मजाज़, रूमानियत का शहीद
अपने दौर के लोगों में जो लोकप्रियता मज़ाज़ को हासिल हुई, वह कम लोगों के हिस्से में आई है। मज़ाज़ ने तक़रीबन पच्चीस साल शायरी की। इस लंबे अरसे को देखते हुए उनका काव्य संग्रह बहुत छोटा है। उनकी बेहतरीन नज़्में ज़्यादातर 1935 और 1945 के बीच की हैं। इधर चार-पांच साल में उन्होंने मुश्किल से कुछ कहा होगा। ख़ुद कहते थे कि शेर की देवी मुझसे रूठ गई है। इतनी कम पूंजी लेकर बहुत कम लोग अमरता के दरबार में दाख़िल हुए होंगे।
मज़ाज़ को ज्ञान और विद्वत्ता में न तो कोई कमाल हासिल रहा, न उन्होंने किसी बड़े आंदोलन में व्यावहारिक दिलचस्पी ली। वैचारिक तौर पर वह प्रगतिशील आंदोलन से जुड़े रहे। मगर इस क़ैद में भी उन्होंने ख़ासी आज़ादी बरक़रार रखी। मज़ाज़ न असाधारण छात्र थे न दुनियावी लिहाज़ से कामयाब साबित हुए। आने वाली नस्लों को शायद इस बात पर हैरत होगी कि मज़ाज़ अपने ज़माने में क्यों इस क़दर लोकप्रिय थे। शराब ने मज़ाज़ को कहीं का न रखा। रियाज़ ने तो रस्म के तौर पर शराब की शायरी का यह शेर कहा था,
अच्छी पी ली ख़राब पी ली
जैसी पाई शराब पी ली
मगर मज़ाज़ ने इस पर बराबर अमल किया, इसी वजह से उनकी सेहत ख़राब हुई। इसी ने उनको दीवानगी की हद तक पहुंचा दिया। इसी ने आख़िरकार उनकी जान ली। मरने के पांच महीने पहले मज़ाज़ मेरे साथ कश्मीर में थे। कश्मीर के दिलकश नज़ारों को देखकर वह शख़्स भी जो सौंदर्य बोध से बिल्कुल ख़ाली हो, कुछ देर के लिए शायर बन जाता है। मज़ाज़ उनके बीच से भी यूंही गुज़र गए। कभी-कभार उनकी स्वाभाविक ज़िंदादिली लौट आती थी और बस, मगर मज़ाज़ की लोकप्रियता और लोगों का उनके प्रति प्रेम इन सब बातों के बावजूद कभी फीका नहीं पड़ा। मज़ाज़ की हालत पर अफ़सोस होता था। दिल कुढ़ता था। कभी-कभी झुंझलाहट भी होती थी मगर उन पर ग़ुस्सा कभी नहीं आया। आ भी नहीं सकता था।
मज़ाज़ मरने के वक़्त पैंतालीस-छियालीस साल के थे। मैं उन्हें 1929 से जानता था। जब वह और जज़्बी, जो उस वक़्त 'मलाल' तख़ल्लुस रखते थे, फ़र्स्ट ईयर साइंस में सेंट जॉन्स कॉलेज आगरा में दाख़िल हुए, मैं उनसे एक साल आगे था। कॉलेज के मुशायरों में दोनों शरीक होते थे। शायद 1931 में मज़ाज़ को एक इनामी मुक़ाबले में पहला इनाम भी मिला था। मज़ाज़ को उस ज़माने में टेनिस से ख़ास दिलचस्पी थी और सेकंड नेट के मेंबर हो गए थे। फ़ानी और मैकश अकबराबादी से उसी ज़माने में उनका मेल-जोल बढ़ा। फ़ानी ने उनकी कुछ ग़ज़लों पर सुधार भी किया था। इसके बाद उन्होंने अपनी रुचि को ही अपना मार्गदर्शक बनाया। जब मैं 1932 में एम.ए. करने अलीगढ़ आया तो मज़ाज़ यहां साल भर पहले से मौजूद थे। साइंस उनसे न चली इसलिए उन्होंने आर्ट्स में दाख़िला लिया और 1935 में बी.ए. कर लिया। अंग्रेज़ी और दर्शनशास्त्र के अलावा एक विषय और लिया था जो इस वक़्त ज़ेहन में नहीं।
उस ज़माने में उनका ज़्यादा वक़्त दोस्तों के कमरों पर गुज़रता था। उनमें जांनिसार अख़्तर, अख़्तर इमाम और हामिद जो टेनिस के अच्छे खिलाड़ी थे, याद आते हैं। दिसंबर 1932 में अंजुमन हदीक़त-उश-शेर का सालाना मुशायरा हुआ था जिसकी अध्यक्षता वाइस चांसलर सर रॉस मसूद ने की थी और जिसमें मौलाना हसरत, असग़र गोंडवी और हफ़ीज़ जालंधरी भी शरीक हुए थे। छात्रों के लिए इसमें नज़्म का एक शीर्षक सुब्ह-ए-बहार रखा गया था। मज़ाज़ की नज़्म पर शुरू में हमेशा की तरह हूटिंग हुई मगर बाद में उसकी रंगीनी और दिलकशी और पढ़ने वाले के दर्द भरे तरन्नुम ने दाद भी हासिल की थी। यह मज़ाज़ का अलीगढ़ से पहला परिचय था।
जांनिसार अख़्तर से सबसे पहले मुझे मज़ाज़ ने ही मिलाया था। अलीगढ़ मैगज़ीन के संपादन के लिए उसके प्रभारी ख़्वाजा मंज़ूर हुसैन साहब से उन्होंने मिलने पर ज़ोर दिया था। मेरे संपादन के ज़माने में मज़ाज़ की नज़्म नुमाइश, एक ग़ज़ल और 'इंक़लाब' इसी मैगज़ीन में छपीं। उस ज़माने में भी मज़ाज़ एक सच्चे दोस्त और एक ज़िंदादिल साथी की हैसियत से जाने जाते थे। नौजवान छात्रों का पसंदीदा शौक़ स्टेशन की सैर या नुमाइश के ज़माने में नुमाइश के चक्कर लगाना था। ख़रीदारी से कोई मतलब न था। बस नज़रों के शौक़ की संतुष्टि काफ़ी थी। 'नुमाइश' उस ज़माने के तेज़ और दीवानेपन से भरे जज़्बात की यादगार है।
