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मबादियात-ए-फ़साहत

दत्तात्रिया कैफ़ी


Translated By: Rekhta Editor

दत्तात्रिया कैफ़ी

मबादियात-ए-फ़साहत

दत्तात्रिया कैफ़ी

MORE BYदत्तात्रिया कैफ़ी

    हर ज़माने में कुछ लोग इस ख़याल के होते हैं कि क़ायदा और क़ानून फ़ुज़ूल हैं। उनके विचार में अभ्यास और आदत सब कुछ सिखा देती है। जन्मजात प्रतिभा का यह जुनून दिमाग़ों पर आज-कल हद से ज़्यादा हावी है। लेकिन देखा जाता है कि जो लोग साहित्य के मामले में कट्टर बुत तोड़ने वाले हैं, वे पुराने बुत तोड़कर अपने नए बुत बनाते हैं और लोगों से उनकी पूजा करने की मांग करते हैं।

    इसमें कोई शक नहीं कि उरूज़ (छंद-शास्त्र) का हर जानकार अच्छा शायर और सर्फ़ (व्याकरण) का हर जानकार अच्छा गद्यकार नहीं होता, लेकिन इससे उरूज़ और सर्फ़ से वाक़िफ़ होने की ज़रूरत ख़त्म नहीं हो जाती। सभ्य समाज की व्यस्तता के हर क्षेत्र में नियम और क़ानून की ज़रूरत मानी हुई है। हाँ, कला के नियम अक्सर आख़िरी शब्द या अंतिम प्रमाण पर आधारित नहीं हुआ करते। मक़सद और लक्ष्य अल्लामा सक्काकी का भी वही था जो आज किसी का हो सकता है। कार्यप्रणाली में चाहे मतभेद हो, लेकिन इससे क़ायदे का वजूद ख़त्म और रद्द नहीं हो सकता। परिष्कृत रुचि, साफ़ ज़ेहन, तेज़ कल्पना और सच्चे कान पुराने नियमों में सुधार और संशोधन ज़रूर करेंगे, मगर क़ायदे से पूरी तरह इनकार नहीं कर सकते।

    शब्दों की बेजोड़ बंदिश, तार्किकता की कमी, रचना के नियमों का एहसास न होना, शब्दों की सुंदर तरतीब का अभाव, नवीनता और ताज़गी की कमी, कल्पना का नीचापन और खोखलापन वग़ैरह, रचना के ये दोष अभ्यास से बहुत हद तक दूर तो हो जाते हैं, लेकिन उस आसानी और भरोसे के साथ नहीं, जो क़ायदे से मदद लेने पर होता है। और ये वे दोष हैं जो सुनने वाले के ज़ेहन को बोलने वाले या लेखक के ज़ेहन के क़रीब नहीं पहुँचने देते। पुराने विद्वानों ने कलाम (रचना) के जो दोष गिनाए हैं, मसलन तनाफ़ुर-ए-कलमात (शब्दों का कानों को खटकना), ज़ोफ़-ए-तालीफ (रचना की कमज़ोरी), ताक़ीद-ए-लफ़्ज़ी व मानवी (शाब्दिक और अर्थगत उलझाव), हश्व-ओ-ज़ियादत (फ़ालतू शब्द), शुतुर-गुर्बा (बेमेल बातें), निंदा का पहलू, तवाली-ए-इज़ाफ़त (लगातार 'का/की/के' का प्रयोग) वग़ैरह, ये सब उन बातों में एक तरह से मौजूद हैं जिनका ज़िक्र अभी आया है। इन्हें चाहे आप अतिरिक्त दोष समझें, ये सब वे दोष हैं जो फ़साहत (वाक्पटुता/स्पष्टता) में बाधा डालते हैं। कलाम के प्रभाव के ख़िलाफ़ हैं। इनसे बचना मार्गदर्शन के बिना नामुमकिन होता है। मार्गदर्शन का स्रोत उस्ताद का सुधार हो या कला की किताबों का अध्ययन, बात एक ही है।

    पुराने विद्वानों ने जो क़ायदे इल्म-ए-मानी (अर्थ-विज्ञान) के तहत फ़साहत से संबंधित बनाए, उनका लक्ष्य ज़्यादातर कलाम की शाब्दिक हैसियत मालूम होता है, न कि उसकी अर्थगत हैसियत। क़ायदा वही फ़ायदेमंद और पुख़्ता होता है जो वैज्ञानिक या इल्मी उसूलों की कसौटी पर पूरा उतरे। इसे स्पष्ट करने के लिए मैं एक निहायत मामूली बात पेश करता हूँ। वह है संज्ञा और विशेषण की तरतीब, यानी सिफ़त (विशेषण) और मौसूफ़ (विशेष्य) को आगे-पीछे रखने की तरफ़ आपका ध्यान खींचता हूँ।

    सवाल यह है कि कलाम में सिफ़त से पहले मौसूफ़ लाया जाए या इसका उल्टा? फ़्रांसीसी और फ़ारसी ज़बानों में मौसूफ़ पहले लाया जाता है और सिफ़त उसके बाद, अंग्रेज़ी और उर्दू में इसके उलट होता है। मिसाल के लिए, 'अस्प-ए-मुश्की' को लीजिए। यह तो हुई फ़ारसी की तरकीब। उर्दू में कहेंगे मुश्की (काला) घोड़ा। सतही नज़र से देखने पर इन दोनों वाक्यों में कोई फ़र्क़ नहीं पाया जाएगा, लेकिन साइंस की नज़र में फ़र्क़ मौजूद है, और बड़ा फ़र्क़ है। मनोविज्ञान के अनुसार इस दो शब्दों वाले वाक्य का विश्लेषण इस तरह होगा। जब अस्प-ए-मुश्की या घोड़ा मुश्की कहा गया तो सुनने वाले ने पहले 'घोड़ा' ग्रहण किया, यानी सुनने वाले का ज़ेहन घोड़े, महज़ घोड़े की तरफ़ तुरंत चला गया और चूँकि घोड़े की कोई ख़ासियत उसके इल्म में नहीं आई है, इसलिए किसी भी घोड़े की शक्ल ज़ेहन पर उभर आती है।

    ज़्यादातर सुनने वाले का ज़ेहन कुमैत (लाल-भूरे) या सब्ज़ा (सफ़ेद-भूरे) घोड़े की तरफ़ जाएगा क्योंकि इन रंगों के घोड़े अमूमन पाए जाते हैं और रोज़मर्रा देखने में आते हैं। नतीजा यह हुआ कि जब लफ़्ज़ मुश्की जोड़ा गया तो कल्पना की रफ़्तार में रुकावट डाली गई। या तो कुमैत घोड़े का नक़्श कल्पना के पटल से मिटाकर उसकी जगह मुश्की घोड़े का नक़्श खींचा गया, या अगर कुमैत घोड़े का नक़्श अभी उभरा नहीं था तो उस उभार की प्रक्रिया को रोक दिया गया। इन दोनों में से कोई भी स्थिति पैदा हो, इनमें से हर एक रुकावट का ही परिणाम है। इसके उलट अगर सिफ़त को पहले और मौसूफ़ को बाद में लाएँ, यानी मुश्की घोड़ा कहें तो ग़लतफ़हमी और रुकावट की गुंजाइश नहीं रहती। मुश्की एक अमूर्त विशेषण है और किसी ख़ास छवि का निर्माण नहीं करता। वह ज़ेहन को उस ख़ास वस्तु की कल्पना के लिए तैयार कर देता है जो मुश्की रंग का है और ध्यान लगा रहता है जब तक कि वह वस्तु मालूम नहीं हो जाती।

    इन दो शब्दों की इस तरतीब से, यानी सिफ़त को मौसूफ़ से पहले लाने से ज़ेहन के काम के साथ कोई रुकावट नहीं हुई, न ग़लतफ़हमी की गुंजाइश पैदा हुई। लिहाज़ा नतीजा यह निकला कि यह तरतीब ज़्यादा असरदार यानी फ़सीह (स्पष्ट) है, इसी तरह जवान और मर्द की तरतीब पर नज़र डालिए। अगर 'मर्द-ए-जवान' कहा जाए तो पहले मर्द की सूरत ज़ेहन में बैठेगी और ज़ेहन भटकेगा। इस तलाश में कि मर्द किस क़िस्म का है? जवान है, बूढ़ा है या अधेड़ है, या ग़लतफ़हमी का शिकार होगा जब तक कि जवान का लफ़्ज़ ग्रहण न करे। लेकिन जवानमर्द कहने से ये दिक़्क़तें दूर हो जाती हैं और ज़ेहन किसी क़िस्म की उलझन और दुविधा में नहीं पड़ता। इसे मैं कहता हूँ क़ायदे का साइंटिफ़िक उसूल पर आधारित होना। शायर ने ज़िंदगी और मौत की हक़ीक़त अपने अंदाज़ में इस तरह बयान की है:

    ज़िंदगी क्या है अनासिर में ज़ुहूर-ए-तरतीब

    मौत क्या है इन्हीं अज्ज़ा का परेशाँ होना

    इसी तरह समझ लीजिए कि फ़साहत क्या है, कलाम के हिस्सों में सुंदर तरतीब है और इन्हीं हिस्सों का बिखर जाना फ़साहत की कमी है।

    कहने का मक़सद यह था कि संस्कृति की अन्य संस्थाओं की तरह ज़बान भी नियमों और क़ायदों की मोहताज है। पूर्वज न तो इस हक़ीक़त से बेख़बर थे और न बेपरवाह। परिस्थितियों और ज़रूरत के मुताबिक़ उन्होंने रचना और बातचीत की कला के क़ायदे संकलित किए। अब वर्तमान युग में अगर ज़बान का ढाँचा और ज़माने की ज़रूरतें कुछ और हैं, नज़रिया और लक्ष्य बदल गया है, ज़्यादा व्यापक हो गया है, कलाम और रचना का मक़सद भी परिवर्तनशील है, लेखक का इरादा भी वह नहीं जो पहले था, तो क्या पुराना नियम बीते हुए कल का कैलेंडर हो गया? यह एक क़िस्म की ख़ुशफ़हमी है और क्या कहूँ। गणित और खगोल-शास्त्र के विद्वान से पूछिए, वह किस तरह पुराने कैलेंडर को जान से प्यारा बनाकर रखता है। ताज़ा अवलोकनों और अनुसंधानों से उस पर हाशिए (टिप्पणियाँ) चढ़ाता है और उसकी मदद से नया कैलेंडर तैयार करता है।

