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माज़ी के अदब-ए-आलिया से मुताल्लिक़

मुमताज़ हुसैन


अनुवाद : Rekhta Editor

मुमताज़ हुसैन

माज़ी के अदब-ए-आलिया से मुताल्लिक़

मुमताज़ हुसैन

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    एक ऐसे ज़माने में जब वर्ग संघर्ष तेज़ हो जाता है, तो जज़्बाती उफ़ान के कारण कभी-कभी अदबी परख में ग़लतियां भी हो जाती हैं। यह तसव्वुर (विचार) सियासी तेज़ी का नहीं है क्योंकि सियासत तो तेज़ होती ही है। बुर्जुआ निज़ाम के अंतर्विरोध जैसे-जैसे उभरते जाएंगे, वर्ग संघर्ष का तेज़ होना लाज़िमी है। इतिहास की मांग तो इन्हीं अंतर्विरोधों को ज़्यादा से ज़्यादा उभारने और तेज़ करने की ही है, लेकिन जब सामाजिक विकास के नियमों को बहुत भोंडे और मशीनी तौर पर साहित्य पर लागू किया जाने लगता है, तो सिर्फ़ साहित्य को ही नुक़सान पहुंचता है बल्कि इंक़लाबी ताक़तें भी कमज़ोर होती हैं।

    मार्क्सवादी तनक़ीद (आलोचना) में आर्थिक बुनियाद की प्राथमिकता और वर्ग संघर्ष अदबी जांच-पड़ताल का बेहतरीन औज़ार है, लेकिन जब इस औज़ार को बाक़ायदा तमाम हालात और इल्म का जायज़ा लिए बिना मशीनी तौर पर इस्तेमाल किया जाता है, तो यही औज़ार ज्ञान-दुश्मनी और जहालत का हथियार भी बन जाता है। समाजवादी इंक़लाब के पहले और बाद में सिर्फ़ रूस ही में बल्कि एंगेल्स और मार्क्स के ज़माने में भी ख़ुद जर्मनी में ऐसे आलोचक मौजूद थे जो मार्क्सवाद को एक मशीनी इल्म बनाकर अतीत के अदब को जांचने की कोशिश करते थे। ऐसे मौक़ों पर मार्क्स और एंगेल्स दोनों ही ने अपनी क़लम उठाई है। इसी तरह लेनिन ने बकवास करने वाले शिक्षकों के ख़िलाफ़ सिर्फ़ बहुत कुछ लिखा है बल्कि अमली तनक़ीद (व्यावहारिक आलोचना) के ज़रिए हमारा मार्गदर्शन भी किया है। हम कोशिश करेंगे कि अपने अतीत के अदब की कसौटी बनाते वक़्त उनकी शिक्षाओं को सामने रखें। इससे पहले कि इतने बड़े मसले को हाथ लगाया जाए, मैं भूमिका के तौर पर सिर्फ़ सामाजिक तरक़्क़ी के अर्थ और क्लासिकी अदब के कुछ बुनियादी मसलों को पेश करूंगा।

    जिसे हम तरक़्क़ी कहते हैं, उसका संबंध तरक़्क़ी की अलग-अलग दिशाओं से है। आर्थिक और राजनीतिक तरक़्क़ी के साथ अगर भौतिक और सांसारिक दृष्टिकोण और मानव जाति की एकता का विचार उभर सके, तो हमें समझना चाहिए कि अभी हमारी तरक़्क़ी सिर्फ़ अधूरी ही है बल्कि उसमें खोट भी है, क्योंकि सामाजिक चेतना एक नैतिक ताक़त है जो आर्थिक बुनियादों पर असर भी डालती है। अगर सामाजिक चेतना ज़्यादा मज़बूत नहीं है, तो मुमकिन है कि वह हमें ग़लत आर्थिक निज़ाम की तरफ़ ले जाए। यही ख़तरा हमें रचनाओं के फ़ौरी असर ही को देखने तक सीमित नहीं रखता है, बल्कि उसके दूरगामी असर का अध्ययन भी ज़रूरी कर देता है। मुमकिन है किसी ज़माने की साहित्यिक रचना फ़ौरी असर के लिहाज़ से कमज़ोर हो, लेकिन सामाजिक तरक़्क़ी में दूरगामी असर रखने वाली हो। इस हक़ीक़त का एक विपरीत पहलू भी है।

    यह बात तो मानी हुई है कि अदब और तहज़ीब की तरक़्क़ी वर्गीय समाज ही में हुई। इसलिए वर्गीय असर की छाप तो अदब और कल्चर दोनों ही पर है, लेकिन जब हम इस तरह सोचें तो हमें सामाजिक तरक़्क़ी के अर्थ को भी अपने ज़हन में रखना चाहिए। ग़ुलामी का दौर शोषणकारी निज़ाम को वजूद में लाने के लिहाज़ से एक बुरा ज़माना माना जाता है। लेकिन क़बाइली निज़ाम के मुक़ाबले में इस दौर में इंसान ने ज़्यादा तरक़्क़ी की है, इसलिए इस दौर का कुछ हिस्सा तरक़्क़ीपसंदी का भी दौर रहा है। यूनान का तमाम इल्म और अदब इसी दौर में फला-फूला। इस दौर के इल्म और अदब ने तरक़्क़ी और प्रतिक्रियावादी दोनों ही ताक़तों की नुमाइंदगी की है। किसी भी दौर की सब चीज़ें तरक़्क़ीपसंद नहीं होती हैं और उन्हें ऐतिहासिक तक़ाज़ों का नतीजा ही कहकर टाला जा सकता है। तरक़्क़ी और प्रतिक्रियावादी परंपराएं लगातार एक-दूसरे से टकराती रही हैं।

    सामाजिक विकास तरक़्क़ी की पुरानी रिवायतों को आगे बढ़ाकर एक नई शक्ल में तब्दील करता रहा है। वह दोषपूर्ण और ग़ैर-वैज्ञानिक रिवायतों को भी ख़ारिज करता रहा है। यह सिलसिला इस वक़्त तक क़ायम है और क़ायम रहेगा। अगर बुनियादी लिहाज़ से देखा जाए तो यह तरक़्क़ी दो बिंदुओं में सिमट आती है: उत्पादन के तरीक़ों को बढ़ाने और उससे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को फ़ायदा उठाने का मौक़ा देना, और इंसानियत को आज़ाद कराने की जद्दोजहद को आगे बढ़ाते रहना। ये ताक़तें अलग-अलग देशों में एक ही वक़्त में अपने मुल्की हालात के तहत अलग-अलग शक्लों में काम करती रहीं। हम एक मुल्क की मिसाल को दूसरे मुल्क पर मशीनी तौर पर लागू नहीं कर सकते हैं। फिर यह कि इल्म और अदब का रिश्ता आर्थिक बुनियादों के साथ वर्गीय निज़ाम में उतना सीधा नहीं रहा है जितना कि क़बाइली निज़ाम में था।

    वर्गीय निज़ाम में तो इन चीज़ों ने अक्सर एक बार आर्थिक बुनियाद से तय होकर अपनी एक आज़ाद ज़िंदगी भी अख़्तियार कर ली है। अक्सर इनकी यह आज़ादी इतनी मज़बूत होती है कि वे अपनी तरक़्क़ी के ख़ास नियम और तर्क भी बना लेते हैं। हमें वैचारिक तहरीकों (आंदोलनों) को जांचते वक़्त सिर्फ़ वर्ग संघर्ष ही को देखना है बल्कि उनके सिलसिले, तर्क और नियम का भी पता चलाना है। चूंकि वैचारिक तहरीकें अदब पर गहरे असर छोड़ती हैं, इसलिए उनका अध्ययन उनके तर्क के साथ बहुत ज़रूरी है। वैचारिक तहरीकें इसलिए भी अहम हैं कि वे एक ख़ास युग के दृष्टिकोण और हक़ीक़त के बोध का पता भी देती हैं। इनकी मदद से अदब को समझने में बड़ी आसानी होती है। अदब की परिभाषा लेनिन ने सिर्फ़ इस तरह की है कि अदब बाहरी हक़ीक़त का आईना है, बल्कि इस तरह भी की है कि अदब हक़ीक़त के बोध में मदद भी करता है। इन्हीं मायनों में अदब हमारी जिस्मानी, ज़हनी और जज़्बाती ज़िंदगी की एक ऐसी तस्वीर है जिसकी मदद से किसी भी ज़माने का इतिहास तैयार किया जा सकता है।