उसी ज़माने में अलीगढ़ में नए विचारों की लहर शुरू हुई। डॉक्टर अशरफ़ यूरोप से वापस आ गए। अख़्तर रायपुरी बी.ए. करने के लिए आफ़ताब हॉस्टल में ठहरे हुए थे। वहीं सिब्ते हसन भी थे। अख़्तर रायपुरी ने अपना लेख अदब और ज़िंदगी उसी ज़माने में लिखा था, जब वह रशीद साहब के यहां ठहरे हुए थे। सिब्ते हसन के कुछ अनुवाद और हयातुल्लाह अंसारी की कहानियां भी मैंने अलीगढ़ मैगज़ीन में प्रकाशित की थीं। सज्जाद ज़हीर ऑक्सफ़ोर्ड में एक लंबे समय तक रुकने के बाद अलीगढ़ भी आए थे। 'अंगारे' प्रकाशित होते ही ज़ब्त हो चुकी थी, मैंने मैगज़ीन में उस पर सख़्त आलोचना की। ख़्वाजा मंज़ूर हुसैन साहब प्रभारी थे। वह 'अंगारे' को कुछ साहित्यिक प्रयोगों की वजह से पसंद करते थे। मेरा लेख उन्हें पसंद न आया मगर उन्होंने उस पर कोई रोक-टोक नहीं की। यह बातें इसलिए लिख रहा हूं कि नए विचारों की इस लहर का असर मज़ाज़ पर भी हुआ और 'नुमाइश' और 'सुब्ह-ए-बहार' का लिखने वाला इंक़लाब का अग्रदूत बन गया।
जब 1935 में ऑल इंडिया रेडियो की स्थापना हुई तो एक अंग्रेज़ फ़ील्डन की नियुक्ति बतौर डायरेक्टर हुई। यह बड़ा असाधारण आदमी था, सरकारी और दफ़्तरी व्यवस्था से सख़्त उकताया हुआ और विद्वानों का बड़ा क़द्रदान। एक दफ़ा लाहौर में था। सूबे के गवर्नर से मिल चुका था और इक़बाल से मिलने जा रहा था। अपने एक मुलाक़ाती से कहने लगा कि मैं लाहौर के सबसे छोटे आदमी से मिल कर आ रहा हूं और सबसे बड़े आदमी से मिलने जा रहा हूं। उसने रेडियो में नियुक्तियां करने के लिए रशीद अहमद सिद्दीक़ी साहब को अलीगढ़ से और प्रोफ़ेसर बुख़ारी को लाहौर से बुलाया। शुरुआती नियुक्तियों में ज़ेड. ए. बुख़ारी, आग़ा अशरफ़ और मज़ाज़ लिए गए। मज़ाज़ को रेडियो की पत्रिका 'आवाज़' का संपादन सौंपा गया।
प्रोफ़ेसर बुख़ारी कुछ समय बाद फ़ील्डन के डिप्टी की हैसियत से दिल्ली आ गए। उनमें और दिल्ली वालों में खींचतान शुरू हो गई। आग़ा अशरफ़ ने मज़ाज़ को अपने साथ मिला लिया। आग़ा अशरफ़ का तो कुछ न बिगड़ा, बुख़ारी ने उनका डिमोशन कर दिया। मज़ाज़ को अलग कर दिया गया। रशीद साहब ने बुख़ारी को समझाया मगर उन्होंने एक न सुनी। उसी ज़माने में मज़ाज़ साहित्यिक हलकों में ख़ासे लोकप्रिय हो चुके थे, उन्हें यह ग़लतफ़हमी हो चुकी थी कि साहित्यिक अहमियत के आधार पर नौकरी पर कोई असर नहीं पड़ेगा। अशरफ़ साहब बच निकले। ग़रीब मज़ाज़ अपने भोलेपन का शिकार हो गया।
1936 में अलीगढ़ में एक उर्दू कॉन्फ़्रेंस हुई। मौलवी अब्दुल हक़ साहब अंजुमन का दफ़्तर दिल्ली स्थानांतरित करना चाहते थे और अंजुमन के काम को फैलाना और बढ़ाना चाहते थे। यह बड़ा शानदार सम्मेलन था। मुझे अच्छी तरह याद है कि मज़ाज़ आए तो दिल्ली की नौकरी ख़त्म हो चुकी थी। हाल पूछने पर उन्होंने इक़बाल का यह शेर पढ़ा,
अगर लुट गया इक नशेमन तो क्या ग़म
मक़ामात-ए-आह-ओ-फ़ुग़ां और भी हैं
इस कॉन्फ्रेंस के दौरान यूनियन में सम्मानित मेहमानों का स्वागत था। पंडित कैफ़ी ने 'उर्दू हमारी ज़बान' के नाम से एक लेख पढ़ा। पंडित कैफ़ी की आवाज़ धीमी थी, माइक का रिवाज़ उस वक़्त तक न था, हॉल में ख़ूब शोर हुआ, ख़ैर ज्यों-त्यों करके लेख ख़त्म हुआ तो अध्यक्ष (सद्र) ने ऐलान किया कि अब असरार-उल-हक़ मजाज़ एक नज़्म सुनाएंगे। मजाज़ ने अपनी दिलकश और दर्द भरी आवाज़ में 'नज़्र-ए-अलीगढ़' शुरू की। महफ़िल पर एक बेख़ुदी सी छा गई, लोग झूम-झूम उठे जब वह इस शेर पर पहुंचे,
आ आ के हज़ारों बार यहां ख़ुद आग भी हमने लगाई है
फिर सारे जहां ने देखा है यह आग हमीं ने बुझाई है
तो हर तरफ़ से बेसाख़्ता तारीफ़ के नारे बुलंद हुए। डायस पर डॉक्टर ज़ाकिर हुसैन, अब्दुर्रहमान सिद्दीक़ी और मौलवी अब्दुल हक़ साहब तशरीफ़ फ़रमा थे। ज़ाकिर साहब ने बेसाख़्ता कहा कि मजाज़ साहब फिर पढ़िए। उस ज़माने में अलीगढ़ के ज़िम्मेदार लोग ओल्ड बॉयज़ पर यह इल्ज़ाम लगाते थे कि वे ख़िलाफ़त के ज़माने की तरह फिर अलीगढ़ को नुक़सान पहुंचाना चाहते हैं। मजाज़ के शेर में इसका जवाब भी था।