    इसी तरह ज़बान के इन क़ायदों और नियमों को सामने रखकर आप रचना और बातचीत के नए क़ायदे बना सकते हैं और ज़बान के नियमों को तार्किकता और साइंस का जामा पहनाकर उससे हर काम ले सकते हैं। जाड़ों में गर्मियों के कपड़े फेंक नहीं दिए जाते। उनमें से कुछ तो गर्म कपड़ों के नीचे भीतरी कपड़े के तौर पर इस्तेमाल होते हैं और कुछ नमूने के लिए दर्ज़ी को दिए जाते हैं कि वह इस ठंडी शेरवानी के मुताबिक़ गर्म कपड़े की शेरवानी तैयार कर दे। आम इंसानी ज़िंदगी का यह उसूल सभ्यता और संस्कृति के तमाम क्षेत्रों पर लागू होता है। जो लोग इसे नज़रअंदाज़ करते हैं, वे सुधारक नहीं बल्कि विनाशकारी और हंगामा खड़ा करने वाले हैं।

    सवाल के दूसरे पहलू पर भी नज़र डालना ज़रूरी है। जहाँ उर्दू की दुनिया में ऐसे लोग पैदा हो गए हैं जो किसी क़ायदे या नियम के पाबंद ही नहीं, मनमानी का भूत उनके सिर पर ऐसा सवार है कि उनकी गर्दन किसी उसूल और हिदायत के सामने झुकने को तैयार नहीं। वहीं ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो पुराने नियमों और कार्यप्रणाली में ज़रा से भी बदलाव और सुधार को पाप और धर्म-त्याग के बराबर समझते हैं। उनका साहित्यिक ज़ुल्म और ज़बरदस्ती राजनीतिक ज़ुल्म और ज़बरदस्ती से कम नहीं। ये साहित्यिक ज़िद्दी और कठोर लोग भी ज़बान के हक़ में एक तरह की पुरानी बीमारी हैं। इनमें और उनमें वही फ़र्क़ है जो टीबी और प्लेग में है। दोनों साहित्य की जान के दुश्मन हैं।

    इन सभी वास्तविक बातों को ध्यान में रखकर उर्दू की तरक़्क़ी और ज़बान के फैलाव की माँग है कि पुराने नियमों का जायज़ा लिया जाए। ज़माने के बदलाव और मौजूदा ज़रूरतों का ख़याल रखा जाए। भविष्य को भी नज़रअंदाज़ न किया जाए। परंपरा और प्रमाण के मुक़ाबले में तर्क और विज्ञान को जगह दी जाए और ऐसा नियम तैयार किया जाए जो ख़ास और आम लोगों में मक़बूल होने की हैसियत रखता हो। इन बातों को ध्यान में रखकर मैंने आज के लिए यह विषय चुना है यानी ''मबादियात-ए-फ़साहत'' (फ़साहत के मूल सिद्धांत) और मैं समझता हूँ कि हैदराबाद इसके लिए बहुत मुनासिब जगह है। वह स्थानीय भावनाओं से मुक्त है। दूसरे सूबों की उथल-पुथल और उर्दू ज़बान के ख़िलाफ़ भटकाव से महफ़ूज़ है।

    जो कुछ अर्ज़ किया गया और जो अब गुज़ारिश की जाएगी, वह उन लोगों को संबोधित है जिनके दिल में उर्दू की तरक़्क़ी और फैलाव की लगन है। जो ज़रूरी सुधार और बदलाव को एक नेक काम मानते हैं। जिन हज़रात को इन बातों से दिलचस्पी नहीं और जो अपनी नाक़ाबिलियत को आज़ादी और बेक़ायदगी का शानदार लिबास पहनाना चाहते हैं, उनकी तरफ़ मेरी बात का रुख़ नहीं है। यह शेर उनके हाल के मुताबिक़ है:

    होती नहीं क़ुबूल दुआ तर्क-ए-इश्क़ की

    दिल चाहता न हो तो ज़बाँ में असर कहाँ

    फ़साहत का पुराना नज़रिया

    अक्सर सुनने में आता है कि फ़लाँ शख़्स अफ़सह-उल-फ़ुसहा (सबसे बड़ा फ़सीह) और अब्लग़-उल-बुलग़ा (सबसे बड़ा बलीग़) है। यानी उसका कलाम फ़साहत (स्पष्टता) की जान और बलाग़त (प्रभावशीलता) की रूह है। आम लोग कहने को तो कह देते हैं लेकिन फ़साहत और बलाग़त का असली मतलब उनके ज़ेहन से उतना ही दूर होता है जितना उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव। वे आसान, सरल और मुहावरेदार को फ़साहत की तारीफ़ समझते हैं और भारी-भरकम, ऊँचे स्वर वाले, पेचीदा और मुश्किल कलाम को बलीग़ मानते हैं। लेकिन ख़ास लोगों के ज़ेहन में सिर्फ़ हक़ीक़त और मजाज़ (वास्तविकता और रूपक), तश्बीह और इस्तिआरा (उपमा और रूपक), तारीज़ और किनाया (व्यंग्य और संकेत) और ईजाज़ और इत्नाब (संक्षेप और विस्तार) वग़ैरह सनाए-बदाए (अलंकार) ही बलाग़त का दायरा होते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि बलाग़त के लिए फ़साहत पहली शर्त है।

    एक दार्शनिक का कथन है कि दुनिया में सजावट को उपयोगिता पर ग़लत तरजीह दी जाती है। समझ की यह कमी साहित्य पर भी उसी तरह हावी है जिस तरह सभ्यता और संस्कृति के दूसरे हिस्सों पर। कलाम में शुद्धता और प्रभाव का ख़याल कम रखा जाता है। सजावट और दिखावे पर ज़्यादातर नज़र रहती है। सही रुचि की सलामती और ज़बान की सलाहियत को सुरक्षित रखने के लिए पुराने ज़माने में अदीबों (साहित्यकारों) ने क़ायदे तय किए और इंशा (लेखन) का दर्शन तैयार किया। उर्दू में ये क़ायदे फ़ारसी से आए और फ़ारसी में अरबी से। लेकिन असली स्रोत अरब वालों के दिलो-दिमाग़ की उपज नहीं था बल्कि अहल-ए-अजम (ग़ैर-अरब लोगों) का था। यह एक बहुत दिलचस्प नज़ारा है कि उन बुज़ुर्गों ने जो अरब मूल के नहीं थे, अरब वालों की ज़बान में और अरबी से मुताल्लिक़ कलाम की ख़ूबियों और ख़ामियों पर नियम बनाए और किताबें लिखीं।

    फ़ारसी में सबसे पहले सिराज-उल-मुहक़्क़िक़ीन अल्लामा सिराजुद्दीन अली ख़ाँ आरज़ू ने इल्म-ए-मआनी-ओ-बयान (अर्थ और अभिव्यक्ति के विज्ञान) पर दो संक्षिप्त किताबें लिखीं। उनके नाम हैं ''अतिया-ए-कुबरा'' और ''मौहिबत-ए-उज़्मा''। इसके बाद मीर तक़ी का उर्दू तज़्किरा ''निकात-उश-शोअरा'' निकला जिसमें शायरों के कलाम पर जगह-जगह आलोचनात्मक टिप्पणियों में फ़साहत के कुछ नुक्ते साफ़ किए गए। मरहूम मीर, ख़ाँ आरज़ू के रिश्तेदार और साहित्यिक शागिर्द थे। 'निकात-उश-शोअरा' की आलोचनाओं से इस बात पर रोशनी पड़ती है कि अब तक साहित्य और शायरी के बारे में अरबी और फ़ारसी में जो हिदायतें जारी हो चुकी थीं, वे सब या उनमें से ज़्यादातर उर्दू पर लागू होती हैं। उसी ज़माने में मिर्ज़ा क़तील की किताबें जैसे ''चार शर्बत'' और ''नहर-उल-फ़साहत'' वग़ैरह निकलीं। दो किताबों का नाम लेना इस शक को दूर करता है कि अब तक पुराने और मध्यकालीन विद्वानों ने साहित्य और बयान पर जो कुछ लिखा, वह उर्दू पर लागू होता है या नहीं? वे हैं सैयद इंशा की ''दरिया-ए-लताफ़त'' और मौलाना सहबाई का अनुवाद ''हदाएक़-उल-बलाग़त''। 'हदाएक़-उल-बलाग़त' का अनुवाद उर्दू ज़बान में है और मिसाल के तौर पर दिए गए शेर भी उर्दू के हैं।

    ''दरिया-ए-लताफ़त'' हालाँकि उस ज़माने के चलन के मुताबिक़ फ़ारसी में लिखी गई, लेकिन इस किताब को उर्दू के फ़न-ए-इंशा (लेखन कला) की पहली किताब मानना चाहिए। ज़बान जानने के बुनियादी उसूल और क़ायदे सैयद इंशा ने तय किए। उनकी व्याख्या की और मिसालों से अपने विचार को साफ़ किया, लेकिन कहना पड़ता है कि फ़साहत का जहाँ तक ताल्लुक़ है, सैयद इंशा क्या, आज तक कोई भी उस मुक़ाम से इधर-उधर नहीं हुआ जहाँ सक्काकी और क़ज़वीनी ठहरे थे। वही ''अल-फ़साहतु यूसफ़ु बिहा अल-मुफ़रदु वल-कलामू वल-मुतकल्लिम'' के अनुवाद हर जगह देखने में आते हैं।

    इस सिलसिले में सिर्फ़ दो बातों की तरफ़ ध्यान दिलाकर मैं असली मतलब पर आऊँगा। पहला यह कि अरबी की जिन किताबों में फ़साहत का ज़िक्र आया है, वे हालाँकि अजमियों (ग़ैर-अरबों) ने लिखीं, लेकिन उनका लक्ष्य अजम नहीं बल्कि अरब था, और चूँकि अरब वाले पुराने ज़माने से ही भाषण कला (ख़िताबत) में माहिर थे, इसलिए यह लाज़िमी था कि मुंशी (लेखक) के मुक़ाबले ख़तीब (वक्ता) को तरजीह दी जाती। फ़साहत में तस्लीस का मसला यानी तीन तरह की फ़साहत की मौजूदगी इसकी पुष्टि करती है। ''फ़साहत-ए-मुतकल्लिम'' (वक्ता की फ़साहत) सौ ज़बानों से इसकी गवाही देता है कि इल्म-ए-मआनी-ओ-बयान पर जो किताबें मशहूर हैं, उनमें प्रस्तावना के तहत फ़साहत के बारे में जो कुछ दर्ज है, वह ज़्यादातर भाषण कला पर लागू होता है न कि लेखन (इंशा) पर। हालाँकि वह जो कुछ भी है, लेखन के बारे में उससे बहुत फ़ायदा उठाया जा सकता है, लेकिन उससे फ़साहत की मुकम्मल और सटीक परिभाषा नहीं निकाली जा सकती। और वह परिभाषा, परिभाषा कहे जाने की हक़दार नहीं जिसमें ये दोनों ख़ूबियाँ मौजूद न हों। तर्क के हिसाब से परिभाषा मुकम्मल और सटीक होनी चाहिए। यहाँ सिर्फ़ यह पिछली ख़ूबी ही पाई जाती है, यानी वह कलाम फ़सीह है जो ऐसा और ऐसा न हो, जिसमें तनाफ़ुर (शब्दों का टकराव) न हो, ज़ोफ़-ए-तालीफ (वाक्य रचना की कमज़ोरी) न हो, ताक़ीद (पेचीदगी) न हो वग़ैरह।

