क़िस्सा उर्दू ज़बान का
उर्दू ज़बान की पैदाइश का क़िस्सा इस लिहाज़ से हिंदुस्तानी ज़बानों में शायद सबसे ज़्यादा दिलचस्प है कि यह रेख़्ता ज़बान बाज़ारों, दरबारों और ख़ानक़ाहों के रास्तों में पड़े-पड़े एक दिन इस मुक़ाम को पहुँची कि इसके हुस्न और समृद्धि पर दूसरी ज़बानें रश्क (ईर्ष्या) करने लगीं। दकन में तो ख़ैर इसे अनुकूल माहौल मिला था, और शाहजहाँनाबाद के उर्दू बोलने वालों ने उर्दू को 'उर्दू-ए-मुअल्ला' का दर्जा तो दे दिया और इसकी अदाओं और अंदाज़ पर जान भी देने लगे, मगर फ़ारसी का असर इतना बढ़ा हुआ था कि लोग उर्दू में शेर कहते हुए कतराते थे।
कहावत मशहूर है कि बड़ या पीपल के पेड़ के नीचे घास भी नहीं उगती। फ़ारसी के साये में यही हाल इस नई जन्मी ज़बान का था। यह वली के दीवान का ही असर था कि लोग फ़ारसी छोड़-छोड़ कर उर्दू की तरफ़ आकर्षित हो गए। मानो मुद्दतों से ज़बान तैयार थी, बस एक हल्के से मनोवैज्ञानिक सहारे की ज़रूरत थी, वह सहारा वली के शेरों की लोकप्रियता ने दे दिया। लगभग इसी ज़माने में फ़ज़ल अली फ़ज़ली ने 'करबल कथा' लिखी। अगर इसके गद्य का मुक़ाबला उस ज़माने की शायरी की ज़बान से किया जाए तो हैरत होती है कि शेर की ज़बान तो किसी हद तक मँज गई थी लेकिन गद्य की राह से काँटे अभी नहीं निकले थे। आम उसूल है कि गद्य पहले बढ़ता है, शायरी बाद में तरक़्क़ी करती है। यहाँ मामला उल्टा था। ज़बान तो तैयार थी ही, बाँध टूटा तो सबसे पहले लोगों के मन को शायरी बहा ले गई, गद्य किनारे पर खड़ा देखता रहा। फ़ज़ली 'करबल कथा' की प्रस्तावना में लिखते हैं,
सबब तालीफ़ इस मजमूआ-ए-महमूदा का और बाइस तसनीफ़ इस नुस्ख़ा-ए-मसऊदा का कि हर हर्फ़ इसका एक गुलदस्ता बोस्तान-ए-विलायत का है... वाक़िया शहादत शाह-ए-करबला का इसमें लिखा है, सुनाता था लेकिन मानी उसके निसा-ओ-औरत की समझ में न आते थे। अक्सर औक़ात बाद किताब ख़्वानी के सब यह मज़कूर करते कि सद हैफ़ ओ सद हज़ार अफ़सोस जो हम कम-नसीब इबारत फ़ारसी नहीं समझते और रोने के सवाब से बे-नसीब रहते। ऐसा कोई साहब-ए-शऊर होवे कि किसी तरह मिन-ओ-अन हमें समझावे और हम से बे-समझों को समझा कर रुलावे।
इस गद्य में उर्दू के शुरुआती दौर की मासूमियत और सादगी तो है लेकिन वाक्य फ़ारसी के शिकंजे में जकड़े हुए हैं। दूसरी तरफ़ शेर की ज़बान में दकनियत यानी बोलियों के शुरुआती प्रभाव थे। मीर ने तो अपने मुहब्बत भरे लहज़े में महज़ इतना कहा था:
माशूक़ जो अपना था बाशिंदा दकन का था
लेकिन क़ायम ने जब दावा किया,
क़ायम मैं ग़ज़ल तौर किया रेख़्ता वर्ना
इक बात लचर-सी ब-ज़बान-ए-दकनी थी
