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नई शा'इरी का पस-मंज़र

सय्यद एहतिशाम हुसैन

नई शा'इरी का पस-मंज़र

सय्यद एहतिशाम हुसैन

MORE BYसय्यद एहतिशाम हुसैन

    हर इंसानी अमल (कार्य) समय और स्थान की सीमाओं के अंदर होता है। शायरी की रचना और कुछ हो, एक अमल ज़रूर है, जो किसी किसी तरह की आंतरिक या बाहरी प्रेरणा से वजूद में आती है। इसलिए इसके सामने आते ही प्रतिक्रिया का सिलसिला भी शुरू हो जाता है। समय और स्थान से सिर्फ़ यथार्थ का ही एहसास नहीं होता, बल्कि अमल की दूरियों का अंदाज़ा भी होता है जो रचना के कलात्मक और वैचारिक मूल्यों को तय करने में मदद देता है। यही पुराने और बहुत पुराने, नए और बहुत नए के बीच अंतर करने और उनके फ़र्क़ को समझने का ज़रिया बनता है, और इससे एहसास, जज़्बे और ख़याल के आपसी रिश्तों का विश्लेषण किया जा सकता है।

    यूँ तो हर समकालीन साहित्य अपने वक़्त में नया होता है, लेकिन जब हम शायरी का ज़िक्र इतिहास के संदर्भ में करते हैं, तो समय की दूरी की वजह से पुराना नए से अलग हो जाता है। इसे समझने के लिए शायरी की सूक्ष्मता के आईने पर स्थूलता (यथार्थ) की कलई ज़रूरी है। नई शायरी के अर्थ, लब-ओ-लहज़े, भाषा, संवेदनात्मक और कलात्मक अनुभवों को समझने के लिए वक़्त के मिज़ाज को पहचानना, ज़माने की माँगों को नज़र में रखना, चेतना के स्वरूप को परखना, परंपरा के जीवित और निर्जीव तत्वों में फ़र्क़ करना, समाज के अंदर विभिन्न हितों के टकराव की स्थिति और मात्रा को जानना, सामूहिक मस्तिष्क में वर्ग-संघर्ष, प्रगतिशील और पतनशील तत्वों के फ़र्क़ को महसूस करना ज़रूरी है। ये वे भौतिक सच्चाइयाँ हैं जो बदलाव के लिए पृष्ठभूमि प्रदान करती हैं। इन विभिन्न आईनों में काव्य और साहित्य की गतिशील, बदलती हुई, एक मंज़िल से दूसरी मंज़िल की तरफ़ बढ़ती हुई और रंग बदलती हुई तस्वीरें देखी जा सकती हैं। इस पृष्ठभूमि को नज़रअंदाज़ करके शायरी और साहित्य को समझने की कोशिश व्यर्थ होगी।

    नया क्या है? किसी स्थिति में वे कौन से बदलाव होते हैं जिनके आधार पर हमें नए का एहसास होता है? यह तो हर जगह के लिए एक समान है, हर दौर के लिए, क्योंकि कभी इनमें क्रमिक विकास का रूप बनता है और कभी क्रांतिकारी गति और तेज़ी का। कभी ज़िंदगी की व्यवस्था इस तरह बदलती है कि परिवर्तन एक दबाव के रूप में प्रकट होता है और आंतरिक एहसास में महज़ एक कशमकश और बेचैनी बनकर चुभता रहता है, कभी यह इस तरह गहराई में बैठ जाता है कि किसी बड़े आंदोलन से ही बाहरी रूप धारण करता है। देश-देश, क़ौम-क़ौम, समाज-समाज, व्यक्ति-व्यक्ति, और व्यक्ति तथा समाज के आपसी रिश्तों में जो अनगिनत बदलाव होते रहते हैं, उन्हीं की अभिव्यक्ति व्यक्तिगत और सामूहिक स्तर पर संस्कृति के विभिन्न क्षेत्रों में होती है और यह स्वीकृति-अस्वीकृति के विभिन्न चरणों से गुज़रता है। सामाजिक चेतना इस स्वीकृति-अस्वीकृति या चुनाव में व्यक्ति की मदद ही नहीं करती, बल्कि उसकी समझ को तेज़ करके उसके आगे की राह भी रौशन करती है। इतिहास में इसके उदाहरण बेशुमार हैं। परिवर्तन का हर अहम मोड़ इसी क्षेत्र से जुड़ा होता है।

