मंटो फ़सादात पर
पिछले दस साल में नए साहित्य के आंदोलन ने उर्दू कथा-साहित्य में बहुमूल्य इज़ाफ़ा किया है। लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि ज़्यादातर नए अफ़सानों की प्रेरणा रचना की अंदरूनी लगन नहीं थी, बल्कि बाहरी हालात और घटनाएँ थीं, चाहे उनका संबंध ख़ुद लेखक की ज़ात से हो या माहौल से। मुमकिन है यह बहुत हद तक इस प्रचलित धारणा के तहत हुआ हो कि महज़ बाहरी माहौल को बदल देने से इंसानों की अंदरूनी ज़िंदगी को भी बदला जा सकता है। बहरहाल, आम तौर से यह दस्तूर रहा है कि जब हमारे अफ़साना-निगारों को अपनी साहित्यिक गतिविधियाँ कमज़ोर होती मालूम हुई हैं, तो उन्होंने अपने-आप को इल्ज़ाम नहीं दिया। उन्हें कभी यह चिंता नहीं हुई कि शायद हमारा अंदरूनी विकास बंद हो गया है जिसे हम अंदरूनी प्रक्रिया से दोबारा जारी कर सकते हैं। इसके बरख़िलाफ़ उन्होंने अपने-आप को यही सोच कर तसल्ली दे ली कि बाहरी दुनिया में कोई ऐसी बात हो ही नहीं रही जिसके बारे में लिखा जाए। छह-सात साल हुए, मैंने उर्दू के एक अफ़साना-निगार को, जिन्होंने ग़रीबी, ग़ुलामी और कश्मीर के बारे में अफ़साने लिखकर ख़ासी मक़बूलियत हासिल कर ली थी, यह कहते हुए सुना था कि अगर जापानी हिंदुस्तान पर हमला कर दें और मुल्क में कुछ गड़बड़ हो तो साहित्य पर बहार आए।
ख़ुदा शकरख़ोरे को शकर देता ही है। जापानियों का न सही, अकाल का हमला हुआ। किसी ने चोर बाज़ार में चावल बेचकर रुपये बटोरे, किसी ने अफ़साने लिखकर शोहरत। चलिए, दुनिया में जो कुछ होता है किसी न किसी के भले के लिए ही होता है। उस ज़माने में अकाल के विषय को ऐसी पवित्रता हासिल हुई कि विद्यार्थियों तक ने अपने यौन अनुभवों के बजाय भूखों के बारे में लिखना शुरू कर दिया। ज़ोर यह था कि अगर पत्रिका के संपादक ने अफ़साना छापने से इनकार कर दिया तो वह पत्थर-दिल और बेरहम ठहरेगा। ग़रज़, बंगाल की मुसीबतों की बदौलत हमारे अफ़साना-निगारों को कुछ दिन ख़ासी आसानी रही, गढ़े-गढ़ाए अफ़साने मिलते रहे। घटनाएँ, जज़्बात सब उपलब्ध थे, किसी चीज़ के लिए मेहनत की ज़रूरत ही न थी।
फिर अकाल कुछ ठंडा पड़ा तो जहाज़ियों की हड़ताल हो गई। कहीं जीत के जश्न में हंगामा हो गया। ग़रज़ किसी न किसी तरह कारोबार चलता रहा। और जब 47 के दंगे हुए तो गोया अल्लाह मियाँ ने छप्पर फाड़ कर दिया। जी चाहे तो त्रासदीपूर्ण अफ़साना लिखिए, वरना व्यंग्यात्मक लेख हो सकता है। इंसानों की ज़िंदगी पर दाँत पीसिए, साम्राज्यवाद की चालाकियों का पर्दाफ़ाश कीजिए, इन बातों से जी भर जाए तो कुछ औरतों की बेइज़्ज़ती के ज़िक्र से गरमी पैदा कीजिए। मौक़े-मौक़े