तो दरअसल इस एहसास का इज़हार कर रहे थे जिसका एक ऐसे ऐतिहासिक दौर में पैदा हो जाना स्वाभाविक था, जब ज़बान के बनने, सँवरने और गढ़ने की प्रक्रिया जारी थी। यह मुबारक काम किसी एक व्यक्ति या अकेले किसी एक शायर का नहीं था, बल्कि इसमें मज़हर, हातिम, मीर, सौदा और क़ायम व यक़ीन के दौर के सभी उर्दू बोलने और लिखने वाले शामिल थे। इस ज़माने में ज़बान को बेइंतिहा विस्तार दिया गया और हज़ारों नए लफ़्ज़, नए मस्दर (क्रिया-मूल), नए मुहावरे, नई तश्बीहें (उपमाएँ), नए इस्तिआरे (रूपक) ज़बान में दाख़िल हुए और ज़बान कहाँ से कहाँ पहुँच गई। इस दौर में एक तरफ़ अगर कई ठेठ हिंदी लफ़्ज़ हमेशा के लिए उर्दू में खप गए तो इसके साथ-साथ कई फ़ारसी मुहावरों और वाक्यों के अनुवाद उर्दू में रच-बस गए। मसलन पैमाना भरना (पैमाना पुर करदन), जामे से बाहर निकलना (अज़-जामा बैरून शुदन), दिल हाथ से जाना (दिल अज़ दस्त रफ़्तन), ख़ुश आना (ख़ुश आमदन), जिगर करना (जिगर करदन)।
इस दौर की शायरी में सिपाहियों, पहलवानों, टप्पेबाज़ों, महावतों, आतिशबाज़ों, तवायफ़ों, बनियों, वैद्यों, बावर्चीयों, शिकारियों वग़ैरह के बेशुमार अल्फ़ाज़ इस्तेमाल हुए हैं। इसके अलावा युद्ध और महफ़िल (रज़्म-ओ-बज़्म) और शादी-ब्याह, मौसमों, फलों, फूलों, परिंदों, जानवरों, ज़ेवरों, कपड़ों, खानों वग़ैरह के सैकड़ों नाम और उनके बारे में ख़ास-ख़ास अल्फ़ाज़ इस दौर में उर्दू की पूँजी में दाख़िल हुए और उर्दू शब्दावली में ज़बरदस्त इज़ाफ़ा हुआ। फ़ारसी लफ़्ज़ों से जो मस्दर (क्रिया-मूल) बनाए गए, उन्हीं से कुछ अंदाज़ा होगा कि उर्दू में शब्दों को अपनाने और ढालने (अख़्ज़-ओ-तसर्रुफ़) का कैसा शानदार सिलसिला जारी रहा। लरज़ से लरज़ना, दाग़ से दाग़ना, फ़रमान से फ़रमाना, ख़रीद से ख़रीदना, ख़र्च से ख़र्चना, बख़्श से बख़्शना, नवाज़ से नवाज़ना, बदल से बदलना, इसी तरह गुज़र करना, अमल करना, ज़हमत करना, ख़राब करना, क़द्र करना, तलाश करना, शुमार करना, मिन्नत खींचना, फ़र्ज़ करना, तूमार बाँधना, हामी भरना, सरोकार न रखना। ये और ऐसे सैकड़ों दूसरे अपनाए गए अफ़आल (क्रियाएँ) हैं जो इतनी कसरत से इस्तेमाल हुए हैं कि उर्दू के अपने हो गए हैं।
फ़ारसी अल्फ़ाज़ के साथ हिंदी अल्फ़ाज़ का मेल भी इसी दौर में शिखर पर पहुँचा। दोराहा, बेतुका, गाड़ीबान, बेढब, बेघर, नेकचलन, शर्मीलापन, मुँहज़ोर, चोरमहल, जेबकतरा, इमामबाड़ा, बेफ़िकरा, नौदौलता, चौराहा, छमाहा, पचरंगा, बेसबरा, थका-माँदा, बेकल, बदचलन, शर्मीला, पानदान, बेधड़क, समझदार, सदाबहार, दीवानापन, बेलाग, दग़ाबाज़, बसंतीपोश, बेलदार, फूलदार, जामा-ए-छींट, मोतीमहल, मोतीमस्जिद। मीर ने जब कहा था,
बातें हमारी याद रहें फिर बातें न ऐसी सुनिएगा
करते किसी को सुनिएगा तो देर तलक सर धुनिएगा