    इतिहास पूरे समाज की ज़िंदगी का इतिहास होता है जो हक़ीक़त में नए और पुराने की जंग का इतिहास होता है। तरक़्क़ीपसंद अदीब (साहित्यकार) किसी किसी मायने में नए के साथ होता है। उस वक़्त यह भी ज़रूरी नहीं है कि वह पूरी तरह से नए के साथ हो, क्योंकि जिस हद तक एक दौर की विरोधी क़दरों (मूल्यों) की उलझी हुई तस्वीर अवाम के ज़हनों में झलकती है, अदीब का ज़हन भी उलझा रहता है। इसीलिए वह अक्सर विरोधी बातें भी करता है। देखना यह है कि वह बुनियादी तौर पर पुराने के ख़िलाफ़ जंग करके कौन-सी नई चीज़ें लाना चाहता है। अगर वह सिर्फ़ अतीत की चीज़ें वापस लाने की कोशिश कर रहा है तो हम उसे प्रतिक्रियावादी समझेंगे, चाहे वह एक ख़ास युग के पुरानेपन के ख़िलाफ़ ही जंग क्यों कर रहा हो।

    मैंने इस चीज़ का ज़िक्र इसलिए किया है कि जब पतनशील शासक वर्ग ख़ुद को ज़िंदा रखने की कोशिश करता है, तो बहुत-से नए विचारों को भी अपनाता है, लेकिन वह इन विचारों को सिर्फ़ अपने वर्गीय हितों के लिए इस्तेमाल करता है। उसकी यह कोशिश असल में पुराने को ज़िंदा रखने की कोशिश होती है। इसकी साफ़ मिसाल इस्लामी इतिहास में इमाम ग़ज़ाली का ज़माना है। उस वक़्त इस्लाम की शरिया हुकूमत पूरी तरह पतन की हालत में थी। शरिया और फ़िक़्ह (इस्लामी न्यायशास्त्र) पर चारों तरफ़ से हमले हो रहे थे। शरिया के दुश्मन यूनानी इल्म से लैस थे। आख़िरकार इमाम ग़ज़ाली को भी यूनानी इल्म-उल-कलाम (तर्कशास्त्र) को उधार लेना पड़ा, लेकिन इमाम ग़ज़ाली ने उसे जिन मक़सदों के लिए इस्तेमाल किया, वे पूरी तरह प्रतिक्रियावादी थे। मौजूदा दौर में इसकी मिसाल अल्लामा इक़बाल की वैचारिक कोशिशें हैं; अल्लामा इक़बाल ने इस्लाम की रूहानी जम्हूरियत (आध्यात्मिक लोकतंत्र) को वापस लाने की कोशिश की है। इस कोशिश में उन्होंने उन साधनों को भी इस्तेमाल करना चाहा है जिनसे यूरोप में तरक़्क़ी हुई थी। लेकिन ऐसे तमाम साधनों को वह अपने ख़ास मक़सद का पाबंद भी कर देते हैं और यही चीज़ उनके कलाम में अंतर्विरोध पैदा कर देती है। क्योंकि भौतिक साधन ग़ैर-भौतिक मक़सदों के साथ मेल नहीं खा सकते हैं।

    अगर इंसान प्रकृति के तत्वों पर नियंत्रण हासिल करेगा तो उसका मक़सद सिर्फ़ भौतिक होगा। यही वह कारण है कि इक़बाल के कलाम के प्रगतिशील हिस्से, ख़ुद अपना विरोध करने लगते हैं। यूँ तो अल्लामा इक़बाल का 'ख़ुदी' का दर्शन बड़ा जानदार मालूम होता है। लेकिन जब वह शरीयत यानी ईश्वरीय प्रतिनिधित्व का पाबंद हो जाता है तो उसके विद्रोह की सीमाएँ भी तय हो जाती हैं। मैं उन लोगों में से नहीं हूँ जो शरीयत को एक लचीली अवधारणा बनाकर हर नई व्यवस्था पर लागू कर देते हैं। शरीयत के वैचारिक आधार बिल्कुल तय हैं और इसके व्यवहार का इतिहास एक लंबे-चौड़े दौर पर फैला हुआ है। अगर हम इस्लामी इतिहास पर नज़र डालें तो यह मानना पड़ेगा कि शरीयत को शोषक वर्ग ने इस्तेमाल किया है और जब व्याख्याएँ लिखने का वक़्त आया तो तमाम धर्मशास्त्रियों ने ऐसे ही बिंदु पेश किए जिनसे शासक वर्ग की स्थिति मज़बूत हुई। अंततः ख़िलाफ़त (धार्मिक राज्य) एक ऐसी संस्था बन गई जिसके विरोध को एक पवित्र कर्तव्य बना लिया गया।

    शरीयत का विरोध इस्लामी इतिहास का एक ज़बरदस्त कारनामा है। इस विद्रोह की शुरुआत उन 'वहदत-उल-वजूद' (सर्वेश्वरवाद) को मानने वाले सूफ़ियों ने की, जो यूनान के वहदत-उल-वजूद के दर्शन से प्रभावित थे। यह दर्शन अफ़लातून (प्लेटो) का नहीं बल्कि प्लोटिनस का था, जिसने अफ़लातून के आदर्शवाद और डेमोक्रिटस के भौतिकवाद को मिलाने की कोशिश की थी। विद्रोह की इस आवाज़ को ज़ुन्नून मिस्री, बायज़ीद बिस्तामी और हल्लाज ने उठाया। उनके लिए यह आवाज़ उठानी ही मुश्किल थी, अगर यूनानी वहदत-उल-वजूद के दर्शन को 'तौहीद-ए-मुतलक़' (पूर्ण एकेश्वरवाद) के दर्शन पर श्रेष्ठता हासिल होती। तौहीद-ए-मुतलक़ के दर्शन में पदार्थ एक रचना है और एक विशिष्ट समय और स्थान का पाबंद है। इसकी एक शुरुआत और अंत है। वह अपनी गति और रूप धारण करने में स्वतंत्र नहीं है। क्योंकि इसका प्रेरक और रचयिता एक दूसरी शक्ति है।

    वहदत-उल-वजूद के दर्शन में पदार्थ, आत्मा के साथ सह-अस्तित्व रखता है। पदार्थ भी आत्मा के साथ-साथ अनादि और अनंत है, पदार्थ का कोई रचयिता नहीं है बल्कि पदार्थ और आत्मा एक दूसरे के अभिन्न अंग हैं। इस तरह इंसान का कर्म और इच्छा ईश्वरीय इच्छा में शामिल हो जाता है, अगर इंसान किसी चीज़ की रचना या विनाश करता है तो उसमें ईश्वरीय इच्छा का भी दख़ल है क्योंकि ईश्वरीय इच्छा का प्रकटीकरण पदार्थ के माध्यम यानी मानवीय कर्म के ज़रिए ही हो सकता है। वहदत-उल-वजूद को मानने वाले सूफ़ियों ने इसी तर्क के आधार पर इस्लामी नैतिकता को दंड और पुरस्कार से आज़ाद करके कर्म में बदल दिया और उन तमाम धार्मिक दीवारों को गिराने की कोशिश की जो इंसानों के बीच खड़ी कर दी गई थीं। इन कारणों से यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि सूफ़ी जनता में बहुत लोकप्रिय थे। वे दरबारी ज़िंदगी से बचते थे। उन्होंने इस्लामी इतिहास में धार्मिक राज्य के स्थापित होने का विरोध भी किया है।