    जब 'नए' शब्द का इस्तेमाल किया जाता है, तो इसके अर्थ भी सबके लिए एक समान नहीं होते, क्योंकि चेतना का स्तर एक समान नहीं होता। जो व्यक्ति इसे महज़ वक़्त की रफ़्तार से तय करता है, वह चेतना और एहसास की भूमिका को नज़रअंदाज़ करता है, क्योंकि वक़्त के लिहाज़ से नए ज़माने में होते हुए भी किसी की चेतना पुराने से जुड़ी हो सकती है, और इसके विपरीत कोई व्यक्ति सामाजिक विकास के सिद्धांतों की जानकारी हासिल करके अपनी चेतना को वर्तमान और भविष्य के बीच की कड़ी बना सकता है। जब हिंदुस्तान में शायरी और सामंती व्यवस्था की जड़ें कमज़ोर हुईं, बाहरी दुनिया से संपर्क क़ायम हुआ और विभिन्न प्रकार के आंतरिक और बाहरी राजनीतिक प्रभावों ने बदलाव का एहसास पैदा किया, नए ज्ञान-विज्ञान और कलाओं, संचार के नए साधनों, नई शिक्षा और औद्योगीकरण ने ज़ेहन बदले, तो हिंदुस्तान में एक नए दौर की शुरुआत हुई, जिसके प्रभाव विभिन्न व्यक्तियों और विभिन्न आंदोलनों की शक्ल में सामने आए, जिसका स्पष्ट रूप से प्रतिनिधित्व राजा राममोहन राय, केशव चंद्र सेन, सर सैयद, रानाडे, आज़ाद, हाली, नज़ीर अहमद, शिबली, भारतेंदु हरिश्चंद्र, सुब्रमण्यम भारती, बंकिम चंद्र चटर्जी आदि करते हैं।

    ये अलग-अलग तरह की उड़ान की शक्ति रखने वाले, नई रौशनी की पहली किरन के परवाने हैं, और अपनी व्यक्तिगत भिन्नताओं, अपनी धार्मिक और वैचारिक पृष्ठभूमि, तथा अपनी वर्गीय चेतना के बावजूद, परिवर्तन और विकास की एक बुनियादी ख़्वाहिश के जज़्बे से ओत-प्रोत नज़र आते हैं। भौतिक स्तर पर जो नयापन आर्थिक और राजनीतिक हालात से पैदा हुआ था, सांस्कृतिक और वैचारिक स्तर पर उसकी अभिव्यक्ति कई तरीक़ों से साहित्य में भी होने लगी, क्योंकि उनके सोचने के तरीक़े में साहित्य उनके पूरे व्यक्तित्व से बाहर की कोई चीज़ नहीं था; वे ही इस युग के बौद्धिक मार्गदर्शक भी थे और साहित्यिक अग्रदूत भी। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखे बिना यह समझना नामुमकिन होगा कि ये लोग फ़ैज़ी, अबुल फ़ज़ल, तुलसीदास, शाह वलीउल्लाह, औरंगज़ेब, दारा शिकोह ही नहीं, बल्कि मीर, सौदा और ग़ालिब से भी क्यों अलग थे।