यह ज़माना मजाज़ की शायरी का बेहतरीन ज़माना था। उनकी मक़बूलियत (लोकप्रियता) अपने उरूज पर थी। इस्मत चुग़ताई ने इसका ज़िक्र अपने ख़ास अंदाज़ में किया है। मजाज़ में इच्छा शक्ति (क़ुव्वत-ए-इरादी) की कमी शुरू से थी। दोस्तों की वाह-वाह, हसीन औरतों की दाद, मुशायरों में मक़बूलियत ने एक नशे की सी कैफ़ियत पैदा कर दी थी। इसी ज़माने में शराब का शौक़ भी होने लगा। मजाज़ अलीगढ़ से लखनऊ पहुंचे और कई साल वहां क़याम रहा। जोश से मेल-जोल शुरू हुआ। यह अक्सर जोश के साथ देखे जाने लगे। जोश का फ़र्ज़ था कि मजाज़ को बहकने न देते मगर दुनिया भर के शराबियों के उस सरताज (क़िबला-ए-रिंदान-ए-जहां) को अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास कब था। कुछ ज़माना इसी तरह गुज़रा। अब तक दिल पर जो ज़ख़्म आए थे वे ज़रा हल्के थे मगर दिल्ली में एक ज़ख़्म ऐसा गहरा लगा कि उसकी चोट सारी उम्र न गई। शुरू में मेहरबानी और लुत्फ़-ओ-करम सब कुछ था। मगर मजाज़ कुछ इससे ज़्यादा चाहते थे। आख़िर मायूसी हुई मगर मजाज़ की ख़ूबी यह थी कि उदासी के बावजूद लहज़े में कड़वाहट न आई।
लखनऊ के क़याम के ज़माने में जोश, सज्जाद ज़हीर, सरदार जाफ़री, सिब्ते हसन, हयातुल्लाह अंसारी, डॉक्टर अब्दुल अलीम, अहमद अली और एहतेशाम हुसैन का साथ रहा। इनमें सिवाए जोश के, शायरी किसी और का ओढ़ना-बिछौना न था। इन सबका एक संजीदा मक़सद था। 'नया अदब' के संपादन में मजाज़ भी शरीक थे। यह पर्चा तरक़्क़ी-पसंद तहरीक (प्रगतिशील आंदोलन) का नुमाइंदा था। मजाज़ का ताल्लुक़ इससे ज़हनी ज़्यादा था, अमली (व्यावहारिक) कम। फिर लखनऊ से अख़बार 'हिंदुस्तान' निकला। इसमें 'अंधेरी रात का मुसाफ़िर' और 'सरमायादारी' जैसी नज़्में छपनी शुरू हुईं। 'साक़ी' के विशेषांक (सालनामे) में 'आवारा' छपी।
तरक़्क़ी-पसंदों में उस वक़्त एक बाग़ियाना जोश था। इंक़लाब का एक रूमानी और बचकाना तसव्वुर (कल्पना) था। अतीत के शानदार सरमाये (धरोहर) से पूरी तरह बग़ावत थी। तहज़ीब और अख़लाक़ घिसे-पिटे समझे जाने लगे थे। मजाज़ पर इन ख़यालात का गहरा असर हुआ। पुराने शायरों से वाक़फ़ियत और शुरुआती तालीम-ओ-तरबियत ने उन्हें पूरी तरह बाग़ी होने से बचा लिया। नारेबाज़ी और सियासी प्रोपेगैंडा उनके यहां भी है मगर बहुत कम। जोश से वह मुतास्सिर ज़रूर हैं मगर उनके नक़लची (मुक़ल्लिद) नहीं। फ़ैज़ ने ठीक कहा है कि वह इंक़लाब के ढिंढोरची नहीं। इस दौर की सबसे अच्छी नज़्म 'आवारा' है। यह एक नस्ल के दर्द और दाग़ की कहानी है। उसकी आरज़ू और जुस्तजू, उसकी महरूमी और सरशारी (मस्ती) की अलामत (प्रतीक) है। यहां ज़ाती तजुर्बात एक दर्द की दास्तान बन गए हैं।
1942 तक मजाज़ की सरशारी (मस्ती) का दौर रहा। इसके बाद यह नशा उतरने लगा। ज़िंदगी की सच्चाइयों (हक़ायक़) ने इंतक़ाम लिया। दोस्त जो शुरू में दिल खोलकर पज़ीराई (तारीफ़) करते थे, कुछ कन्नी काटने लगे। मजाज़ अब दूसरों पर निर्भर (तुफ़ैली) थे और शायरी से बहरहाल ज़ेहन की आग बुझे तो बुझे, पेट की आग तो नहीं बुझती। चुनांचे तंग आकर नौकरी की जुस्तजू की। आख़िरकार हार्डिंग लाइब्रेरी दिल्ली में एक जगह मिल गई। एक तरफ़ मुशायरों की मक़बूलियत और ऊंचे-ऊंचे घरानों की वाह-वाह थी, दूसरी तरफ़ एक क्लर्क की ज़िंदगी की परेशानियां। मजाज़ बेचारे का क्या क़सूर। एक ही वक़्त में आसमान पर परवाज़ और वहां से फ़ौरन धरती पर पटक दिया जाना, फिर आसमान की सैर और फिर पथरीली सच्चाइयों का बोझ, एक नाज़ुक मिज़ाज कमज़ोर दिल का नौजवान जिसके दिल पर कितने ही ज़ख़्म थे और जिसकी जेब ख़ाली थी, मगर जो तहज़ीब और शराफ़त के एक मेयार (स्तर) को भुला नहीं सकता था, कैसे बर्दाश्त करता।
चुनांचे दिमाग़ी असंतुलन (ख़लल-ए-दिमाग़) शुरू हुआ, बातें और बिना थके बातें करने का मर्ज़ पैदा हो गया। इनमें कुछ अपनी तारीफ़ थी, कुछ लतीफ़े थे, कुछ शेर-ओ-अदब पर उल्टी-सीधी बातें थीं। ख़ैर नैनीताल के क़याम से तबीयत कुछ संभली। तबीयत में एक ठहराव पैदा हुआ। यह फ़िक्र हुई कि रोटी तो किसी तरह कमा खाए मछंदर। चुनांचे बंबई का रुख़ किया। फ़िल्मी गानों से बहुत से शायर अच्छा-ख़ासा कमा लेते थे मगर मजाज़ इस दुनिया की कारोबारी ज़िंदगी और दुनियादारी (ज़माना-साज़ी) के लिए न बने थे। चुनांचे वहां भी नाकामी का मुंह देखना पड़ा। इस आलम में शराब एक पनाह बन गई। अब मजाज़ बिल्कुल पक्के शराबी (रिंद-ए-ख़राबाती) बन गए। मुशायरों में आते तो अक्सर बदमस्त होते। जो लोग शेर सुनने आते थे, उन्हें बदमस्ती के नज़ारे भी सहने पड़ते मगर वह स्वभाव से इतने सच्चे (मुख़्लिस), नेक, मुहब्बत करने वाले और उसूल वाले (वज़ादार) थे कि उनकी बदमस्ती से उन्हीं को नुक़सान पहुंचा। उन्होंने किसी को नुक़सान नहीं पहुंचाया।