    जिस हद तक यूनानी वहदत-उल-वजूद का दर्शन और पारसी ईसाई भौतिक दर्शन की परंपराएँ तौहीद-ए-मुतलक़ के दर्शन के साथ मिलती गईं, सूफ़ियों के क्रांतिकारी स्वभाव में भी कमज़ोरी आती गई। इस दर्शन ने पहला समर्पण (बैअत) इमाम ग़ज़ाली के हाथों किया और दूसरा समर्पण मुजद्दिद अल्फ़ सानी सरहिंदी के हाथों। इमाम ग़ज़ाली ने वहदत-उल-वजूद को इसके भौतिक अंश से बिल्कुल ही आज़ाद कर दिया। इंद्रियगोचर दर्शन को रद्द करके तसव्वुफ़ (सूफ़ीवाद) को आंतरिक अभ्यास और महारत की चीज़ बना दिया। इसी के साथ-साथ उन्होंने शरीयत और तरीक़त (सूफ़ी मार्ग) को भी मिलाने की कोशिश की। इसी तरह जब मुजद्दिद अल्फ़ सानी सरहिंदी ने 'हमा ओस्त' (सब वही है) को 'हमा अज़ ओस्त' (सब उसी से है) में बदला तो पदार्थ को बिल्कुल ही एक रचना का रूप दे दिया। इसके यह मायने नहीं कि वहदत-उल-वजूद का अपना आदर्शवादी दर्शन जो पदार्थ और आत्मा को मिलाता है, बहुत से मायनों में घातक साबित नहीं हुआ।

    यद्यपि वहदत-उल-वजूद वालों ने पदार्थ और आत्मा के द्वैत को मिलाने की नाकाम कोशिश की। वे आदर्शवाद से छुटकारा हासिल कर सके। उन्हें आत्मा को कर्ता और पदार्थ को कर्म बनाना ही पड़ा। यही कारण है कि इस दर्शन में चिंतन को कर्म पर प्राथमिकता दी गई है। सूफ़ियों के जीवन में चिंतनशीलता, ख़ामोशी और एकांतवास इन्हीं अवधारणाओं के तहत आया है, लेकिन इस दर्शन का एक सुंदर पहलू भी था। सूफ़ी इंसान को 'आलम-ए-अकबर' (महान ब्रह्मांड) मानते थे और प्रकृति के नियमों में सिर्फ़ इंसान के ही प्रकटीकरण पर अपना विश्वास रखते थे। मीर का ऐसा थका-हारा इंसान भी इस रहस्य से वाक़िफ़ था,

    हम आप ही को अपना मक़सूद जानते हैं

    अपने सिवाए किसको माबूद जानते हैं

    अपनी ही सैर करने पर जल्वागर हुए थे

    इस रम्ज़ को वलेकन मादूद जानते हैं

    यहाँ तो ख़ुदा को बंदे से यह पूछने की भी ज़रूरत नहीं रहती है कि बता तेरी रज़ा (मर्ज़ी) क्या है। नियति और स्वतंत्र इच्छा (जब्र-ओ-इख़्तियार) का झगड़ा तो सिर्फ़ उसी वक़्त बाक़ी रहता है जब हम पदार्थ को एक रचना मानें, यह कशमकश तो तौहीद-ए-मुतलक़ की ही दी हुई है। भला सत्रहवीं सदी का पतनशील तसव्वुफ़ इसकी ज़द से कैसे बच सकता था, अंततः मीर के हाथ से भी अपनी स्वायत्तता का विश्वास जाता रहा।

    इसी तरह हल्लाज का 'बक़ा-बिल्लाह' (ईश्वर के साथ अमरत्व) का दर्शन भी पतनशील दौर में ख़त्म हो गया था। सिर्फ़ 'फ़ना-फ़िल्लाह' (ईश्वर में विलीन होना) का लफ़्ज़ याद रह गया था। हल्लाज के 'बक़ा-बिल्लाह' के सिद्धांत के अनुसार इंसान ईश्वर की सत्ता के रचनात्मक गुणों में विलीन होकर एकात्मकता और रचना के लिए तत्पर होता है। अल्लामा इक़बाल ने इसी अवधारणा के तहत इंसान को रचयिता भी बताया है। 'फ़ना-फ़िल्लाह' वह दर्जा है जब वह अपने व्यक्तित्व को नई रचना के लिए फ़ना कर देता है। चूँकि 'बक़ा-बिल्लाह' में इंसान के बंदा (दास) रहने की अवधारणा कमज़ोर हो जाती है, इसलिए तौहीद-ए-मुतलक़ के मानने वालों ने इसका कड़ा विरोध किया। इसे कुफ़्र के बराबर माना। इसका अनिवार्य परिणाम यह था कि मुसलमान सूफ़ियों ने ज़्यादातर 'फ़ना-फ़िल्लाह' को ही बढ़ावा दिया। फिर यह कि सामंती व्यवस्था का पतन इस विचार को हवा देने में और भी मददगार साबित हुआ।

    ज़िंदगी में कोई भी नई रचना भौतिक विज्ञानों के बिना मुमकिन नहीं है। यहाँ अहल-ए-शरअ (शरीयत के अनुयायी) और अहल-ए-सफ़ा (सूफ़ी) दोनों ने ही भौतिक विज्ञानों को सत्य के बोध के दायरे से बाहर कर दिया। अहल-ए-सफ़ा तो इंद्रियगोचर चीज़ों से जुड़े भी रहे लेकिन अहल-ए-शरअ ने तो इसका भी विरोध किया। इन तमाम चीज़ों से ज़्यादा अहम बात तो यह है कि वहदत-उल-वजूद को मानने वाले बुनियादी तौर पर अगर एक तरफ़ प्राकृतिक दृश्यों की एकता के क़ायल थे, तो दूसरी तरफ़ ब्रह्मांडीय रचना के दृश्यों की वैश्विक स्थिति को मानते थे। समाज के बारे में उनकी यह अवधारणा नहीं थी कि व्यक्ति ने किसी समझौते के आधार पर अपने अधिकार समाज को सौंपे हैं, बल्कि यह कि इंसानों का समाज भी उसी तरह एक संसार है जैसे वनस्पतियों या निर्जीव वस्तुओं की दुनिया है। उनकी सामाजिक अवधारणा शहरी नहीं बल्कि वैश्विक है। इसी वजह से मानव जाति की एकता की अवधारणा उनकी शायरी में बहुत मज़बूत है। ग़ालिब का शेर है,

    बरोज़े कि मर्दुम शवंद अंजुमन

    शवद ताज़ा पैवंद जाँहा ब-तन

    लेकिन चूँकि वे पदार्थ के विकास और उसकी द्वंद्वात्मक प्रक्रिया से वाक़िफ़ थे, इसलिए सामाजिक विकास को वर्ग संघर्ष के रूप में देख सके। यह राज़ तो यूरोप में औद्योगिक क्रांति के बाद ही प्रकट हुआ। फिर हम सूफ़ियों से इसकी उम्मीद कैसे कर सकते हैं।

    यह एक छोटी सी बात है लेकिन कह देने में हर्ज़ ही क्या है। यूरोप को पहली बार गोएटे ने विश्व साहित्य का विचार दिया है और इसे इत्तेफ़ाक़ ही समझिए कि गोएटे वहदत-उल-वजूद (अद्वैतवाद) का समर्थक भी था। इस गोएटे के बारे में एंगेल्स ने लिखा है, गोएटे ख़ुदा के विचार के साथ खेलना नहीं चाहता था। उसे तो यह लफ़्ज़ ही बेचैन कर देता था। वह तो सिर्फ़ इंसानों ही के साथ घुला-मिला था। उसकी यह इंसान-दोस्ती, साहित्य से धर्म को बाहर कर देने की कोशिश, गोएटे का यह सबसे बड़ा कारनामा था। इस लिहाज़ से शेक्सपियर भी उसके बराबर नहीं है। लेकिन मैं इसे इत्तेफ़ाक़ नहीं समझता हूँ कि फ़ारसी और उर्दू साहित्य में सिर्फ़ वहदत-उल-वजूद को मानने वाले सूफ़ियों ही ने ख़ुदा के विचार को चुनौती दी है। मैं फ़ैज़ी और ग़ालिब के शेर पेश करना नहीं चाहता हूँ बल्कि मैं मौलाना रूम का एक शेर पेश कर रहा हूँ जिसकी मदद से आपको वहदत-उल-वजूद का दर्शन भी समझ में आएगा।