    दूसरी बात है ''फ़साहत-ए-कलिमा'' (शब्द की फ़साहत)। इसमें अक्षरों के टकराव और अजनबीपन वग़ैरह की मनाही का ज़िक्र आया है, और मिसाल में ''मुस्तशज़िरात'' पर एतराज़ किया गया है। मेरा ख़याल है कि वे विद्वान लेखक इस शब्द की इतनी चीर-फाड़ न करते अगर ख़तीब और भाषण कला उनके ज़ेहन पर हावी न होते। मैं यह न कहूँगा कि अगर यह शब्द अरबी व्याकरण के मुताबिक़ सही है और 'अजलल' की तरह अप्रचलित भी क़रार नहीं दिया गया, बयान के तरीक़े और अर्थ के लिहाज़ से भी सही जगह पर इस्तेमाल हुआ है, तो फिर इसमें क्या ख़राबी निकल आई? अगर यह कहा जाए कि इस लफ़्ज़ की जगह इमरुल क़ैस ''मुस्तरफ़िआत'' लिख देता तो बेहतर था, तो इसे ज़्यादा से ज़्यादा बेहतरी कहा जाएगा न कि सुधार। लेकिन उन विद्वान लेखकों ने ''मुस्तशज़िरात'' के बदले कोई और लफ़्ज़ सुझाने की तकलीफ़ नहीं उठाई।

    चूँकि यह शेर 'फ़साहत-ए-कलमा' (शब्द की मधुरता/स्पष्टता) के ज़िक्र में इस लफ़्ज़ की वजह से बहुत बदनाम है, इसलिए मैं निहायत अदब से यह अर्ज़ करने की हिम्मत करता हूँ कि वे बुज़ुर्ग अगरचे अरबी ज़बान के बड़े आलिम (विद्वान) थे, लेकिन 'साहिब-ए-क़ामूस' (शब्दकोश के रचयिता) की तरह अहल-ए-ज़बान (मातृभाषी) न थे। इस वजह से मुस्तशज़िरात पर यह एतराज़ कर गए। मुमकिन है मैं ग़लती पर हूँ। जहाँ तक मैं समझता हूँ एतराज़ हर्फ़ 'शीन' (श) की वजह से हुआ। यानी 'श' जो महमूसा रख़वा है, दरमियान 'ते' (त) के, जो महमूसा शदीद है और 'ज़े' (ज़) के जो महजूरा मोजमा है, आ गया है। इससे तलफ़्फ़ुज़ (उच्चारण) के भारीपन का गुमान हुआ।

    लेकिन मुझे इस तर्क पर एतराज़ है क्योंकि रा-ए-मोहमला (बिना नुक्ते वाला 'रे') भी तो महजूरा है, ज़े (ज़) की तरह। कहा गया है कि क़रीब-उल-मख़ारिज (जिनके उच्चारण स्थान क़रीब हों) हर्फ़ों के एक साथ आने से भी ऐसा भारीपन पैदा होता है जो फ़साहत में बाधक है। इसी बिना पर इस आयत अलम आ'हद में कहा गया कि ऐसा भारीपन है जो तनाफ़ुर (कर्कशता) के क़रीब और फ़साहत-ए-कलमा में बाधक है, मगर असल में ऐसा नहीं है, इसकी तफ़सील के लिए अल-इतक़ान का मुताला (अध्ययन) ज़रूरी है। अगर एक लम्हे के लिए मज़हबी अक़ीदत (धार्मिक पवित्रता) की नज़र हटा कर महज़ अदबी (साहित्यिक) निगाह क़ुरआन मजीद पर डाली जाए तो साबित होगा कि इसका लफ़्ज़-लफ़्ज़ फ़साहत की रूह-ओ-रवाँ (जान) है। ऐसी तारीफ़ों से जिनका नुक़्स (दोष) ज़ाहिर कर चुका हूँ, मुतास्सिर (प्रभावित) होकर एक साहब ने एतराज़ कर दिया कि नूह-यूहबित में तनाफ़ुर-ए-हुरूफ़ (अक्षरों की कर्कशता) है। ये और ऐसे एतराज़ करने वाले हर्फ़ों के मख़ारिज (उच्चारण स्थानों) की हक़ीक़त से बिल्कुल अनजान हैं। अलिफ़ और ऐन, हा-ए-हव्वज़ और हा-ए-हुत्ती की सही और हक़ीक़ी आवाज़ अदा करने से उनके बोलने के अंग असमर्थ हैं। जब इस बारे में अहल-ए-ज़बान को भी मुग़ालता (भ्रम) हो जाता है, फिर ग़ैर अहल-ए-ज़बान का तो ज़िक्र ही क्या है।

    देखा जाता है कि आजकल लोगों के मिज़ाज ज़्यादा हस्सास (संवेदनशील) हैं। कारणों से बहस नहीं। यह वाक़या ज़ाहिर है कि मौजूदा दौर में हर मामले में, चाहे वह समाज या क़ौम से मुताल्लिक़ हो या धर्म और साहित्य से, लोगों के ज़ेहन ज़्यादा हस्सास हो गए हैं। इस ख़ौफ़ से मैं सिर्फ़ यह अर्ज़ करूँगा कि अहल-ए-ज़बान ही अपनी ज़बान के कलाम यानी इबारत और अल्फ़ाज़ को सही अंदाज़ और लब-ओ-लहज़े से अदा कर सकते हैं। ग़ैर अहल-ए-ज़बान उस ज़बान का चाहे कितना ही बड़ा आलिम और मुसन्निफ़ (लेखक) क्यों न हो, उसके बोलने के अंग लब-ओ-लहज़े की सेहत (शुद्धता) और अदा करने के तरीक़े की क़ुदरती सफ़ाई पर हावी नहीं हो सकते।

    क्या फ़साहत का ताल्लुक़, जैसा कि पुराने विद्वानों ने ज़ोर दिया है, कलमे (शब्द) की ज़ात से है? यह बहस अभी अधूरी है। आगे ज़िक्र आया है कि फ़ारसी में सबसे पहले ख़ान आरज़ू ने अहल-ए-हिंद (हिंदुस्तानियों) को 'इल्म-ए-मआनी' (अर्थ-विज्ञान) और उसके भेदों से वाक़िफ़ किया। मुमकिन है अहल-ए-फ़ारस (ईरानियों) ने इस मौज़ू पर अपनी ज़बान में कुछ लिखा हो, लेकिन वह हम तक नहीं पहुँचा। ख़ान मौसूफ़ अतिया-ए-कुबरा के दीबाचे (भूमिका) में फ़रमाते हैं,

    दरगाह कि नज़र बर कुतुब-ए-क़दीमा व जदीद उफ़्ताद किताबे दर इल्म-ए-बयान कि यक जुज़्व-ए-फ़साहत अस्त, दर फ़ारसी ब-नज़र दर नमी आयद... पस ईं रिसाला अव्वल किताबे अस्त कि अज़ आसमान-ए-फ़िक्र-ए-बुलंद ब-ज़मीन-ए-शेर-ए-फ़ारसी नाज़िल शुदा।

    फिर उन्होंने दूसरा रिसाला (पुस्तिका) मौहिबत-ए-उज़मा लिखा जिसको इल्म-ए-मआनी से मुताल्लिक़ कहा जाता है। इसके मज़मून वतवात की 'हदाईक़-उस-सिहर' और दूसरी अरबी किताबों से लिए गए हैं। जैसा अरबी किताबों में एहतमाम था, उसकी पैरवी ख़ान आरज़ू ने की, यानी फ़साहत का ज़िक्र ज़िम्नन (प्रसंगवश) और मुख़्तसर तौर पर दीबाचे में कर दिया, लेकिन फिर भी वह तल्ख़ीस से कुछ ज़्यादा ही है। चूँकि सक्काकी की ज़बान से निकल गया था कि कलाम-ए-बलीग़ (प्रभावशाली कलाम) के लिए फ़सीह होना लाज़िमी है, इसलिए उन्हें और उनके बाद आने वालों को चंद लफ़्ज़ फ़साहत की नज़र करने पड़े। तस्लीस-ए-फ़साहत (फ़साहत की त्रिमूर्ति) का नज़रिया बस इतना है। फ़साहत-ए-कलमा, फ़साहत-ए-कलाम, फ़साहत-ए-मुतकल्लिम—इन तस्लीस के हिस्सों की तारीफ़ों में सबका इत्तेफ़ाक़ (सहमति) है।

    1. फ़साहत-ए-कलमा: ख़ुलूस-ए-ओस्त अज़ तनाफ़ुर-ए-हुरूफ़ व ग़राबत व मुख़ालिफ़त-ए-क़ियास-ए-लुग़वी (यानी अक्षरों की कर्कशता, अपरिचितपन और भाषाई नियमों के विरोध से इसका पाक होना)। पहली ख़राबी यह वाक़े हुई कि महज़ फ़साहत की तारीफ़ की तरफ़ किसी का ज़ेहन नहीं गया। फ़साहत-ए-कलमा, फ़साहत-ए-कलाम और फ़साहत-ए-मुतकल्लिम—ये तीनों इज़ाफ़ी तरकीबें (व्याकरणिक संरचनाएँ) हैं। कलमे की तारीफ़ 'सर्फ़' (शब्द-विचार) में और कलाम की तारीफ़ 'नह्व' (वाक्य-विचार) में आ जाती है। इसलिए ज़रूरी न था कि इनकी तारीफ़ें गढ़ी या नक़ल की जातीं, क्योंकि सर्फ़-ओ-नह्व (व्याकरण) का इल्म इन किताबों के मुताले से पहले होना ज़रूरी है। लेकिन यह किसी के ख़्याल में न आया कि इतना तो फ़रमा देते कि फ़साहत इसे कहते हैं। इन मुरक्कबात (यौगिक शब्दों) में फ़साहत ही अहम और सबसे बड़ा हिस्सा है, और इसी की इस्तेलाही (पारिभाषिक) हैसियत बताने से परहेज़ किया गया। लुग़त (शब्दकोश) की किताबों ने इस लफ़्ज़ के मायने बताए हैं: कुशादा सुख़न गुफ़्तन व तेज़ ज़बानी व ख़ुश गोई (खुलकर बात करना, तेज़ ज़बानी और अच्छी बातचीत)। मगर एक लफ़्ज़ जब इस्तेलाही हैसियत हासिल कर लेता है तो अपने लुग़वी (शाब्दिक) मायने से कम-ओ-बेश दूर हो जाता है। यह एक ज़ाहिर सी बात है।