जहाँ से खोलिए इक शेर शोर-अंगेज़ निकले है
क़यामत का सा हंगामा है हर जा मेरे दीवाँ में
तो काव्य सौंदर्य और प्रताप के ये दावे ज़बान की भाषाई ताक़त, विस्तार, लोच और समृद्धि के बग़ैर नामुमकिन थे। लगभग इसी ज़माने में जब दिल्ली की शेरी फ़ज़ाएँ (काव्य का माहौल) मीर व सौदा के समकालीनों और उनके शागिर्दों के तराने और गीतों से गूँज रही थीं, लखनऊ में उर्दू शायरी के बीज बोने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी। दूसरी तरफ़ क़ुरआन शरीफ़ के उर्दू अनुवादों की तरफ़ भी ध्यान जाने लगा था और केंद्रीय इलाक़ों से दूर उर्दू या हिंदुस्तानी के असर से मुर्शिदाबाद और कलकत्ते के भाषाई माहौल में भी हलचल पैदा होने लगी थी। यही वह ज़माना है जब विलियम जोन्स ने संस्कृत, पहलवी, यूनानी, जर्मन और इतालवी ज़बानों के साझा पूर्वज का सुराग़ खोज निकाला और ऐतिहासिक भाषाविज्ञान और विशेषकर इंडो-यूरोपियन परिवार की गुमशुदा ऐतिहासिक कड़ियाँ मिलाई जाने लगीं।
इसी ज़माने में साम्राज्यवाद के एक हथियार के तौर पर गिलक्रिस्ट ने फ़ोर्ट विलियम कॉलेज में उर्दू पर ध्यान दिया। गिलक्रिस्ट ने शब्दकोश, व्याकरण और ज़बान पर बीसियों किताबें लिखीं और लिखवाईं और फ़ोर्ट विलियम कॉलेज में हिंदुस्तानी यानी उर्दू के मुंशी जमा किए। इस ऐतिहासिक काम का एक पहलू यह है कि अगर यहाँ गद्य की किताबें सादा ज़बान में न लिखी जातीं तो उर्दू शायद एक मुद्दत तक अता हुसैन तहसीन की 'नौ तर्ज़-ए-मुरस्सा' की सजावट और तुकांत गद्य की भूल-भुलैयों में गुम रहती। यूँ तो फ़ोर्ट विलियम कॉलेज में हैदर बख़्श हैदरी, शेर अली अफ़सोस, मिर्ज़ा अली लुत्फ़, काज़िम अली जवाँ, मज़हर अली वला, बहादुर अली हुसैनी, निहाल चंद लाहौरी, बेनी नरायन जहाँ और कई दूसरे अदीब थे जिन्होंने उर्दू ज़बान की इल्मी सीमाओं को विस्तृत किया लेकिन इस दौर की किताबों में जो मर्तबा मीर अम्मन की 'बाग़-ओ-बहार' ने पाया वह गद्य की किसी किताब को नसीब न हुआ।
उर्दू अगर प्राकृत और अरबी-फ़ारसी तत्वों के बीच एक भाषाई संतुलन का नाम है तो मीर अम्मन ने अपनी ज़बरदस्त भाषाई प्रतिभा और इंतिहाई मँजे और रचे हुए ज़ौक़ और शऊर (रुचि और चेतना) की बदौलत इस भाषाई संतुलन के हुस्न का राज़ पा लिया था। 'बाग़-ओ-बहार' की उर्दू सिर्फ़ कौसर-ओ-तस्नीम (स्वर्ग की नदियों) ही में धुली हुई नहीं, यह गंगा और जमुना के आईने में भी अपना चेहरा देखे हुए है,