    पश्चिम के कुछ देशों में हालात बदल चुके थे। औद्योगिक क्रांति और राजनीतिक जागरूकता ने विचार और चिंतन, एहसास और चेतना की राह में पहले ही चराग़ जला दिए थे, और वहाँ शायरी में ज़िंदगी के रहस्यों से पर्दा हटाने, तथा कला और समाज के आपसी संबंध को जानने की कोशिश बहुत पहले शुरू हो चुकी थी। जो लोग संस्कृति, इतिहास, राजनीति, आर्थिक व्यवस्था, वैज्ञानिक विकास और विचार तथा साहित्य को किसी मनमाने दर्शन के तहत विशुद्ध बनाना चाहते हैं, जो एहसास और चेतना को भौतिकता से परे समझते हैं और विचार तथा चिंतन को भौतिक जीवन के प्रभावों से मुक्त क़रार देते हैं; अगर विश्लेषण किया जाए और तार्किक बहस की जाए, तो आख़िरकार ये वही लोग निकलेंगे जो राजनीतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से किसी ख़ास क़िस्म के परिवर्तन के विरोधी होते हैं। लेकिन अपनी संबद्धता और प्राथमिकता पर पर्दा डालने के लिए वे काव्य और साहित्य को ही उद्देश्यहीन, दिशाहीन, अर्थहीन और सामूहिक संबंधों से दूर भागने वाला क़रार देते हैं, और शायरी को महज़ अभिव्यक्ति या आत्म-प्रकटीकरण बताकर उसे उसकी पृष्ठभूमि से बिल्कुल वंचित कर देना चाहते हैं।

    पृष्ठभूमि कितनी ही अस्पष्ट, उलझी हुई, तेज़ी से बदलने वाली, ठहरी हुई और बेरंग हो, वह शायरी के स्वरूप को पहचानने में मदद देती है, शेर की कलात्मक ख़ूबियों और ख़ामियों, बदलावों और विस्तार को रौशनी में लाती है, तथा परंपरा और अनुभव की मंज़िलों का पता देती है। क्या इक़बाल और टैगोर की शायरी वैश्विक चिंतन, हिंदुस्तानी जागरूकता, रूसी क्रांति, पारंपरिक धरोहर, विचार और साहित्य, तथा समकालीन माँगों पर ग़ौर किए बिना समझी जा सकती है? यहाँ तक कि दोनों महान शायरों के अलौकिक और आदर्शवादी विचारों के स्रोत भी इसी पृष्ठभूमि में तलाशे जा सकेंगे। यह सही है कि माहौल और काव्य-रचना का रिश्ता गणितीय या यांत्रिक नहीं है, लेकिन यह इससे परे भी नहीं है।

    उन्नीसवीं सदी के आख़िर और बीसवीं सदी की शुरुआत में उर्दू शायरी के विषय राष्ट्रीय आज़ादी के आंदोलन के अलग-अलग पहलुओं से इस तरह जुड़े हुए हैं कि एक के अध्ययन से दूसरे के अध्ययन में मदद मिलती है। यथार्थवाद और रोमानियत की जो खींचतान उर्दू और हिंदी में प्रथम विश्व युद्ध से 1930 ई. तक नज़र आती है, उसे सिर्फ़ शायरों की व्यक्तिगत दिमाग़ी उपज मानना भोलेपन के समान होगा क्योंकि ख़ुद हिंदुस्तानी ज़ेहन पश्चिमी विचारों, पश्चिमी राजनीतिक धारणाओं और साहित्यिक आंदोलनों से प्रभावित हो रहा था और उसकी झलक काव्य रचनाओं में दिखाई देती थी। इन प्रभावों को उस वक़्त का कोई शायर किस हद तक क़ुबूल करता था, क्यों करता था, यह उसकी अपनी समझ और चुनाव था, लेकिन सामग्री उसको अपने आस-पास से ही मिलती थी और प्रेरणा, बदले हुए हालात से।

    1930 ई. के बाद से साम्यवादी विचारों और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण की तरफ़ ज़्यादा ध्यान दिया जाने लगा। इसके भी भौतिक कारण थे। यूरोप और अमेरिका में एक तरफ़ पूंजीवाद और साम्यवाद ने एक दूसरे पर बढ़त हासिल करने का संघर्ष शुरू कर दिया, तो दूसरी तरफ़ चेतन और अवचेतन, धार्मिकता और भौतिकवाद, यथार्थ और आंतरिकता की जंग शुरू हुई। दोनों के आपसी रिश्तों को तलाश कर लेना मुश्किल नहीं है। जो लड़ाइयां बाहर राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्थाओं में होती थीं, वही सांस्कृतिक और वैचारिक रूप में दर्शन, शायरी और साहित्य के सिद्धांतों और अभिव्यक्ति में होती थीं। हिंदुस्तान भी इन लड़ाइयों का मैदान बना, क्योंकि वह राजनीति और विचार दोनों में अपने हित के अनुसार वैश्विक विचारों और राजनीति से अपना संबंध क़ायम रखने पर मजबूर था। उर्दू शायरी में प्रगतिशील आंदोलन और उसकी प्रेरणाएं इसी टकराव की झलक पेश करती हैं। उन्हें सिर्फ़ कला की विरोधी धाराएं कहकर स्पष्ट नहीं किया जा सकता।