से यह भी दिखाते चलिए कि इस हैवानियत के साथ-साथ रहमदिली और इंसानी हमदर्दी के नमूने भी मिलते हैं, फिर भोला-सा मुँह बनाकर ताज्जुब कीजिए कि हिंदू-मुसलमानों की अक़्ल को क्या हो गया, कल तक तो भाई-भाई थे, आज एक-दूसरे के ख़ून के प्यासे क्यों हो गए। बस ख़तरा यह रह जाता है कि कहीं आपके ऊपर पक्षपात का इल्ज़ाम न आ जाए। तो वह भी ऐसी मुश्किल बात नहीं। शुरू में अगर पाँच हिंदू मारे गए हैं तो अफ़साना ख़त्म होते-होते पाँच मुसलमानों का हिसाब भी पूरा हो जाना चाहिए। तराज़ू की तौल दोनों तरफ़ बराबर करने के लिए क़सूर बराबर-बराबर कर दीजिए। असल राज़ यह है कि आप अपनी इंसानियत-परस्ती, नेकदिली, निष्पक्षता और अमन-पसंदी साबित कर दें और किसी को बात बुरी भी न लगे।
अगर कोई आदमी हवा में तनी हुई रस्सी पर चलने की क़ाबिलियत रखता हो तो दाद तो हमें उसको भी देनी चाहिए। आख़िर अपने शरीफ़ाना जज़्बात को सामने लाना और इस तरह दूसरों के शरीफ़ाना जज़्बात को भड़काना भी तो इंसानियत की एक ख़िदमत है। अलबत्ता, शरीफ़ाना जज़्बात में थोड़ी-सी कसर यह है कि उनके ज़रिए साहित्य की रचना नहीं हो सकती। मैं यह बात कोई ख़याली और अव्यावहारिक पैमाना सामने रखकर नहीं कह रहा हूँ। दंगों वाला साहित्य लिखने वाले अफ़साना-निगार सबसे पहला दावा यह करते हैं कि हम सच बोलेंगे। मगर साथ ही उन्हें यह भी फ़िक्र होती है कि न हिंदू नाराज़ हों न मुसलमान। निष्पक्षता के मायने यह लिए जाते हैं कि एक समुदाय को दूसरे समुदाय से ज़्यादा क़सूरवार न ठहराया जाए। यह साहित्य ज़ुल्म, संगदिली और हैवानियत की निंदा करना चाहता है। मगर ज़ुल्म को ज़ुल्म कहने की ताक़त नहीं रखता। इस ज़िम्मेदारी से बचना चाहता है। साहित्य से हम इस क़िस्म के सच-झूठ की माँग नहीं करते जो हम इतिहास, अर्थशास्त्र या राजनीति की किताबों से करते हैं।
अदीब (साहित्यकार) से हम किसी नज़रिए या बाहरी दुनिया के बारे में सच बोलने की उतनी माँग नहीं करते जितनी अपने बारे में सच बोलने की। दंगों पर लिखने वाले चाहे दुनिया भर के बारे में सच बोलते हों, लेकिन अपने बारे में नहीं बोलते। उनकी सबसे बड़ी कोशिश यह होती है कि हम अपने स्वाभाविक रुझानों और पूर्वाग्रहों को छिपाए रखें, हालाँकि इतनी ज़बरदस्त उथल-पुथल के ज़माने में ऐसे पूर्वाग्रहों का उभर आना जैविक ज़रूरत है। अगर ये लोग अपने अफ़सानों में वाक़ई कोई मानवीय सार्थकता पैदा करना चाहते हैं तो सबसे पहले इन्हें अपनी इंसानी कमज़ोरी को स्वीकार करना होगा। अपने अंदर जो सच-झूठ भरा हुआ है, उससे आँखें चुराकर सच्चा साहित्य पैदा नहीं किया जा सकता। अलबत्ता, लोकप्रिय साहित्य पैदा हो सकता है। क्योंकि पढ़ने वाले भी तो अपने-आप को यही यक़ीन दिलाना चाहते हैं कि हमारे शरीफ़ाना जज़्बात मरे नहीं हैं।