1936 में मजाज़ अलीगढ़ से लखनऊ चले गए थे। मैं 1945 तक अलीगढ़ में रहा। डेढ़ साल के लिए रामपुर गया था। वहां से 1946 के मध्य में लखनऊ पहुंचा। इतने अरसे में मजाज़ से कभी-कभार ही मुलाक़ात हुई थी। इसके बाद लखनऊ में अक्सर मुलाक़ात होती। वह कॉफ़ी हाउस में ख़ास पाबंदी से आते थे। मैं कभी-कभार पहुंचता था। यूनिवर्सिटी के अदबी जलसों में छात्र (तुलबा) मजाज़ को बड़े शौक़ से बुलाते और वह उनकी दावत को कभी रद्द न करते। 1947 के इंक़लाब के बाद जो वाक़यात पेश आए, उनका असर मजाज़ पर भी हुआ। उन्होंने न तो आज़ादी को हर ख़्वाब की ताबीर (मंज़िल) समझा और न उसे झूठी आज़ादी क़रार दिया। जश्न-ए-आज़ादी में कहते हैं,
यह इंक़लाब का मुज़्दा है इंक़लाब नहीं
यह आफ़्ताब का परतव है आफ़्ताब नहीं
वह जिसकी ताब-ओ-तवानाई का जवाब नहीं
अभी वह सई-ए-जुनूं-ख़ेज़ कामयाब नहीं
यह इंतेहा नहीं आग़ाज़-ए-कार-ए-मर्दां है
वह बड़े दर्द से पूछते हैं,
सब्ज़ा-ओ-बर्ग-ओ-लाला-ओ-सर्व-ओ-समन को क्या हुआ
सारा चमन उदास है हाए चमन को क्या हुआ
मगर अब मजाज़ बहुत कम कहने लगे थे। शराब ने उनकी सेहत तबाह कर रखी थी। 1950 में अपनी ग़नूदगी (सुस्ती) से कुछ चौंके और 'फ़िक्र' जैसी नज़्म और 'जुनून-ए-इश्क़ अभी कम नहीं है' जैसी ग़ज़ल कही। इसके बाद वह ख़ासे संभले हुए थे। उन्हें यह एहसास हो चला था कि कोई संजीदा काम करना चाहिए। उर्दू में एम.ए. करने का इरादा था। उनके सारे दोस्तों (अहबाब) को ख़ुशी थी कि अब मजाज़ संतुलन की राह (राह-ए-एतेदाल) पर आ रहे हैं मगर क़िस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। अजमेर और दिल्ली के मुशायरों में और वहां की रंगीन महफ़िलों में शिरकत के बाद उनका दिमाग़ी तवाज़ुन बिगड़ गया और उन्हें उनके रिश्तेदारों (अइज़्ज़ा) ने रांची पहुंचा दिया।
रांची में तक़रीबन छह महीने रहने के बाद आए तो बिल्कुल ठीक थे। सुहैल अज़ीमाबादी उनके साथ थे। मुझसे मिलने आए तो कहने लगे, सुरूर साहब! अब की रांची में मैंने एक रिसर्च की है। शराब से नशा नहीं होता आदमी पागल हो जाता है।
शराब बिल्कुल छोड़ दी थी। उनके ग़ैर-ज़िम्मेदार दोस्त ज़िद भी करते तो वह मना कर देते थे। इसी ज़माने में उनकी बहन सफ़िया का एक लंबी बीमारी के बाद इंतिक़ाल हुआ। मजाज़ पर इसका बहुत गहरा असर हुआ। हफ़्तों घर से बाहर न निकले। सफ़िया के बच्चों का दिल बहलाते रहते थे मगर चंद महीने के बाद फिर शराब की कशिश हावी हो गई और इस बार वह इसमें बिल्कुल डूब गए।
जुलाई 1955 में रेडियो श्रीनगर के एक मुशायरे में शिरकत के लिए मैं भी गया और मजाज़ भी। दोस्तों ने मजाज़ की इस तरह देखभाल की जैसे किसी बहुत क़ीमती और नाज़ुक चीज़ की। हम लोग उन्हें गुलमर्ग और श्रीनगर के शाही बाग़ दिखाने ले गए थे। उन पर किसी चीज़ का असर न होता था। निशात और शालीमार में बहुत सारे फ़व्वारे हैं। इन फ़व्वारों में पानी इतने ज़ोर से चलता है कि अगर कोई नींबू फ़व्वारे के मुँह पर रख दिया जाए तो कुछ देर के लिए पानी के ज़ोर से हवा में टिक जाता है। एक दोस्त यह खेल कर रहे थे कि एक पंजाबी औरत ने कहा, अल्लाह दी क़ुदरत है। मजाज़ को इस जुमले में बहुत मज़ा आया। शालीमार और निशात के अनुभवों का निचोड़ मजाज़ के नज़दीक यह लतीफ़ा था।
मजाज़ से आख़िरी मुलाक़ात नवंबर के आख़िरी हफ़्ते में हुई। मैं अलीगढ़ आने वाला था। एक विदाई दावत में मजाज़ भी थे, कहने लगे, सुरूर साहब! यह बहुत अच्छा है कि आप अलीगढ़ जा रहे हैं, वहाँ जो बात है कहीं नहीं। मैं भी आऊँगा, मुझे 'नज़्र-ए-अलीगढ़' भी सुनना है जिसे यूनियन वालों ने अपना तराना बनाया है। ज़रा यह छात्रों का उर्दू कन्वेंशन हो ले तो मैं भी अलीगढ़ का इरादा करूँ। छात्र कन्वेंशन हुआ। मुशायरे में मजाज़ ने बड़े जोश से अपना कलाम सुनाया, दूसरे दिन इतनी शराब पी कि उनके दिमाग़ की नसें फट गईं। अलीगढ़ आने से पहले वह दूसरी दुनिया में पहुँच गए। यह है उर्दू के कीट्स की त्रासदी।
