पाउण्ड की हिदायात नए लिखने वालों को
नए साहित्य के नाम से अभिव्यक्ति के नए-नए तरीके हर भाषा में समय-समय पर ईजाद होते रहते हैं। और यह कोई ताज्जुब की बात भी नहीं है क्योंकि लेखन की शैली दरअसल मानसिक और भावनात्मक जीवन की शैली होती है और अगर नई शैली वाक़ई ठोस और सच्ची है तो इसके मायने यह होंगे कि सोचने और महसूस करने का एक नया ढंग खोज लिया गया है। मगर यूँ भी होता है कि जिस चीज़ को हम कुछ समय के लिए अभिव्यक्ति की नई शैली कहते हैं, वह या तो किसी पुरानी शैली की गूँज होती है या लिखने वाले के ख़राब हाज़मे का प्रमाण। कई बार जो चीज़ नई कविता के शीर्षक से छपती है, वह महज़ एक चुटकुले की हैसियत रखती है जिसे साहित्य के चालाक पाठक सिर्फ़ इस ज़ोर पर लिखते और प्रचलित करते हैं कि उन्होंने थोड़ा-बहुत साहित्य पढ़ा होता है। उन्हें यह भी अंदाज़ा होता है कि अच्छा शेर रचना बहुत योग्यता और जोखिम का काम है और वे अपनी असल हैसियत से भी वाक़िफ़ होते हैं। अच्छा शेर कह नहीं पाते। लिहाज़ा चुटकुले तैयार करके प्रकाशक के सिर पर दे मारते हैं। प्रकाशक बहरहाल व्यापारी होता है। वह किताब ही ऐसी छापेगा जिससे मुनाफ़े की राहें निकलें। अतः किताब छपती है। गर्मियों-गर्मियों ख़ूब चर्चे रहते हैं। फिर बरसात आती है। फिर जाड़े। साल ख़त्म होने तक किसी को याद भी नहीं रहता कि क्या छपा था और किसने लिखा था।
'नई शायरी' के अंतर्गत आजकल भी बहुत कुछ छप रहा है, इस शायरी के बारे में कुछ कहने को मेरा जी भी चाहता था। मगर कहते हुए डरता हूँ कि मैं कुछ बोला तो शायर हज़रात फ़रमाएँगे कि मियाँ! न ग़ज़ल लिखी न नज़्म। डेढ़ बालिश्त के आदमी हो मगर आलोचना करने में सबसे आगे। कोई यूँ कहे तो मैं क्या कहूँ? इस आपत्ति से बचने की तरकीब मैंने यह निकाली कि जो कुछ ख़ुद कहना चाहता था, वही पाउंड के लेखों में से निकाल लाया। उर्दू के नए शायर भी आख़िर अपना प्रमाण यूरोप से ही मँगवाते हैं और फिर पाउंड साहब तो वह शख़्स हैं जो पिछले पचास-पचपन बरस से हर नई पीढ़ी को सबक़ देते चले आ रहे हैं। वैसे अस्करी साहब तो कहते हैं कि पाउंड आजकल दुनिया का सबसे बड़ा शायर है। मैं इस सिलसिले में कुछ नहीं कहना चाहता क्योंकि अस्करी साहब कहते हैं तो फिर ठीक ही कहते होंगे। मैंने दुनिया भर की शायरी तो पढ़ी नहीं है कि इतनी बड़ी बात इतने दावे से कह सकूँ। अलबत्ता इतना अर्ज़ करूँगा कि आलोचक दो क़िस्मों के होते हैं। एक वे जो पढ़ने वाले को बेहतर पाठक बनाना चाहते हैं और दूसरे वे जो पढ़ने वाले को बेहतर साहित्यकार बनने में मदद देते हैं। पाउंड साहब दूसरी क़िस्म के आलोचक हैं और लिखने वाले को बहरहाल इसी तरह के आलोचकों की ज़रूरत होती है।