दरअसल साहित्य को इस बात से कोई दिलचस्पी नहीं कि कौन ज़ुल्म करता है, कौन नहीं करता। ज़ुल्म हो रहा है या नहीं हो रहा। साहित्य तो यह देखता है कि ज़ुल्म करते हुए और ज़ुल्म सहते हुए इंसानों का बाहरी और अंदरूनी रवैया क्या होता है। जहाँ तक साहित्य का ताल्लुक़ है, ज़ुल्म की बाहरी प्रक्रिया और उसके बाहरी तत्व बेमानी चीज़ें हैं। हमारे अफ़साना-निगार ज़ुल्म के सिर्फ़ सामाजिक पहलू को देखते हैं। ज़ालिम और मज़लूम की अंदरूनी ज़िंदगी से ज़ुल्म का क्या ताल्लुक़ है, इससे उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं। हमारे अफ़साना-निगार तलवारें और बंदूकें तो बीसियों दिखाते हैं, काश इन तलवारों और बंदूकों के पीछे जीते-जागते हाथ और सामने जीते-जागते सीने भी होते... मैं यह नहीं कहता कि दंगों पर लिखने वाले सिरे से निष्ठाहीन हैं। इनमें से कुछ लोग वाक़ई नेक-दिल और नेक-नीयत हैं। मगर साहित्य में आम ज़िंदगी वाली निष्ठा काम नहीं देती। ये लोग इस मक़सद से अफ़साने लिखते हैं कि ज़ुल्म की बाहरी प्रक्रिया दिखाकर ज़ुल्म के ख़िलाफ़ नफ़रत के जज़्बात पैदा करें। लेकिन जब तक हमें किसी कर्म की मानवीय पृष्ठभूमि मालूम न हो, महज़ बाहरी प्रक्रिया का नज़ारा हमारे अंदर कोई स्थायी, ठोस और गहरी सार्थकता रखने वाली प्रतिक्रिया पैदा नहीं कर सकता। हम इंसानों से तो नफ़रत और मुहब्बत कर सकते हैं, ज़ालिमों और मज़लूमों से नहीं।
दंगों पर लिखने वाले अफ़साना निगारों ने ज़ुल्म से नफ़रत दिलाने के लिए अक्सर यह तरीक़ा इस्तेमाल किया है कि ज़ुल्म होता हुआ दिखाकर पढ़ने वालों के दिलों में दहशत पैदा की जाए। मगर ये सारी घटनाएँ इतनी ताज़ा हैं, लोग अपनी आँखों से इतना कुछ देख चुके हैं या अपने क़रीबी दोस्तों से इतना कुछ सुन चुके हैं कि सिर्फ़ ज़ुल्मों की फ़ेहरिस्त अब उन पर कोई असर ही नहीं करती। अगर आपने अपने अफ़साने में दो-चार औरतों की बेइज़्ज़ती या बच्चों का क़त्ल दिखा दिया तो इससे लोगों के ज़ेहन पर कोई प्रतिक्रिया होती ही नहीं। यह ज़माना ही ऐसा ग़ैर-मामूली है। ज़ुल्म आजकल बेहद मामूली चीज़ बन गए हैं। ग़ैर-मामूली बातें अब लोगों को चौंकाती ही नहीं। इस क़िस्म के ज़िक्र से उनकी उत्सुकता तक नहीं जागती। नैतिक भावना तो दूर की चीज़ है, दंगों वाले अफ़साने साहित्य (अदब) नहीं थे तो न होते, मगर वे तो अपना सामाजिक मक़सद भी ठीक तरह पूरा नहीं कर सकते। क्योंकि जो बातें अफ़साने पेश करते हैं, वे तो अब ख़बरें भी नहीं रहीं।