    मी गुफ़्त दर बयाबाँ रिंदे दोहोल दरीदा

    सूफ़ी ख़ुदा दारद नीस्त आफ़रीदा

    यहाँ मौलाना ने साफ़ लफ़्ज़ों में स्पष्ट कर दिया है कि चूँकि पदार्थ का कोई रचयिता नहीं है, इसलिए इंसान का भी कोई रचयिता नहीं है। यही तर्क हल्लाज को 'अनल-हक़' (मैं ही सत्य हूँ) की तरफ़ ले गया था और इस तर्क के तहत कितने सूफ़ी शायर 'ख़ाकम-ब-दहन' (मेरे मुँह में ख़ाक) कहकर ख़ामोश हो गए। मुझे यह कहने में झिझक नहीं है कि फ़ारसी और उर्दू शायरी में सामंती व्यवस्था के ज़माने तक इंसानी महानता के गीत इसी दर्शन के तहत आए हैं और वे सूफ़ी शायर भी जिन्होंने शरीयत के आगे समर्पण कर दिया, इंसान की महानता के एक हद तक क़ायल हैं, लेकिन उससे आगे क़दम उठाना नहीं चाहते। उन्होंने ज़्यादा से ज़्यादा सुधार का एक बीच का रास्ता अपनाया है, जिस हद तक अल्लामा इक़बाल हल्लाज के दर्शन से प्रभावित हैं, इंसान को हरीम-ए-किबरिया (ईश्वर के दरबार) में ला खड़ा भी किया है। लेकिन जिस हद तक वे इमाम ग़ज़ाली और सरहिंदी के सूफ़ीवाद से प्रभावित हैं, भौतिक दृष्टिकोण की, इंसानी महानता की नफ़ी (खंडन) भी की है।

    तौहीद-ए-मुतलक़ (पूर्ण एकेश्वरवाद) और वहदत-उल-वजूद के विरोधी सिरों को मिलाने ही की कोशिश में अल्लामा इक़बाल ने ख़ुदा-ए-ताला को असीमित और सीमित दोनों ही बताया है। और यही कोशिश इज्तेहाद (स्वतंत्र चिंतन) और तक़लीद (अनुकरण) के अंतर्विरोध को भी क़ायम रखती है। उनका यह कहना है कि इज्तेहाद तरक़्क़ी के ज़माने में करना चाहिए और तक़लीद पतन के ज़माने में, जब भी कोई रहनुमा इंसानों को ईश्वर का स्थान बताकर उसे मख़्लूक़ (रचना) की उपाधि दे देता है तो वह उसे ग़ुलाम बनाने पर मजबूर हो जाता है। इस पर और रोशनी डालने के लिए मैं लेनिन के लेख का उद्धरण पेश कर रहा हूँ, हक़ीक़त में यह ख़ुदा का विचार था जिसने पाशविक व्यक्तिवाद को दबाया है। यह काम शुरुआत की सामूहिक ज़िंदगी ने किया है, ख़ुदा के विचार ने हमेशा सामाजी जज़्बे को कमज़ोर किया है। ख़ुदा के विचार ने कभी भी व्यक्ति और समाज के रिश्ते को मज़बूत नहीं होने दिया है बल्कि शोषित तबक़े को ग़ुलामी की ज़ंजीरों में इस आस्था के साथ जकड़े रखा कि शासक तबक़े पर ख़ुदा का साया होता है।

    इसमें संदेह नहीं कि लेनिन ने जो कुछ लिखा है पश्चिम के इतिहास को सामने रखकर लिखा है लेकिन यह ग़लत भी नहीं है। क्योंकि ज़िल्ले-सुब्हानी (ईश्वर की छाया) का विचार तो हमारे यहाँ भी लागू रहा है। यह विचार सिर्फ़ तौहीद-ए-मुतलक़ (पूर्ण एकेश्वरवाद) ही का हिस्सा बन सकता है। वहदत-उल-वजूद में तो इसकी गुंजाइश ही थी लेकिन तौहीद-ए-मुतलक़ के दर्शन से प्रभावित होने के बाद तो सूफ़ियों के यहाँ भी वलियों (संतों) का एक सिलसिला क़ायम हो गया था, जो या तो सियासत से अलग हो गए थे या फिर शासक की रियायतों के मोहताज थे। जहाँ तक भौतिक दर्शन के दृष्टिकोण से देखने का ताल्लुक़ है, तौहीद-ए-मुतलक़ और वहदत-उल-वजूद दोनों ही ऐनी (आदर्शवादी) दर्शन हैं। लेकिन सामंती व्यवस्था के पिछले इतिहास में तौहीद-ए-वजूदी (अद्वैतवादी एकेश्वरवाद) ने सियासी निरंकुशता, धार्मिक कट्टरपन और ईश्वरीय तर्क के ख़िलाफ़ जो जंग की, उसे हम नज़रअंदाज़ भी नहीं कर सकते। उसने इस जंग में तर्कसंगत को अनुभवजन्य ठहराया। आँख-कान और स्वाद के आनंद की निंदा की और साहित्य में अनुभूतियों की तमाम सुंदरताओं को रचाया। उसने चित्रकारी, मूर्तिकला, संगीत, नृत्य, शेर-ओ-नग़्मा किसी भी चीज़ को वर्जित क़रार दिया।

    यह बात दूसरी है कि उसने हर चीज़ को एक पर्दा बनाया लेकिन सच तो यही है कि पर्दे को कभी उठा सका, क्योंकि इंसानी दिमाग़ पदार्थ से परे विचारों को ज़ेहन में ला ही नहीं सकता है। अगर पूरब में कुछ लोग हाफ़िज़ के दीवान का अध्ययन हक़ीक़त के रंग में करते हैं तो इसमें किसका क़ुसूर है। अगर गोएटे और हाइने ने हाफ़िज़ को सिर्फ़ सांसारिक ही के रंग में देखा तो अल्लामा इक़बाल को तो ख़ुश होना चाहिए था कि कम से कम दुनिया के एक हिस्से में अफ़लातूनी गोसफ़ंद (प्लेटोनिक भेड़) की आध्यात्मिकता कारगर नहीं है, लेकिन वे इस बात से भी उदास थे। वे तो यही चाहते थे कि हाफ़िज़ का अध्ययन सिर्फ़ मज़हबी रंग में किया जाए ताकि ईसाई पश्चिम और एशियाई मुसलमान उसके ईरानी पैगनिज़्म का विरोध करे, रह गई दुनिया के नष्ट होने की बात तो उसका विरोध तो कोई भी ऐसा शख़्स नहीं कर सकता है जो पदार्थ को रचना समझता है क्योंकि अगर पदार्थ रचना है तो उसकी एक शुरुआत है और एक अंत भी।

    कम से कम शरीयत को मानने वालों को तो दुनिया के नष्ट होने की शिकायत करना ही नहीं चाहिए। मुसलमान सूफ़ियों में तो यह चीज़ तौहीद-ए-मुतलक़ ही के दर्शन के तहत आई और वहदत-उल-वजूद की आवाज़ तो हमेशा यही रही है। हमसे पहले तो अबद (अंत) है और हमारे बाद अज़ल (आरंभ)। - हल्लाज। फिर यह चीज़ सिर्फ़ सूफ़ियों ही के साथ क्यों जोड़ दी गई। क़िस्सा यह है कि हेराक्लिटस के कथन के मुताबिक़ वहदत-उल-वजूद को मानने वाले भी इस बात को मानते थे कि हर चीज़ है और नहीं है यानी हर चीज़ एक रूप से दूसरे रूप में तब्दील होती रहती है,