    ख़ैर, अब फ़साहत-ए-कलमा को लीजिए। इसकी तारीफ़ जो कुछ भी की गई है वह महज़ माने' (निषेधात्मक) है। यानी तनाफ़ुर-ए-हुरूफ़, ग़राबत और मुख़ालिफ़त-ए-क़ियास-ए-लुग़वी का न होना। उस कलमे को फ़सीह कहा गया जिसमें ये तीन ऐब (दोष) न हों। फिर फ़साहत-ए-कलमा की इन तीनों शर्तों की तारीफ़ यूँ की गई:

    (अ) तनाफ़ुर उन हर्फ़ों के एक साथ आने को कहते हैं जिनका तलफ़्फ़ुज़ (उच्चारण) तबा-ए-सलीम (स्वस्थ स्वभाव/अच्छे ज़ौक़) पर दुश्वार हो। इसे एक ज़ौक़ी अम्र (रुचि का मामला) बताया गया है।

    (ब) ग़राबत की निस्बत कहा गया कि वह कलमा जो ग़ैर-मानूस-उल-इस्तेमाल हो, यानी जिसे अहल-ए-ज़बान इस्तेमाल न करते हों।

    (ज) मुख़ालिफ़त-ए-क़ियास-ए-लुग़वी की निस्बत फ़रमाया गया कि एक कलमे को क़ायदे, क़ानून और मुहावरे के ख़िलाफ़ लाना। इसकी कई क़िस्में हैं:

    (1) शेर का वज़्न या क़ाफ़िया दुरुस्त करने के लिए कलमे में तग़य्युर (बदलाव) करना, जैसा इस शेर में किया है:

    आब-ए-अंगूर ओ आब-ए-नीलोफ़ल

    शुद मरा अज़ अबीर ओ मुश्क बदल

    नीलोफ़र की रे को लाम (ल) से बदल दिया ताकि क़ाफ़िया दुरुस्त रहे। तो मतलब पूरा हो जाता, मुख़ालिफ़त का नुक़्स (दोष) भी निकल जाता।

    (2) कलमे का बेमौक़ा इस्तेमाल जैसे टूटना की जगह फूटना कहना। इस फ़िक़रे में उसकी बातें सुन कर मेरा दिल टूट गया। यहाँ टूट गया की जगह फूट गया कहा जाए तो मुख़ालिफ़त का नुक़्स आयद होता है (लागू होता है)। इसी तरह इस जुमले में साझे की हंडिया चौराहे पर फूटा करती है। फूटना के बदले टूटना कहना वैसा ही है जैसा पहली मिसाल में फूटना था।

    (3) अलिफ़-ए-इश्बाअ जो बाज़ कलमों के आख़िर में ज़रूरत-ए-शेरी (काव्य की आवश्यकता) की वजह से बढ़ा दिया जाए, जैसे निज़ामी ने इस मिसरे में 'काख़' को 'काख़ा' बाँधा है:

    बसा काख़ा कि महमूदश बिना कर्द।

    ज़्यादा तफ़सील ग़ैर-ज़रूरी है।

    मैं यह अर्ज़ करूँगा कि काख़ को काख़ा कहना ग़लत, दिल टूट गया को दिल फूट गया कहना ग़लत है। इसी तरह तग़य्युर (बदलाव) या तक़लीब (उलट-फेर) वग़ैरह से कलमे की शक्ल बदल देना ग़लत और मना है। जो शख़्स रहीम बख़्श को 'हरीम बसक' और क़ादिर को कादर कहता है, वह ग़लत और मोहमल (निरर्थक) अल्फ़ाज़ बोल रहा है।

    अब देखना है कि फ़साहत-ए-कलमा की जो तारीफ़ क़रार दी गई, माक़ूलियत (तर्कसंगत होने) के किस दर्जे में रखी जा सकती है? इस बारे में यह जताना है कि कोई कलमा जो इल्म-ए-सर्फ़ (शब्द-विचार) के क़ायदों से मेल खाता है, अपनी लुग़वी (शाब्दिक) हैसियत में फ़सीह या ग़ैर-फ़सीह नहीं ठहराया जा सकता, हाँ उसका मुनासिब या ग़ैर-मुनासिब इस्तेमाल। या 'सर्फ़' (प्रयोग) ही वह अमल है जो उसे यानी उसके इस्तेमाल को फ़सीह या ग़ैर-फ़सीह बना सकता है और यह सर्फ़ या इस्तेमाल कलाम से ताल्लुक़ रखता है क्योंकि जब एक जुमले या फ़िक़रे में किसी कलमे का इस्तेमाल हो तो ज़ाहिर है कि कलाम का वजूद पैदा हो गया। लिहाज़ा फ़साहत या ग़ैर-फ़साहत का इत्लाक़ (लागू होना) कलाम पर हुआ न कि कलमे पर।

    अगर वज़ू के मसले को फ़िक़्ह (इस्लामी न्यायशास्त्र) की किसी किताब में पढ़ रहे हों या उसके बारे में कुछ लिख रहे हों, तो 'जोराबैन' (मोज़े) का शब्द ज़रूर इस्तेमाल होगा और वहां वह शब्द हरगिज़ ग़ैर-फ़सीह (असाहित्यिक) नहीं होगा। लेकिन अगर आप ग़ज़ल में यह लफ़्ज़ इस्तेमाल करें, जहां पैरहन, आंचल, नक़ाब, दामन और गिरेबान का ज़िक्र होता है, तो यक़ीनन इस शब्द यानी 'जोराबैन' का इस्तेमाल बेमौक़ा होगा, इसलिए ग़ैर-फ़सीह कहलाएगा। यही हाल उन शब्दों और मुरक्कब (संयुक्त) शब्दों का है जो ग़ालिब और नासिख़ से पहले की शायरी में पाए जाते हैं, यानी उनकी ग़ज़लों में। अगर उनमें से ज़्यादातर क़सीदे या नस्र (गद्य) में इस्तेमाल किए जाते तो कोई हर्ज़ न था।

    जो लफ़्ज़ मतरूक (अप्रचलित) हो चुके हैं, वे गोया ज़बान से बाहर कर दिए गए। शब्दकोशों में जो वे पाए जाते हैं, तो इस मक़सद से कि पुराने शायरों का कलाम समझने में मदद मिले। अब मैं 'फ़साहत-ए-कलमा' (शब्द की मधुरता) के नज़रिए का जायज़ा पेश करता हूं। इस नज़रिए में पहली ख़ामी यह नज़र आती है कि जहां तक फ़ारसी या उर्दू का ताल्लुक़ है, पुराने या बाद के शायरों ने शब्द में 'तनाफ़ुर-ए-हुरूफ़' (अक्षरों के टकराव) की कोई मिसाल पेश नहीं की जिससे उनकी मंशा साफ़ होती, लेकिन 'ग़ियास-उल-लुग़ात' के लेखक ने इस बारे में कोशिश की है। फ़रमाया है कि जैसे 'शम्अ-ए-इल्म', 'सिद्क़-ए-क़ौल' में उच्चारण का भारीपन है।

    अव्वल तो मुझे इन्हें एक शब्द मानने में एतराज़ है। ये दोनों मुरक्कब शब्द वह हैसियत नहीं रखते जो 'ख़ुश-गुफ़्तार' या 'सुख़न-शनास' की है। बल्कि 'शम्अ-ए-इल्म' और 'सिद्क़-ए-क़ौल' एक वाक्य के दो टुकड़े हैं, जिन्हें उसमें से काट-छांट कर अलग दिखाया गया है। शम्अ और सिद्क़, इल्म और क़ौल को ज़रूर शब्द कहा जाएगा, इन मुरक्कब शब्दों की कोई स्वतंत्र हैसियत नहीं है। अगर नामुमकिन बात को मुमकिन मानकर 'ग़ियास-उल-लुग़ात' के लेखक का यह दावा मान भी लें, तो उनके सिद्धांत के मुताबिक़ मिलल, क़िसस और असास वग़ैरह सैकड़ों अरबी और फ़ारसी शब्द भाषा से बाहर कर देने पड़ेंगे। और ख़ुद उनकी किताब का नाम यानी 'ग़ियास-उल-लुग़ात' उन्हीं की बात के मुताबिक़ 'फ़साहत-ए-कलमा' के ख़िलाफ़ ठहरेगा, क्योंकि इसमें दो 'लाम' लगातार आ गए, जैसे 'सिद्क़-ए-क़ौल' में दो 'क़ाफ़' और 'शम्अ-ए-इल्म' में दो 'ऐन' थे। और 'शश' (छह) का अंक तो गिनती से बाहर ही कर देने के क़ाबिल है। अगर मोमिन के इस शेर में तनाफ़ुर (टकराव) है तो वह पूरे वाक्य (कलाम) से मुताल्लिक़ है, किसी एक शब्द से उसका कोई वास्ता नहीं। वह शेर यह है:

    पांव तुर्बत पे मेरी देख संभल कर रखना

    चूर है शीशा-ए-दिल संग-ए-सितम से पिस के

    एतराज़ यह है कि चार 'सीन' एक जगह लाकर इकट्ठे कर दिए। यह एतराज़ शायर की रचना-समझ के ख़िलाफ़ हो सकता है, वरना इन शब्दों में से 'संग-ए-सितम से पिस के' किसी में भी अपनी अकेली हैसियत में, यानी अकेले शब्द के तौर पर, नाम को भी उच्चारण का भारीपन या टकराव नहीं है। यही शब्द जब मुनासिब जगह पर इस्तेमाल किए जाएं तो कोई एतराज़ नहीं उठाया जाता। यही हाल फ़ारसी के इन मिसरों का है:

    (1) ज़मीं शश शुद ओ आसमां गश्त हश्त

    (2) अज़ यक कशिश-ए-शह शश सद शेर बिलरज़द

    इन मिसरों में 'शश' से लेकर 'शेर' तक किसी शब्द पर अक्षरों के टकराव या भारीपन का दोष नहीं लगाया जा सकता। जो ख़राबी है, वह पूरे कलाम की है। यही हाल 'ग़राबत' (अजनबीपन) का है। 'जोराबैन' का ज़िक्र पहले आ चुका है। इस सिलसिले में यह बताना है कि कोई शब्द अगर इस्तेमाल में अजनबी है, यानी भाषा वाले या भाषा के जानकार उसे इस्तेमाल नहीं करते, तो वह उस ज़बान में दाख़िल ही नहीं है या एक मुद्दत के इस्तेमाल के बाद मतरूक (अप्रचलित) हो गया। मतरूक शब्दों की तरफ़ अभी इशारा हुआ है। शब्दकोशों में हर इल्म और फ़न की इस्तिलाहें (पारिभाषिक शब्द), हर ज़माने के मुहावरे और हर दौर में इस्तेमाल होने वाले शब्द लिखे होते हैं। अगर आप इन अल्फ़ाज़ वग़ैरह को छांट-छांट कर निकालें और अपनी शायरी या गद्य में लाएं; मौक़ा, मुनासिबत, विषय और बेमौक़ा इस्तेमाल, साथ ही शायरी की विधा का ख़याल न रखें, तो बेशक कलाम का भारीपन 'ग़राबत' के इल्ज़ाम का हक़दार होगा।

    मिसाल के तौर पर, आजकल के फ़सीह साहित्यकारों और बाद के लोगों ने वर्तमान काल के रूप को, जैसे 'जाए है', 'करे है', भाषा से बाहर कर दिया है। अब अगर कोई पुराने चलन का शौक़ीन वर्तमान काल के ये रूप इस्तेमाल करे, तो बेशक उसका यह काम भाषा वालों के इस्तेमाल से हटकर होगा और उसका कलाम ग़लत समझा जाएगा। मिर्ज़ा ग़ालिब ने अपने उर्दू दीवान के तीसरे संस्करण के अंत में लफ़्ज़ 'कसू' के बारे में लिखा था:

    मैं यह नहीं कहता कि यह लफ़्ज़ सही नहीं, अलबत्ता फ़सीह नहीं। क़ाफ़िए की रियायत से अगर लिखा जाए तो कोई ऐब नहीं। वरना फ़सीह, बल्कि ज़्यादा फ़सीह 'किसी' है।

    इसी तरह बहुत से शब्दों के इस्तेमाल की जगह पर गहरी नज़र डाली जाए, तो यह निष्कर्ष सही होगा कि कोई शब्द अपने आप में फ़सीह या ग़ैर-फ़सीह नहीं हुआ करता, बल्कि उसके इस्तेमाल की जगह या तरीक़ा ऐसा हो सकता है। इस सिलसिले में यह साफ़ कर देना भी ज़रूरी है कि कुछ मतरूक शब्द ऐसे हैं जिनका इस्तेमाल आम हालतों में जायज़ नहीं, लेकिन मिर्ज़ा के 'कसू' की तरह (हालांकि अब 'कसू' पूरी तरह मतरूक है) ख़ास मौक़े पर जायज़ और जारी है। जैसे 'नित', कि इसका इस्तेमाल 'नया' के साथ तो दुरुस्त है (नित-नया), और हालतों में नहीं। इससे साफ़ हो गया कि फ़साहत का ताल्लुक़ पूरे कलाम से है, किसी एक शब्द से नहीं है। हां, शब्द का सही होना इसके लिए लाज़िमी है।

    व्याकरण के नियमों के ख़िलाफ़ होने को शब्द पर लागू करते हुए कहा गया था कि इसका मतलब है शब्द को क़ायदे-क़ानून और मुहावरे के ख़िलाफ़ लाना। अब देखना यह है कि जो शब्द क़ायदे और क़ानून के ख़िलाफ़ होगा, वह सही होने से ही महरूम होगा। फ़साहत या ग़ैर-फ़साहत का इसमें दख़ल ही क्या है। अगर 'फ़साहत-ए-कलमा' के इस नज़रिए को, जिसकी व्याख्या हो चुकी है, तयशुदा और पक्का मान लिया जाए, तो आप ही बताएं, ईरान और हिंदुस्तान के उन नामी उस्तादों के हक़ में क्या फ़ैसला दिया जाएगा जो फ़रमा गए हैं:

    लंघनत गर तुरा कुनद फ़र्बा

    सेर ख़ुर्दन तुरा ज़ लंघन फ़र्बा

    ना दरां दीदा क़तरा-ए-पानी

    हकीम सनाई ने 'लंघन' का शब्द फ़ाक़ा (उपवास) के अर्थ में इस्तेमाल किया है जैसा कि हिंदी में होता है, 'क़तरा-ए-पानी' पर भी नज़र रहे। उरफ़ी फ़रमाते हैं:

    दर चाश्त कि अज़ शबनम-ए-गुल गर्द फ़िशां अस्त

    आं याद कि दर हिंद दर आयद जकर आयद

    इस शेर में झक्कड़ आंधी को ईरानी लहज़े में 'जकर' कहा गया है। इरशाद हुआ है:

    गीत ख़्वानत ज़ोहरा क़व्वाल ओ मक्की रानत ज़ोहल

    आबदारत अब्र-ए-नैसां ओ ख़्वासत आफ़्ताब

    इस शेर में 'गीत', और 'मक्की' यानी मक्खी का राग सुनने की तवज्जो चाहता है।

    सालिक का शेर है:

    सेर गश्तम ज़ किचरी-ए-अय्याम

    हवस-ए-ख़्वान-ए-सीम-ओ-ज़र ना कुनम

    हिंदी-फ़ारसी की इस 'खिचड़ी' की मक़बूलियत को मुलाहज़ा फ़रमाइए और 'कसरा-ए-इज़ाफ़त' (दो शब्दों को जोड़ने वाले 'ए') का भी ख़याल रखिए।

    अज़ सुख़न तासीर-ए-मा अज़ लफ़्ज़-हा-ए-इंतिख़ाब

    बस्ता-हा-ए-ख़ुश क़ुमाश पुर ज़ानक आवुर्दा अस्त

    'अंक' वह निशान है जो हिंदुस्तान में कपड़ा बनाने वाले या बज़ाज़ (कपड़ा व्यापारी) थानों वग़ैरह पर बुनते या छाप देते हैं। यह संस्कृत का शब्द है, इसके मायने हैं निशान, पता। संस्कृत में ख़ुदा के नामों में 'निरंकार' भी आया है। इसके मायने हैं पहचान की निशानी न रखने वाला। आजकल कपड़े के 'अंक' को 'मारका' कहते हैं जो ट्रेडमार्क का बिगड़ा हुआ छोटा रूप है।

    अमीर ख़ुसरो के यहां आया है:

    हमा रा ज़ नोक-ए-मिज़्गां ज़दा बर जिगर कटारा

    मिर्ज़ा साहब ने इज़ाफ़त (संबंध कारक) से इस हिंदी लफ़्ज़ 'कटारा' को और भी अपना लिया। फ़रमाया है:

    दिलेर मी-रवी अज़ पय सियाह चश्मां रा

    कटारा-ए-निगहत बर जिगर नयामदा अस्त

    मिर्ज़ा ग़ालिब ने फ़रमाया:

    सर पे चढ़ना तुझे ज़ेबा है पर ऐ तरफ़-ए-कुलाह

    मुझ को डर है कि ना छीने तिरा नंबर सेहरा

    कुछ दफ़्तर वाले अंग्रेज़ी लफ़्ज़ 'नंबर' को 'लंबर' भी कहते और लिखते हैं, जैसे रजिस्टरों के पहले कॉलम का शीर्षक 'लंबर शुमार'। और मिर्ज़ा साहब के फ़ारसी दीवान में है:

    अरे ना चेक बुवद ना तमुस्सुक ज़े-हर कि हस्त

    ने दस्तख़त ना मोहर ना नाम ओ निशां ओस्त

    मज़मून-ए-शेर, नोट, बुवद फ़ी-ज़मानना

    यानी ब-दस्त-ए-हर कि बियफ़्ताद आन ओस्त

    इसके बावजूद कि मिर्ज़ा क़तील अपनी मआनी-ओ-बयान (अर्थ और अभिव्यक्ति) की किताबों के साथ इतने बरस लखनऊ में रहे, शेख़ नासिख़ ने फ़रमाया,

    तेरे रुख़्सार-ए-ताबाँ का कभी जो अक्स पड़ता है

    फ़्रेम आईना बनती है हाला माह-ए-कामिल का

    फ़्रेम और है हाला ग़ौर करने लायक़ है।

    ज़ौक़ का इरशाद है,

    पुकारे सब कि, क़वायद है फ़ौज की शायद

    कि फ़ैर उड़ा रहे हर सफ़ में हैं क़तार क़तार

    लाल किताब अपनी अब बादा-ए-लाला-रंग है

    मैकदा अपने वास्ते मदरसा-ए-फ़रंग है

    आप घबराएं नहीं, मैं मुख़ालिफ़त (नियम विरुद्ध होने) या ग़राबत (अपरिचित शब्दों के प्रयोग) की और मिसालें पेश नहीं करूँगा। ख़ुलासा यह कि वह सक्काकी हों या रशीद-उद-दीन वतवात, ख़ान आरज़ू हों या मिर्ज़ा क़तील और उनका इज्तिहाद (नया नज़रिया), न तर्क की तराज़ू में पूरा उतरता है न ईरान और हिंदुस्तान के उस्तादों के अमल के लिहाज़ से स्वीकार करने के लायक़ ठहरता है।

    'फ़साहत-ए-कलिमा' (शब्द की शुद्धता) के इस फ़तवे ने एक बुरी बिदअत (नई प्रथा) हमारे अदब में लाकर दाख़िल कर दी। ख़ासकर नज़्म में शायरों का मक़सद सिर्फ़ 'कलिमा-ए-मुफ़रद' (अकेला शब्द) रह गया और कलाम (पूरी बात) और तख़य्युल (कल्पना) को पीछे डाल दिया गया। जहाँ अल्फ़ाज़ पर ग़ैर-ज़रूरी ज़ोर और ताकीद का कोड़ा लगाया गया, वहाँ यही नतीजा सामने आया। इस लफ़्ज़ी फ़साहत के मंतर ने ट्यूडर काल में जो गत अंग्रेज़ी लिटरेचर की बनाई थी, वही बाद के ज़माने में उर्दू शायरी, ख़ासकर लखनऊ के एक ख़ास तबक़े की बन गई थी; यानी कहने वाले का पूरा का पूरा ध्यान कलाम से हटकर कलिमे (शब्द) पर केंद्रित हो गया। उस ज़माने में तो इंग्लैंड में एक शख़्स ऐसा वसी-उन-नज़र (व्यापक दृष्टिकोण वाला) पैदा हो गया जिसने कलिमे के साथ कलाम का भी लिहाज़ रखा, यानी जॉन मिल्टन, लेकिन हिंदुस्तान में कलिमे और मुफ़रद (अकेले शब्द) का जादू ऐसा चला कि आज तक कलाम इसकी भूल-भुलैया में ग़ुम है।