प्रस्तुत लेख कोई एक लेख नहीं है बल्कि पाउंड की विभिन्न रचनाओं से उद्धरण निकालकर एक शीर्षक के तहत जमा कर दिए गए हैं। पाउंड के जितने लेख इस वक़्त मेरे सामने हैं, उनमें से सबसे पहला लेख 1907 ई. का है। इस हिसाब से उनके लेखन की उम्र छप्पन बरस बनती है। इस लंबी अवधि में पाउंड ने बहुत कुछ लिखा है और ये लेख हज़ारों पृष्ठों पर फैले पड़े हैं। प्रस्तुत चयन किसी भी तरह से पाउंड की आलोचनात्मक योग्यताओं का प्रतिनिधित्व नहीं करता। प्रतिनिधि चयन पेश करना मेरा मक़सद भी नहीं है। मैं तो महज़ वे बातें निकाल लाया जो हमारे युग की उर्दू शायरी की स्पष्ट ख़ामियों पर रोशनी डालती हैं। इन उद्धरणों का अनुवाद करते हुए मैंने किसी ख़ास क्रम का भी ख़याल नहीं रखा क्योंकि मैं तो केवल यह देखना चाहता हूँ कि ब्रिटेन की जिस पीढ़ी का अनुसरण हम कर रहे हैं, उस पीढ़ी के अच्छे शायरों ने आख़िर किन सिद्धांतों के तहत शेर लिखे और किन ख़ूबियों को अच्छे लेखन की ज़मानत माना। जहाँ-जहाँ मुझे इन सिद्धांतों का ज़िक्र मिला, मैंने वाक्य का अनुवाद कर डाला। लेख का क्रम यह है कि पहले हिस्से के उद्धरण पढ़ाई की अलिफ़. बे. ते. में से हैं। दूसरे हिस्से के उद्धरण पाउंड के विभिन्न लेखों से। और तीसरे हिस्से के वाक्य उनके पत्रों में से अनुवाद किए गए हैं। स्पष्ट रहे कि पत्रों के रूप में पाउंड ने आधुनिक अंग्रेज़ी आलोचना का सबसे अहम और दिलचस्प दस्तावेज़ तैयार किया है। उनके ज़्यादातर पत्र फ़िलहाल छपे नहीं हैं मगर जो भी छप गए हैं, वे आलोचना की अच्छी-अच्छी किताबों पर भारी हैं।
पाउंड ने ही कहीं लिखा है कि ख़राब शायरी हमेशा एक सी ही होती है और अपने खोखलेपन के लिहाज़ से इटली का पेट्रा सिज़्म (Petra schism) और चीन के चावल के सफ़ूफ़ (पाउडर) वाले शायर बिल्कुल एक समान हैं। कुछ यही बात अच्छी शायरी की भी है। अच्छे-बुरे लेखन के जो सिद्धांत पाउंड ने अंग्रेज़ी के लिए बनाए थे, वे उर्दू शायरी पर भी ज्यों के त्यों लागू होते हैं। मैं अपनी बात कह चुका। अब ज़रा पाउंड पढ़िए और अंदाज़ा कीजिए कि आज की उर्दू शायरी चावल के पाउडर वाली शायरी है या गुफ़्तार-ए-मौजूँ (लयबद्ध काव्य) वाली।
(1)
आलोचना के अंतर्गत बहुत सी अला-बला महज़ इसलिए छपी और बर्बाद गई क्योंकि दो बिल्कुल विपरीत क़िस्म के लेखों में भेद नहीं किया गया।
(अलिफ़) वे किताबें जो आदमी इसलिए पढ़ता है कि उसकी योग्यताओं में इज़ाफ़ा हो ताकि वह चीज़ों को पहले की तुलना में बेहतर तरीक़े से और कम वक़्त में समझ सके और जानकारी हासिल करे।
और
(बे) वे किताबें जो आदमी महज़ वक़्त गुज़ारने के लिए या अफ़ीम के तौर पर या मानसिक बिस्तर की हैसियत से इस्तेमाल करता है।