    हर क़ितआ पर चमन के टुक ग़ौर से नज़र कर

    बिगड़ीं हज़ार शक्लें तब फूल ये बनाए

    - मीर

    मत सहल हमें जानो फिरता है फ़लक बरसों

    तब ख़ाक के पर्दे से इंसान निकलते हैं

    - मीर

    सब कहाँ कुछ लाला-ओ-गुल में नुमायाँ हो गईं

    ख़ाक में क्या सूरतें होंगी कि पिन्हाँ हो गईं

    - ग़ालिब

    शायद इसी कारण से बहुत से सूफ़ियों पर हुलूली (अवतारवाद) होने का इल्ज़ाम भी लगाया गया। लेकिन हेराक्लिटस के इस बिंदु को वैज्ञानिक तौर पर समझने के लिए प्राकृतिक विज्ञान की ज़रूरत थी जिससे एशिया मुद्दतों तक वंचित रहा। मजबूरन परिवर्तन और गति को फ़ना (विनाश) के समानार्थी कर दिया गया। यह तो सही है कि हर चीज़ फ़ना होती रहती है लेकिन वह एक नए रूप में बदलती रहती है। निरंतरता ज़िंदगी को है कि फ़ना को। यह बिंदु क़यामत के विचार और समय-स्थान के भौमिक और आकाशीय विभाजन ने भुला दिया। सूफ़ी शायर भी इस ग़लत विचार के शिकार हुए। इसलिए मीर और ग़ालिब दोनों ही के यहाँ यह दृष्टिकोण उलटा हुआ नज़र आता है। दोनों ही अमरता के राज़ को भुलाकर फ़ना को प्राथमिकता दे देते हैं,

    मिरी तामीर में मुज़्मिर है इक सूरत ख़राबी की

    हयूला बर्क़-ए-ख़िर्मन का है ख़ून-ए-गर्म दहक़ाँ का

    - ग़ालिब

    फिरती है अपने साथ लगी मुत्तसिल फ़ना

    आब-ए-रवाँ से हम हुए नाबूद हर जगह

    - मीर

    मिरी नुमूद ने मुझको किया बराबर-ए-ख़ाक

    मैं नक़्श-ए-पा की तरह पाएमाल अपना हूँ

    - मीर

    मरना है ख़ाक होना हो ख़ाक उड़ते फिरना

    इस राह में अभी तो दरपेश मरहले हैं

    - मीर

    बहरहाल, इस बिगाड़ का जो कुछ भी कारण हो, इस तरह के पतनशील दर्शन से हाफ़िज़ के ज़माने से लेकर आज तक हर एक सूफ़ी शायर प्रभावित हुआ है। इस तरह के विचारों का जितना विरोध किया जाए कम है, लेकिन जब एक ख़ास विचार को पर्दा बनाकर सूफ़ी शायरों की अच्छी बातों का भी विरोध किया जाता है तो फिर नतीजा ग़लत होता है। मिसाल के तौर पर हाफ़िज़ का एक शेर लीजिए,

    आसाइश-ए-दो गीती तफ़्सीर-ए-ईं दो हर्फ़स्त

    बा-दोस्तां तलत्तुफ़ बा-दुश्मनां मुदारा

    इस शेर के बारे में अगर कोई व्यक्ति इस तरह की राय दे कि जब हाफ़िज़ ने यह शेर कहा था तो वह तरक़्क़ी-पसंद (प्रगतिशील) था लेकिन अब रज्अत-पसंद (प्रतिक्रियावादी) है, तो इसके यह मायने होंगे कि उसे या तो क्लासिकी साहित्य को परखने का विज्ञान नहीं मालूम है या फिर वह लोगों को क्लासिकी साहित्य से दूर करना चाहता है। ग़ुलामी के दौर से लेकर पूँजीवादी व्यवस्था तक तब्क़ाती शऊर (वर्गीय चेतना) के विभिन्न चरण रहे हैं। अगर आज के दौर की वर्गीय लड़ाई में, जिसकी चेतना बहुत ही साफ़, तेज़ और उग्र है, हम ग़ुलामी के दौर या सामंती व्यवस्था के साहित्य को परखने की कोशिश करेंगे तो वह हमें यक़ीनन तुच्छ मालूम होगा। ऐसी सूरत में उनकी अर्थगत उपयोगिता को उभार कर उनके जमालियाती लुत्फ़ (सौंदर्यपरक आनंद) को बिल्कुल ही दबा देना ज़ुल्म करने के बराबर है। कार्ल मार्क्स ने यूनान के पौराणिक साहित्य और शेक्सपियर को इस नज़रिए से नहीं परखा है और यह नज़रिया अतीत के अदब-ए-आलिया (महान साहित्य) के बारे में रूस ही में प्रचलित है। इसकी बहुत सी मिसालें मौजूद हैं।

    डिकेंस के उपन्यासों में इंसान-दोस्ती (मानवतावाद) का जज़्बा वर्गीय संघर्ष के विरोधाभास पर हावी हो जाता है। आप डिकेंस को वर्गीय समझौतावादी कह सकते हैं लेकिन इससे डिकेंस की महानता घटती नहीं है, हालाँकि वह पूँजीवादी व्यवस्था का उपन्यासकार था। उसे ज़्यादा से ज़्यादा बुर्जुआ इंसान-दोस्त कहा जाता है, इसका कारण यह है कि उसकी दोस्ती मजलूम (शोषित) वर्ग के साथ बहुत ही स्पष्ट है। अगर यह मान भी लिया जाए कि डिकेंस के उपन्यासों में जमालियाती लुत्फ़ नहीं है, तो इंसान-दोस्ती के जज़्बे के तहत ही डिकेंस रूस में बहुत ज़्यादा लोकप्रिय है। अब आप एक सीढ़ी और उतरिए। शेक्सपियर का कोई भी ऐसा नाटक नहीं है जिसमें उसने अपने हीरो को मुक़द्दर (भाग्य) के साथ हम-नवा (सहमत) किया हो। दूसरे शब्दों में, उसका कोई भी हीरो तक़दीर के निर्माण में हावी नज़र नहीं आता है। शेक्सपियर के हीरो सोवियत रूस के हीरो की चेतना को बेदार (जागृत) नहीं कर सकते। फिर भी शेक्सपियर रूस में पढ़ा जाता है और डिकेंस के मुक़ाबले में ज़्यादा जमालियाती लुत्फ़ के साथ।

    अब आप एक सीढ़ी इससे भी नीचे उतरिए। यूनान का क्लासिकी साहित्य, जिसका ब्रह्मांडीय दृष्टिकोण बिल्कुल ही बचकाना है, आज की दुनिया में क्या उपयोगिता रखता है, लेकिन कार्ल मार्क्स उसे हर साल पढ़ता था। और उसे इंसानियत के बचपन के दौर की याद के नाम से याद करता था। इसी साहित्य के बारे में कार्ल मार्क्स ने यह क्लासिकी वाक्य भी लिखा है, यह समझना मुश्किल नहीं है कि यूनान की कला और साहित्य और उसके दौर एक ख़ास क़िस्म के सामाजिक विकास के साथ जुड़े हुए हैं। हाँ, यह समझने में यक़ीनन दिक़्क़त होती है कि वे आज भी क्यों जमालियाती लुत्फ़ का कारण बने हुए हैं। और कुछ मायनों में एक ऐसा पैमाना क़ायम किए हुए हैं जिसे हासिल करना बहुत मुश्किल है।