    अल्फ़ाज़ के टकराव और मुनासिबत (तालमेल) का जुनून भी इसी सिलसिले में आता है, जो लिखने और बोलने वाले के हाथ से ऊँची कल्पना का साथ छुड़ा देता है और कलाम सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का गोरखधंधा रह जाता है। यह सारी ख़राबी दिल्ली वालों ने, जिनमें ख़ान आरज़ू और मिर्ज़ा क़तील का बड़ा हिस्सा है, लखनऊ की नई ज़मीन में जाकर फैलाई और फिर यह अदबी बिदअत (साहित्यिक कुप्रथा) वापसी की कशिश के क़ानून के तहत ख़ुद दिल्ली पर भी लागू हो गई। आजकल के अक्सर लोगों को अपने गुमान में कलाम को सजाने का यह आसान तरीक़ा हाथ आ गया है, जैसा कि सियासत का उसूल है कि एक मौक़ा जो ख़ुद-ब-ख़ुद पैदा हो गया है, क्यों न उससे फ़ायदा उठा लिया जाए। यही उसूल आजकल साहित्य पर हावी है। हल्दी लगे न फिटकरी रंग चोखा दे।

    गीता ने कर्म के फ़लसफ़े पर इस हिदायत के साथ बात पूरी कर दी कि जो काम तुम्हारा फ़र्ज़ है उसे अंजाम दिए जाओ और उसके फल के फेर में न पड़ो। इसी तरह लोग अच्छे-अच्छे कलिमे (शब्द), शानदार तरकीबें, और भारी-भरकम लफ़्ज़ इस्तेमाल करते हैं। भई, इससे मतलब क्या निकला? इस कलाम का निचोड़ क्या है? यह सब अगर कहीं है तो शायर के पेट में; यानी रोबदार शब्द इस्तेमाल किए जाओ, कलाम की अर्थपूर्ण ख़ूबी से कोई मतलब नहीं। तभी तो मौलाना सहबाई ने ताकीद की,

    मदार-ए-हुस्न-ए-क़ुबूल बर फ़साहत-ए-कलाम अस्त।

    शब्दों के टकराव और तालमेल वग़ैरह के बारे में मौसूफ़ (उनका) शिकायती लहज़ा भी ग़ौर करने लायक़ है, फ़रमाया है, पा-ए-बंद-ए-मुनासिबात शुदन व आँ-गाह बर ईं क़दर कि गामे बे-मुराआत-ए-आँ बर न-दारंद व लुक़्मा बे-मुलाहिज़ा, आं दर दहन न गुज़ारंद सा-प-ए-सई रा लंग व माइदा-ए-सुख़न रा तंग गर्दानीदन अस्त।

    यहाँ एक जुमला-ए-मोतरिज़ा (बीच की बात) ज़ेहन में आया, जिसका ज़िक्र हालाँकि 'फ़साहत-ए-कलिमा' के तहत तो नहीं आता, लेकिन कलिमे के फ़लसफ़े से इसका बहुत ताल्लुक़ है। इसलिए इसका मुख़्तसर ज़िक्र किए देता हूँ। कुछ लोगों का ख़याल बल्कि यक़ीन है कि फ़ारसी या अरबी अल्फ़ाज़ का इस्तेमाल कलाम में ज़ोर पैदा कर देता है। ख़ुदा मालूम वो लोग ज़ोर से क्या मतलब लेते हैं। एक रेल इंजन लंबी ट्रेन को लेकर भागे जाता है और जल्दी से मंज़िल पर पहुँचा देता है। यह हुई एक बात।

    आप किसी काम से घर से निकलते हैं, रास्ते में आपको एक घोड़ा नज़र आता है, जिसका रंग निहायत ही दिलफ़रेब (आकर्षक) है, बदन सुडौल कि साँचे में ढला हुआ, मोर की सी ठुमक चाल है, रग-रग में बिजलियाँ भरी हुई हैं, अठखेलियाँ करता जा रहा है। आप ठहर जाते हैं और उस घोड़े को देखते रहते हैं जब तक कि वह दिखाई देता है। अब ग़ौर करने वाली बात यह है कि क्या उस इंजन में ज़ोर था या इस घोड़े में। आप अपने ज़ेहन को ज़हमत में डालें, मैं जल्दी से कहे देता हूँ कि इंजन में भी ज़ोर है और घोड़े में भी, मगर मैं एक ज़ोर को जिन्नाती (राक्षसी) कहूँगा और दूसरे को मलकूती (फ़रिश्तों जैसा), क्योंकि इंजन का ज़ोर बेचैनी से भरा है और घोड़े का ज़ोर सुकून देने वाला है। अगर आप इस बातचीत को यूक्लिड (ज्यामिति) के किसी दावे की हैसियत दें, तो सुबूत में उस्ताद शायरों के चंद शेर सुनिए जिनमें मुश्किल से दो-तीन फ़ारसी या अरबी अल्फ़ाज़ आए हैं, बल्कि उन्हें फ़ारसी या अरबी नहीं उर्दू ही कहना चाहिए। अनपढ़ शख़्स भी उन्हें समझता और बोलता है।

    तुम मिरे पास होते हो गोया

    जब कोई दूसरा नहीं होता

    मोमिन के इस शेर में सिर्फ़ एक फ़ारसी लफ़्ज़ गोया आया है।

    अब तो घबरा के यह कहते हैं कि मर जाएँगे

    मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएँगे

    ज़ौक़ के इस मतले में एक लफ़्ज़ भी फ़ारसी या अरबी नहीं आया।

    वो नहीं भूलता जहाँ जाऊँ

    हाए मैं क्या करूँ कहाँ जाऊँ

    नासिख़ के इस शेर में भी फ़ारसी-अरबी का कोई लफ़्ज़ दाख़िल न हो सका।

    उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़

    वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

    ग़ालिब के इस शेर में रौनक़, हाल, बीमार—ये तीन लफ़्ज़ आए हैं। इन्हें जो चाहें समझ लीजिए।

    सुनने वालों के ज़ौक़ और ज़ेहनियत की तौहीन होगी अगर मैं इन अशआर की ख़ूबियाँ और ज़ोर दिखाने बैठूँ। बस इतना कहूँगा कि ये वो शेर हैं जिन पर सैकड़ों दीवान क़ुर्बान हैं। अदब में ज़ोर उस मूसल को नहीं कहते हैं जो ओखली में धान कूटता है, बल्कि ज़ोर नाम है उस असर का जिसका ताल्लुक़ नफ़्सियात (मनोविज्ञान) से है।

    अदब के दायरे में यह एक मानी हुई हक़ीक़त है कि लफ़्ज़ के टुकड़े जिसे अंग्रेज़ी में 'सिलेबल' (Syllable) कहते हैं और 'एक्सेंट' (Accent), जिसे एक लफ़्ज़ के किसी हिस्से की आवाज़ का उतार-चढ़ाव कहिए, उसकी अर्थपूर्ण हैसियत से अलग, सुनने वाले के ज़ेहन को क़ाबू करने और मुतास्सिर करने में बहुत बड़ा दख़ल रखते हैं। अंग्रेज़ी लफ़्ज़ 'ग्रैंड' (Grand) के मुक़ाबले में 'मैग्निफ़िसेंट' (Magnificent) और इसी तरह हमारे 'शानदार' के मुक़ाबले में 'अज़ीम-उश-शान' में जो फ़र्क़ है, उसकी तफ़्सील की ज़रूरत नहीं। यह इंशा (लेखन) के फ़लसफ़े का एक हिस्सा है, जिसकी तफ़्सील का यह मौक़ा नहीं।

    हाँ, बातचीत 'फ़साहत-ए-कलिमा' (शब्द की शुद्धता) से मुताल्लिक़ थी। मेरा नज़रिया यह है कि जो कलिमा (शब्द) सही और शाब्दिक, पारिभाषिक या प्रतीकात्मक अर्थ में इस्तेमाल हो, अहल-ए-ज़बान (मातृभाषियों) के मुहावरे के मुताबिक़ हो और मुनासिब जगह पर इस्तेमाल हुआ हो, मौज़ू के एतबार से भी दुरुस्त और सही हो, ऐसे कलिमे कलाम में इस्तेमाल करना उसकी ख़ूबी और असर को बढ़ा देता है। इससे ज़्यादा कहना बेकार है। जिस कलिमे में ग़राबत (अपरिचित होने) या मुख़ालिफ़त (नियम विरुद्ध होने) का दोष हो, उसे मतरूक (छोड़ दिया गया) समझना चाहिए। 'निपट' और 'अँझवाँ', 'नैन' और 'निदान' कभी इस्तेमाल होते थे, इनसे कलाम चमक उठता था मगर आज ये ग़रीब (अपरिचित) हैं। इसी तरह 'मुख़ालिफ़त-ए-क़ियास-ए-लुग़वी' (शाब्दिक नियमों के विरुद्ध होने) को समझ लीजिए।

    'तनाफ़ुर-ए-हुरूफ़' (अक्षरों के टकराव) का ज़िक्र मुस्तशज़रात (उलझे हुए शब्दों) के तहत आ चुका है। इस बहस का ख़ुलासा यह है कि आज तक फ़साहत के पहले रुक्न (स्तंभ) के बारे में जो कुछ फ़रमाया गया, वह ज़्यादातर बाल की खाल निकालने और 'फ़साहत-ए-कलाम' से मुताल्लिक़ है। इसके ज़िक्र की ज़रूरत नहीं कि कोई ख़ुशफ़हम, मौक़े-महल और मौज़ू को ताक़ पर रखकर डिक्शनरी से लफ़्ज़ ले-लेकर कलाम में भर दे।

    अब मैं आपको फ़साहत की दूसरी हद पर ले जाना चाहता हूँ। मेरा मतलब है फ़साहत-ए-मुतकल्लिम (वक्ता की फ़साहत)। आगे कह चुका हूँ कि इसका ताल्लुक़ ज़्यादातर ख़िताबत (भाषण) से है, साथ ही मुकालमा (संवाद) भी इसी में आ जाता है। अगर कोई शख़्स ज़ंजीर को ज़ंज़ीर या जंजीर, शाम को साम, क़लम को कलम कहे तो अच्छी रुचि वाले सुनने वाले ज़रूर बदमज़ा होंगे। इसलिए ज़रूरी है कि बोलने में लफ़्ज़ सही तलफ़्फ़ुज़ (उच्चारण) में अदा हो और हर हर्फ़ से उसकी सही आवाज़ पैदा हो। कुछ स्थानीय विशेषताएँ ऐसी हैं जो सही इल्म के बावजूद मुकालमे को सही नहीं होने देतीं, इसकी वजह बोलने के अंगों की बनावट की ख़ासियत और आदत है, जिसका इलाज सोहबत (संगति) और अभ्यास के सिवा कुछ नहीं। एक अकेले उदाहरण से इसकी वज़ाहत (स्पष्टीकरण) हो जाएगी।