(पढ़ाई की अलिफ़. बे. ते. पृष्ठ 88)
ईमानदार आलोचक को इस बात के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए कि उसके युग में बहुत ही कम रचनाएँ वाक़ई सिर खपाने के लायक़ होंगी। मगर यह भी चाहिए कि नई और मूल्यवान रचना पहचानने के लिए हर वक़्त तैयार रहे और जब कोई ऐसी रचना सामने आए तो पिछली रचना को पीछे हटाकर नई रचना को आगे बढ़ा दे। (पृष्ठ 91)
अयोग्य लेखक व्यर्थ शब्दों के इस्तेमाल से पहचाना जाएगा।
किसी रचना का विश्लेषण करते वक़्त पढ़ने वाले का पहला काम तो बस यही है कि ऐसे शब्द देखता जाए जिनका अपना कोई उपयोग नहीं होता। यानी जो शब्द रचना के अर्थ में कोई इज़ाफ़ा नहीं करते या जो पढ़ने वाले का ज़हन रचना के अधिक महत्वपूर्ण पहलुओं से हटाकर कम महत्वपूर्ण पहलुओं की तरफ़ ले जाते हैं। (पृष्ठ 63)
किसी शब्द या संयोजन के बेमक़सद होने का सवाल महज़ गिनती का मसला नहीं है। (पृष्ठ 69)
अच्छे लेखक वे हैं जो भाषा की क्षमताएँ बरक़रार रखें यानी स्पष्ट और खरी भाषा को प्रचलित करें। यह कोई ज़रूरी नहीं कि अच्छा लेखक हमेशा किसी मक़सद के तहत ही लिखे, न ही बुरा लेखक वह है जो रचनात्मक कामों में हिस्सा नहीं लेता। (पृष्ठ 32)
कहते हैं कि मोपासाँ को लिखना फ़्लॉबेयर ने सिखाया था। जब मोपासाँ टहल कर आता तो फ़्लॉबेयर उसे किसी व्यक्ति का हुलिया बयान करने की हिदायत देता। मसलन किसी ऐसी सब्ज़ी बेचने वाली औरत का हुलिया बयान करने को कहता जिसे फ़्लॉबेयर पहले से न पहचानता हो और जिसे अगली बार टहलने के लिए जाते हुए दोनों देखते। फ़्लॉबेयर शर्त रखता कि बयान ऐसा हो कि उस औरत को फ़्लॉबेयर ख़ुद-ब-ख़ुद पहचान ले और वह बयान किसी दूसरी सब्ज़ी बेचने वाली पर लागू न होता हो। (पृष्ठ 65)
अगर आप साहित्य में खरे तत्व तलाश करना शुरू करें तो पता चलेगा कि साहित्य रचने वाले लोग निम्नलिखित क़िस्मों में बाँटे जा सकते हैं।
(1) ईजाद करने वाले। यानी वे लोग जिन्होंने कोई नई शैली खोजी या जिनकी कोई रचना ऐसी है जिसमें किसी विशिष्ट शैली की पहली मिसाल मिलती है। (ख़ुसरो)
(2) उस्ताद। वे लोग जिन्होंने विभिन्न प्रचलित शैलियों को इकट्ठा किया और उन्हें ईजाद करने वालों जैसी महारत के साथ या उनके मुक़ाबले ज़्यादा अच्छी तरह से इस्तेमाल किया। (मीर और सौदा)
(3) कमी करने वाले यानी वे लोग जो पहली दो क़िस्म के लिखने वालों के बाद आए और अपना काम उतनी ज़्यादा महारत के साथ अंजाम नहीं दे पाए। (मोमिन, नासिख़)
(4) अच्छे लिखने वाले जिनकी अपनी कोई विशिष्ट ख़ूबी नहीं होती। वे लोग जो क़िस्मत से ऐसे दौर में पैदा हुए जब देश का साहित्य अच्छी हालत में था या साहित्य की कोई ख़ास विधा वाक़ई जानदार थी (क़ायम चाँदपुरी या मीर के आधा दर्जन समकालीन)।