मजाज़ की शख़्सियत के बारे में भी अपने विचार बयान कर दूँ। मजाज़ सिर से पैर तक शायर था। ख़्वाबों की दुनिया का रहने वाला। ज़िंदगी की कड़वी सच्चाइयों का इलाज मजबूरन शराब में ढूँढता था। शुरुआती तालीम और तरबियत ने उसे शराफ़त, तहज़ीब, और अच्छे सामाजिक बर्ताव के कुछ पैमाने दिए थे। स्वभाव में इतनी मज़बूती न थी कि उनकी ख़ातिर या उन पैमानों की ख़ातिर जो एक शैक्षिक और साहित्यिक आंदोलन से जुड़ाव की वजह से उसने क़ुबूल कर लिए थे, वह मेहनत करता। वह रिंद (मस्तमौला) था। उसमें आशिक़ का जोश था। किसी योद्धा के किरदार जैसी मज़बूती न थी, उसकी शुरुआती तरबियत ने जो छाप दिल में बिठा दी थी, उसे वह मिटा न सका। नए रंग का जो नशा चढ़ गया था, वह उतर न सका, इस कशमकश ने उसे जीवन के संघर्ष में अपना रास्ता निकालने के बजाय नाकामी और निराशा के रास्ते पर लगा दिया मगर उसके किरदार की ख़ूबी यह है कि वह लोगों से चिढ़ने वाला, कड़वा या निराशावादी कभी नहीं हुआ। लगातार नाकामियों को झेलने या भुलाने की कोशिश करता रहा। कभी लतीफ़ों में, कभी शराब में, उसके दो-तीन लतीफ़े मुझसे सुनिए जो मेरे सामने हुए।
एक दफ़ा मजाज़ और जज़्बी लखनऊ में मेरे पास बैठे हुए थे कि उस दौर के एक मशहूर शायर मिलने आए। बातों-बातों में कहने लगे कि सुरूर साहब! सोचता हूँ शादी कर लूँ। मुझे ताज्जुब हुआ। मैं उन्हें शादीशुदा समझता था, फिर कहने लगे और सोचता हूँ किसी विधवा से करूँ। अब तक यह बातें सिर्फ़ मैं सुन रहा था क्योंकि मजाज़ और जज़्बी एक दूसरे से कानाफूसी कर रहे थे। मुझे यह गवारा न हुआ कि ऐसी मज़ेदार बातचीत में दूसरे शरीक न हों, इसलिए मैंने मजाज़ का ध्यान खींचते हुए कहा कि यह साहब शादी करने वाले हैं और किसी विधवा से शादी करने का ख़याल है। मजाज़ ने तपाक से कहा, हज़रत आप सोचिए नहीं, कर ही लीजिए, विधवा तो आपसे शादी के बाद वह हो ही जाएगी।
सलाम मछलीशहरी को एक ज़माने में लंबे-लंबे काव्यात्मक ख़त लिखने की धुन थी, सज्जाद ज़हीर और कृश्न चंदर को लिख चुके थे। कॉफ़ी हाउस में एक दफ़ा इसी का ज़िक्र था। एक निहायत छोटे क़द के आदमी थे भुवनेश्वर, ख़ुदा जाने अब कहाँ हैं। हिंदी के बहुत अच्छे लेखक, उर्दू भी ख़ूब जानते थे। किसी को ख़ातिर में कम लाते थे। उन्होंने कहा कि सलाम साहब! आप मेरे नाम ख़त कब लिख रहे हैं। मजाज़ ने कहा, तुम्हें इतना लंबा ख़त क्या लिखेंगे। एक पोस्टकार्ड डाल देंगे।
बक़रीद के मौक़े पर लखनऊ रेडियो से एक छोटा सा मुशायरा था। मजाज़ ने अरसे से कुछ न कहा था। मुशायरे के दिन उनसे पूछा। कहो भाई आज तो तुम्हारी क़ुर्बानी है, कहने लगे, सुरूर साहब! क़ुर्बानी नहीं झटका कहिए। आख़िर में मजाज़ का यह रंग बहुत फीका पड़ गया था मगर राख में से कभी-कभी चिंगारियाँ निकल ही आती थीं।
मजाज़ ने कभी कोई टोली नहीं बनाई, शोहरत के लिए उसने कोई जाल नहीं बिछाया, अपने समकालीनों में से हर एक से उसी स्तर पर मिलता रहा। उसके दोस्तों में हर विचारधारा और पंथ के आदमी थे। एक की बुराई दूसरे से करना उसकी आदत न थी। वह सबका दोस्त था, सिर्फ़ अपना दुश्मन था। माहौल ने उसके साथ संवेदनहीनता और बेपरवाही बरती मगर उसने माहौल की शिकायत भी नहीं की। उसमें बड़ा बड़प्पन था। उसने किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया। नशे के आलम की बात दूसरी है। इस आलम में अक्सर लोग बर्दाश्त के बाहर हो जाते हैं। आख़िर में मजाज़ की भी यही हालत हो गई थी, मगर नशे में एक दफ़ा जो कुछ उसने किया मैं भूल नहीं सकता।
हुआ यूँ कि डॉक्टर अलीम, एहतिशाम और मैं एक उर्दू कॉन्फ़्रेंस में शिरकत के लिए पटना गए, मजाज़ भी साथ थे। एक डिब्बे में सिर्फ़ तीन बर्थ ख़ाली थीं। मजाज़ को दूसरे डिब्बे में जाना पड़ा। जल्द ही लौट आए, मैंने पूछा, क्या हुआ, कहने लगे, वहाँ एक सरदार जी कृपाण लिए मेरा इंतज़ार कर रहे थे। इसलिए मैंने शानदार तरीक़े से पीछे हटने में ही भलाई समझी, और फ़र्श पर बिस्तर बिछा कर लेट गए।