    सैयद इंशा ने 'दरिया-ए-लत़ाफ़त' में जो गुफ़्तगू और लहजा मीर ग़फ़र ग़ैनी का लिखा है, उससे इस बात पर तेज़ रोशनी पड़ती है। मीर ग़फ़र ग़ैनी के बोलने के अंग कुछ ऐसे बने थे कि वह 'ल' और 'र' वग़ैरह की आवाज़ सही अदा नहीं कर सकते थे, बल्कि इन हुरूफ़ (अक्षरों) की जगह 'ग़' और 'फ़' वग़ैरह की आवाज़ निकलना लाज़िमी था। सहर-उल-बयान के इस शेर को,

    चली वाँ से दामन उठाती हुई

    कड़े को कड़े से बजाती हुई

    वह यूँ कहते थे,

    चग़ी वाँ से दामन उठाती हुई

    कफ़े को कफ़े से बजाती हुई

    इस लहजे की वजह से उनका नाम ही ग़फ़र ग़ैनी पड़ गया। ऐसी ही हालत क़ौमों की है। अलग-अलग मुल्कों या एक मुल्क के अलग-अलग हिस्सों के रहने वालों का लहजा ख़ास तौर पर ख़ास हुरूफ़ की आवाज़ निकालने में अलग होता है। सेहत-ए-तकल्लुम (बोलने की शुद्धता) अहल-ए-ज़बान (मातृभाषियों) के लहजे से जुड़ी होती है और यह फ़र्क़ हर मुल्क और हर ज़बान में मौजूद है। क़ुरैश के लहजे और सबा-अहरूफ़ (सात शैलियों) का महज़ हवाला देना, उम्मीद है इस बारे में काफ़ी समझा जाएगा।

    अभी कलमे के हिस्से यानी सिलेबल और तोड़ यानी एक्सेंट का ज़िक्र आ चुका है और ज़बानों में तोड़ के फ़र्क़ और रद्दोबदल से कलमे के मानी बदल जाते हैं। कभी इस्म (संज्ञा) से फ़ेल (क्रिया) और फ़ेल से इस्म बन जाता है, हालाँकि लिखावट वही ज्यों की त्यों रहती है, मसलन अंग्रेज़ी में कॉन्ट्रैक्ट और कॉन्ट्रैक्ट। मुकालमे में एक और चीज़ भी है, जो कलाम के मानी और मुतकल्लिम (वक्ता) की मंशा पर गहरा असर रखती है। यानी लहजे से अल्फ़ाज़ पर ज़ोर डालना जिसे अंग्रेज़ी में एम्फेसिस कहते हैं, इसका ताल्लुक़ कलाम से है, कलमे से नहीं। इसकी तशरीह एक जुमले से बख़ूबी हो जाएगी जिसमें यही कलमात का आवाज़ का ज़ोर अलग-अलग मानी पैदा कर देता है। वह जुमला है:

    'मैं कल दिल्ली जाऊँगा'

    (1) मैं कल दिल्ली जाऊँगा? (आपने यह किससे सुना, मैंने तो ऐसा इरादा नहीं किया)

    (2) मैं कल दिल्ली जाऊँगा! (यह कौन कहता है कि कल जाऊँगा, अभी जाने की तारीख़ मुक़र्रर नहीं हुई)

    (3) मैं कल दिल्ली जाऊँगा! (और लोग कल जाएँगे, मेरा अभी तय नहीं पाया)

    (4) मैं कल दिल्ली जाऊँगा। (और कोई जाए न जाए, मैं ज़रूर जाऊँगा)

    (5) मैं कल दिल्ली जाऊँगा। (आज या परसों नहीं, कल जाऊँगा)

    (6) मैं कल दिल्ली जाऊँगा। (बंबई या बंगलौर नहीं, दिल्ली जाऊँगा)

    आपने देखा कि लहजे और आवाज़ के उतार-चढ़ाव ने इन चारों लफ़्ज़ों में क्या मानी पैदा किए। जुमला इस्तिफ़हामिया (प्रश्नवाचक), निदाइया (विस्मयादिबोधक) से ख़बरिया (कथनात्मक) और इंशाइया (भावनात्मक) हो गया। इसी तरीक़े पर और आधी दर्जन सूरतें इस जुमले की निकल सकती हैं। फ़साहत-ए-मुतकल्लिम की हक़ीक़त बस यही और इतनी है। इससे ज़्यादा फ़न-ए-ख़िताबत (भाषण कला) से ताल्लुक़ रखता है। अब फ़साहत-ए-कलाम के बारे में अर्ज़ करना है। इसकी तारीफ़ (परिभाषा) की गई है, ख़ुलूस आनस्त अज़ ज़ोफ़-ए-तालीफ ओ तनाफ़ुर-ए-कलमात ओ ताक़ीद।

    फ़साहत-ए-कलाम की यह तारीफ़ पुरानी किताबों से ली गई है। एक साहब ने फ़साहत में ख़लल डालने वाले इन तीन दोषों में इज़ाफ़ा किया और तकरार-ए-कलमा-ए-वाहिद, तवाली-ए-इज़ाफ़त, इब्तिज़ाल, तग़य्युर, इस्काल और तनाक़ुस की बढ़ोतरी फ़रमाई। एक और साहब ने इस फ़ेहरिस्त को इतना लंबा किया कि फ़साहत की तारीफ़ में बीस दोष गिन कर दस उयूब-ए-क़ाफ़िया (क़ाफ़िए के दोष) भी शामिल कर दिए।

    वह तीन ऐबों से ख़ुलूस (मुक्ति) दरकार हो या तीस ऐबों से, कलाम के दोषों की इन फ़ेहरिस्तों को फ़साहत-ए-कलाम की तारीफ़ क़रार देना माक़ूलियत (तार्किकता) से ख़ारिज है और फिर तर्क और प्रमाण का साया तक नहीं पड़ने पाता। इस लिटरेचर को देखने से यह भी साबित होता है कि इन दोषों की कैफ़ियत और कमियत (गुणवत्ता और मात्रा) के बारे में मतभेद भी है। बोस्ताँ का मतला है,

    बनाम-ए-जहाँ-दार जाँ-आफ़रीं

    हकीम-ए-सुख़न बर ज़बाँ-आफ़रीं

    एक बुज़ुर्ग दूसरे मिसरे में ज़ोफ़-ए-तालीफ का नुक़्स निकालते हैं कि दो कलमों में जो फ़ाइलियत (कर्ता होने) के मानी रखते हैं, फ़स्ल (अलगाव) जायज़ नहीं और फिर 'ख़ून-ए-दिल-आशाम' की तरह अलगाव की वजह से महज़ इज़ाफ़त ही नहीं बल्कि यहाँ हर्फ़-ए-जार (संबंधबोधक अव्यय) है। दूसरे बुज़ुर्ग इस मिसरे में ज़ोफ़-ए-तालीफ मानते ही नहीं।

    ज़ोफ़-ए-तालीफ, तनाफ़ुर-ए-कलमात, ताक़ीद वग़ैरह की माहियत (प्रकृति) बताना और मिसालें पेश करना फ़ुज़ूल मालूम होता है। वह सब कुछ प्रचलित किताबों में आ चुका है जो आपकी नज़र से गुज़र चुकी हैं।

    यहाँ एक सवाल यह उठता है कि क्यों मुतक़द्दिमीन (पूर्ववर्तियों) ने फ़साहत-ए-कलाम की तारीफ़ में सिर्फ़ तीन दोषों से ख़ुलूस (मुक्ति) की ताकीद की और क्यों मुतवस्सितीन (मध्यवर्तियों) और मुताख़िरीन (परवर्तियों) ने इस तादाद को दस गुना कर दिया। अगर यह कहा जाए कि पुराने ज़माने में कलाम पर और दोष लग ही नहीं सकते थे, लोग ज़्यादा फ़सीह लिखते थे। ज्यों-ज्यों कलाम फ़साहत के मेयार (स्तर) से गिरता गया, दोषों की फ़ेहरिस्त बढ़ती गई। यह दलील उस वक़्त क़ुबूल हो सकती थी जब एक दौर के कलाम का मुवाज़ना (तुलना) दूसरे दौर के कलाम से किया जाता। जैसे ज़माना-ए-जाहिलियत की शायरी की तुलना बेसत (पैग़ंबरी मिलने) के बाद के ज़माने की शायरी से की जाती है।

    फ़साहत इल्म-ए-मानी (अर्थ-विज्ञान) का सबसे बड़ा हिस्सा है। ज़्यादातर इस वजह से कि कलाम-ए-बलीग़ के लिए पहले फ़सीह होना लाज़िमी है। इल्म-ए-मानी और बयान वग़ैरह की तारीफ़ें वही बरक़रार हैं, लेकिन फ़साहत की तारीफ़ कहिए या फ़साहत-ए-कलाम की तारीफ़ में क्यों तब्दीलियाँ होती रहीं? इसकी दो वजहें ज़ेहन में आती हैं। एक तो यह कि मुतक़द्दिमीन की बनाई हुई तारीफ़ जो कुछ भी थी, वह जामे और माने (व्यापक और सटीक) नहीं थी और दूसरे यह कि फ़साहत के मामले में तक़रीबन सबका ज़ेहन ग़ैर-मुस्तक़िल (अस्थिर) था। उनके मिज़ाज को चूँ-ओ-चरा (बहस) की बर्दाश्त न थी। इसी वजह से उनके मलफ़ूज़ात (कथनों) में तख़र्रुज और तामिया (निष्कर्ष और अस्पष्टता) का दख़ल देखा जाता है। सबने अपना ज़ोर बलाग़त पर ख़र्च किया। फ़साहत का ज़िक्र चलते-चलते किसी ने मुक़द्दमे (प्रस्तावना) में कर दिया, किसी ने ख़ातमे पर। जभी तो आज हर कोई अच्छे से अच्छे शायर को मुँह खोल कर कह गुज़रता है: फ़सीह नहीं, यह लफ़्ज़ फ़सीह नहीं। भई वजह क्या है, क्यों फ़सीह नहीं? जवाब मिलता है—सुना नहीं, कानों को भला नहीं मालूम होता।