(5) ख़ालिस साहित्य या ललित निबंध (इंशाइए) लिखने वाले। यानी वे लोग जिन्होंने ईजाद कुछ भी नहीं किया मगर किसी एक ख़ास विधा में लिखते चले गए, जिन्हें किसी भी तरह से बड़ा साहित्यकार नहीं कहा जा सकता और जो अपने दौर का मुकम्मल चित्रण नहीं कर पाए। (सीमाब या नियाज़ स्कूल)
(6) जो चुटकुलों को बढ़ावा देते हैं।
जब तक पढ़ने वाला पहली दो क़िस्मों के साहित्य से वाक़िफ़ नहीं होता, वह साहित्य का अध्ययन एक सुसंगत परंपरा के रूप में नहीं कर सकता। मुमकिन है वह अपनी निजी पसंद की चीज़ पहचान सकता हो। इस बात की भी संभावना है कि वह किताबों से इश्क़ करने की सारी औपचारिकताएं निभाता हो, यानी उसके पास बहुत ख़ासतौर पर छपी हुई और मोटी-मोटी जिल्दों वाली किताबों का संग्रह हो, मगर उसे ख़ुद अपने ज्ञान की सीमाएं पता नहीं होंगी और वह पिछली रचनाओं के हवाले से नई रचना के मूल्य और महत्व को तय नहीं कर सकेगा। अस्सी या सौ साल पुरानी किताबों के बारे में तो वह भली-बुरी राय शायद दे दे, मगर जब कोई नया लिखने वाला परंपरा से हटकर साहित्य में कोई नया योगदान देगा, तो ऐसा पढ़ने वाला नई रचना के बारे में कोई राय क़ायम करने के बिल्कुल अयोग्य होगा। (पृष्ठ 40-39)
नए लिखने वाले के लिए पहला इम्तिहान
(1) चाहिए कि एक-दूसरे की रचनाएं देखें और यह देखें कि कितने अल्फ़ाज़ ज़रूरत से ज़्यादा हैं। कितने अल्फ़ाज़ ऐसे हैं जिनसे कोई नई बात मालूम नहीं होती।
(2) कितने अल्फ़ाज़ ऐसे हैं जिनसे अर्थ अस्पष्ट हो जाता है।
(3) कितने अल्फ़ाज़ ऐसे हैं जिनका स्थान व्याकरण के लिहाज़ से ग़लत है और यह कि क्या इस बदलाव से रचना में कोई नया ज़ोर या ज़्यादा दिलचस्पी पैदा हुई है।
(4) क्या वाक्य अस्पष्ट है? क्या वाक्य के एक से ज़्यादा अर्थ बनते हैं? क्या ऐसे अर्थ भी बन जाते हैं जो ख़ुद लिखने वाले के मतलब से अलग हों? क्या वाक्य को ऐसे पढ़ा जा सकता है कि अर्थ लिखने वाले के मतलब से बिल्कुल अलग बन जाएं?
(5) क्या रचना ऐसी है कि कागज़ पर साफ़ और सरल नज़र आए, मगर तेज़ आवाज़ में पढ़ते वक़्त अस्पष्ट हो जाए। (पृष्ठ 65-64)
दूसरा इम्तिहान
(1) किसी पेड़ का वर्णन लिखिए।
(2) ऐसे लिखिए कि पेड़ का नाम रचना में न आए (नीम, कीकर, बरगद वग़ैरह) मगर ऐसा स्पष्ट हो कि पढ़ने वाला पेड़ को फ़ौरन पहचान ले और किसी दूसरे पेड़ का गुमान न हो। (पृष्ठ 66)
हर बार इम्तिहान का एक नुस्ख़ा बहुत कारगर साबित होगा। क्या यही सामग्री किसी दूसरी विधा में बेहतर तरीक़े से इस्तेमाल हो सकती थी? (पृष्ठ 76)
लेकिन जनाब, क्या हमें वर्ड्सवर्थ नहीं पढ़ना चाहिए?