    यूनान के क्लासिकी साहित्य के बारे में कार्ल मार्क्स ने अपने विचारों को कई जगहों पर व्यक्त किया है। इन सबको सामने रखते हुए इस नतीजे पर पहुँचना पड़ता है कि अतीत के महान साहित्य के बारे में कार्ल मार्क्स का नज़रिया ऐतिहासिक था। चूँकि उसकी यथार्थवादी निगाहें एक दौर को दूसरे दौर के साथ गडमड नहीं करती थीं और चूँकि वह सामाजिक चेतना के विभिन्न चरणों से भी वाक़िफ़ था, इसलिए वह जमालियाती लुत्फ़ हासिल करने से परहेज़ भी नहीं करता था। आख़िर साहित्य का भी तो एक सौंदर्य है जिसे मार्क्स ने शाश्वत सौंदर्य (अबदी हुस्न) कहकर याद किया है। यह शाश्वत सौंदर्य, हाफ़िज़ के शब्दों में, हर व्यक्ति हासिल नहीं कर पाता है,

    हर-कि चेहरा बर-अफ़रोज़त दिलेरी दानद

    हर-कि आईना साज़द सिकंदरी दानद

    अगर मार्क्स का नज़रिया सही है तो यह मानना पड़ेगा कि हाफ़िज़ का शेर सिर्फ़ अतीत में ही तरक़्क़ी-पसंद नहीं था बल्कि आज की तारीख़ में भी हसीन है। क्योंकि वह जमालियाती लुत्फ़ का कारण बना हुआ है। अब मैं हाफ़िज़ का एक दूसरा शेर पेश कर रहा हूँ,

    हदीस अज़ मुतरिब-ओ-मय गो राज़-ए-दहर कमतर जो

    कि कस न-कुशूद न-कुशायद ब-हिकमत ईं मुअम्मा रा

    यह वाक़ई बड़ा रज्अत-पसंद (प्रतिक्रियावादी) ख़याल है कि जो पहेली हिकमत (दर्शन या ज्ञान) से खुल सके, भला उसे मुतरिब (गायक) कैसे खोल सकता है। शायद यही दर्शन ख़य्याम का भी था। फिर भी ख़य्याम ने ईरानी साहित्य में भौतिक और ऐंद्रिक (हिस्सी) दर्शन को जन्म दिया, लेकिन मैं ख़य्याम का सहारा क्यों लूँ। हाफ़िज़ के इस रज्अत-पसंद दर्शन के बारे में मेरा जो आज रिएक्शन है, वह विज्ञान और भौतिक विज्ञानों की बढ़ती हुई रोशनी के कारण है। जबकि रोज़-ब-रोज़ पहेली पर पहेली खुलती जा रही है। क्या यही बात हाफ़िज़ के वक़्त में भी सही थी? अगर आप हाफ़िज़ के वक़्त का जायज़ा लें, और यह बात तेरहवीं सदी ईसवी की है जब यूरोप में भी अँधेरा था, तो आपको मालूम होगा कि हाफ़िज़ के ज़माने में भौतिक विज्ञानों की शिक्षा बहुत कम थी। मदरसों में सिर्फ़ माक़ूलात (तर्कशास्त्र) और मनक़ूलात (धर्मशास्त्र) की किताबें पढ़ाई जाती थीं।

    माक़ूलात का दायरा ईश्वरीय दर्शन (फ़लसफ़ा-ए-इलाहियात) था और मनक़ूलात का दायरा हदीसें। ईश्वरीय दर्शन से भौतिक विज्ञानों को बिल्कुल ख़ारिज कर दिया गया था। भौतिक विज्ञानों के ख़िलाफ़ यह जंग तीन सौ साल पहले से लड़ी जा रही थी। इसकी शुरुआत मोतसिम बिल्लाह के ज़माने से होती है। जब भौतिकवादियों को (मज़े की बात यह है कि उस वक़्त वहदत-उल-वजूद को मानने वालों को भी भौतिकवादियों में गिना जाता था) मौत के घाट उतार दिया गया और तमाम भौतिक विज्ञानों की शिक्षा पर पाबंदी लगा दी गई। उस वक़्त से ईरान भौतिक विज्ञानों से दूर होता गया। हाफ़िज़ के वक़्त में तो ख़ालिस फ़िक़ही (इस्लामी क़ानून की) शिक्षा रह गई थी। ऐसे माहौल में अगर हाफ़िज़ ने फ़िक़ही हिकमत का विरोध किया तो क्या क़ुसूर किया।

    यहाँ जब हाफ़िज़ हिकमत के ख़िलाफ़ प्रतिक्रिया करके मुतरिब और मय (गायक और शराब) की तरफ़ बढ़ता है तो उसका इशारा सिर्फ़ महसूस की जाने वाली चीज़ों (महसूसात) की तरफ़ है और महसूसात ज्ञान की पहली सीढ़ियाँ हैं। इन्हीं मायनों में ख़य्याम और हाफ़िज़ ने ऐंद्रिक (हिस्सी) दर्शन को ईरानी साहित्य में दाख़िल किया है। यह ईरानी पैगनिज़्म की गूँज थी जो एक भौतिक दर्शन था।

    गब्र मी गोयद कि हस्त आलम नेस्त रब। (रूमी)

    भौतिकवाद की बुनियादों को मज़बूत करने के लिए पहले अपनी इंद्रियों (हवास) की ताक़तों को काम में लाना पड़ता है, भौतिक विज्ञान ईश्वरीय तर्क की कोख से नहीं पैदा होता है। यूनान का भौतिक दर्शन यूनान के पैगनिज़्म से पैदा हुआ। यूरोप में भी पुनर्जागरण (निशात-उस-सानिया) के आंदोलन के ज़माने में विचारक वर्ग और अदीबों ने पैगनिज़्म से बेपनाह अक़ीदत (श्रद्धा) का इज़हार किया, क्योंकि भौतिक जीवन की ख़ुशियों को उभारे बिना भौतिकवाद का नज़रिया मज़बूत नहीं होता है। हाफ़िज़ के सामने भौतिक विज्ञान नहीं थे, वह ख़ुद इमाम ग़ज़ाली के हाथों बैअत (दीक्षा) ले चुके थे। फिर भी उनकी शायरी में ईरानी पैगनिज़्म ऐंद्रिक यथार्थवाद (हिस्सिया हक़ीक़त-निगारी) के रूप में उभर आया है। भौतिक यथार्थवाद ऐंद्रिक यथार्थवाद के बिना वजूद में नहीं आता है। हाफ़िज़ का यह बहुत बड़ा कारनामा है कि उसने ईश्वरीय तर्क के सूखे तर्क-वितर्क के ख़िलाफ़ बग़ावत करके ऐंद्रिक यथार्थ की अभिव्यक्ति से ईरानी साहित्य को मालामाल कर दिया।

    इस मौक़े पर मेरे सामने अल्लामा इक़बाल के वो शेर भी हैं जो उन्होंने कभी हाफ़िज़ के बारे में कहे थे। मुझे उनकी इस आलोचना से इत्तेफ़ाक़ नहीं है। क्योंकि जहाँ तक हाफ़िज़ के 'अफ़लातूनी गोसफ़ंद' (प्लेटो की भेड़) होने का ताल्लुक़ है, हर वो शख़्स अफ़लातूनी गोसफ़ंद है जो माद्दे (पदार्थ) को मख़्लूक़ (रचना) समझता है। फिर यह कौन समझाए कि हाफ़िज़ 'सहबा-गुसार' (शराब पीने वाले) और मौलाना रूमी में क्या फ़र्क़ है क्योंकि एक से ख़तरे का इज़हार किया जाता है और दूसरे को इमाम बनाया जाता है। क्या इस ख़याल से कि हाफ़िज़ ज़्यादा ईरानी और रंगीन हैं? तीसरी बात और भी पेचीदा नज़र आती है। अल्लामा इक़बाल उरफ़ी के अनुसरण की हिदायत करते हैं और उरफ़ी हाफ़िज़ की शायरी पर अपना ईमान रखता है,