    शायरी और साहित्य को विचार के आम बहाव से अलग कर लेने की कोशिश इसलिए हमेशा नाकाम रहती है कि इससे वे बाहरी सच्चाइयां पर्दे के पीछे नहीं छिप पातीं जो ज़ोर-शोर के साथ एक दूसरे पर वर्चस्व पाने की कोशिश करती रहती हैं। शायरी अगर एक से अपना रिश्ता नहीं जोड़ती तो दूसरे की तरफ़दार मालूम होने लगती है। चाहे यह कोशिश चेतन और स्पष्ट हो, तीसरे, चौथे और पांचवें पहलू भी हो सकते हैं, लेकिन बुनियादी विश्लेषण में वे मूल टकराव के किसी किसी रूप के क़रीब हो जाएंगे।

    पृष्ठभूमि के संदर्भ में शायरी पर ग़ौर करने से उसके अंदर के वे छिपे हुए अर्थ भी सामने जाते हैं जिन्हें हम अवचेतन कहते हैं, और शायर के व्यक्तिगत रुझान, ज़िंदगी की तरफ़ उसके रवैये और कलात्मक सौंदर्यबोध का ज्ञान भी इसी माध्यम से होता है। पिछले पच्चीस साल में दुनिया ने बड़े भयानक ख़्वाब देखे, बहुत सी कड़वी सच्चाइयों का सामना किया, बहुत से नए क्षितिज रोशन हुए, विज्ञान ने नई संभावनाओं की राहें खोलीं तो राजनीतिक जोड़-तोड़ ने दिल बुझा दिए, बीमारियों के इलाज निकले तो मानसिक उलझनों के सामान पैदा हुए। तरह-तरह की जीवनदायी और ख़्वाब दिखाने वाली विचारधाराएं पेश की गईं और इंसान जैसे चौराहे पर रास्ता भूल गया।

    ये सब सच्चाइयां हैं जो आज की शायरी में प्रतिबिंबित हो रही हैं, यह कहना कि शायर इनका बोध नहीं रखता या इन्हें समझ नहीं सकता, सही नहीं है। जिस हद तक वह महसूस करता है और अपनी रचना में उसे ज़ाहिर करता है, वह उसके चेतन और अर्ध-चेतन रुझान का परिचायक होता है। मौजूदा युग के औद्योगिक असंतुलन, मौत के ख़ौफ़, राजनीतिक विश्वासों की तरफ़ से अनिश्चितता, शक और उकताहट, बिखराव और अराजकता, विद्रोही जोश के बावजूद हर सच्चा शायर अपना विषय उसी ज़िंदगी से लेता है जिसे वह झेल रहा है। वह उसे इस तरह ज़ाहिर करने की कोशिश करता है जो उसकी कला की अवधारणा के अनुरूप हो और जिसके लिए समाज के किसी किसी वर्ग या समूह में स्वीकृति की संभावना मौजूद हो। इसलिए आधुनिकतम शायर भी रचना के साथ-साथ जीवन की आलोचना की प्रक्रिया से गुज़रने पर मजबूर है।

    आज की शायरी की पृष्ठभूमि आज की पूरी ज़िंदगी है। शायर अपने विचारों का चित्र उभारने के लिए इसके किसी भी हिस्से से काम ले सकता है और किसी भी विषय, सामग्री और अभिव्यक्ति की शैली का चुनाव कर सकता है। लेकिन अगर उसके दिल में पाठक की भी कोई जगह है, तो उसे इस सवाल का जवाब देने के लिए भी तैयार रहना चाहिए कि उसने अपनी आज़ादी का इस्तेमाल किस विचारधारा के हक़ में किया है और क्यों।