हाँ मेरे बच्चो, ज़रूर पढ़ो। बल्कि जो जी चाहे पढ़ो। मगर मुझसे या किसी और से पूछने के बजाय अपने तौर पर ख़ुद देखो कि किताब के पन्ने पर क्या लिखा है।
क्या वर्ड्सवर्थ साहब ऐसे अल्फ़ाज़ इस्तेमाल करते हैं जिनसे अर्थ में कोई इज़ाफ़ा नहीं होता?
स्विन्बर्न साहब (SWINBURNE) के बारे में मशहूर है कि वे बहुत से अल्फ़ाज़ ऐसे इस्तेमाल करते थे जिनसे सिर्फ़ रंग या 'सौंदर्य' ही ज़ाहिर होता था। यह भी कहा जाता है कि वे औरत के वर्णन में भी वही विशेषण इस्तेमाल करते हैं जो पहले गोधूलि (शफ़क़) की तारीफ़ में इस्तेमाल कर चुके हों। (पृष्ठ 77)
याद रहे कि वर्णनात्मक रचना की कुछ ख़ूबियां ऐसी भी हैं जो होमर, रुडयार्ड किपलिंग और किपलिंग के मशहूर शागिर्द जनाब एडगर वॉलेस में समान हैं।
(2)
ज़बान का मसला
मत इस्तेमाल करो वह लफ़्ज़ जो ज़रूरत से ज़्यादा है या वह विशेषण जिससे किसी नई बात का ख़ुलासा नहीं होता।
अस्पष्टता से ख़ौफ़ खाओ। ख़राब शायरी में वे बातें मत दोहराओ जो अच्छे गद्य में कही जा चुकी हैं। यह मत समझो कि अगर तुम अच्छे गद्य की बेहद मुश्किल कला की दिक़्क़तों से कतराकर अपनी बात को अलग-अलग मिसरों (पंक्तियों) में फैला दोगे, तो बुद्धिमान लोग भी इस धांधली से प्रभावित हो जाएंगे।
जिस बात से पढ़ा-लिखा शख़्स आज तंग आ गया है, उसी बात से कल अवाम भी तंग आ जाएंगे।
यह मत समझो कि लिखने की कला संगीत की कला से आसान है, और जब तक तुम लिखने के अभ्यास पर कम-अज़-कम उतना ही वक़्त ज़ाया नहीं कर लेते जितना पियानो का मामूली उस्ताद संगीत की कला पर ज़ाया करता है, तो यह मत समझो कि तुम्हारी रचना कला के माहिरों को भी प्रभावित करेगी।
भरसक कोशिश करो कि तुम्हारी रचना ज़्यादा से ज़्यादा बड़े कलाकारों से प्रभावित हो। मगर साथ ही साथ तुम्हारे अंदर इस क़दर शराफ़त भी होनी चाहिए कि या तो स्वीकार कर लो कि तुमने ये प्रभाव क़बूल किए हैं, या इन प्रभावों को इस तरह से क़बूल करो कि वे पढ़ने वाले की नज़रों से छुप जाएं। (अदबी मज़ामीन, पृष्ठ 5-4)
लय (आहंग) और क़ाफ़िया
यह मत समझो कि शायरी में वह बात भी चल जाएगी जो ग़ैर-दिलचस्प होने की वजह से गद्य में नहीं चल सकी।
अपनी बात के हाथ-पैर काटकर अलग-अलग मिसरों में बंद मत करो। ऐसे मत लिखो कि बात मिसरे के आख़िर में आकर एकदम ख़त्म हो जाए और अगला मिसरा धक्के के साथ शुरू हो। शेर ऐसे लिखो कि लय की लहर फैलकर अगले मिसरे में पहुँचती हुई मालूम हो। बशर्ते कि तुम ख़ुद यह न समझते हो कि मिसरे के आख़िर में ठहराव ज़रूरी है।
साथ ही यह भी ख़याल रखो कि ध्वनियों की लय तय करते वक़्त तुम अल्फ़ाज़ की असल शक्ल या उनकी असल आवाज़ या उनके अर्थ बिगाड़ नहीं रहे हो।