पटना पहुँचे तो सब एक ही होटल में ठहराए गए, एक कमरे में मैं और एहतिशाम थे। बग़ल के कमरे में पंडित कैफ़ी थे। उसके बाद के कमरे में मजाज़ और जज़्बी थे। रात को सब सोने लेटे ही थे कि पंडित जी के कमरे से शोर उठा अरे दौड़ियो, बचाइयो। यह मार डालता है। हम लोग घबरा कर दौड़े तो देखा कि मजाज़ नशे में पंडित जी के पैर ज़ोर-ज़ोर से दबा रहे हैं और कह रहे हैं कि आप बुज़ुर्ग हैं। आपकी ख़िदमत में ही सौभाग्य है। पंडित जी चीख़ रहे थे कि हाय मैं मरा, बड़ी मुश्किल से मजाज़ को अलग किया। सुबह हुई तो अब मजाज़ पंडित जी के सामने नहीं आते। आख़िर पंडित जी ने गले से लगाया और कहा कि मजाज़ तुमसे उर्दू शायरी की बड़ी उम्मीदें जुड़ी हैं। तुम्हारे ख़ुलूस (सच्चे प्रेम) से मैं बड़ा प्रभावित हुआ मगर ख़ुलूस में तुमने मेरा काम ही तमाम कर दिया होता। भाई अपने आप को सँभालो। तुम्हें अभी बहुत कुछ करना है। हम सबकी आँखें भर आईं।
मज़ाज़ के पास ज़िंदगी और अदब का एक ख़ासा साफ़ नज़रिया था। उसने न तो अध्ययन से इसे निखारा, न ज़िंदगी की आग में कूद कर इसे गुलज़ार बनाया। वह बड़े हसीन ख़्वाब देखता था। कुछ बड़ी सच्चाइयों का भी उसे एहसास था मगर ख़्वाबों के इस रसिया को जब सच्चाइयों ने चूर-चूर कर दिया तो उसने पलट कर कोई वार नहीं किया। ख़ामोशी से हथियार डाल दिए, इसी वजह से मैं उसे रोमानियत का शहीद कहता हूँ।
आम तौर पर रोमानियत के मायने हुस्न-ओ-इश्क़ की बातों के लिए जाते हैं, दरअसल यह कल्पना-परस्ती है। यूँ तो अदब ज़िंदगी की काल्पनिक प्रस्तुति है मगर जब कल्पना की लय इतनी बढ़ जाए कि सच्चाइयों या अक़्ल का दामन हाथ से छूट जाए तो रोमानियत वजूद में आती है। उर्दू शायरी में रोमानियत की लहर सबसे पहले 'अदब-ए-लतीफ़' के पैरोकारों में मिलती है। इसके बाद शीरानी के यहाँ। अख़्तर शीरानी और मज़ाज़ में ख़ासी समानता है मगर अख़्तर के यहाँ चढ़ती जवानी के इश्क़ की तड़प और दर्द-ओ-पीड़ा है। महबूब की तस्वीर सीने से लगा कर मर जाने का जोश है। मज़ाज़ की रोमानियत में इंक़लाब के ख़्वाब भी शामिल हैं। मज़ाज़ की रोमानियत कुछ तो जोश की तरह बाग़ियाना गरज-चमक में ज़ाहिर होती है मगर इसमें भी वह अपने अंदाज़ से नहीं हटते। दूसरे वह कुछ समाजी सच्चाइयों का भी गहरा एहसास रखते हैं और उन्हें शेर में बयान कर सकते हैं। फिर मज़ाज़ के लहज़े में अख़्तर शीरानी के समर्पण और दीवानगी के साथ-साथ संगीतात्मकता और मिठास कुछ ज़्यादा है।
जोश की भव्यता और ज़ोर में कठोरता का एहसास होता है और उनके यहाँ असाधारण रचनात्मक क्षमता के बावजूद ऊँच-नीच भी है। मज़ाज़ के यहाँ एक तालमेल है। जोश एकांत में भी बहुत ऊँची आवाज़ से बातें करते हैं लेकिन मज़ाज़ भरी महफ़िल में भी मनमोहक नर्मी से अच्छी बात कह देता है।
दरअसल मज़ाज़ की शायरी पर निष्पक्ष समीक्षा अभी मुमकिन नहीं है, इसलिए मैं इसकी कोशिश भी नहीं करूँगा। हाँ, मज़ाज़ की अदबी अहमियत के बारे में अपने विचार बयान करना ज़रूरी समझता हूँ।
पहली बात तो यह है कि अपनी पीढ़ी में मज़ाज़ के यहाँ क्लासिकल कवियों के अंदाज़-ए-बयान की गरिमापूर्ण सादगी मिलती है। दूसरे उसके यहाँ शब्दों की शुद्धता और ज़बान की नर्मी और नज़ाकत का एहसास भी समकालीनों से कुछ ज़्यादा ही है। मज़ाज़ ने दिल्ली के माहौल और फ़ानी की संगत से ख़ामोश असर लिया है। यह असर उसके यहाँ बड़ी ख़ूबी से ज़ाहिर होता है। तीसरी अहम बात यह है कि मज़ाज़ के यहाँ रूपक और उपमाएँ एक रचनात्मक दिमाग़ ज़ाहिर करते हैं। मज़ाज़ की शुरू की नज़्में जैसे 'नुमाइश', 'नज़्र-ए-ख़ालिदा', 'इंक़लाब' और 'रात और रेल' इसी विशेषता की वजह से क़ाबिल-ए-तारीफ़ बन जाती हैं।
'नुमाइश' में एक रंगीन माहौल का चित्रण साहित्यिक कारीगरी का हुस्न रखता है। 'इंक़लाब' में बचपना है मगर इसके बावजूद अंदाज़-ए-बयान में ज़ोर और प्रभाव है। 'रात और रेल' सौंदर्य-सृजन की अच्छी मिसाल है। इसमें विकास और समाज के लफ़्ज़ तो तावीज़ के तौर पर इस्तेमाल होते हैं मगर नज़्म में बड़े सुंदर और नर्म शब्दों में रेल की रफ़्तार और उसके नित-नए माहौल को क़लमबंद कर दिया है। 'नज़्र-ए-ख़ालिदा' भी मज़ाज़ की कामयाब नज़्मों में से है। इसमें ख़ालिदा ख़ानम की पूरी शख़्सियत के समंदर को मज़ाज़ ने मिसरे के कूज़े में बंद कर लिया है।