    उर्दू में जो अराजकता और अव्यवस्था फैली हुई है, उसका कारण अतिवादी साहित्यकारों का मानसिक भटकाव और दिमागी बेचैनी है। पूर्वज हर हाल में धन्यवाद के पात्र हैं कि वे कम से कम एक बुनियाद तो डाल गए। बाद में आने वालों का यह फ़र्ज़ था कि अगर उसमें कहीं टेढ़ापन और कमज़ोरी के लक्षण थे, तो उसे एक सीधी रेखा का रूप देते ताकि सारी उलझनें और गांठें निकल जातीं। सक्काकी और वतवात, ख़ां आरज़ू या शम्सुद्दीन फ़क़ीर का कहना कोई आयत और हदीस तो था ही नहीं कि उस पर कहीं उंगली उठाना कुफ़्र या कोई बहुत बड़ा पाप था। बात यह है कि जैसा कि मैंने शुरू में अर्ज़ किया है, सजावट को उपयोगिता पर प्राथमिकता दी गई, इससे कलाम (रचना) में बहुत से दोष पैदा हो गए। इसकी व्याख्या में ग़ालिब और नासिख़ का एक-एक शेर पेश किया जाता है। मैं इस बारे में अपनी राय सुरक्षित रखूंगा कि इन शेरों पर जो आपत्तियां उठाई गई हैं, वे सही हैं या नहीं? इन शेरों को पेश करने का मेरा मक़सद बस यह है कि जानकारों को भी इनकी शुद्धता और फ़साहत (वाक्पटुता) में शक है, और शक करने वालों की साहित्यिक हैसियत सब पर ज़ाहिर है और सर्वमान्य है। ग़ालिब का शेर उनके दीवान का मतला (पहला शेर) है:

    नक़्श फ़रियादी है किसकी शोख़ी-ए-तहरीर का

    काग़ज़ी है पैरहन हर पैकर-ए-तस्वीर का

    नासिख़ का मशहूर और साफ़ मतला है:

    मेरा सीना है मशरिक़ आफ़ताब-ए-दाग़-ए-हिज्रां का

    तुलू-ए-सुब्ह-ए-महशर चाक है मेरे गरेबां का

    पहले शेर को ग़लत बताया गया और दूसरे को बेमानी। आपत्ति की प्रकृति से मतलब न रखकर, ज़रूर आपकी भी यह राय होगी कि कलाम की सजावट की अधिकता ने विद्वान आलोचकों को आपत्ति और आलोचना का मौक़ा दिया। आप देखते हैं कि इन दोनों शेरों में सजावट किस कमाल की है। इसमें कुछ और जोड़ने की गुंजाइश नहीं है।

    जैसा कि अर्ज़ किया गया है, सजावट का शौक़ जब हावी हो जाता है तो इंसान की सोचने-समझने की शक्ति उपयोगिता की तरफ़ से सुन्न हो जाती है और उसकी चेतना या कहिए उसकी पूरी मानसिकता, सजावट और बनावट की ग़ुलाम हो जाती है। आपको इंतज़ार होगा कि आख़िर मैंने अपने दिमाग़ में फ़साहत की क्या परिभाषा तय की है। सुनिए, सच्चाई सुनने वाले कानों से सुनिए और सुधार की नज़र से देखिए: फ़साहत कलाम की वह ख़ूबी है जो पढ़ने या सुनने वाले के दिमाग़ को लिखने या बोलने वाले के दिमाग़ के सबसे क़रीब पहुंचा देती है।

    अब यह देखना है कि दिमाग़ी क़रीबी किन तरीक़ों से हासिल हो सकती है, इसके कई स्तर हैं। पहला स्तर समझाना और समझना है। कलाम ऐसा हो कि लिखने वाला अपने मन की बात पढ़ने वाले को समझा सके और पढ़ने वाला बिना किसी दिक़्क़त और परेशानी के उसे समझ सके। दूसरा स्तर है आनंद लेना या मज़ा उठाना, यानी सुनने और पढ़ने वाले को उस कलाम से ख़ुशी और सुकून हासिल हो। और 'सुभान अल्लाह' अनायास ही उसकी ज़बान से निकल पड़े। कहिए कि रूह झूम उठे। तीसरा और आख़िरी स्तर है प्रभाव, इसके मायने हैं कि श्रोता आपके कलाम से प्रभावित होकर आपका हमख़याल (समान विचार वाला) हो जाए। दूसरे शब्दों में यह कहिए कि दोनों में पूरी दिमाग़ी क़रीबी और एकता पैदा हो जाए। इन तीनों स्थितियों को फ़साहत कहिए या लेखन का विकास, यही कलाम की चरम सीमा है।

    फ़साहत के इस क्रमिक विकास के स्तरों में बीच वाला स्तर कुछ स्पष्टीकरण चाहता है। हर भाषा और साहित्य के जानकार उस आनंद को अच्छा नहीं मानते जिसमें उत्तेजना या एक तरह की बर्बरता का शोर पाया जाए। हुसैन सागर से जब आपकी बंसी ने एक बड़ी और कम कांटों वाली मछली निकालकर किनारे पर डाली, उस वक़्त आपको मज़ा आया होगा और आप ख़ुश हुए होंगे, और जब आपने उसी हुसैन सागर से एक डूबते हुए शख़्स की जान बचाई, तो उस वक़्त भी आपको ख़ुशी हुई और सुकून मिला। अब आप ख़ुद देख लें कि इन दोनों स्थितियों की मानसिक प्रकृति में क्या फ़र्क़ है। वह शारीरिक उत्तेजना जिसमें बर्बरता का जोश और शोर हो, वह दिल में उतरने वाली नहीं होती। इसलिए वह टिकाऊ नहीं होती, क्योंकि उसकी बुनियाद में आध्यात्मिकता नहीं बल्कि भौतिकता कूट-कूट कर भरी है। शायर कह गया है और किस हसरत से कह गया है:

    हक़ीक़त तुम पे खुल जाए अभी इस दर्द-ए-उल्फ़त की

    घड़ी भर तुम जो मेरे दिल को अपने दिल में रहने दो

    शायर ने अपनी धुन में दिल में दिल डालने की तमन्ना ज़ाहिर की। मैं इसे दूसरे अंदाज़ में दिमाग़ी क़रीबी का नाम देता हूं। दोनों बातें असल में एक ही हैं। जब ऐसे शख़्स से आपका वास्ता पड़े जो आकर्षक हो, मीठा बोलने वाला हो, अच्छे शिष्टाचार और नेक चरित्र वाला हो, तो उसके लिए ज़रूर आपके दिल में लगाव का एहसास पैदा होगा। इसी तरह जब ऐसा कलाम पढ़ने या सुनने में आए जिसमें शब्द सही और संगीतमय हों, जिसके वाक्यों की बुनावट चुस्त और सुलझी हुई हो, जिसमें शुरू से आख़िर तक कल्पना की उड़ान हो, जिसका विषय आकर्षक और अर्थ दिल को लुभाने वाला हो, मगर जिस मोती को पाने के लिए आपको हिमालय पलटने की ज़रूरत न पड़े; ऐसा कलाम पढ़ने और सुनने वाले के दिमाग़ को, उसके दिलो-दिमाग़ को अपनी तरफ़ खींचेगा और उन्हें उस कलाम को अपने दिमाग़ में उतारने के लिए कम से कम वक़्त और ध्यान लगाना पड़ेगा।

    इसे मैं कहता हूं एक दिमाग़ का दूसरे दिमाग़ के सबसे क़रीब होना। जिन हस्तियों ने इंसानों की मानसिकता पलट दी, पहेलियां बुझाना और लच्छेदार बातें करना उनसे कोसों दूर थीं। क़ुरआन मजीद की फ़साहत सर्वसम्मति से एक मिसाल है। प्राच्यविद् (पूरब के विद्वान) इस बात पर सहमत हैं कि ऋग्वेद में जो ऋचाएं उषा यानी सुबह होने की शान में हैं, उनसे बढ़कर फ़सीह (प्रभावशाली) कलाम अन्य भाषाओं की कविता में नहीं मिलता। इसी संदर्भ में वह प्रभाव और मानसिक खिंचाव आता है जो मार्टिन लूथर के कलाम से यूरोप की मानसिकता पर पड़ा।

    पहले पेड़ हुआ या बीज? या प्राथमिकता विचार की है या बोली की? ऐसे सवालों की उधेड़बुन में पड़ना बेकार की कोशिश है। वह कुछ भी हो, यह बात तो एक स्पष्ट सच्चाई है कि कल्पना बिना शब्दों के असंभव है। इसी तर्क के आधार पर शैली का प्रभाव कल्पना पर सर्वमान्य है। अच्छी बात और अच्छे विचार के लिए भाषा और शैली भी अच्छी चाहिए, बल्कि उनका प्रभाव बुरी बात को भी दिलकश बना देता है। मुतनब्बी ने एक शायर को सुनकर कहा:

    व अस्मउ मिन अल्फ़ाज़िल लती

    यलज़्ज़ु बिहा समई व लौ ज़म्मनत शत्मी

    (उसकी ज़बान से मेरे कान आनंद पाते हैं, भले ही उनमें गालियां भरी हों और वे मुझ ही पर पड़ रही हों।)

    क़िस्सा मुख़्तसर (संक्षेप में) फिर अर्ज़ किया जाता है: फ़साहत कलाम की वह ख़ूबी है जो पढ़ने या सुनने वाले के दिमाग़ को लिखने या बोलने वाले के दिमाग़ के सबसे क़रीब कर देती है।

    'दिमाग़ी क़रीबी' बहुत ही व्यापक शब्द है। इस विषय पर न सिर्फ़ भाषा विज्ञान बल्कि मनोविज्ञान के तहत बहुत कुछ कहा जा सकता है। अगर मैं यह राम कहानी सुनाने बैठूं तो लेक्चर एक पोथा बन जाएगा और विषय फिर भी अधूरा रहेगा। इसलिए बेहतर है कि दिमाग़ी क़रीबी की मिसाल या व्याख्या में उस्ताद का शेर सुनाकर आपसे विदा लूं, फ़रमाया है:

    देखना तक़रीर की लज़्ज़त कि जो उसने कहा

    मैंने यह जाना कि गोया यह भी मेरे दिल में है

    हाशिये

    (1) इमरउल क़ैस का शेर है: ग़दायरुहु मुस्तशज़िरातून इलल उला तज़िल्लुल इक़ासु फ़ी मुसन्ना व मुर्सलि

    (2) सूरह यासीन

    (3) सूरह हूद

    (4) क़ौल-ए-फ़ैसल, लेखक मौलाना इमाम बख़्श सहबाई देहलवी।

    (5) क़ौल-ए-फ़ैसल, लेखक मौलाना इमाम बख़्श सहबाई देहलवी।

    (6) बह्र-उल-फ़साहत, पृष्ठ 344

    (7) शरह-ए-दीवान-ए-ग़ालिब, लेखक तबातबाई

    (8) गंजरीना-ए-तहक़ीक़, लेखक बेख़ुद मोहानी।

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