क़ाफ़िया शेर में लुत्फ़ सिर्फ़ इसी सूरत में पैदा कर सकता है कि उसमें कोई अनोखापन हो। यह भी नहीं कि क़ाफ़िया इस क़दर अनोखा हो कि अचंभा बनकर रह जाए। फिर भी, अगर क़ाफ़िया इस्तेमाल कर रहे हो तो ढंग से करो।
अगर कोई संतुलित रूप या विधा (ग़ज़ल, रुबाई वग़ैरह) इस्तेमाल कर रहे हो, तो ऐसे मत कहो कि पहले जो बात कहनी हुई वह कह दी और फिर ऊपर से बाक़ी मिसरे टाँक दिए। (पृष्ठ 7-6)
कुछ ऐलान
लय। मैं निश्चित लय में यक़ीन रखता हूँ। यानी ऐसी लय में जो व्यक्त होने वाले जज़्बे और जज़्बे की ख़ास कैफ़ियत के साथ मेल रखती हो। शायर को चाहिए कि लय का इस्तेमाल अर्थ को स्पष्ट करने के लिए करे। इस तरह न तो वह ख़ुद किसी की नक़ल उतारेगा, न कोई और उसकी नक़ल कर पाएगा।
प्रतीक। मेरा ईमान है कि ख़ास क़ुदरती चीज़ें ही सही और मुकम्मल प्रतीक बन सकती हैं, और यह कि अगर कोई प्रतीकों का इस्तेमाल कर रहा है तो ऐसे करे कि प्रतीकात्मक शैली से अर्थ गड़बड़ न हो जाएं। ताकि जो लोग प्रतीक को प्रतीक के तौर पर नहीं समझते, यानी जिनके लिए शाहीन (बाज़) महज़ शाहीन है, वे भी शेर के माहौल और कैफ़ियत का लुत्फ़ उठा सकें।
रूप (हैयत)। मैं समझता हूँ कि सामग्री तरल भी होती है और ठोस भी, और यह कि कुछ नज़्मों का रूप ऐसा होता है जैसे तश्तरी में गिरता हुआ पानी, और कुछ का रूप ऐसा होता है जैसे पेड़ का तना होता है, और यह कि क़ाफ़िए वाली विधाओं के भी कुछ फ़ायदे होते हैं, और यह कि बहुत से विषय ऐसे भी हैं जो इन विधाओं में सटीकता के साथ पेश नहीं किए जा सकते।
मैं समझता हूँ कि शेर लिखने वाले को चाहिए कि वह सभी सिन्फ़ों (विधाओं) और बहरों (छंदों) पर महारत हासिल करे। मैंने ख़ुद यह महारत हासिल करने की कोशिश बड़ी बाक़ायदगी (नियमित रूप) से की है। और उन दौरों की तहक़ीक़ (खोज) तो ख़ास तौर पर की है जिनमें कोई ख़ास सिन्फ़ ईजाद हुई हो या अपने उरूज (शिखर) को पहुँची हो। (सफ़्हा 9)
अच्छी शायरी कभी बीस बरस पुराने उसलूब (शैली) में नहीं लिखी गई क्योंकि ऐसी तर्ज़ में लिखने से साफ़ पता चलता है कि लिखने वाला असल ज़िंदगी के बजाय किताबों, रवायती (पारंपरिक) शैलियों और घिसी-पिटी इस्तलाहों (शब्दावलियों) के हवाले से सोचता है। वैसे यह भी मुमकिन है कि जब कोई शख़्स अपने फ़न (कला) का रिश्ता असल ज़िंदगी से टूटता हुआ महसूस करे तो वह मतरूक (छोड़ी जा चुकी) पुरानी शैलियाँ खोज लाए, बशर्ते कि डूबे हुए उस उसलूब में कोई ख़ूबी ऐसी हो कि फ़न अपने असल जौहर (यानी ज़िंदगी) के साथ दोबारा मरबूत हो जाए (जुड़ जाए)। (सफ़्हा 11)