मंटो ने भी दंगों के बारे में कुछ लिखा है। लतीफ़े या छोटे-छोटे अफ़साने जमा किए हैं। दरअसल मैंने बड़ा ग़लत वाक्य इस्तेमाल किया है। ये अफ़साने दंगों के बारे में नहीं हैं, बल्कि इंसानों के बारे में हैं। मंटो के अफ़सानों में आप इंसानों को अलग-अलग रूपों में देखते रहे हैं। एक तवायफ़ के रूप में इंसान, एक तमाशबीन के रूप में इंसान वग़ैरह। इन अफ़सानों में भी आप इंसान ही देखेंगे, फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि यहाँ इंसान को ज़ालिम या मज़लूम की हैसियत से पेश किया गया है और दंगों के ख़ास हालात में सामाजिक मक़सद का तो मंटो ने झगड़ा ही नहीं पाला। अगर उपदेश देने से आदमी सुधर जाया करते तो मिस्टर गांधी की जान ही क्यों जाती। मंटो को अफ़सानों के सामाजिक असर के बारे में न ज़्यादा ग़लतफ़हमियाँ हैं, न उन्होंने ऐसी ज़िम्मेदारी अपने सर ली है जो साहित्य पूरी कर ही नहीं सकता। सच पूछिए तो मंटो ने ज़ुल्म पर भी कोई ख़ास ज़ोर नहीं दिया। उन्होंने कुछ घटनाएँ तो ज़रूर होती दिखाई हैं मगर यह कहीं ज़ाहिर नहीं होने दिया कि ये घटनाएँ या काम अपने आप में अच्छे हैं या बुरे। न उन्होंने ज़ालिमों पर लानत भेजी है न मज़लूमों पर आँसू बहाए हैं। उन्होंने तो यह तक फ़ैसला नहीं किया कि ज़ालिम लोग बुरे हैं या मज़लूम अच्छे हैं।
भारतीय उपमहाद्वीप के ये दंगे ऐसी पेचीदा चीज़ हैं, और सदियों के इतिहास से, सदियों आगे के भविष्य से इस बुरी तरह उलझे हुए हैं कि उनके बारे में यूँ आसानी से अच्छे-बुरे का फ़तवा नहीं दिया जा सकता। कम से कम एक समझदार अदीब (साहित्यकार) को यह शोभा नहीं देता कि ऐसे होश उड़ा देने वाली घटनाओं के बारे में राजनीतिक लोगों के स्तर पर उतर कर फ़ैसले करने लगे। मंटो ने अपने अफ़सानों में वही किया है जो एक ईमानदार (राजनीतिक मायनों में ईमानदार नहीं बल्कि एक अदीब की हैसियत से ईमानदार) और सच्चे अदीब को इन हालात में और ऐसी घटनाओं के इतने थोड़े समय बाद लिखते हुए करना चाहिए था। उन्होंने अच्छे और बुरे के सवाल को ही बहस से बाहर क़रार दे दिया है। उनका नज़रिया न राजनीतिक है, न समाजशास्त्रीय, न नैतिक, बल्कि साहित्यिक और रचनात्मक है।
मंटो ने तो सिर्फ़ यह देखने की कोशिश की है कि ज़ालिम या मज़लूम के व्यक्तित्व की अलग-अलग ज़रूरतों से ज़ालिमाना काम का क्या ताल्लुक़ है, ज़ुल्म करने की ख़्वाहिश के अलावा ज़ालिम के अंदर और कौन-कौन से रुझान काम कर रहे हैं, इंसानी दिमाग़ में ज़ुल्म कितनी जगह घेरता है, ज़िंदगी की दूसरी दिलचस्पियाँ बाक़ी रहती हैं या नहीं। मंटो ने न तो रहम के जज़्बात भड़काए हैं न ग़ुस्से के, न