रूह-ए-इशरत-गाह-ए-साहिल, जान-ए-तूफ़ान-ए-अज़ीम
इसी तरह 'रात और रेल' में यह शेर देखिए,
तेज़ झोंकों में वो छम-छम का सरोद-ए-दिल-नशीं
आँधियों में मेह बरसने की सदा आती हुई
नौनिहालों को सुनाती मीठी-मीठी लोरियाँ
नाज़नीनों को सुनहरे ख़्वाब दिखलाती हुई
राशा-बर-अंदाम करती अंजुम-ए-शब-ताब को
आशियाँ में ताइर-ए-वहशी को चौंकाती हुई
डालती बे-हिस चट्टानों पर हिक़ारत की नज़र
कोह पर हँसती फ़लक को आँख दिखलाती हुई
मज़ाज़ की चौथी विशेषता यह है कि उसने नौजवानों के संकल्प, सरफ़रोशी, जीवन के जोश, क़लंदराना आन-बान, मस्तों जैसी हिम्मत और निडर शौक़ को हुस्न के ग़ाज़े (सौंदर्य प्रसाधन) के तौर पर नहीं, बल्कि जीवन के बाग़ को सजाने के लिए भी इस्तेमाल किया है। एक तरफ़ वह नौजवानों में संघर्ष का एक जोश पैदा करना चाहता है। दूसरी तरफ़ महिलाओं को भी जीवन के युद्धक्षेत्र में शामिल होने की दावत देता है। वह नौजवानों से कहता है,
जो हो सके हमें पामाल करके आगे बढ़
न हो सके तो हमारा जवाब पैदा कर
बहे ज़मीं पे जो मेरा लहू तो ग़म मत कर
इसी ज़मीं से महकते गुलाब पैदा कर
तू इंक़लाब की आमद का इंतज़ार न कर
जो हो सके तो अभी इंक़लाब पैदा कर
नौजवान ख़ातून से कहता है,
सिनानें खींच ली हैं सरफिरे बाग़ी जवानों ने
तू सामान-ए-जराहत अब उठा लेती तो अच्छा था
तेरे माथे पे ये आँचल बहुत ही ख़ूब है लेकिन
तू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था
'पर्दा और इस्मत' में इरशाद होता है,
जो ज़ाहिर न हो वो लताफ़त नहीं है
जो पिन्हाँ रहे वो सदाक़त नहीं है
ये फ़ितरत नहीं है मशक़्क़त नहीं है
कोई और शय है ये इस्मत नहीं है
क़सम शोख़ी-ए-इश्क़-ए-संजोगता की
क़सम जोन के अज़्म-ए-सब्र-आज़मा की
क़सम ताहिरा की, क़सम ख़ालिदा की
कोई और शय है ये इस्मत नहीं है
मज़ाज़ दरअसल हुस्न का पुजारी है। यूँ तो वह इंक़लाब की लैला का भी मजनूँ है मगर हुस्न की हर अदा का भेद जानने वाला है। उसकी पूजा में आशिक़ का जज़्बा और जुनून है। हुस्न उसके लिए सब कुछ है। उसने हुस्न को हर हाल में देखा, ढूँढा, चाहा और पाया है। इस अंतर्दृष्टि ने उसके अशआर में एक सरमस्ती और नशा भर दिया है। शब्दों में जादू पैदा कर दिया है और अशआर को पिघला हुआ लावा बना देता है। ये अशआर मुलाहिज़ा हों,
हर साँस में एहसास-ए-फ़रावाँ की कहानी
ख़ामोशी-ए-महजूब में एक सैल-ए-मआनी
जज़्बात के तूफ़ाँ में है दोशीज़ा जवानी
छलके तेरी आँखों से शराब और ज़्यादा
महकें तेरे आरिज़ के गुलाब और ज़्यादा
अल्लाह करे ज़ोर-ए-शबाब और ज़्यादा
वो इक मरमरीं हूर ख़ुल्द-ए-बरीं की
वो ताबीर आज़र के ख़्वाब-ए-हसीं की
वो तस्कीन-ए-दिल थी वो सुकून-ए-नज़र थी
निगार-ए-शफ़क़ थी, जमाल-ए-सहर थी
बीमार के क़रीब ब-सद-शान-ए-एहतियात
दिल-दारी-ए-नसीम-ए-बहाराँ लिए हुए
रुख़्सार पर लतीफ़ सी इक मौज-ए-सरख़ुशी
लब पर हँसी का नर्म सा तूफ़ाँ लिए हुए
लब-ए-गुल-रंग-ओ-हसीं, जिस्म-ए-गुदाज़-ओ-सीमीं
शोख़ी-ए-बर्क़ लिए, लर्ज़िश-ए-सीमाब लिए
नर्म सोफ़े गोद में फ़िरदौस-ए-रानाई लिए
ज़ुल्फ़ के ख़म मरमरीं शानों की बरनाई लिए
क़हक़हे जिनमें सबा का राग सय्यारों के गीत
नुक़रई नय की सदा जन्नत के मह-पारों के गीत
बाम-ओ-दर पर इक तबस्सुम था फ़िज़ा गुल-रंग थी
जुम्बिश-ए-मिज़्गाँ धड़कते दिल से हम-आहँग थी
मेरे नज़दीक मज़ाज़ की बेहतरीन नज़्में 'आवारा', 'ख़्वाब-ए-सहर' और 'नज़्र-ए-अलीगढ़' हैं। 'आवारा' में रोमानियत की पूरी दर्द भरी दास्तान आ गई है और इस दास्तान में एक पूरी पीढ़ी की कहानी और जादू की त्रासदी है। दृश्यों का हुस्न दिल में यूँ चुटकियाँ लेता है,
झिलमिलाते क़ुमक़ुमों की राह में ज़ंजीर सी
रात के हाथों में दिन की मोहनी तस्वीर सी
मेरे सीने पर मगर चलती हुई शमशीर सी
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
फिर वो टूटा इक सितारा फिर वो छूटी फुलझड़ी
जाने किसकी गोद में आई ये मोती की लड़ी
हूक सी सीने में उट्ठी चोट सी दिल पर पड़ी