और जहाँ तक चुटकुलों का सवाल है तो बात दरअसल यह है कि अदब (साहित्य) में बीमारियाँ गिनती की ही हुआ करती हैं और इन दो-चार बीमारियों के अलावा कोई और हो ही नहीं सकती। लिहाज़ा यह भी इमकान (संभावना) है कि आपस में किसी क़िस्म के लेन-देन के बग़ैर ही अलग-अलग और दूर-दराज़ के मुल्कों के अदब में एक ही क़िस्म के जरासीम (कीटाणु) पैदा हो जाएँ। अच्छा तबीब (डॉक्टर) जाने-पहचाने मर्ज़ की पहचान फ़ौरन करेगा, चाहे इज़हार (अभिव्यक्ति) का तरीक़ा सतही तौर पर कितना ही अलग क्यों न हो। (सफ़्हा 24)
आज़ाद नज़्म
मैं समझता हूँ कि आज़ाद नज़्म सिर्फ़ उस सूरत में लिखनी चाहिए कि जब ऐसा किए बग़ैर चारा न हो। यानी सिर्फ़ उस वक़्त जब नज़्म का अपना आहंग (लय) मुरव्वजा (प्रचलित) बहरों के आहंग से ज़्यादा ख़ूबसूरत, ज़्यादा सच्चा और इज़हार पाने वाले जज़्बे के ज़्यादा क़रीब हो। ऐसा आहंग जिसे पढ़कर क़ारी (पाठक) जानी-पहचानी बहरों से उकताहट महसूस करने लगे।
इलियट ने बात बिल्कुल ठीक कही है कि जो शख़्स शेर सलीक़े से कहना चाहता है, उसके लिए कोई नज़्म आज़ाद नहीं हुआ करती। (सफ़्हा 12)
(3)
याद रखो कि आदमी का असल काम वह है जो वह करने वाला है, न कि वह जो अब माज़ी (अतीत) का हिस्सा बन चुका। (ख़त नंबर 4, सफ़्हा 42)
क्या तुम अमेरिका के शायर को समझा सकती हो कि शायरी एक फ़न है, ऐसा फ़न है जिसकी अपनी हैयत (रूप) होती है, अपना उसलूब (शैली) है, एक ऐसा फ़न जिसकी संभावनाएँ हमेशा बढ़ती और फैलती रहती हैं और अगर यह फ़न ज़िंदा रहेगा तो बस इसी सूरत से कि इज़हार के तरीक़े बदलते रहें? क्या तुम उसे समझा सकती हो कि शेर से यह मुराद (मतलब) हरगिज़ नहीं होती कि जो समाजी मसाइल (सामाजिक समस्याएँ) पिछले साल के रिसालों (पत्रिकाओं) में छप चुके हैं, वे अब बहर और क़ाफ़िए के साथ दोबारा छापे जाएँ। (ख़त नंबर 5, सफ़्हा 42)
याद रहे कि मानी (अर्थ) आवाज़ के निज़ाम (व्यवस्था) में जकड़े हुए होते हैं। (ख़त 173, सफ़्हा 226)
बड़ा अदब (साहित्य) वह ज़बान है जिसमें मानी (अर्थ) की बारूद कूट-कूट कर भरी गई हो।
शायरी में अच्छी नस्र (गद्य) की सी सादगी और वैसा ही ठोसपन ज़रूरी है।
शायरी भी उतनी ही मेहनत से लिखी जानी चाहिए जितनी मेहनत अच्छी नस्र (गद्य) के लिए दरकार (ज़रूरी) है। शेर की ज़बान निखरी हुई ज़बान होनी चाहिए और बढ़ती हुई शिद्दत (यानी सादगी) के अलावा इसमें कोई ऐसी ख़ुसूसियत (विशेषता) नहीं होनी चाहिए कि बोलचाल की ज़बान से मुमताज़ (अलग) हो सके। न किताबी अल्फ़ाज़ की ज़रूरत है, न चर्बे उतारने (नक़ल करने) की और न ज़बान की सादा क़वायद (व्याकरण) को तोड़ने-मरोड़ने की। शेर की ज़बान ऐसी ही सादा होनी चाहिए जैसी मोपासां की बेहतरीन नस्र और वैसा ही ठोसपन ज़रूरी है जैसा स्तांदाल की नस्र में होता है। ज़रूरी है कि शेर का सौती आहंग (ध्वनि-लय) मानी (अर्थ) से भी जुड़ा हो। (ख़त नंबर 60, सफ़्हा 91)