नफ़रत के। वे तो आपको सिर्फ़ इंसानी दिमाग़, इंसानी किरदार और व्यक्तित्व पर साहित्यिक और रचनात्मक अंदाज़ से ग़ौर करने की दावत देते हैं। अगर वे कोई जज़्बा पैदा करने की फ़िक्र में हैं तो सिर्फ़ वही जज़्बा जो एक फ़नकार को जायज़ तौर पर पैदा करना चाहिए। यानी ज़िंदगी के बारे में असीम हैरानी और आश्चर्य। दंगों के बारे में जितना भी लिखा गया है उसमें अगर कोई चीज़ इंसानी दस्तावेज़ कहलाने की हक़दार है तो ये अफ़साने हैं।
चूँकि मंटो के अफ़साने सच्ची साहित्यिक रचनाएँ हैं इसलिए ये अफ़साने हमें नैतिक तौर पर भी चौंकाते हैं, हालाँकि मंटो का बुनियादी मक़सद यह नहीं था बल्कि सिर्फ़ रचना (तख़्लीक़) था। ग़ैर-मामूली हालात में अगर कोई ख़बर हमें चौंका सकती है तो ग़ैर-मामूली घटनाएँ या काम नहीं बल्कि बिल्कुल मामूली और रोज़मर्रा की सी बातें। अगर कोई आदमी दो सौ बच्चों और औरतों का क़त्ल करने के बाद उनकी खोपड़ियों का हार गले में पहन लेता है तो यह कोई अप्रत्याशित बात नहीं। जब क़त्ल एक आम शग़ल बन चुका हो तो उसमें कोई ख़ौफ़ की बात भी बाक़ी नहीं रह जाती। लेकिन जब हम देखते हैं कि क़ातिलों को यह फ़िक्र हो रही है कि ख़ून से रेल का डिब्बा गंदा हो जाएगा तो हम ज़रूर एक तरह की बेचैनी महसूस करते हैं। क़ातिलों का क़त्ल किए चले जाना भयानक चीज़ नहीं है, दहशत तो इस ख़याल से होती है कि जिन लोगों में सफ़ाई और गंदगी की तमीज़ बाक़ी है वे भी क़त्ल कर सकते हैं। आख़िर सार्थकता तो तुलना और विरोधाभास से ही पैदा होती है।
ग़ैर-मामूली हालात में ग़ैर-मामूली हरकतें हमें इंसान के बारे में ज़्यादा से ज़्यादा यह बता सकती हैं कि हालात इंसान को जानवर के स्तर पर ले आते हैं। लेकिन ग़ैर-मामूली हालात में ग़ैर-मामूली हरकतें करते हुए मामूली बातों की तरफ़ ध्यान हमें इंसान के बारे में एक ज़्यादा गहरी और ज़्यादा बुनियादी बात बताता है, वह यह कि इंसान हर वक़्त और एक ही समय में इंसान भी होता है और हैवान भी। इसमें ख़ौफ़ का पहलू यह है कि इंसानियत के एहसास के बावजूद इंसान हैवान बनना कैसे गवारा कर लेता है और राहत का पहलू यह है कि वहशी से वहशी बन जाने के बाद भी इंसान अपनी इंसानियत से पीछा नहीं छुड़ा सकता। मंटो के इन अफ़सानों में ये दोनों पहलू मौजूद हैं। ख़ौफ़ भी और दिलासा भी। इन लतीफ़ों में इंसान अपनी बुनियादी बेचारगियों, बेवक़ूफ़ियों, नफ़ासतों और पाकीज़गियों समेत नज़र आता है।