    गर ख़ुदावंदी हवस दारी दर इक़्लीम-ए-सुख़न

    बंदगी-ए-हाफ़िज़ शीराज़ी बायस्त कर्द

    - उरफ़ी

    इन तमाम बातों में अल्लामा इक़बाल ने एक बड़ी अच्छी बात कही है। वो है हाफ़िज़ की जादू-बयानी। इसमें शक नहीं कि जहाँ इसे हासिल करना मुश्किल है, वहीं इसकी नेमत ख़तरनाक भी है। वो आने वाली नस्लों को सहल-अंगारी (आसान रास्ता अपनाने) से रोकती है। उन्हें बार-बार याद दिलाती रही है कि ख़यालात को सिर्फ़ नज़्म कर देना (कविता में ढाल देना) ही शायरी नहीं है। शेर एक तख़्लीक़ी (रचनात्मक) चीज़ है जो सूरत और मानी (रूप और अर्थ) के द्वंद्वात्मक तरीक़ा-ए-कार से उभरती है।

    अब देखना है कि इन ग़लतियों का बुनियादी सबब क्या है। पहली ग़लती तो अलग-अलग देशों के सामाजिक विकास को समझने में होती है। पश्चिम का सामाजिक विकास और वहाँ का तबक़ाती शऊर (वर्ग चेतना) एशिया के ऐतिहासिक विकास और वर्ग चेतना से आगे रहा। हम पश्चिमी इतिहास के सुबूतों को यांत्रिक (mechanical) तौर पर पूरब पर लागू नहीं कर सकते और हम इतिहास के अलग-अलग दौरों को इस तरह ख़ानों में बाँट सकते हैं कि गोया एक का ताल्लुक़ दूसरे दौर से था ही नहीं। अक्सर हम यांत्रिक तौर पर दास सभ्यता की पीठ पर जागीरदाराना निज़ाम (सामंती व्यवस्था) और उसकी पीठ पर सरमायादाराना निज़ाम (पूँजीवादी व्यवस्था) की ईंट चुनते हुए चले जाते हैं और इन तीनों दौरों को एक मायने में एक युग (EPOCH) समझने में असमर्थ रहते हैं।

    इसमें शक नहीं कि जहाँ तक उत्पादन के साधनों और सभ्यता के भौतिक संसाधनों के बढ़ने और तरक़्क़ी करने का ताल्लुक़ है, एक दौर को दूसरे पर बरतरी (बढ़त) हासिल है और यह भी सच है कि ग़ुलाम के मुक़ाबले में खेत मज़दूर और खेत मज़दूर के मुक़ाबले में मिल मज़दूर की आज़ादी तुलनात्मक रूप से आगे बढ़ती रही है। लेकिन उत्पादन के साधनों पर एक ख़ास वर्ग के क़ब्ज़ा कर लेने से ग़ुलामी का दौर ख़त्म नहीं हो जाता, जब तक कि वो वर्ग शोषण की बुनियादों को ख़त्म कर दे। यही सबब है कि मार्क्स ने इन तीनों दौरों को एक युग कहकर भी याद किया है। यह पूरा युग ग़ुलामी का युग है। इसमें शोषण की शक्लें तो ज़रूर बदलती रही हैं लेकिन शोषण ख़त्म नहीं हुआ है। इन्हीं मायनों में समाजवादी इंक़लाब (क्रांति) अपने पिछले इंक़लाबों से बहुत ही अलग है। यह फ़र्क़ एक बुनियादी तब्दीली का है। समाजवादी इंक़लाब की यह बुनियादी ख़ासियत उस वर्ग चेतना का नतीजा है जिसे बुर्जुआ निज़ाम ने बहुत ही तेज़ कर दिया है। आज बुर्जुआ निज़ाम की वर्ग चेतना में जो तेज़ी और शिद्दत है, अगर उसकी बुनियाद पर आप जागीरदाराना निज़ाम (सामंती व्यवस्था) की वर्ग चेतना को जाँचने की कोशिश करेंगे तो आपको बड़ी नाकामी होगी, लेकिन इसके यह मायने नहीं कि जागीरदाराना निज़ाम में तबक़ाती जंग (वर्ग संघर्ष) या वर्ग चेतना नहीं थी।

    इससे सिर्फ़ इतना मतलब है कि उस वक़्त वर्ग चेतना इतनी आगे बढ़ी हुई थी जितनी कि आज है, क्योंकि उस वक़्त तक लूटने वाले और लूटे जाने वाले वर्गों का टकराव इतना उभर नहीं पाया था। जागीरदाराना निज़ाम के बहुत से दबे हुए अंतर्विरोधों को पूँजीवादी व्यवस्था ने उभारा है और इस व्यवस्था के बहुत से दबे हुए अंतर्विरोधों को समाजवादी व्यवस्था ने उभारा है। मैं वज़ाहत (समझाने) के लिए हिंदुस्तान के इतिहास से एक मिसाल देना चाहता हूँ। अंग्रेज़ों के आने से पहले देहात की ज़मीनों पर किसानों का क़ब्ज़ा था। ज़ाहिर तौर पर उत्पादन के साधनों पर अधिकार व्यक्तिगत था लेकिन वो अपनी मेहनत से भरपूर फ़ायदा उठा पाते थे। क्योंकि पैदावार का एक तिहाई या चौथाई हिस्सा वो जागीरदार को भी देते थे जो कि ज़मीनों के मालिक थे, लेकिन चूँकि उत्पादन के साधनों पर सीधा क़ब्ज़ा जागीरदार का था, इसलिए जागीरदारों और किसानों का वर्गीय टकराव भी इतना शदीद (तीव्र) था, जितना कि अंग्रेज़ी राज में हुआ।

    अंग्रेज़ों के आने से यहाँ के वर्गीय संबंधों में एक बुनियादी तब्दीली पैदा हुई। अंग्रेज़ों ने देहात के सामूहिक जीवन को तबाह करके ज़मीनें लगान जमा करने वाले वर्ग यानी ज़मींदारों को दे दीं। अब ज़मीनी उत्पादन के साधनों पर सीधा क़ब्ज़ा ज़मींदारों का है। क्योंकि वो उन्हें बेदख़ल भी कर सकता है। यही सबब है कि आज उनकी लड़ाई आगे बढ़ी हुई है और उनकी वर्ग चेतना बहुत बेदार (जाग्रत) है। आज की ऐसी शऊरी आगही (जागरूकता) जागीरदाराना निज़ाम में थी, लेकिन वर्गीय कशमकश तो थी ही। यह बात सही है, लेकिन इस कशमकश का इज़हार उस वक़्त शाही राजनीति में होता था। एंगेल्स कहता है कि तमाम क्रांतिकारी तत्व जो जागीरदाराना निज़ाम की परतों में उठते थे, वो सब के सब शाही ताक़त की तरफ़ रुजू होते थे (मुड़ते थे) और आख़िर-उज़-ज़िक्र (यानी शाही ताक़त) उनकी तरफ़ रुजू होती थी।