अब दमड़ी की ठड्डियां मयस्सर नहीं जो चबा कर पानी पीऊं। दो-तीन फ़ाक़े कड़ाके के खींचे। भूख की ताब न ला सका। लाचार बेहयाई का बुरक़ा मुंह पर डाल कर यह इरादा किया, बहन के पास चलिए। लेकिन यह शर्म दिल में आती थी कि पिता की वफ़ात के बाद न बहन से कुछ सुलूक किया, न ख़ाली ख़त लिखा। वह माजाई, मेरा यह हाल देख कर, बलाएं ले और गले मिल कर बहुत रोई। तेल मालिश और काले टके मुझ पर से सदक़े किए। एक दिन वह बहन कहने लगी, ऐ बीरन! तू मेरी आंखों की पुतली और मां-बाप की मुई मिट्टी की निशानी है। तेरे आने से मेरा कलेजा ठंडा हुआ। जब तुझे देखती हूं, बाग़-बाग़ होती हूं। तूने मुझे निहाल किया।
लेकिन मर्दों को ख़ुदा ने कमाने के लिए बनाया है, घर में बैठे रहना उनको लाज़िम नहीं। जो मर्द निखट्टू होकर घर में बैठा रहता है, उसको दुनिया के लोग ताना-मेहना देते हैं। ख़ास तौर पर इस शहर के लोग। छोटे-बड़े बिना वजह तुम्हारे रहने पर कहेंगे, अपने बाप की दौलत-दुनिया खो-खाकर बहनोई के टुकड़ों पर आ पड़ा। यह निहायत बेग़ैरती और मेरी-तुम्हारी हंसाई और मां-बाप के नाम को लाज लगने का सबब है। नहीं तो मैं अपने चमड़े की जूतियां बनाकर तुझे पहनाऊं और कलेजे में डाल कर रखूं। अब यह सलाह है कि सफ़र का इरादा करो। ख़ुदा चाहे तो दिन फिरें और इस हैरानी और मुफ़लिसी के बदले, तसल्ली और ख़ुशी हासिल हो।
इस गद्य से मालूम होता है कि उर्दू ज़बान ने अपने लड़कपन को पीछे छोड़ दिया है और अब इसमें अपनी बात कहने की ख़ूबियां पैदा हो गई हैं। फ़ोर्ट विलियम कॉलेज के बाद उर्दू गद्य जवान होता हुआ मालूम होता है। अंग्रेज़ी तालीम और पश्चिमी तहज़ीब की रोशनी की किरणें कलकत्ते से फूटने लगी थीं, लेकिन उधर अवध की तहज़ीब अपने घेरे में बंद थी और यह घेरा भी ऐसा था जिसकी अपनी एक दुनिया थी, अपनी ज़मीन और अपना आसमान। इसके सूरज, चांद और सितारे आतिश, नासिख़, बहर, सहर, नसीम, वज़ीर, रिंद, सबा, क़लक़ और रजब अली बेग सुरूर थे। तिलिस्म-ए-होशरुबा, अमीर हमज़ा और बीसियों दूसरी दास्तानों के सिलसिले थे। दरबार तो एक था, लेकिन इसके साये में छोटे-बड़े दरबारियों के कई दायरे थे जिनके असर से मुशायरे, शेरी हुनरमंदी, कला पर पकड़ और ज़बान-दानी की महारत के सबसे बड़े अखाड़े थे।
दौलत की बहुतायत और सरपरस्तों की अधिकता ने शायरी को जितना बेजान किया, ज़बान को उतनी ही तरक़्क़ी और विस्तार भी दिया क्योंकि सारी तवज्जो अब लफ़्ज़ और ज़बान पर ख़र्च होने लगी थी, बाल की खाल निकाली गई। मतरूकात (त्यागे गए शब्दों) के दफ़्तर तैयार किए गए, लेकिन ज़बान का पौधा अवध की फ़िज़ाओं में परवान चढ़ता रहा, जहां ज़मीन भी उपजाऊ थी और मिट्टी भी नम थी। इस दौर में उर्दू पर अवधी के लोच, नरमी और घुलावट की ऐसी छटा पड़ी जिस पर उर्दू हमेशा नाज़ करती रहेगी। इस दौर की ज़बान में लताफ़त, रस और तबीयत को बहा ले जाने वाली कैफ़ियत देखनी हो तो ग़ज़ल में नहीं मसनवी और मरसिये में देखनी चाहिए।