और तकनीक से मुराद (मतलब) यह है कि आदमी न सिर्फ़ अपनी छाती का बोझ उतार दे बल्कि वही बोझ ज्यों का त्यों दूसरे की छाती में पैवस्त भी कर दे (उतार दे)। (ख़त 24, सफ़्हा 60)
हमें वज़ाहती तनक़ीद (व्याख्यात्मक आलोचना) नहीं चाहिए। ज़रूरत सलीक़े से चुने हुए मजमुओं (संग्रहों) की है। सैंडबर्ग ने मुझे शिकागो से एक ख़त में लिखा है कि जब हम लिखने वाले एक-दूसरे की तहरीरें (रचनाएँ) भी ख़रीद के नहीं पढ़ सकते तो यूँ लगता है जैसे जहन्नुम में सुलग रहे हैं।
अगर कोई शख़्स छह मिसरे वाक़ई अच्छे लिख दे तो अदब में उसका नाम दायम (हमेशा) रहेगा। क्या यह एज़ाज़ (सम्मान) ऐसा नहीं है कि आदमी इसे हासिल करने के लिए थोड़ी-बहुत मेहनत करे? क्या कोई नक़्क़ाद (आलोचक) ऐसा नहीं मिल सकता जो किसी चीज़ को उस वक़्त तक अच्छा न कहे जब तक ऐसा कहने के लिए वह अपनी पूरी शोहरत ख़तरे में डालने के लिए तैयार न हो। (ख़त नंबर 9, सफ़्हा 46)
और अगर तुम वही ख़यालात छाप रही हो जिस पर लोग पहले से ही मुत्तफ़िक़ (सहमत) हैं तो फिर ये ख़यालात छापने की ज़रूरत ही क्या है। (ख़त नंबर 10, सफ़्हा 47)
ढंग की तनक़ीद (आलोचना) इसी सूरत से पैदा हो सकती है कि समझ-बूझ रखने वाले कुछ लोग मिल बैठें और एक-दूसरे से इख़्तिलाफ़ात (मतभेद) ज़ाहिर करें। मैं इस क़िस्म के गधों में से हूँ जो इज्तिमाई ज़हानत (सामूहिक बुद्धिमत्ता) में यक़ीन रखते हैं। (ख़त नंबर 9, सफ़्हा 46)
पढ़ाई-लिखाई का और मज़मून (विषय) से वाक़फ़ियत (जानकारी) का सबसे बड़ा फ़ायदा यह होता है कि आदमी वे तहरीरें पहचानने लगता है जिनमें सिर खपाने की मुतलक़ (बिल्कुल) कोई ज़रूरत नहीं होती, वह नुक़्ता (बिंदु) समझ में आ जाता है जहाँ से वह ख़ुद अपना काम शुरू कर सकता है। (ख़त नंबर 233, सफ़्हा 298)
या ख़ुदावंदा! क्या कोई शख़्स ऐसा नहीं है जो अठारहवीं सदी के घिसे हुए मुहावरे इस्तेमाल करने के बजाय साफ़ और सादा बोलचाल की ज़बान इस्तेमाल कर सके। (ख़त नंबर 13, सफ़्हा 50)
हाशिए
(1) हर बहर में अशआर कहे उम्र को खोया (मीर) और एक सिन्फ़ में लिखने वाले को मीर साहब यक-फ़न्नी (एक कला वाला) कहते थे।
(2 से 4) ये फ़िक़रे (वाक्य) मुझे ज़बानी याद थे। इसी तरह तर्जुमा कर दिए। अब पाउंड के ख़ुतूत (पत्रों) का मजमुआ (संग्रह) देखा तो वे ख़त नज़र नहीं आए जिनमें ये फ़िक़रे मिलते हैं।
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