परस्ती ज़िंदगी की ख़िदमत करने से परहेज़ करती है। लेकिन साहित्यिक सौंदर्य और साहित्यिक स्तर को बरक़रार रखने का नाम हैयत-परस्ती नहीं है, क्योंकि यह बात तय है कि साहित्यिक स्तर का निर्धारण औसत दर्जे की रचनाओं से नहीं किया जा सकता है। इसका निर्धारण आला दर्जे की रचनाओं से किया जा सकता है और यहीं पर हमें तमाम युगों के प्रकाश-स्तंभ को देखना पड़ता है।

    मूल उर्दू लेख यहाँ पढ़िए :
    स्रोत :

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY
    Click on any word to get its meaning
    बोलिए