    तमाम ऐतिहासिक और वैज्ञानिक पहलुओं को नज़रअंदाज़ करके 'आधुनिक' या 'आधुनिकता' को एक मनगढ़ंत और सीमित अर्थ में इस्तेमाल करने वाले कुछ मान्यताओं की रट लगाते हैं। वे यह समझते हैं कि उन्होंने शायरी और साहित्य को हर बंधन से आज़ाद करा दिया है और ख़ुद को भी इस आरोप से बचा लिया है कि उन्हें किसी दृष्टिकोण या किसी विशेष विचार का समर्थक समझा जाए। तर्क के तौर पर वे यह कहते हैं कि वे बिना दिशा तय किए चलते हैं, वे किसी से बंधे हुए नहीं हैं और वही कहते हैं जो उनके अनुभव से संबंधित है। वे ज़िंदगी की किसी समस्या का हल पेश करके पाठक की आज़ादी में रुकावट नहीं पैदा करना चाहते, बल्कि सिर्फ़ वास्तविकता को व्यक्त करते हैं और भाषा का निडरता से इस्तेमाल करके उसे नए अर्थों से सजाते हैं। वर्तमान वैज्ञानिक युग में और अतीत के इतिहास की मौजूदगी में ये सारे दावे निराधार हैं। अगर ये ख़ुद को धोखा देने या अज्ञानता पर आधारित नहीं हैं, तो इन्हें जानबूझकर दिमाग़ों को भटकाने की उस कोशिश के सिवा और कुछ नहीं कहा जा सकता जिसका प्रयास वैश्विक स्तर पर जारी है।

    आज का समझदार पाठक यह अच्छी तरह समझता है कि हर युग में अच्छे शायरों ने अपने ही माध्यम से सच्चाइयों को व्यक्त किया है। हर युग में भाषा को उस अर्थ को पकड़ में लाने के लिए तोड़ा-मरोड़ा गया है जो शायर का उद्देश्य रहा है। हर युग में प्रयोग किए गए हैं और हर युग में शायर ने अपनी आज़ादी का डंका बजाया है। रही यह बात कि आज के शायर का उद्देश्य बिना दिशा तय किए सच्चाइयों को व्यक्त करना है, तो यह बात उस वक़्त बेमानी हो जाती है जब सिर्फ़ व्यक्तिगत रूप से शायरों के विचारों की दिशाएं तय हो जाती हैं, बल्कि एक सामूहिक केंद्रीकरण भी पैदा हो जाता है जिसमें सिर्फ़ कुछ विषयों की रट आधुनिकता की पहचान बन जाती है। शायरी फ़ार्मूला बनने लगती है और वह स्थिति सामने आती है जो एक सोचे-समझे उद्देश्य और योजना के तहत समान विचार, समान दृष्टिकोण और एकरूपता में ढल जाती है। व्यक्तिगत विशेषताओं का रंग फीका होकर उड़ जाता है और उद्देश्यहीनता का सहारा लेना भी मुमकिन नहीं रहता, क्योंकि ख़ुद अराजकतावाद एक सुसंगत दर्शन सही, एक दृष्टिकोण ज़रूर है।

    अपनी शायरी पर जदीदियत (आधुनिकता) का लेबल लगाने वाले बहुत से शायर नस्र (गद्य) में भी अपने विचार प्रकट करते हैं या अगर वे खुद नहीं लिखते तो उनकी तरफ से दूसरे लोग उनकी बे-तअल्लुक़ी (अलगाव) और ना-वाबस्तगी (अनासक्ति) की वकालत करते हैं। इन लेखों में शायरी के अंदर इबहाम (अस्पष्टता) के पर्दे में छुपाकर रखे हुए नज़रिए, फ़लसफ़े (दर्शन) या मक़सद की साफ़ तर्जुमानी (व्याख्या) होती है और बड़ी शिद्दत से दूसरों के ख्यालों से मुक़ाबला करके अपनी शायरी के मक़सद की हिमायत की जाती है। जो बात नज़्मों में पोशीदा (छुपी) रहती है, वह लेखों में ज़ाहिर हो जाती है। फ़र्क़ सिर्फ़ यह होता है कि एक नज़रिया रखने वाले इस बात का इज़हार भी कर देते हैं कि वे इंसानी आज़ादी, साइंसी और इल्मी तरक़्क़ी, जम्हूरियत (लोकतंत्र), मआशी आसूदगी (आर्थिक खुशहाली), अमन, इंसाफ़, इंसानी मुहब्बत, ज़िंदगी में हुस्न और मुसर्रत (सौंदर्य और खुशी) के तरफ़दार हैं और दूसरे तक़रीबन नब्बे फ़ीसदी लोग इन अक़दार-ए-हयात (जीवन-मूल्यों) के मुख़ालिफ़ (विरोधी) होते हैं और अदीब (साहित्यकार) की विचारों की आज़ादी को आड़ बनाकर मौत, ख़ौफ़, जारिहियत (आक्रामकता), ला-यानीयत (अर्थहीनता), इंसान की बे-वक़अती (महत्वहीनता), अक़्ल-दुश्मनी (बुद्धि-विरोध) और निराज (अराजकता) का खुला-ढका प्रचार करते हैं।