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
इस आग का भड़कना देखिए,
दिल में इक शोला भड़क उठा है आख़िर क्या करूँ
मेरा पैमाना छलक उठा है आख़िर क्या करूँ
ज़ख़्म सीने का महक उठा है आख़िर क्या करूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
'ख़्वाब-ए-सहर' में कमाल की सादगी के साथ अपनी बात कही है,
ज़ेहन-ए-इंसानी ने अब औहाम के ज़ुल्मात में
ज़िंदगी की सख़्त तूफ़ानी अंधेरी रात में
कुछ नहीं तो कम से कम ख़्वाब-ए-सहर देखा तो है
जिस तरफ़ देखा न जाता था उधर देखा तो है
'नज़्र-ए-अलीगढ़' में कमाल के हुस्न और जादू के साथ एक तालीमी इदारे की तहज़ीबी अज़मत (सांस्कृतिक गरिमा) का तराना गाया है,
जो ताक़-ए-हरम में रौशन है वो शमा यहाँ भी जलती है
इस दश्त के गोशे-गोशे से इक जू-ए-हयात उबलती है
हर शाम है शाम-ए-मिस्र यहाँ हर शब है शब-ए-शीराज़ यहाँ
है सारे जहाँ का सोज़ यहाँ है सारे जहाँ का साज़ यहाँ
आ आ के हज़ारों बार यहाँ ख़ुद आग भी हम ने लगाई है
फिर सारे जहाँ ने देखा है ये आग हमीं ने बुझाई है
जो अब्र यहाँ से उठेगा वो सारे जहाँ पर बरसेगा
हर जू-ए-रवाँ पर बरसेगा हर कोह-ए-गिराँ पर बरसेगा
हर सर्व-ओ-समन पर बरसेगा, हर दश्त-ओ-दमन पर बरसेगा
ये अब्र हमेशा बरसा है, ये अब्र हमेशा बरसेगा
मजाज़ की नज़्मों के मुक़ाबले में उनकी ग़ज़लों की अहमियत कम है, मगर उनमें भी हमें शौक़ की बेबाकी, जुनून का बुलंद हौसला, जज़्बे की तस्वीर-कशी (चित्रण), दर्द की दास्तान, यानी बहुत कुछ मिलता है। ये शेर देखिए,
हम अर्ज़-ए-वफ़ा भी कर न सके, कुछ कह न सके कुछ सुन न सके
याँ हम ने ज़बाँ ही खोली थी वाँ आँख झुकी शर्मा भी गए
ये रंग-ए-बहार-ए-आलम है क्यों फ़िक्र है तुझ को ऐ साक़ी
महफ़िल तो तेरी सूनी न हुई, कुछ उठ भी गए, कुछ आ भी गए
ऐ शौक़-ए-नज़ारा क्या कहिए नज़रों में कोई सूरत ही नहीं
ऐ ज़ौक़-ए-तसव्वुर क्या कीजे हम सूरत-ए-जानाँ भूल गए
सब का तो मुदावा कर डाला, अपना ही मुदावा कर न सके
सब के तो गरेबाँ सी डाले, अपना ही गरेबाँ भूल गए
दिल धड़क उठता है ख़ुद अपनी ही हर आहट पर
अब क़दम मंज़िल-ए-जानाँ से बहुत दूर नहीं
क्या क्या हुआ है हम से जुनूँ में न पूछिए
उलझे कभी ज़मीं से कभी आसमाँ से हम
बारहा ऐसा हुआ है याद तक दिल में न थी
बारहा मस्ती में लब पर उन का नाम आ ही गया
शौक़ के हाथों ऐ दिल-ए-मुज़्तर क्या होना है क्या होगा
इश्क़ तो रुस्वा हो ही चुका है हुस्न भी क्या रुस्वा होगा
वाइज़-ए-सादा-लौह से कह दो छोड़े उक़्बा की बातें
इस दुनिया में क्या रखा है इस दुनिया में क्या होगा
जुनून-ए-शौक़ अब भी कम नहीं है
मगर वो आज भी बरहम नहीं है
बहुत मुश्किल है दुनिया का सँवरना
तेरी ज़ुल्फ़ों का पेच-ओ-ख़म नहीं है
अभी बज़्म-ए-तरब से क्या उठूँ मैं
अभी तो आँख भी पुरनम नहीं है
बा-ईं सैल-ए-ग़म ओ सैल-ए-हवादिस
मेरा सर है कि अब भी ख़म नहीं है
ये बिजली चमकती है क्यों दम-ब-दम
चमन में कोई आशियाना भी है
ज़माने से आगे तो बढ़िए मजाज़
ज़माने को आगे बढ़ाना भी है
जैसा कि मैंने शुरू में कहा था, मजाज़ की शायरी पर बेलाग (निष्पक्ष) टिप्पणी तो अभी मुमकिन नहीं है, मगर उनकी शख़्सियत और शायरी के बारे में जो छाप दिलों में बैठ गई है, उसकी कुछ झलक तो पेश की जा सकती है। मजाज़ की ज़िंदगी और शायरी में रूमानियत के बहाव की हर लहर मिलती है। 'तिफ़्ली के ख़्वाब' से लेकर 'एतेराफ़' तक एक काफ़ी सिलसिलेवार दास्तान है। मजाज़ की रूमानियत में जो जानदार, सेहतमंद और बाशऊर (समझदार) हिस्सा है, उसकी क़द्र-ओ-क़ीमत हमेशा क़ायम रहने वाली है, लेकिन उनकी पूरी शायरी भी हमारे लिए गहरी समझ और सीख का सामान रखती है। वह एक शहाब-ए-साक़िब (टूटते तारे) की तरह हमारे अदबी उफ़ुक़ (साहित्यिक क्षितिज) पर उभरा था। उसकी रोशनी आँखों को बहुत भाने वाली थी। देखते-देखते सस्ती दाद, तबीयत की कमज़ोरी और ख़्वाबों की मौजूदा पस्त और कारोबारी दुनिया में कोई क़ीमत न होने की वजह से इस शोले को ज़माने की नज़र खा गई। मगर उसने हमें दर्द-ओ-दाग़, आरज़ू और जुस्तुजू (तलाश) का जो ख़ज़ाना दिया है, उससे हम कभी बेनियाज़ (बेपरवाह) नहीं हो सकते।
Additional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.