इस दौर की उर्दू में दोनों चरम सीमाएं मिलती हैं। एक तरफ़ नासिख़ की रवायतें, रजब अली बेग सुरूर का 'फ़साना-ए-अजायब' और दयाशंकर नसीम की 'गुलज़ार-ए-नसीम' है तो दूसरी तरफ़ मीर हसन, मीर अनीस और मिर्ज़ा शौक़ की बोलचाल की चांदनी में धुली हुई ज़बान है, जिसकी सरलता, घुलावट और रवानी की क़सम खाई जा सकती है। उर्दू ज़बान नज़्म और गद्य दोनों में अब इस शिखर तक पहुंच गई थी कि उसे इंतज़ार था कि कोई ऐसा बाकमाल आए जो उसकी दोनों चांदी जैसी कलाइयां थाम ले और ज़बान उसकी मुहब्बत के बदले उसके सर पर भाषाई हीरे-जवाहरात से जगमगाता हुआ महानता का ऐसा ताज रख दे जिसकी चमक रहती दुनिया तक आंखों को चौंधियाती रहे। ऐसे बाकमाल अज़ीम फ़नकार मिर्ज़ा ग़ालिब थे। उन्होंने जब यह कहा था,
गंजीना-ए-मानी का तिलिस्म उसको समझिए
जो लफ़्ज़ कि ग़ालिब मिरे अशआर में आवे
तो परोक्ष रूप से ही सही, वह इस बात का इज़हार कर रहे थे कि उर्दू शाब्दिक और अर्थ दोनों एतबार से इस सतह तक उठ आई है कि नाज़ुक से नाज़ुक मानी और ज़िंदगी के पेचीदा से पेचीदा रिश्तों के एहसासात को व्यक्त करने में सक्षम हो सकती है। गद्य में गुफ़्तगू को और शायरी में जादू को समोने की मिर्ज़ा में ऐसी बेपनाह सलाहियत थी कि उनके साथ-साथ उर्दू ज़बान के भाषाई विकास का वह दायरा तार्किक तौर पर मुकम्मल हो गया जो अमीर ख़ुसरो के दौर में बनना शुरू हुआ था। ग़ालिब के बाद अर्थ व्यक्त करने की एक ऐसी शाहराह खुल गई जिस पर उर्दू आज तक चल रही है। ग़ालिब की इस तहरीर को देखिए और फ़ैसला कीजिए कि आज की उर्दू का मानकीकरण किस ज़बान की बुनियाद पर किया जाता है,
पैंसठ बरस की उम्र है, पचास बरस इस दुनिया की सैर की। जवानी की शुरुआत में एक कामिल मुर्शिद (गुरु) ने हमको यह नसीहत की कि हमको परहेज़गारी मंज़ूर नहीं, हम ऐश-ओ-इशरत से रोकने वाले नहीं, पियो, खाओ, मज़े उड़ाओ, मगर यह याद रहे कि मिसरी की मक्खी बनो, शहद की मक्खी न बनो। सो मेरा इस नसीहत पर अमल रहा है। किसी के मरने का वह ग़म करे जो आप न मरे। कैसा आंसू बहाना, कहां की मरसिया-ख़्वानी, आज़ादी का शुक्र बजा लाओ, ग़म न खाओ और अगर ऐसे ही अपनी गिरफ़्तारी से ख़ुश हो तो 'चुन्ना जान' न सही, 'मुन्ना जान' सही। मैं जब जन्नत का तसव्वुर करता हूं और सोचता हूं कि अगर बख़्शिश हो गई और एक महल मिला और एक हूर मिली। हमेशा वहीं रहना है और उसी एक नेक-बख़्त के साथ ज़िंदगानी है। इस तसव्वुर से जी घबराता है और कलेजा मुंह को आता है। हाय-हाय वह हूर अजीर्ण हो जाएगी, तबीयत क्यों न घबराएगी। वही पन्ने का महल और वही तूबा (जन्नत का पेड़) की एक शाख़। चश्म-ए-बद-दूर, वही एक हूर, भाई होश में आओ, कहीं और दिल लगाओ।
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