    ऐसी सूरत में जब हम जागीरदाराना निज़ाम की राजनीति और वर्ग चेतना का पता लगाने की कोशिश करें तो हमें बादशाहों की राजनीति को नज़रअंदाज़ नहीं कर देना चाहिए। यह रास्ता काफ़ी मुश्किल है, यहाँ सिर खपाने की ज़रूरत पड़ती है। हमें जल्दबाज़ी में किसी भी शोषक वर्ग के विचारक की आलोचना क़बूल नहीं करनी चाहिए क्योंकि वो अपने विरोधी वर्ग की पोल खोलने में तो बहुत ही कामयाब रहता है लेकिन वो हक़ीक़त की तहों तक नहीं पहुँच पाता है। उसका शोषक रुझान हक़ीक़त तक पहुँचने में एक पर्दा बन जाता है। ख़ैर यह एक ज़िमनी (गौण) बात हुई, वरना सितम-ज़रीफ़ी (विडंबना) तो उस वक़्त शुरू होती है जब मीर और ग़ालिब की शायरी में किसानों की बग़ावत और प्लासी की जंग का ज़िक्र नहीं मिलता है तो उन्हें रज्अत-पसंद (प्रतिक्रियावादी) कहकर अलग कर दिया जाता है। इतिहास का यह यांत्रिक तसव्वुर (अवधारणा) हमें दूसरी क़िस्म की ग़लतफ़हमियों में मुब्तिला कर देता है। कभी-कभी हम समाजवादी और फ़्यूडल (सामंती) निज़ाम को दो पलड़ों में रखकर मुवाज़ना (तुलना) करने लगते हैं और जब फ़्यूडल का पलड़ा हल्का नज़र आता है तो फिर अतीत की सेहतमंद रिवायतों (स्वस्थ परंपराओं) पर भी हिक़ारत की नज़र डालने लगते हैं।

    अतीत की सेहतमंद रिवायतों को हिक़ारत से देखने का यह जज़्बा असल में इतिहास को मिटाने का जज़्बा है और इतिहास को वही मिटाता है जिसमें कुछ एहसास-ए-कमतरी (हीन भावना) होती है। वो तमाम अदीब और शायर जो अपने फ़न को इस हद तक चमका नहीं सके हैं कि अपने कलाम में भी एक अबदी हुस्न (शाश्वत सौंदर्य) पैदा कर सकें, अतीत की हसीन रिवायतों को मिटाने की कोशिश करते हैं ताकि साहित्यिक हुस्न का वाहिमा (भ्रम) ही ख़त्म हो जाए।

    यह हमेशा रहने वाला हुस्न सिर्फ यूनान के क्लासिकी अदब (साहित्य) में ही नहीं मिलता है बल्कि हर दौर की बेहतरीन अदबी तख़्लीक़ों (रचनाओं) में मिलता है। हर दौर के अदब का सिर्फ मवाद (विषय) ही बदला हुआ है बल्कि हैयत (रूप) भी बदली हुई है। फिर भी उनके आपसी मेल से जो हुस्न पैदा हुआ है, वह सिर्फ हैयत को नसीब नहीं हुआ है। हमें इस हक़ीक़त को मानना पड़ेगा और इस हक़ीक़त तक पहुँचने के लिए हमें अदब के अलग-अलग अनासिर (तत्वों) का पता लगाना है। यह बात तो सही है कि अदब ख़ास क़दरों (मूल्यों) और ख़यालात का प्रचार करता है लेकिन देखना यह है कि इस प्रचार का असर वक़्ती (अस्थायी) है या देरपा (स्थायी)। वह हमारे जज़्बात और ख़यालात को हरकत में लाकर एक देरपा काम की तालीम देता है या सिर्फ वक़्ती जोश में लाकर छोड़ देता है। वह हमारे एहसासात और नफ़्सियात (मानसिकता) की जवाबी सलाहियतों (क्षमताओं) को छूता है कि नहीं। उसमें इतनी सलाहियत है कि नहीं कि वह हमारी नफ़्सियात पर असर डालकर हमें हालात को बदलने और ख़ुद अपने को बदलने में मदद कर सके और हमारी नफ़्सियात को नई क़दरों के साथ हमनवा (सहमत) करके एक नई जज़्बाती तंज़ीम (भावनात्मक व्यवस्था) भी कर सके।

    अगर यह ताक़त और मज़बूती किसी शायर के कलाम में नहीं है तो यह मानना पड़ेगा कि यह क़ुसूर माज़ी (अतीत) की हसीन रवायतों का नहीं है। यह उसकी अपनी कमज़ोरी है। उसमें इतनी सलाहियत नहीं कि वह अपने ख़यालात और जज़्बात को ऐसे ज़िंदा और मुतहर्रिक (गतिशील) साँचों में ढाल सके जिनकी वापसी से हमारे अंदर नया जीवन पैदा हो जाए, मुशाहिदे (अवलोकन) और तजुर्बे की बदगुमानियाँ (ग़लतफ़हमियाँ) दूर होने लगें और क़दम-क़दम पर सच्चाई की दाद देती जाएँ। यही वह रास्ता है जिस पर चलकर हम अवाम को नए ख़याल से वाक़िफ़ कर सकते हैं और नए मार्के (संघर्ष) की तरफ़ उकसा सकते हैं, यह उकसाहट उसी वक़्त देरपा हो सकती है जब वे शायर के मुशाहिदे और ख़याल की सच्चाई को अपने ज़ाती तजुर्बे की सतह पर महसूस करें और उन्हें उन लफ़्ज़ों, तश्बीहों (उपमाओं) और तस्वीरों के ज़रिए महसूस करें जिनसे उनके हवास (इंद्रियाँ) वाक़िफ़ हैं।

    यहाँ हमें अवामी अदब (लोक साहित्य) और माज़ी की रवायतों से बहुत सी चीज़ें उधार लेनी पड़ेंगी। यह काम चीख़ने और चिंघाड़ने से ज़्यादा तपने और तपाने का है। तक़रीर (भाषण) का काम वक़्ती होता है लेकिन अदबी शाहकार (उत्कृष्ट रचना) का असर देरपा होता है, वे इंसानी ज़ेहन में रेंगते रहते हैं, हमें बार-बार उकसाते और अपना हमख़याल बनाने की कोशिश करते हैं। उसके काम की प्रेरणा में एक ऐसी मज़बूती होती है जो भारी पहाड़ का भी मुक़ाबला कर सकती है। ऐसा ही अदब फाँसी पर झूलने का हौसला भी बख़्शता है। यह मर्तबा (दर्ज़ा) तक़रीर को हासिल नहीं हुआ करता है। शेर-ओ-अदब की तख़्लीक़, तसव्वुरात (विचारों) को दोहराना नहीं बल्कि तजुर्बात को नए सिरे से तख़्लीक़ करने का काम है।

    इस काम के तरीक़े को तफ़्सील (विस्तार) से समझा भी जा सकता है, इन्हीं मायनों में यह कोई मोजज़ा (चमत्कार) भी नहीं है। इस तरीक़े को समझने में इल्म-ओ-अदब (ज्ञान और साहित्य) की मशहूर हस्तियों के कलाम का मुताला (अध्ययन) बहुत ही मदद करता है। गोर्की का अदब फ़्लाबेयर के अदब से बुनियादी तौर पर अलग है, फिर भी उसने फ़्लाबेयर से लिखना सीखा। चेखव का फ़न किसी हद तक दुख-निराशा और उदासी के जज़्बात से भरा है, फिर भी गोर्की को यह कहना पड़ा कि जब मैं तुम्हारे फ़न से अपने फ़न का मुक़ाबला करता हूँ तो ऐसा मालूम होता है कि मैं क़लम से नहीं बल्कि बाँस से लिख रहा हूँ।

    ये ऐसी मिसालें हैं जो शेर-ओ-अदब की तख़्लीक़ में मील का पत्थर साबित हो सकती हैं और अगर इंसान मेहनत करता रहे तो वह अपने फ़न को माँज भी सकता है। फिर भी वह सिर्फ इसी रास्ते से सही अदबी तख़्लीक़ तक नहीं पहुँच सकता है, उसे अवाम की ज़िंदगी से सबक़ सीखना पड़ता है और जब वह यह काम ज़िंदगी के किसी इंक़लाबी मोड़ पर अंजाम देता है तो उसे माज़ी की रवायतों को जगाना भी पड़ता है। वह माज़ी से नारे, नाम और लिबास सब उधार लेता है ताकि वह नई हक़ीक़त को अवाम के पसंदीदा लिबास में पेश कर सके। आज का इंक़लाबी शायर जिस हद तक इस हक़ीक़त से दूर होता जाएगा, अवाम से भी दूर होता जाएगा।

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