    आज़ाद दोनों हैं और क़दरों (मूल्यों) के चुनाव का सवाल उनकी अपनी मर्ज़ी पर है। इसके बाद भी ना-वाबस्तगी और ला-तअल्लुक़ी का दिखावा महज़ प्रोपेगैंडा नहीं तो और क्या है, या अदब और शायरी को फ़लसफ़े, सियासत और साइंस की तरह एक मुकम्मल और अपने आप में स्वतंत्र चीज़ मानना और उसे ज़िंदगी के किसी दर्द का इलाज, किसी सवाल का जवाब, किसी ज़ख़्म का मरहम समझना एक ऐसा मुतज़ाद (विरोधाभासी) रवैया है जिसे वही लोग सही समझ सकते हैं जो शेरो-अदब के ज़रिए ज़िंदगी में इंतिशार (अफ़रा-तफ़री) पैदा करना चाहते हैं। ये सारी उलझनें इसलिए पैदा होती हैं कि कुछ लोग शायरी को उसके ज़िंदा रिश्तों और शायर को उसके ज़हनी और समाजी पस-ए-मंज़र (पृष्ठभूमि) से अलग करके देखते हैं और शायर की ज़ात (अस्तित्व) को शायर और समाजी इंसान में बाँट कर उसके दोनों हिस्सों के ज़िम्मे अलग-अलग फ़र्ज़ तय कर देते हैं। शायर की हैसियत से समाजी कशमकश, सियासत, साइंसी तरक़्क़ी, और सोच-विचार उसके लिए शजर-ए-ममनूआ (वर्जित वृक्ष) हैं और समाजी इंसान की हैसियत से वह दूसरे तमाम लोगों के साथ अनुभवों में शामिल हो सकता है। क्या इस माँग को फ़ितरी (स्वाभाविक) और अक़्ली (तर्कसंगत) कहा जा सकता है?

    पस-ए-मंज़र की असलियत का एहसास शायरी में वाक़इयत (यथार्थ) पैदा करता है लेकिन बदक़िस्मती से नई शायरी के कुछ मुबल्लिग़ (प्रचारक) उर्दू के नए शायरों के लिए उस पस-ए-मंज़र को ज़्यादा शायराना और हक़ीक़ी (असली) मानते हैं जो तक़रीबन सौ साल पहले के फ्रांस में, पचास साल पहले के यूरोप में था या आज के अमेरिका में है। वे इलियट के 'वेस्ट लैंड' की दुनिया को अब तक हक़ीक़ी दुनिया, काफ़्का और कामू के किरदारों को हक़ीक़ी किरदार समझते हैं। दुनिया बदल चुकी है और ख़ुद हिंदुस्तानी ज़िंदगी एक ख़ास तरह के दर्द-ए-ज़ीस्त (जीवन के दर्द) में मुब्तला है। इसका कर्ब (पीड़ा) कुछ और है, इसकी उम्मीदें और मायूसियाँ दूसरे अंदाज़ की हैं और इसका सच्चा एहसास यहीं के पस-ए-मंज़र और यहीं की ज़िंदगी को समझने से ही हो सकता है। इस मुख़्लिसाना (सच्चे) एहसास से जो शायरी वजूद में आएगी, वह नई शायरी होगी।

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