मंटो के क़हक़हे (ठहाके) में बड़ा ज़हर है, मगर यह क़हक़हा हमें तसल्ली भी बहुत दिलाता है। ग़ैर-मामूली हालात में यह कहना कि इंसान की मामूली दिलचस्पियाँ और मामूली रुझान किसी के दबाए नहीं दब सकते, बड़ी बात है। मंटो ने इंसान को न ज़ालिम बताया है न मज़लूम, बल्कि बस इतना इशारा करके चुप हो गया है कि इंसान में बहुत सी बातें बिल्कुल अनमेल और बेजोड़ हैं। इस ख़याल से मायूसी भी बहुत पैदा होती है। मगर एक तरह से देखिए तो इंसानी फ़ितरत का यह अनमेल बेजोड़पन ही सच्चे आशावाद की बुनियाद बन सकता है। अगर इंसान सिर्फ़ एक तरह का, सिर्फ़ नेक या सिर्फ़ बुरा होता तो बड़ी ख़तरनाक चीज़ होता। इंसान की तरफ़ से अगर कुछ उम्मीद बंधती है तो सिर्फ़ इस वजह से कि इंसान का कुछ ठीक नहीं, अच्छा भी हो सकता है और बुरा भी हो सकता है। दूसरे यह कि इंसान अपनी इंसानियत के दायरे में क़ैद है। न तो फ़रिश्ता बन सकता है न शैतान। वह कितना ही ग़ैर-मामूली क्यों न बनना चाहे, मामूली ज़िंदगी की ज़रूरतें उसे फिर अपनी हदों में घसीट लाती हैं। रोज़मर्रा की मामूली ज़िंदगी ऐसी ताक़तवर चीज़ है कि इंसान अगर बहुत अच्छा नहीं बन सकता तो बहुत बुरा भी नहीं बन सकता। मामूली ज़िंदगी उसे ठोंक-पीटकर सीधा कर ही लेती है।
मंटो के इन अफ़सानों की सबसे बड़ी खूबी मामूली ज़िंदगी की ताक़त और महानता का यही इक़रार है। दूसरे कहानीकार हिंदुओं और मुसलमानों को शर्म दिला-दिलाकर उन्हें सही रास्ते पर लाना चाहते हैं। लेकिन उनके अफ़साने ख़त्म करने के बाद हम यक़ीन के साथ नहीं कह सकते कि उनका विरोध कारगर भी होगा या नहीं। मंटो न तो किसी को शर्म दिलाता है, न किसी को सही रास्ते पर लाना चाहता है। वह तो बड़ी तंज़िया मुस्कुराहट के साथ इंसानों से यह कहता है कि तुम अगर चाहो भी तो भटककर बहुत ज़्यादा दूर नहीं जा सकते। इस लिहाज़ से मंटो को इंसानी फ़ितरत पर कहीं ज़्यादा भरोसा नज़र आता है। दूसरे लोग इंसान को एक ख़ास रंग में देखना चाहते हैं। वे इंसान को क़ुबूल करने से पहले शर्तें लगाते हैं। मंटो को इंसान अपनी असली शक्ल में ही क़ुबूल है, चाहे वह कैसी भी हो। वह देख चुका है कि इंसान की इंसानियत इतनी सख़्त जान है कि उसकी बर्बरता भी इस इंसानियत को ख़त्म नहीं कर सकती। मंटो को इसी इंसानियत पर भरोसा है।
फ़सादात के बारे में जितने भी अफ़साने लिखे गए हैं, उनमें मंटो के ये अफ़साने और लतीफ़े सबसे ज़्यादा ख़ौफ़नाक और सबसे ज़्यादा आशावादी हैं। मंटो की दहशत और आशावाद सियासी लोगों या इंसानियत के नेक दिल सेवकों की दहशत और आशावाद नहीं है, बल्कि एक फ़नकार की दहशत और आशावाद है। इसका ताल्लुक़ बहस-मुबाहिसे या सोच-विचार से नहीं है, बल्कि ठोस रचनात्मक तजुर्बे से है। यही मंटो के इन अफ़सानों की एकमात्र ख़ासियत है।
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